मैं झूम के गाता हूं, कमजर्फ जमाने में, इक आग लगा ली है, इक आग बुझाने में…

कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव के लिये जारी जंग पर पानी भी फिरने लगा है और जंग भी लगनी शुरू हो गई है। जो लोग अन्तिम सांस तक प्रेस क्लब को अभंग देखना चाहते थे उसके पद और पदलाभ को अपनी बपौती मान बैठे थे, उन सारे के सारे लोगों ने धीरे-धीरे नयी कमेटी के चुनाव की बागडोर अपने हाथो में मैनेज कर ली है। जो युवा पत्रकार लोग परिवर्तन के लिये मुट्ठी ताने थे वे हाथ खोलकर खारिज प्रेस क्लब के मठाधीशों से घुल मिल गये लगते हैं।

 

कानपुर के प्रेसक्लबिया पत्रकारों और उनकी राजनीति के बारे में मैं क्या कहूं

: अभी काम पूरा नहीं हुआ है : लगभग 9 बरस बाद कानपुर प्रेस क्लब नीयतखोर कार्य समिति के चंगुल से मुक्त हुआ। परिवर्तन के पक्षधर कुछ पत्रकारों ने हिम्मत दिखाई और खुद को अजेय समझने वाले मठाधीशों को पलक झपकते औंधा कर दिया। एक जुलाई को नये चुनाव घोषित हुये हैं। प्रेस क्लब से मेरा सीधा नाता रहा है। मेरे ही महामंत्रित्व काल में इस मंच ने प्रेस क्लब का पुनरुद्धार कराया और ‘पत्रकारपुरम’ आवासीय योजना को मूर्त रूप दिया।

2010 कनपुरिया पत्रकारों के मानमर्दन का वर्ष

: चौथा कोना – खुद सुधरो फिर छेड़ो सुधार की मुहिम : एक आईपीएस अधिकारी ने कानपुर प्रेस को सिखाया सबक : दिसम्बर के आखिरी हफ्ते में पलटकर देखा जाता है बीते साल को. चौथा कोने से पलटकर देखने में 2010 कनपुरिया पत्रकार के मानमर्दन का वर्ष कहा जायेगा. एक आईपीएस अधिकारी ने कानपुर प्रेस को यह सबक दिया है कि चाहे नौकरी वाले पत्रकार हों या फैक्ट्री (प्रेस) मालिक वाले पत्रकार अगर अपने गरेबान में झांके बगैर दूसरे में खोट निकालने का धन्धा करोगे तो मारे जाओगे…. तन से भी, मन से भी और धन से भी.