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यशवंत दोगला और डरपोक है

राहुल कुमारउस दिन जब नई दिल्ली, फ्रेंड्स कॉलोनी में स्पेशल सेल (दिल्ली पुलिस) में पुलिस इंस्पेक्टर के सामने बैठा था तो अंदाजा हुआ कि बाहर से बड़ी-बड़ी बातें करने और बिंदास लिखने वाला यशवंत कितना दोगला और डरपोक है. उस दिन चिदंबरम का बयान आया था कि अगर किसी ने भी माओवादियों के समर्थन में बोला तो उसे राष्ट्रद्रोही समझा जाएगा और उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इसी से तमक कर मैंने कुछ उल्टी-सीधी चीजें लिखी थी जिसे यशवंत ने खट से छाप दिया.

राहुल कुमारउस दिन जब नई दिल्ली, फ्रेंड्स कॉलोनी में स्पेशल सेल (दिल्ली पुलिस) में पुलिस इंस्पेक्टर के सामने बैठा था तो अंदाजा हुआ कि बाहर से बड़ी-बड़ी बातें करने और बिंदास लिखने वाला यशवंत कितना दोगला और डरपोक है. उस दिन चिदंबरम का बयान आया था कि अगर किसी ने भी माओवादियों के समर्थन में बोला तो उसे राष्ट्रद्रोही समझा जाएगा और उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इसी से तमक कर मैंने कुछ उल्टी-सीधी चीजें लिखी थी जिसे यशवंत ने खट से छाप दिया.

उससे पहले भी मेरे कुछेक लेख वहां छपे थे और कई गालियां पाठकों ने मुझे सुनाई थीं. खैर, अपने बाकी लेखों से मिली गालियां मेरे लिए मायने नहीं रखती थी क्योंकि मुझे जो सही लगा था, मैंने वही लिखा था. इस बार चिदंबरम के बारे लिखते हुए शायद मैं कुछ ज्यादा ही आगे निकल गया था जिसका मुझे थोड़ा बहुत मलाल भी था. अपने दोस्तों को मैंने उसी शाम बताया भी कि यह मुझे ठीक नहीं लग रहा.

बहरहाल, भड़ास पर छपा वो लेख सायबर पुलिस या किसी और माध्यम से पुलिस के कानों तक पहुंचा. पुलिस ने यशवंत को नोटिस भेजा. यशवंत ने उस रात मुझे फोन किया और कहा, ’राहुल भाई, क्या कमाल लिखा है आपने, प्रशासन की तो फट गई है. अब तो मेरा भी यही मन होता है सब छोड़-छाड़कर माओवादी बन जाऊं.’

मैं थोड़ा बेवकूफ किस्म का इंसान हूं, कनफ्यूज्ड किस्म का भी. जब कोई मेरी बुराई या बड़ाई करता है तो समझ नहीं आता क्या प्रतिक्रिया देनी है. हां-हां करता हूं, थोड़ा सा असहज हो जाता हूं और इस भाव को मेरा चेहरा सामने नहीं आने देता.

दारू पीकर आदमी सच बोलता है, ऐसा फिल्मों में सुना था पर यह कितना बड़ा झूठ है, इसका पुख्ता सबूत है – यशवंत. यशवंत ने अगले दिन सुबह फिर से फोन किया. अबकी शायद उसकी बात पुलिस इंस्पेक्टर से हो चुकी थी. उसने मेरा लेख अपनी साईट से डीलीट कर दिया था. वह कहने लगा, ’राहुल भाई, जितने लोगों को पढ़ना था उनने तो पढ़ ही लिया है. फ़िलहाल के लिए इसको डीलीट कर रहा हूं. आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है, मैं हूं आपके साथ. मैं जाऊंगा आज थाने पर. आप नहीं भी आएंगे तो कोई बात नहीं. मैं सब संभाल लूंगा, क्या उखाड़ लेंगे ये, अरे आपने वही तो लिखा है जो सही है.’

मैंने कहा, ’यशवंत भाई, अगर डरना ही रहता तो लिखता क्यों! जो महसूस किया है वही लिखा है, आप बस ये बताइए कि कहां पहुंचना है और बेफिक्र रहिए’

फ्रेंडस कॉलोनी में यशवंत के आने से आधे घंटे पहले मैं पहुंच गया था. ऑटो में उसके साथ काला गोगल लगाए एक और आदमी था जो दिखने से तो निहायत टुच्चा लगता था, असलियत का पत नहीं. यशवंत से यह मेरी पहली मुलाकात थी. असल में मैं उसके लिखने के अंदाज का कायल भी था इसलिए उसे देखकर अच्छा लगा था.

हम अंदर गए. यशवंत ने मुझसे कहा कि मैं अपनी पहचान गुप्त रखूं. मैं सोच में पड़ गया. फिर हामी भर दी. शुक्र है कि वह इंस्पेक्टर मुझे पहचान गया था क्योंकि लेख के साथ भड़ास पर मेरी फोटो भी छपी थी. पूछताछ का सिलसिला शुरु हुआ.

यशवंत इस बात से इनकार कर गया कि उसने मेरा यह लेख पढ़ा था. उसने पुलिस अफसर को कहा कि ऐसे कई लेख दिनभर उसके पास आते रहते हैं और उसे तो इन्हें पढ़ सकने का वक्त ही नहीं. कहा कि उसने एक नवयुवक को लेख वगैरह छापने के लिए रखा हुआ है जो शायद गलती से यह लेख छाप गया. आगे उसने कहा, ’सर जैसे ही आपका नोटिस मिला तो मैंने इनका (मेरा) लेख पढ़ा और यह बिल्कुल अतार्किक लगा. मैंने फौरन हटा दिया.’ फिर मुझे बचाने की कवायद में जुटा यशवंत कहने लगा, ’अभी कम उमर के हैं, भावावेश में लिख डाला होगा, धीरे-धीरे समझ जाएंगे.’

मुझे ताज्जुब हुआ. क्या ये वही यशवंत है जो दुनिया भर की बातें करता रहता है. क्या ये वही यशवंत है जो बातों से बहुत बड़ा बागी, फ़ेमिनिस्ट, एथिस्ट, कम्यूनिस्ट दिखता है?

पुलिस वाला मेरी तरफ मुखातिब हुआ तो मैंने उसे साफ-साफ कहा कि हां आवेश में जरूर लिख गया लेकिन चूंकि वे भी हमारे देश के नागरिक हैं और हमें उनके पक्ष में या विपक्ष में बोलने से कोई मंत्रालय नहीं रोक सकता. यशवंत कुर्सी के नीचे से मुझे चिकोटी काट रहा था ताकी मैं संभल के बोलूं.

खैर मैंने वही बोला जो मुझे बोलना चाहिए था, यशवंत ने वही बोला जो ऐसी हालत में कोई भी डरपोक बोलता. और फिर उसे अपनी साईट भी तो चलानी थी. फिर झूठा चरित्र ओढ़कर हीरो बनने की क्या जरूरत है. उस दिन के पहले तक हर दो दिन पर उसका कॉल आ जाया करता था लेकिन पुलिस प्रकरण के बाद वह शायद मुझसे नजर मिलाने की हिम्मत में नहीं है. तभी तो न कोई फ़ोन, न कोई एसएमएस, न कोई ई-मेल.

यशवंत फट्टू है. आज अपनी साईट की तुलना उसने जनसत्ता से कर डाली और खुद को प्रभाष जोशी के साथ खड़ा कर डाला, बहाना चाहे जो भी हो. मैं उससे बस इतना ही कहूंगा कि एक बेइमान आदमी को यह सब शोभा नहीं देता. मुझे उसे सरेआम करके कुछ नहीं मिलना लेकिन उसका लेख पढ़कर सब कुछ दोबारा से सामने आ गया और इस बार रहा नहीं गया.

