कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव के लिये जारी जंग पर पानी भी फिरने लगा है और जंग भी लगनी शुरू हो गई है। जो लोग अन्तिम सांस तक प्रेस क्लब को अभंग देखना चाहते थे उसके पद और पदलाभ को अपनी बपौती मान बैठे थे, उन सारे के सारे लोगों ने धीरे-धीरे नयी कमेटी के चुनाव की बागडोर अपने हाथो में मैनेज कर ली है। जो युवा पत्रकार लोग परिवर्तन के लिये मुट्ठी ताने थे वे हाथ खोलकर खारिज प्रेस क्लब के मठाधीशों से घुल मिल गये लगते हैं।
तभी तो तकरीबन पुरानी कमेटी ही सदस्यता सूची की जांच करेगी, पुरानी कमेटी ही तय करेगी कि चुनाव किसकी देख-रेख में होगा और पुरानी कमेटी ही यह भी बतायेगी कि पत्रकार कौन है और कौन नहीं…। और अगर ऐसा ही कुछ हुआ तो यह बदलाव केवल किसी बोतल के लेबल बदलने जैसा ही होगा… बस! न शराब बदलेगी और न ही बोतल…। वैसे भी यह बात पत्रकारों की कौम को खुद समझनी चाहिये कि जिन लोगों ने घोर अलोकतांत्रिक तरीके से कानपुर के समूचे पत्रकार जगत की भावनाओं को वर्षों चिढ़ाया और खिझाया है वही लोग अब नये लोकतंत्र की रचना करेंगे। सौरभ शुक्ला! यह नाम इस चुनाव में परिवर्तन का चेहरा बनकर उभरा है लेकिन अब उनका कहना है कि वह अकेले क्या कर सकते हैं? इसका सीधा सा अभिप्राय है कि उनकी भूमिका अब शिथिल है। उनकी बातचीत में ‘यथास्थितिवाद’ का पूरा पुट है।
उनका कहना है कि जब अखबार की ओर से महेश शर्मा, सरस बाजपेयी, इरफान, राजेश द्विवेदी के नाम स्क्रीनिंगकमेटी के लिये भेजे गये हैं तो हम ‘अखबार’ से थोड़े ही लड़ सकते हैं…? वैसे मेरी जानकारी में स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों को हिन्दुस्तान, अमर उजाला या दैनिक जागरण के बोर्ड आफ डायरेक्टरों ने अपना प्रतिनिधि घोषित नहीं किया है। रही बात अखबार से लडऩे या न लडऩे की तो इस मुगालते में भी किसी पत्रकार को नहीं होना चाहिये कि वह किसी अखबार से लड़ भी सकता है। खुद पीछे पलट कर देखें… प्रेस क्लब के चुनाव हों… इसके लिये जब-जब शहर के युवा क्रान्तिकारियों से कहा गया तो सभी ने एक ही जवाब दिया- भैया! नौकरी बचाएं कि प्रेस क्लब की राजनीति करें। आखिर घर गृहस्थी और बीवी बच्चे भी तो हैं…। इन्हीं जवाबों के कारण ही मैंने हिन्दुस्तान, अमर उजाला, जागरण और राष्ट्रीय सहारा के सम्पादकों और प्रबन्धकों से सीधी बात की। सभी से निवेदन किया कि वे अपने अधीनस्थों में यह विश्वास जगाये कि प्रेस क्लब की सक्रियता से नौकरी या अखबार का कोई मतलब नहीं है। मैं समझता हूं जो बदलाव हुआ उसमें सभी अखबारों के उच्च पदस्थ लोगों की सहमति शामिल है। अब इस सहमति का मान-सम्मान बनाये रखना, उसे बढ़ाना और प्रेस क्लब की खोई प्रतिष्ठा को वापस लाना, किसी और का नहीं आम पत्रकारों का काम है। यह मौका है ‘आत्मशुद्धि’ का और इसके लिये मठों और उनके धीशों को धो-धाकर कोने में खड़ा करना होगा।
सरस बाजपेयी, महेश शर्मा, राजेश द्विवेदी, इरफान, कवीन्द्र कुमार, इन सभी लोगों पर समय से चुनाव न होने का दोष है। फिर ये लोग नये चुनाव कराने के अधिकारी कैसे हो सकते हैं। ये चुनाव लड़ तो सकते हैं लेकिन चुनाव करा कैसे सकते हैं। ‘चुनाव आयोग’ की संरचना ध्यान में होनी चाहिये। क्या सत्ताधारी दल कभी चुनाव आयोग की भूमिका अदा कर सकता है…? या तो चुनाव संचालन में शामिल लोग चुनाव न लडऩे का फैसला करें… या फिर चुनाव लडऩा है तो चुनाव संचालन की प्रक्रिया से खुद को अलग रखें। खुद सोचिये! अगर कानून बनाने वाले, अपराध करने वाले और फैसला सुनाने वाले चेहरे एक ही हैं तो प्रेस क्लब के नाम पर न्याय और सच्चाई का इतना तूफान क्यों … और अगर ऐसा ही फेने वाला तूफान उठाना था तो मेरे जैसे किनारे खड़े पत्रकार को बीच में लाने की आवश्यकता ही क्या थी…?