लेखक राहुल कुमार बिहार के बेगुसराय ज़िले के निवासी हैं. पांच साल से दिल्ली में हैं और पांच महीनों से पत्रकारिता के पेशे में. इस पोस्ट से पहले उनके तीन आलेख भड़ास4मीडिया के विचार सेक्शन में प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है–

मैं मर्द हूं, तुम औरत, मैं भूखा हूं, तुम भोजन

क्या ये पत्रकार कहे जाने लायक हैं

क्या होगी उपर वाले की लैंग्वेज

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  1. यशवंत

    September 25, 2010 at 2:31 pm

    भाई, इतना वक्त नहीं है कि आपके आरोपों के जवाब के लिए अलग से पोस्ट लिखूं. कमेंट के रूप में अपनी बात रख देता हूं. पहली बात तो ये कि आप खुद के बारे में जितनी कांट्राडिक्टरी बातें कर रहे हैं, वह बताता है कि कनफ्यूजन बहुत ज्यादा है, राय बहुत जल्दी बना लेते हैं. जिस लेख को विचार सेक्शन पर अनपब्लिश किया गया, उस लेख के बारे में खुद इसी पोस्ट में आप कह रहे हैं कि

    ”…इस बार चिदंबरम के बारे लिखते हुए शायद मैं कुछ ज्यादा ही आगे निकल गया था जिसका मुझे थोड़ा बहुत मलाल भी था. अपने दोस्तों को मैंने उसी शाम बताया भी कि यह मुझे ठीक नहीं लग रहा….”

    सच है, आपने अति भावुकता अति क्रांतिकारिता में लिख डाला, और मैंने भी अति भावुकता और अति क्रांतिकारिता में छाप डाला. आपको लेख छपने के बाद लगा कि ज्यादा आगे निकल गया व इसका आपको मलाल हुआ और मुझे पुलिस से नोटिस आने के बाद लेख को दुबारा ठीक से पढ़ने के बाद लगा कि लेख बहुत बचकाना किस्म का है, कोरी भावुकता व सतही अति क्रांतिकारिता से भरा, तर्क व तथ्य के लिहाज से शून्य लेख, जिसे किसी हालत में डिफेंड नहीं किया जा सकता. ऐसे में गल्ती को दुरुस्त करने की जगह उस पर थेथरई करना मुझे उचित नहीं लगा. तुरंत अनपब्लिश किया. एक न्यूजमैन गल्ती करता है, और, गल्ती कुबूलता भी है. बात पुलिस की हो या पब्लिक की, अपना पक्ष कमजोर है तो उसे स्वीकारना चाहिए.

    आपकी दूसरी बात- ”राहुल भाई, क्या कमाल लिखा है आपने, प्रशासन की तो फट गई है. अब तो मेरा भी यही मन होता है सब छोड़-छाड़कर माओवादी बन जाऊं.’’

    हां, ये मैंने कहा. मैं माओवादी होने, क्रांतिकारी होने, दुनियादार होने, गीतकार होने, संगीतकार होने, लेखक होने, पत्रकार होने, धनी होने, बदमाश होने, प्रेमी होने के सपने समय-समय पर हालात वश देखा करता हूं, इन हिस्सों को जीता रहता हूं. ये आज के जमाने का सच है. मेरे में दस-बीस आदमी हैं, सौ आदमी भी हो सकते हैं, मैं कहां इनकार कर रहा.

    आपने अपने लेख में खुद के बारे में लिखा है- ”मैं थोड़ा बेवकूफ किस्म का इंसान हूं, कनफ्यूज्ड किस्म का भी.”

    ठीक लिखा है, यह बेवकूफी और कनफ्यूजन आपके लिखे से झलक भी रही है.

    आपने लिखा है- ”दारू पीकर आदमी सच बोलता है, ऐसा फिल्मों में सुना था पर यह कितना बड़ा झूठ है, इसका पुख्ता सबूत है – यशवंत.”

    दोस्त, दारू पीकर आदमी वो हो जाता है, जो असल जीवन में नहीं हो पाता. सपने और दारू पीने के बाद की अवस्था में काफी कुछ साम्य होता है. मैं अक्सर दारू पीकर सपने देखता हूं. ऐसा मैं अपने पिछले कई आलेखों में लिख चुका हूं. अगर पुलिस के नोटिस आने के रोमांच और आपका लेख छापने के जज्बे के कारण तात्कालिक भावावेश में, दारू के नशे में, मैं माओवादी बनना चाहता था तो यह बिलकुल सहज है, स्वाभाविक है. मैं दारू पीकर कभी धनवान बनने के बारे में सोचना लगता हूं तो यह भी सच है. मैं दारू पीकर कुमार गंधर्व और भीमसेन जोशी को गाने लगता हूं और सब छोड़ छाड़कर संन्यास लेने का प्लान कर लेता हूं तो यह भी सच है. आदमी में बहुत उलझाव होता है दोस्त. आप जैसे सीधे, सरल, सहज, निश्छल, भावुक, सपाट लोग कम ही हैं.

    आपने लिखा… ”यशवंत के आने से आधे घंटे पहले मैं पहुंच गया था. ऑटो में उसके साथ काला गोगल लगाए एक और आदमी था जो दिखने से तो निहायत टुच्चा लगता था, असलियत का पता नहीं.”

    किसी अपरिचित आदमी के बारे में, उसके चेहरे के आधार पर आप इतने अमानवीय हो जाएंगे लिखते हुए, मुझे यह उम्मीद नहीं है. न ही यह आपको शोभा देता है. खैर, कोई बात नहीं. आपने यह पोस्ट भी उसी भावुकता में लिख मारी है जिस भावुकता में आपने चिदंबरम को गोली मारने और संसद को बम से उड़ाने की कविता लिख दी थी और आप की ही तरह भावुक मैं, एक युवा क्रांतिकारी लेखक के लिखे को स्थान देने की भावना के साथ बिना गहन जांच पड़ताल के, बिना ठीक से पूरा पढ़े छाप बैठा.

    आपने लिखा है… ”आगे उसने कहा, सर जैसे ही आपका नोटिस मिला तो मैंने इनका (मेरा) लेख पढ़ा और यह बिल्कुल अतार्किक लगा. मैंने फौरन हटा दिया. फिर मुझे बचाने की कवायद में जुटा यशवंत कहने लगा, अभी कम उमर के हैं, भावावेश में लिख डाला होगा, धीरे-धीरे समझ जाएंगे.’’

    बिलकुल. आपकी कम उम्र, आपकी क्रांतिकारिता देख, आपके लेख का सतहीपना देख मुझे आपसे प्यार हो आया. दूसरे नोटिस मुझे दी गई थी, आपको नहीं. ऐसे में आपके खिलाफ पुलिस आफिस में कुछ हो जाए, यह मैं कतई नहीं चाहता था.मैं कतई नहीं चाहता कि आप परेशान हों, आपको भुगतना पड़े. इसलिए पुलिस इंस्पेक्टर, जिनकी बातों के आधार पर उनके मानसिक स्तर व बनावट को आप भी समझ रहे थे, जो आपको बारंबार रामचरित मानस और भगवद गीता पढ़ने को कह रहे थे, से उलझने की बजाय बातचीत के जरिए मामला खत्म करने को उचित समझा. पर मुझे दुख है कि आपने वो सब नहीं लिखा जो मैंने उस इंस्पेक्टर से कहा व पूछा कि आपकी इस पूछताछ, आपसे इस बातचीत को हम लोग प्रकाशित कर सकते हैं या नहीं? और ऐसी ही कई बातें जिसके कारण इंस्पेक्टर कई बार असहज हुआ. शायद आपने गौर नहीं किया ना?

    आपने लिखा… ”मुझे ताज्जुब हुआ. क्या ये वही यशवंत है जो दुनिया भर की बातें करता रहता है. क्या ये वही यशवंत है जो बातों से बहुत बड़ा बागी, फ़ेमिनिस्ट, एथिस्ट, कम्यूनिस्ट दिखता है?”

    भई, मुझे चारसौचालीस बोल्ट का नंगा तार छूने का शौक नहीं है. आपको है तो आपको मुबारक. इस लिहाज से मैं वाकई कायर, डरपोक व दोगला हो सकता हूं. मैंने कभी अपने को कम्युनिस्ट, एथनिस्ट, फेमिनिस्ट नहीं घोषित किया. बल्कि मैं कई बार एंटी-कम्युनिस्ट, एंटी-फेमिनिस्ट लिखता-करता रहता हूं. आपको पता नहीं है क्या?

    ”पुलिस वाला मेरी तरफ मुखातिब हुआ तो मैंने उसे साफ-साफ कहा कि हां आवेश में जरूर लिख गया लेकिन चूंकि वे भी हमारे देश के नागरिक हैं और हमें उनके पक्ष में या विपक्ष में बोलने से कोई मंत्रालय नहीं रोक सकता. यशवंत कुर्सी के नीचे से मुझे चिकोटी काट रहा था ताकी मैं संभल के बोलूं.”

    इंस्पेक्टर या सब इंस्पेक्टर, जो भी सज्जन थे, उनके मानसिक बुनावट, उनके सोच के तौर-तरीके को देखने के बाद मुझे बिलकुल उचित नहीं लगा कि उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क्रांतिकारिता का पाठ पढ़ाया जाए. मुझे रणनीतिक रूप से उचित नहीं लगा कि हम उस सब इंस्पेक्टर या इंस्पेक्टर से बहस करें. याद होगा, उसने बेहद सम्मान से हम लोगों से बात की. चाय व पानी के लिए पूछा. वो कतई बदतमीजी नहीं कर रहा था और अपनी बात को पूरी शांति व साफगोई से रख रहा था. वो इंस्पेक्टर बार बार आपकी पढ़ाई लिखाई के बेहद कम होने, रामचरित मानस व गीता पढ़ने पर जोर दे रहा था, आपके स्त्री वाले लेख को बेकार लेख बताता रहा, उससे क्या बहस करें व क्यों बहस करें. अगर ये सब बातें अदालत में होतीं तो वहां जिरह में मजा आता क्योंकि वो सारी बातें आन रिकार्ड होतीं.

    आपने लिखा… ”खैर मैंने वही बोला जो मुझे बोलना चाहिए था, यशवंत ने वही बोला जो ऐसी हालत में कोई भी डरपोक बोलता. और फिर उसे अपनी साईट भी तो चलानी थी. फिर झूठा चरित्र ओढ़कर हीरो बनने की क्या जरूरत है. उस दिन के पहले तक हर दो दिन पर उसका कॉल आ जाया करता था लेकिन पुलिस प्रकरण के बाद वह शायद मुझसे नजर मिलाने की हिम्मत में नहीं है. तभी तो न कोई फ़ोन, न कोई एसएमएस, न कोई ई-मेल.”

    इसमें कई बातें आपने कही हैं. मेरे क्रमशः जवाब हैं. हां, मैं आपके मुकाबले वाकई डरपोक हूं. मुझे ट्रेन के आगे कूद कर जान देने का शौक नहीं है. हां, मुझे साइट भी चलानी है. अगर साइट न भी चलानी होती तो मैं जेल जाने का मकसद तय करके किसी को पत्थर नहीं मारता.

    आपने लिखा… ‘यशवंत फट्टू है. आज अपनी साईट की तुलना उसने जनसत्ता से कर डाली और खुद को प्रभाष जोशी के साथ खड़ा कर डाला, बहाना चाहे जो भी हो. मैं उससे बस इतना ही कहूंगा कि एक बेइमान आदमी को यह सब शोभा नहीं देता. मुझे उसे सरेआम करके कुछ नहीं मिलना लेकिन उसका लेख पढ़कर सब कुछ दोबारा से सामने आ गया और इस बार रहा नहीं गया.”

    भई, मैं तो अपनी तुलना गांधी से भी करता रहता हूं, मैं गांधी को बेहद आम आदमी मानता हूं, बस वे सच्चे और ईमानदार बने रहे जीवन भर. बड़े मकसद के लिए सक्रिय रहे जीवन भर. गांधी की जीवनी पढ़िए. उनके छोटे-छोटे कुबूलनामे कितनी ताकत देते हैं. प्रभाष जोशी कोई देवता नहीं थे. वे भी हमारे आप जैसे इंसान ही थे. हर आदमी को अच्छे व बेहतर लोगों से अपनी तुलना करनी चाहिए और खुद को परिष्कृत करना चाहिए. मैं नहीं समझता कि मैं दाउद इब्राहिम और लादेन से तुलना न कर गांधी व प्रभाषजी से तुलना कर कोई अपराध किया है.

    आखिर में. आप दिल के खरे, भावुक आदमी हैं. पढ़ाई लिखाई कम है, सो तार्किकता पर भावुकता भारी है. अच्छी बात है कि आप ईमानदार हैं, जो सोचते हैं, वो लिख देते हैं. चाहे वो चिदंबरम के बारे में हो या यशवंत के बारे में. अपनी बात आपने कह कर बिलकुल उचित किया वरना आप न जाने क्या क्या और सोचते रहते मेरे बारे में.

    जहां तक फोन मेल ईमेल एसएमएस की बात है तो आपसे शायद पहले भी बहुत संवाद न था. पुलिस नोटिस मुझे मिलने के बाद कहीं से आपका नंबर पता कर आपको फोन किया था ताकि आपको सचेत कर दूं, आगाह कर दूं. पुलिस की तरफ से दुबारा अभी तक कोई नोटिस नहीं आई, कोई कार्रवाई नहीं हुई सो आपसे संपर्क करना उचित न समझा. वैसे भी, मैं अपने मां-पिता, भाई-बहन, नजदीकी दोस्तों को भी बहुत कम फोन एसएमएस व मेल कर पाता हूं क्योंकि मेरा ज्यादातर वक्त आए हुए मेलों, एसएमएसों, फोनों को निपटाने, सुलटाने में बीतता है.

    लेकिन फिर भी मिस्टर राहुल कुमार. मैं आपको अपना प्यारा भाई व दोस्त मानता हूं. इसे आप मेरा दोगलापन मानें या सहृदयता, लेकिन आपको लेकर मेरे दिल में यही भाव है. किसी अपने के प्रति सदिच्छा हो तो आदमी उसके लिए दोगला भी बन जाता है, ताकि उसका भला कर सके.

    पूरे प्रकरण पर एक बार फिर सोचिए और मेरे इस जवाब के बाद भी लिखिएगा. इंतजार करूंगा. हां, कुतर्क नहीं करना चाहूंगा लेकिन आपके मन में कोई और सवाल तैर रहा हो तो कहिएगा. मामला बस इतना है कि आपको बचाने के चक्कर में आपको चुप रखने की कोशिश की, कम बोलने देने की कोशिश की, खास तरह की मानसिकता से लैस इंस्पेक्टर से बिना वजह जिरह से बचने की कोशिश की. इंस्पेक्टर की सुभाषितानी सुनने में मुझे ज्यादा मजा आनंद आ रहा था, बजाय उसे यह समझाने की कि क्रांति व माओवादी कितने जरूरी हैं.

    जय हो राहुल कुमार की.