वैसे मैं अनावश्यक ही खुद को बीच में समझ रहा हूं। सच बात तो ये हैं कि जब तक कमेटी भंग नहीं हुई क्रान्तिकारियों ने मुझे पल-पल की खबर दी और राय मशविरा किया। जैसे ही कमेटी भंग हुई उसके बाद क्या चल रहा है इसकी जानकारी देना किसी ने भी मुनासिब नहीं समझा…। खैर! कोई बात नहीं…
मैं झूम के गाता हूं, कमजर्फ जमाने में, इक आग लगा ली है, इक आग बुझाने में…
यह कहने वाला भी तो मैं ही हूं।
लेखक प्रमोद तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं. कानपुर में निवास करते हैं. अपने बेबाक लिखने और बोलने के लिए जाने जाते हैं. ”हैलो कानपुर” के प्रधान संपादक हैं.












raj kaushik
May 29, 2011 at 5:30 am
pramod ji. sher gazab ka hai. iske liye badhai. ho sake to apna phone no. de den. thanx.
-raj kaushik, r.e.DLA, ghaziabad
9811449246
singh manoj
May 29, 2011 at 12:41 pm
अरे चुनाव कराने वालों….कुछ तो सौंप दीजिये प्रमोद जी के हाथों में…कहीं लटक कर गिर ही न जाएँ..आखिर आखिरी बेला का तकाजा है….
और प्रमोद जी…पहले वाली आग भी आप ही ने लगाई थी…अब दूसरी बुझाने में तीसरी और तीसरी के चक्कर में चौथी….यह तो चलता ही रहेगा…अब आग लगा कर झूमिये…या झूम कर आग लगाईये…. बात तो बराबर है न……रही बात कमज़र्फ जमाने की….तो इतना समझ लीजिये…”अगर आपकी ईमानदारी में जर्क नहीं होता, तो शायद यह ज़माना आपके लिए कमज़र्फ नहीं होता…”
praveen shukla
June 1, 2011 at 10:15 am
लगता है कि आप शेरो शायरी और प्रमोद जी के गहरे जानकार है, और प्रेस क्लब कानपुर से भी आपका गहरा नाता है ! कानपुर की पत्रकारिता पर भी आपकी गहरी निगाह दशको से है ! कानपुर में तो कोई ‘सिंह मनोज’ नाम से कोई कलम का धनी है नहीं, निश्चित ही आप भी अरुण कानपुरी की तरह ही शहर से दूर और प्रमोद जी के सताए है .लेकिन वाह, क्या पकड़ है आपकी कानपुर प्रेस क्लब की नब्ज पर . ! नौ बरस पुरानी समिति को जब अन्ना हजारे की ओट में शिकार बनाया गया तो वर्तमान समिति के तोते उड़ गए ! इसके बाद पूरे प्रेस क्लब ने एडी चोटी का जोर लगा कर सिर्फ एक काम किया की किसी भी तरह से प्रमोद जी के हाथ में प्रेस क्लब का कोई सिरा भी नहीं लगना चाहिए ! और अभी तक पुरानी समिति अपने इरादों में सफल है ! लेकिन आपको बता दें , कि आग बुझाने के लिए आग लगा दी गयी है और अगर आपको अलोकतांत्रिक और नीयतखोर समिति के प्रति ज़रा भी हमदर्दी है तो कृपया दूरी ही बनाए रखे, वरना सामने आयें. अगर उनकी “ईमानदारी में जर्क नहीं होता तो उनके लिए दुनिया कमजर्फ नहीं होती !” इस तरह की फिलूल बातें न करें.आपकी टिप्पणी आज की तारीख में कानपुर के किसी पत्रकार के
गले नहीं उतरेगी. ……