    देखिए, जवाब लिखते लिखते आपकी पोस्ट से शायद लंबी पोस्ट बन गई है 🙂

  2. Pradeep Rawat

    September 25, 2010 at 2:43 pm

    Rahul Je Ap Kitna Sach Bol Rahey Hai Ye to Dekh Liya…?? Yashwant Je Kom Ap Kab Sey Jaantey Ho Jo Baar Baar A Sabdo Ka Estey Maal Kar Rahey Ho…!!!! Agar Ap Thoda Bhe Yashwant Je Ko nJantey To Ye Gise Pitee Baatey Nahe Likhtey…??? Ap K Es LeyKH mai Ap Ke Maansikt a Dikhaaye Dey Rahe hai k Ap Kis Mana Wrati K hai…!!!! Ap Bhadas Dekhtey Hai to Ye Sab Nahe Kahatey…!!! Apko Abhe 6-7 Maheney Huye Hai or Baatey itne Bade Bade…?? Ap ko Kiya Pata k Ak Patrakar Ko KItne Pareshaniyo Sey Gujarna Padta hai…!!! Galte Har Kise Sey Hote Hai, Kiyo k Insaan Khudaa Nahe…!!!! Leykin Ap Mujhe Mansik Roge Lag Rahey Hai….!!!!! Apna Ilaaj Karaye Phir Patrakaarita Ke A.B.C.D. Seekhna….!!!! Yashwant Bhai Kiya Ap Bhe in Chooran K Jaisey Logo K Chakar Mai…!!!! Ap Ke Bhe Dariya Dile Ke Dad Deyne Padeyge Yashwant Bahi…!!!! Pradeep Kumar

  3. abhijeet sinha

    September 25, 2010 at 2:44 pm

    यशवंत जी ,
    कैसे हो आप……..आज भड़ास पर आपके बारे में जो लिखा गया है उसको पढ़कर बहुत तकलीफ हुई….जहाँ तक मै यशवंत जी को जनता हूँ वो आज तक न ही किसी से डरे और न ही उन्होने किसी को कभी नुकसान पहुँचाया है……..राहुल जी का सभी लेख मैंने गौर से पढ़ा है …….वैसे मेरे पास इस तरह की फालतू बातों के लिए समय नहीं रहता पर जब मैंने पढ़ा कि आप्प पर जो इंसान आरोप लगा रहा है उसकी बातों को भी पढ़ा जाये कि आखिर उनको लेखनी का ऐसा कौन सा शौक है जिसके कारण उन्होने आपको ऐसा कहा है …………..जब मैंने सारा कुछ पढ़ा और समझा तब मालूम हुआ कि बात क्या है……………
    अब मै सीधे राहुल जी पे आना चाहूँगा………..राहुल जी आप लिखो खूब लिखो, एक पत्रकार को लिखने कि पूरी आज़ादी होती है अगर वो नहीं लिखेगा तो लोगो को सच्चाई कैसे मालूम होगी पर क्या आप जिस तरह से लिख रहे हो वो एक पत्रकार कि भाषा हो सकती है…..नहीं बिलकुल नहीं…………..पत्रकारिता का मतलब सिर्फ लिखने या किसी मीडिया हाउस में कम करने का नहीं होता, पत्रकारिता का मतलब होता है कि आपकी लेखनी का सही इम्पैक्ट आपको पढने वालों पर सही तरीके से पड़े……. आप क्या, कब और किस हालत में लिख रहे हो ये कोई नहीं जानता है, पर आपकी बातों को आपके पाठक पढ़ते है और वो आपकी बातो से सहमत भी हो जाते हैं……..मगर आपने अपनी लेखनी में जिस भाषा का प्रयोग किया है वो एक पत्रकार कि कतई हो नहीं सकती…..आप अपने लेखनी के जरिये जो कहना चाह रहे हो, हो सकता है कि हमलोग उन बातों को नहीं समझ पा रहें है पर आप जिस भाषा का इस्तेमाल कर लिख रहे हो वो काफी निराशजनक है……… हम पत्रकारों को लोग अगर जानते है तो वो है सिर्फ हमारी लेखनी के कारण पर आपने अपनी लेखनी में गंदे और अभद्र भाषा का प्रयोग कर इसको बदनाम किया है……………… अभिजीत सिन्हा [b][/b]

  4. kamta prasad

    September 25, 2010 at 3:17 pm

    क्रांतिकर्म दुनिया का सबसे व्‍यावहारिक काम है। कोरी भावकुता से हम किसी का भला नहीं करते। आत्‍मघाती पागलपन की उम्‍मीद हम यशवंत जी से नहीं करते और अगर कोई करता है तो उस पर तर‍स खाया जा सकता है उसका समर्थन नहीं किया जा सकता । सिर्फ व्‍यापक प्रश्‍नों पर ही पुलिस की मार सही जा सकती है किसी अहम को डिफेंड करने के लिए नहीं।
    साथी कोई मंच तलाशें अपने लिए और मार्क्‍सवाद का गहन अध्‍ययन करें और फिर अपने लिए कोई समूह और भूमिका तलाशें। जय हो।

  5. Amitabh

    September 25, 2010 at 3:27 pm

    Excellent reply ..Dear Yashwant…..this is after very long time when someone’s writing has made me appreciate the power of words…..Mark my words..you are a prolific word-smith. And I have nothing but sympathy to offer the juvenile kid called Rahul Kumar .Cheers

  6. Dharmesh

    September 25, 2010 at 3:31 pm

    gadhe ko nauri kisne de diya ,sasur jindgiye confujen me ji raha hai,suraj par thuk raha hai,bhare javane chatiya gaya hai.
    haye kale
    kalyan karo

  7. rahul kumar

    September 25, 2010 at 3:35 pm

    यशवंत जी,
    जब आपने मुझे आप कहकर ही संबोधित किया है तो मुझे भी उसी तरह से जवाब देना चाहिए.

    आपने मेरी बहुत सारी बातों को कोट किया और उसपर अपने विचार भी रखे हैं.. अब इसे क्लेरिफिकेशन कहकर आपका और अपमान नहीं करूंगा.. आपकी साईट पर वैसे भी आधे से ज्यादा लोग मुझे गरियाते ही हैं और शायद इसपर भी गरियाएंगे ही. जो कि लाज़िमी है. शायद मुझे उसका फर्क भी नहीं पड़ता.

    मुझे आपकी हर बात बहुत ही चतुरता के साथ सोच-समझकर लिखी हुई जान पड़ रही है.. जिसमें न तो लाठी टूटे और सांप भी साला मर जाए. आपकी तरह शब्दों की जलेबी छानना मुझे नहीं आता.. न ही सीखना है.. आप तो गांधी भी हो लिए और कार्लमार्क्स भी. पर मैं बस एक हूं और वही रहना चाहता हूं. जो भी बोलूंगा, लिखूंगा वो सीधा और सपाट होगा.

    सारी बात कोट की आपने… ये क्यों नहीं बताया कि पुलिस वाले से आपको ये झूठ बोलने की क्या जरूरत पड़ी कि आपने मेरा लेख उस दिन देखा जब आपके पास नोटिस पहुंचा.. आपने तो पहले ही दिन लेख देखा था… है न.. फिर तुरंत आपका रेप्लाय आया था.. फिर आप तुरंत ऐसे कैसे मुकर सकते थे..

    रही पुलिस वाले के सकते में आने की बात… तो शुक्रिया… वैसे उसकी घबराहट को जिस तरह से प्रोजेक्ट कर रहे हैं वैसा सिर्फ़ आप ही के मुंह से सुन सका था.. मुझे दिखा नहीं.. इसलिए लिखना जरूरी नहीं समझा… मुझे तो बस आपकी घबराहट दिख रही थी… घबराना तो मुझे चाहिए था न..!!

    दूसरी बात ये कि आपके साथ जो आए थे उनपर मेरी टिप्पणी के लिए मुझे खेद है.. पर जो लगा लिख दिया.. क्या करूं.. आदत से लाचार हूं!!

    इतनी ही चिंता और इतना ही ख्याल होता मेरे फंसने का.. तो पुलिस स्टेशन पहुंचने से पहले ही सारी नीति मुझे समझा जाते..अंदर जाते ही पल्ला बदलना तो दोगलापन ही कहलाएगा..

    जो शख्स पांच दिन तक आपके लिखे की तारीफ़ करे.. और एकाएक छठे दिन उसे वह लेख सतही, अतार्किक और बेवकूफ़ी लगे.. ये तो आपके जैसे अनुभवी पत्रकार पर शोभा नहीं देता साहब.

    शुक्रिया

  8. rizwan mustafa

    September 25, 2010 at 4:27 pm

    kaha chakkar me pade hai yaswant bhai aap,yeh samaj ke krack hai inke tassurat mat chape to achcha hai nahi to ye vairaus padne walo ke bhi lag jayega

  9. Anam

    September 25, 2010 at 4:40 pm

    Ye to purana dogla hai.Isne mere bhi teen vichar jo subrato Roy ke baare mein the delete kar diye

  10. gunjan sinha

    September 25, 2010 at 4:52 pm

    congrats to yashwant jee for showing such a high dgree of personal tolerance and professional control in responding to an immature and knave novice in journalism. But being an idiot or a child does not give anybody a natural right to be indecent or to use abusive language against anybody. this chap who claims to be a journo, does not even know the meaning of words he is using. i do not have as much tolerance as yashwant jee. in fact it is my considere opinion that our society, since long long ago, has suffered a lot owing to overdose of tolerance. we must be intolerant to those who cross the limits of rationality and mutual respect. such an abuse must be returned by two leather shoe marks on the ass, and not in the style of binoba bhave.

  11. PANKAJ KUMAR SINGH ETV BIHAR

    September 25, 2010 at 4:56 pm

    YASHWANTJI,
    ye sab kya ho raha hai,kya chhap raha hai,pahale to mujhe laga ki B4M par kisi atanki ne kabja kar liya hai ya fir kisi aur ne kharid liya hai,lekin niche jab apaka coment dekha to sukun hua ki nahin apni site sahi salamat hai.

    jaisa aur jo kuchh aapne apne virudhh chhapa hai,waisa bharatiya patrakarita ke etihas me koi kabhi nahin kiya,Rahul ke prati jaisi sadasayata aapne dikhayi hai wasa koi kabhi nahin dikha sakta.chaplusi ki patrkarita ke es yug me aapne ek lambi rekha khich di hai,ese todana namumkin hoga,bahut kuchh likhana chahta hu lekin fir kabhi,aaram se.

  12. ravindra bharti

    September 25, 2010 at 4:57 pm

    ab main aapse milna chahta hun , kab main milu time date aap fix kijiye,
    and call or mail me
    9711802760

  13. अनिल दीक्षित

    September 25, 2010 at 4:58 pm

    अरे भाई, यह कहां लिखा-कहा गया है कि पत्रकार को दबंग होना चाहिये? दबंग होकर क्या बदमाश बनना है? समझदारी से काम निकालना और खुद खबर न बनना तो पत्रकार होने के दो प्रमुख गुण हैं। कुछ भी लिखने वालों को छापना क्या जरूरी था यशवंत भाई। इन्हें जगह देना वेबसाइट की स्पेस खराब करना है जिसकी जबर्दस्त किल्लत है।

  14. ravindra bharti

    September 25, 2010 at 4:59 pm

    Dear sir
    i want to meet you , bahut ho gai patrikarita.

  15. Shravan Shukla

    September 25, 2010 at 5:00 pm

    bhad ghatiya or bachkana post…AISE logo ki yeh ghatiya or sharmnaak aaropo se to yahi lagta hai ki yah jo bachche hai jo BHAVAVESH me aakar KUCH bhi kah dete hai AB WO chahe KHUD KI MA ki gaali hi kyu na ho us par JANAAB ka ULTE CHOR KOTWAL ko DAATE wala dumdaba RAWAIYA…RAHUL sirf 5 maheeno me abhi tum kuch bhi nahi seekhe..PAHKE to BAAT KARNE ka DHANG or bado ka AADAR OR SAMMAN karna seekho…jo SHAYAD AAPKE MATA-PITA sikhana bhool gaye the…kabhi wakt mile to IDHAR BHI ek behad KHATI kism ka NAWJAWAAN aapke jaawb ki PRATEEKSHA me hai…BAS thora SHABDO ke chayan or UCHCHARAN par dhyaan deejiyega..KYUKI maine saari baate apne mata pita se seekhi hai..JAWAAB bachcho ko dena achcha nahi hota..OR agar YASHWANT ji pyar se AAPKO samjha rahe hai… jara IS LINE par gaur karke–आप दिल के खरे, भावुक आदमी हैं. पढ़ाई लिखाई कम है, सो तार्किकता पर भावुकता भारी है….
    SHUBHEKCHHU.
    sHrAvAn ShUkLa
    9716687283

  16. jagdeep yadav

    September 25, 2010 at 5:04 pm

    Mujhe tooo pata tha ye fattu hai………thanks rahul ji.

  17. Anirudh kumar

    September 25, 2010 at 5:08 pm

    राहुल जी, यशवंत जी पर जब आप उंगली उठाए तो मैंने आपका लिखा हुआ कई लेख पढा। इसके पहले मैंने नही पढा था। आप अपने आपको एक पत्रकार बताते हैं। पहले मैं आपको एक बात बता दूं कि पत्रकार वही होता है जिसे भाषा पर पूरी पकड़ हो, तीखी से तीखी बातों को अपनी कलम से ऐसा लिखे जिसे पढने बालों को कभी बुरा न लगे और आपकी बात भी समझ आ जाए। आपने अपने एक लेख में व्यंग किया है कि “घर मे बहन की गदरायी हुई बदन देखता हूं” शायद इससे अभद्र बात और कुछ हो हीं नहीं सकता। मैं आपसे यह जानने का प्रयास करता हूं कि आखिर आपका दिमाग उक्त लाइन की ओर कैसे गया? इस पवित्र भारत के उस राज्य के निवासी आप अपने आपको कहते हैं, जहां वर्तमान समय में रिश्ते नाते और संस्कृति को लोग बखुबी समझते हैं। जरा सोचिए आपका लिखा हुआ लेख यदि आपकी बहन, मां, भाभी, चाची, नानी और दादी को पढने दे दिया जाय तो वह क्या समझेगी, उन्हें तो उसका विशेष मतलब समझ नहीं आएगा, जो आप समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
    एक पत्रकार आप तभी हो सकते हैं जब आपका लिखा हुआ लेख या कोई भी विचार समाज के सबसे अंतिम पायदान पर जीवन बसर कर रहे व्यक्तियों को भी समझ आ जाए।
    दो-चार महीने किसी मीडिया संस्थान में काम कर लेने से आप बहुत बड़े पत्रकार नहीं कहे जाएंगे। आप एक अच्छे पत्रकार तभी कहे जाएंगे जब आपकी लेखनी मे दम हो। उपर जैसी बकवास लेखनी न हो।
    आपने अपने एक लेख में मीडिया की धज्जियां भी उड़ाने मे पीछे नहीं रहे, जब यही करना था तो पत्रकार क्यों बने। आप पत्रकारिता का काम छोड़कर किसी अन्य कम्पनी या सरकारी दफ्तर ज्वाइन कर लें। अपने नाम के आगे से पत्रकार शब्द हटा दें। क्योंकि आपको पूरी-पूरी जानकारी ही नहीं है। आप मुझे एक बात बताने का कष्ट करेंगे कि कौन सा ऐसा फिल्ड है जो दुध से धुला हुआ है। एक आईएएस और आईपीएस आज लोग इसलिए नहीं बनता है कि उन्हें देश की सेवा करना है बल्कि इसलिए कि उन्हें इमान बेचकर पैसा कमाना है। एक डॉक्टर का नाम भी आप बताइए जो बिना फीस लिए इमानदारी के साथ एक गरीब का इलाज सेवा के रूप में करता हो। एक भी वैसा सांसद का नाम बताइए जो अपने घर का विकास छोड़ देश के विकास के लिए सोचता हो। ऐसे में मीडिया यदि मार्केट के लोगों की मांगो के अंदाज में खबर लिखता या प्रसारित कर रहा हो तो वह आपको गंवारा लग रहा है लेकिन आप इस सामाज के एक पवित्र रिश्ते को अपने व्यंग मे तार-तार कर रहें है तो आप काफी अच्छे पत्रकार हो गये। क्यों पत्रकारिता को बदनाम करने मे लगे हैं।
    एक पत्रकार को समाज का हर तबका इसलिए इज्जत नहीं देता है कि वह कोई तोप बाबू हैं, वह विद्वान है, बल्कि इसलिए देता है कि वह उसके द्वारा उठायी गई आवाजों को बुलंद करता है। एक कलेक्टर या मंत्री और मुख्यमंत्री इसलिए इस तबके को सम्मान नहीं देते हैं कि वह मेरी खबर बहुत अच्छी तरह से लिखेंगे बल्कि इसलिए देते हैं कि आप जनता की आवाज हैं।
    ध्यान रखें एक पत्रकार न तो जज है कि वह फैसला सुनाए, न तो पुलिस या सिविल पदाधिकारी है कि वह कारवाई करे। वह सिर्फ जनता की आवाज है, जो समाज के नब्जों को टटोल कर, उनकी समस्याओं से रूबरू होकर सरकार के सामने प्रस्तुत करता है। वह जनता और सरकार के बीच एक कड़ी के सिवा और कुछ नहीं है। यदि आपको अपने लेख पर फिर भी गर्व है तो मैं आपके उस लेख को प्रिन्ट करवा कर अपके जिला बेगूसराय या अपने गांव का नाम बताइए मैं वहां बंटवा देता हूं उसके बाद सबसे पूछुंगा कि आपके लेखनी को वे लोग कितना सराहे। लेखनी वही सही होता है जिसे जनता सराहे, पढने की इच्छा रखे, समाज के सभी लोग सरल तरीके से समझ जाए। यदि फिर भी आप समझने का प्रयास नहीं करते हैं तो मैं भगवान से यही प्रार्थना करूंगा कि आपको पत्रकारिता मे तरक्की मिले। फले फुले, इसी तरह समाज और पवित्र रिश्ते की धज्जियां उड़ाते रहें।

    अनिरूद्व कुमार, ब्यूरो प्रमुख
    इनसाइट टी0वी0 न्यूज, पटना।
    वेव: http://www.insighttvnews.com
    mo:9386399008, 9473042353

  18. azad khalid

    September 25, 2010 at 5:22 pm

    भड़ास 4 मीड़िया के सभी पाठको और पत्रकारिता को मिशन मानने वाले क़लम के सभी सिपाहियों के साथ साथ इस जमात के बेहद जुझारु सिपाही यशवंत को बेहद प्यार और दिल की गहराईयों से सलाम…। आज बहुत दिनों बाद बल्कि यूं कहना ग़लत ना होगा कि वेब की दुनियां की पत्रकारिता में पहली बार क़लम का इतना मर्दानगी भरा क़दम देखने को मिला। राहुल के बहुत अच्छे लेख देखने को मिलते रहे हैं। लेकिन जिस लेख के जवाब में यशवंत ने एक जो एक नई मिसाल पेश की है यशवंत का वो क़दम सैल्यूट के क़ाबिल है। अपने खिलाफ़ इतनी तल्ख़ टिप्पणी को रद्दी की टोकरी मे डालने के बजाए बेहद सम्मान के साथ अपनी छाती पर लगा कर दुनियां के सामने पेश करके यशवतं ने बता दिया है कि क़लम के सिपाही झुका या मुंह नहीं छिपाया नहीं करते। फिलहाल ना तो राहुल के लेख या किसी टिप्पण पर बहस का इरादा है। अगर राहुल को सिर्फ इसी बात पर ऐतराज़ है कि यशवंत ने प्रभाष जी ( हांलाकि मैने वो लेख भी पढ़ा था जिसमे किसी भी पत्रकार या मीडिया हाउस से मिलते जुलते हालात को बेहद अच्छे ढंग से कहा गया था, मगर फिर भी ऐसा लगने वालों की कोई गलती भी नहीं है क्योंकि सबकी अपनी नज़र और सोच है) से तुलना की है। तो मै राहुल के ऐतराज़ से इत्तफाक़ रखता हूं। क्योंकि यशवंत की सोच और बेबाकी आज के दौर में किसी से भी तुलनीय नहीं है। यशवंत ने जो किया वो बेमिसाल लाजवाब है।
    आज़ाद ख़ालिद
    9811409960

  19. babloo durgvanshi

    September 25, 2010 at 5:46 pm

    wakai aap dono ka samvaad achha laga kafi dino bad aisi bahas bahut achhi lagi

    dhirendra pratap singh dehradun

  20. pankaj

    September 25, 2010 at 7:08 pm

    yaswantji main aap ki baat sey puri terhe se sehmat hon-

  21. कुमार गौरव

    September 25, 2010 at 7:59 pm

    दोनों पक्षों की बातें सुन कर यही लगता है की अभी राहुल जी अभी भी सपनो की दुनिया से आगे नहीं निकल पाए हैं और यशवंत जी एक सुलझे हुए सज्जन है ..
    अंत भला तो सब भला

  22. संजय कुमार सिंह

    September 25, 2010 at 8:10 pm

    क्या यशवंत जी आपभी सफाई देने में लग गए। वो भी इतना लंबा चौड़ा। इससे तो अच्छा होता नहीं छापते। जब छाप ही दिया तो पाठक क्या राहुल के लिखे से नहीं समझ जाते कि उसने जो किया वो बेवकूफी नहीं तो बचपने की ही श्रेणी में आएगा और आपने जो किया वह अक्लमंदी ही कही जाएगी। मेरे ख्याल से राहुल को छापना जितना सही है उसका जवाब देना उतना ही गलत। आपका जवाब इतना लंबा है कि मैं पूरा पढ़ नहीं पाया। मेरी राय में बिल्कुल बेजरूरत है। आपने उसका लिखा प्रकाशित किया वही आपका जवाब है।

  23. jaibihar

    September 25, 2010 at 8:58 pm

    rahul
    tum koin si khait ki mulli ho yaar.tumharai jaissai na janai kitanai sarakchhap patrakar road par aur sarkari logo ka talwa chatatai rahtai hai…apni haaad or aukad mai raho rahul.tumhari itni aukad nahi hui hai ki tum yaswant ji jaisai aadmi par ilzam laggwo.pahlai apni aukad bannao phir kisi kai baarai mai bolo.bachhhai ho bhai bachhai ki tarikai sai raho baap naa bano nahi to yai duniya kahi ki nahi choraigi.mai bhi bihari huu tumhari iss tuchhi harkart sai mujhai saram aa rahi hai boltai hua ki tum bihari ho…

  24. कृष्ण

    September 25, 2010 at 9:16 pm

    खालिश डिप्लोमैटिक अन्दाज है यशवन्त जी का! वैसे ये सोशल कान्फ़्लिक्ट को ठीक करने का सबसे तरीका होता है-डिप्लोमैटिक हो जाना!
    http://dudhwalive.com

  25. ravi shankar maurya

    September 26, 2010 at 4:33 am

    हर किसी को डर लगता है
    पर डरना जिन्दगी नहीं होती
    हमें आपस में कीचड उछाल के क्या मिलेगा
    देश को सोचो
    कलम के वीरो
    सच्ची पत्रीकारिता करो ……

  26. mahandra singh rathore

    September 26, 2010 at 4:47 am

    yashwant ji rahul ji thik keh rehen hai ya galat yah to mai nahi janta lakin aapnne unka lekh heading samat chhap diya hai. DOGLA KYA HOTA HAI-? kya isske leye rahul ko yahi shabd mila tha kya DOHRA CHARITAR WALA- nahi likh sekete the. DOHRE MANDAND- thik nahi. rahul apne ko kuch baaton ke leye kasurwar man rehe han aap bhi essa kiya hai to baatao taki lo log jan seken yashwant ne essa nahi kiya. thanks.

  27. vijay singh thakur

    September 26, 2010 at 6:45 am

    बहुत अच्छे राहुल भाई साहब ….. आपने यशवंत जी के पोल पट्टी खोलकर सबकी आँखे खोल दिए ,जो आज तक हम यही समझते थे की ये साहब सच्चाई ,के लिए कुछ भी कर सकते है ….. बड़ी बड़ी बाते करने वाले यसवंत जी की ये सच्चाई जानकर दुखी भी हैं तो अच्छा भी लग रहा है की कम से कम उनका दूसरा चेहरा भी सामने आ गया ….. वाह यशवंत जी ..बाहर से कुछ और ,अन्दर से तो शुभानल्लाह …. बधाई हो राहुल जी …अपनी कलम की धार ऐसे ही बनाए रखिये ……. हम आपके साथ है … समाज को नयी दिशा दिखाईये …… हम आपके साथ है ….. निर्भीक पत्रकार ,सिपाही राहुल को सलाम ……….. विजय ठाकुर साधना न्यूज़ दुर्ग (c g) 09300291136

  28. Abhishek sharma

    September 26, 2010 at 6:55 am

    patrakarita 19 (1) se shuru hoti hai…aur 19(2) par khatm hoti hai… isse jyada patrakarita kuchh nahi hai..toap banne ki koshish mat karo rahul bhai…naya dhobi kuchh hi din kathari me sabun lagata hai..ok
    Regards
    Abhishek sharma
    ETV news
    [email protected]
    http://www.exultvision.blogspot.com

  29. chandan

    September 26, 2010 at 7:11 am

    yashwant je

    apne kai ese lekh post kie jo nahi karna chahie tha or uske bad apne use jald hi delete v kar diya kiya ap apne jamir ko bechh deya…..

    apne es portal ko purn rup se bajaru bana diya

    thank u

  30. chandan

    September 26, 2010 at 7:16 am

    yashwant je

    apne kai ese lekh post kie jo nahi karna chahie tha or uske bad apne use jald hi delete v kar diya kiya ap apne jamir ko bechh deya…..

    apne es portal ko purn rup se bajaru bana diya

    thank u

  31. chandan

    September 26, 2010 at 7:23 am

    Rahul Reply j apne jo Yaswant ko reply diya realy ye kabile tarif hai ….

    Yashwant ke Bhadas4media ki popularity bahut hi jald samapt hogi……

    jika kar Yashwant khud hoga…

  32. qamaruddin farooqui

    September 26, 2010 at 7:27 am

    अरे भाई राहुल तुम जो यशवंत को डरपोक कह रहे हो तो इस बात का जवाब तो तुम्हे खुद इस बात से मिल जाता कि यशवंत ने तुम्हारे इस भड़काऊ मेल को पोस्ट किया और तुम्हे अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका दिया, अब रही बात तुम्हारे विचारों कि तो क्या ये ज़रूरी हे कि जो तुम सोचते हो वो 100% सही हो, अरे भाई तुम भी इंसान हो कोई भगवान् तो हो नहीं, जो गलती नहीं कर सकता , यशवंत पर ऊँगली उठाकर किया दिखाना चाहते हो ? , पहले भी तुम्हेरे दिमाग के दिवालियेपन को पड़ चुका हूँ, जुमा जुमा चार दिन इस फील्ड में हुए हें और चले हो क्रन्तिकारी बन्ने , अरे अभी बच्चे हो अकल से कच्चे हो. तुम्हारा उत्साह ठीक हे मगर जिस भाषा का इस्तेमाल तुम करते हो उससे लगता हे कि तुम एक सनकी इंसान हो , तुम यशवंत के कमेन्ट का जवाब देते हुए भी अपनी आदत के मुताबिक यशवंत को पिन मारने से नहीं चूके , और ये पिन यशवंत को नहीं बल्कि मेरे जेसे उन तमाम लोगो को लगी होगी जो यशवंत को थोडा बहुत समझते हें. बेहतर होगा अपने ये उलटे सीधे विचार अपने पास रखो और किसी चाय वाले या नाई कि दुकान पर दाड़ी बनवाते हुए अपनी भड़ास निकालों ; क्यूंकि वहां तुम्हे ताली मिलेगी, और यहाँ कहोगे तो गाली मिलेगी, अपने दिमाग का इलाज कराओ ……!

  33. Bimal Rai

    September 26, 2010 at 8:18 am

    यशवंत जी ने यह बयान छापकर दिखा दिया है कि एक संपादक को खुद अपनी कटु आलोचना भी छापनी चाहिए. मैं इस पक्ष के लिए उनहें बधाई देता हूं.
    बिमल रा

  34. .xyz.

    September 26, 2010 at 8:36 am

    Rahul ji , Aapne *Dogle* shabd ka istemaal kiya ! ajeeb aur at-pata laga ! Jahan tak Yashwant ke darne ki baat hai , to qanoon ka dar to achche-achche logon ke andar hota hai , baat sirf waqt ki hai ki kab aur kis par qanoon ki nazar tedhi ho jaaye ! Yaki maaniye ki aap ko bhi jab Police-Stations ke chakkar lagaane padenge to aap bhi wahi karenge jo Yashwant ne kiya ! Ishwer kabhi Aap ko bhi kisi organization ka, 8-10 saal baad, Head ban ne ka mauka dega to aap ke saahas ka jalwa har koi dekhna chaahega , Par phir yaki maaniye ki kuch legal bandishein aur qanoon ka dar aap ko har wo kuch, nahi karne dega jo aap ke vichaar hain. Aur gar yashwant ji ki tarah GAIRZIMMEDAARANA ruqh apnaayenge to qanoon apna kaam to karega hi . Halaanki yashwant jaisee himmat paida karne mein waqt lagega ! Aap ka unhone (Police Station mein) bachhav kiya, iske liye aap unhe DOGLA kahe, to ye munaaseeb nahi dikhta. Ha ! Aap ki is baat se humesha sahmat rahunga ki — …… फिर झूठा चरित्र ओढ़कर हीरो बनने की क्या जरूरत है ,
    Log Kaagazon par bahaaduri to log aksar dikha jaate hain par niji zindagee mein unke jigar ka haal khud wahi jaan te hain ! ye baat kuch waisee hi hai, jaise aaj kal DELHI mein hi baith kar humaare kai TV channels pure INDIA ke saath-saath Taalibaan aur Iraq tak ka haal bayan kar dete hain . Videshi patrakaaron ki tarah un-mein, FIELD mein jaa kar reporting karne ka maadda aur jigar nahi hai ! WAR ya KATHIN PARISTHITION mein field se jaa kar reporting karne ki bajaay Delhi mein, Internet aur other sources se jaankaari lekar, humare yahan ke BADE patrakaar KAAGAZI SHER bante hain .
    Phir Aap ki is baat se sahmati jataaungaki …… फिर झूठा चरित्र ओढ़कर हीरो बनने की क्या जरूरत है , par saath mein aap ne ye bhi likha ki ……फिर मुझे बचाने की कवायद में जुटा यशवंत कहने लगा….. . Yaani yashwant ne aap ko bachaane ki kawayad ki (Tariqa chaahe jo ho ) . Par phir bhi *Dogla* ?
    Main maanta hun ki yashwant mein ( Patrakaarita ke lihaaz se) Zimmedaari ka bhav na ke baraabar hai ! Aur ( kai baar abhadra bhaashaa ke sath ) kuch bhi ( example- Aap ke kai lekh ) publish kar wo apne paripakwa na hone ka ehsaas bhi kara dete hain AUR India TV ban ne chakkar mein kuch bhi publish karne ki aadat daal chuke hain , Par Yashwant ji mein itni Imaandaari to hai hi ki , Aap ne unhe DOGLA kaha aur bawjud iske , unhone ise publish kar diya. Aaj aise kitne log hain jo apne hi organization mein, SANTULIT BHAASHA mein, Jaayaz aalochanaaon ya tippaniyon ko jagah dete hain ! Abhadra (Publisher ke baare mein ) Tippani to dur ki baat hai ! Par Yashwant ne itni Imaandaari ya Saahas to dikhaaya hi !
    Yashwant ji , Aap se bhi ek-Guzaarish hai ki thoda paripakwata ( Patrakaarita ke lihaaz se) Apne andar zaroor paida kijiye ! Desh ya legal system sirf jazbe aur Aakraamak vichaaron se nahi chalta , balki Sabhyata aur shishtaachaar bhi uske paimaane hote hain ! Taalibaani sanskriti thode samay ke liye HIT hoti hai , baad mein nestanaabood ho jaati hai !
    Sansanee failaane aur India TV ki raah par chalkar , aap Readers ki QUANTITY to badha rahe hain, par QUALITY ? Log Aap ko gambhir aur zimmedaar maane, iske liye quantity kam rakhe aur quality ko paimaana banaaye , warna sansanee aur Gair-Zimmedaaraana Baatein, logon ka dhyaan apni taraf kheenchati hain , aur BHADAS4MEDIA apni is muhim mein, Qaafi had tak, safal raha hai .

  35. amitabh

    September 26, 2010 at 8:53 am

    bravo ! yashwant ji,lage raho…..
    amitabh shukla.
    durg

  36. कुमार गौरव

    September 26, 2010 at 9:10 am

    दोगले तो तुम हो , जो यशवंत जी को गरिया रहे हो , कुछ तो शर्म करो और बचपना छोडो. तुम्हे तो यशवंत जी को धन्यवाद देना चाहिए , जो की पुरे मामले तो तुम्हे बचा ले गए , वैसे लगता है की कभी तुम्हे पुलिस का मार, गांड पर पड़ी नहीं है इसलिए इतना उछल रहे हो , वैसे मर्द बन ने का इतना ही शौक है तो एक चिट्ठी चिदंबरम हो भी लिख ही दो .. औकात समझ में आ जायेगी

  37. vijay singh

    September 26, 2010 at 10:11 am

    shri rahul ji, badi-badi bate karne aur likhne se kuch nahi hota. maovadi jin pulise walo ko marte hai. unse aur unke gharwala se kya unki koi jati dusmani hoti hai. yashvant ji aap ko aise phaltu logo ko chapne ki jarurat hi kya hai. jinhe shabdo ki maryada ka gyan nahi..us din aap ke sath police stataion gaye aadmi ke bare me chehra dekh kar rahul ne jo upadhi di. vah unhe bhi di ja sakti hai. chehre se to aap (rahul) bhi kai sarif nazar nahi aate.

  38. vikas mishra

    September 26, 2010 at 11:20 am

    राहुल पर कुछ नहीं कहूंगा। क्योंकि मैं जानता नहीं, उनके लिखे से जितना जाना, उसका निष्कर्ष ये है कि वो इस लायक नहीं कि उनके बारे में एक लाइन भी लिखी जाये। रहा सवाल यशवंत का, तो मैं पिछले आठ साल से जानता हूं। दुस्साहस और बहादुरी में फर्क नहीं जानते यशवंत। और अगर थाने की बात सच्ची है तो मैं खुश हूं। कोई भी समझदार इंसान यही करता। इसका मतलब यशवंत पहले से ज्यादा समझदार हो गए हैं। क्योंकि यशवंत किसी से टकराएं तो उसका भी स्तर होना चाहिए। कमिश्नर के आगे होते तो बात कुछ और होती। खैर…. एक सज्जन लिखते हैं कि उनकी तीन पोस्ट सुब्रत रॉय के बारे में थी, उसे यशवंत ने हटा दिया। भड़ास को आप लोगों ने समझ क्या रखा है। तवायफ का कोठा है, मुंह उठाए और चले आए। वो तो यशवंत की भलमनसाहत है कि यशवंत बिना पात्रता देखे लोगों के लेख, विचार, भड़ास छापते रहते हैं। कमरे में बैठकर ईमादारी की बातें करना और हकीकत की जमीन पर चलकर ईमानदार बने रहने में कितना बड़ा फर्क है, ये जानने के लिए जरा बाहर निकलिए। इतने लोगों से पंगे लेने के बाद ये निहत्था आदमी सड़क पर यूं ही चल रहा है। पुरानी आल्टो कार से, जो बरसों पहले किस्तों पर खरीदी थी। यशवंत वेबसाइट चला रहे हैं, वेबसाइट से कुछ और नहीं चला रहे हैं। धंधा है, लेकिन गंदा नहीं है। रहा सवाल प्रभाष जोशी से तुलना करने की..। तो भाई सब अपने-अपने क्षेत्र के सूरमा हैं। प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर अपना अखबार नहीं निकालते थे। सेठों के अखबार में ठाठ से नौकरी करते थे। अखबार चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा, इसकी चिंता नहीं थी। यशवंत की चिंता यहीं से शुरू होती है। दूसरी बात ये कि जैसे मनोज तिवारी को भोजपुरी का अमिताभ बच्चन कहा जाता है। प्रभाष जोशी को हिंदी पत्रकारिता का भीष्म पितामह कहा जाता है। तो हिंदी वेब पत्रकारिता में यशवंत ने सबसे पहले भड़ास4 मीडिया. कॉम लॉंच किया था। तबसे जाने कितनी साइट्स हो गई हैं, लेकिन भड़ास अभी भी नम्बर वन है। सबसे कामयाब है। मैं भड़ास से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। कई बार टुच्ची चीजें भी छप जाती हैं, जिनसे मैं असहमत होता हूं। लेकिन इसकी कामयाबी मुझे खुश करती है। यशवंत कम से कम ये तो कह सकते हैं कि मैं सेल्फ मेड इंसान हूं। मैंने देखा है कि यशवंत ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए क्या सहा है, कितना सहा है, परिवार को कैसे दिन देखने पड़े हैं। यशवंत चाहते तो अच्छी खासी नौकरी का जुगाड़ कर सकते थे। उनके क्रिएटिव माइंड का अंदाजा आप सभी को होगा, अगर ये दिमाग किसी भी प्रोडक्ट में लगता तो उसे कामयाबी मिलती। लेकिन यशवंत ने अलग रास्ता चुना। यशवंत ने कहा, लोगों ने बुरा माना। लीजिए मैं समर्थन में कहता हूं कि यशवंत वेब पत्रकारिता के प्रभाष जोशी हैं, राजेंद्र माथुर हैं। यशवंत के विरोधियों की नजर जहां जाती है वो यशवंत की निजी जिंदगी है, जिसको उन्होंने कभी परदे में नहीं रखा। दारू पीते हैं, तो खुलकर उसे लिखते भी हैं। दो चेहरे नहीं रखते। इसलिए यशवंत के लिए दोगला शब्द का इस्तेमाल मत कीजिए, समाज में तो बहुत दोगले पड़े हुए हैं। क्रांतिकारी लेख ठोंकने वाले जरा एक बार पुलिस की लाठी के सामने तो आएं… आईना देखते ही उन्हें दोगला दिख जाएगा। मीडिया चाहे जो हो, उसके बारे में आम राय यही है कि वो गंदा तालाब बन चुकी है। लेकिन साहब, इसी पानी से उद्धार की गुंजाइश भी बनती है। गंदगी बजाय गुंजाइश पर ध्यान जाएगा तो मीडिया भी सुधरेगा, नजरिया भी सुधरेगा। भड़ास एक बेहतर मीडिया बनकर उभरा है। जहां विरोध और समर्थन दोनों के लिए जगह है। कई साथियों ने यशवंत का विरोध किया, कई ने समर्थन किया। एक नाम चलिए मेरा भी जोड़ लीजिए। मैं यशवंत का समर्थक हूं।
    -विकास मिश्र

  39. R.K.Singh Mau

    September 26, 2010 at 11:50 am

    राहुल भाई…. शायद…… आप बिहार के उस “राहुल राज ” की तरह है जो एक मामूली से कट्टा ले कर , मुंबई पुलिस से मुकाबला करने में रोड पर ही कुत्ते की मौत मारा गया ……शायद आप उशी बहादुरी की अपेछा यशवंत जी से कर रहे है ,आप कितनो भी बरे लेखक हो लेकिन आप को जो पहचान b4m से ही मिला , आप तो खुद बहुत बडे फट्टू है ….. पुलिस को बोल देते और दिखा देते की आप के अंदर कितना दम है….फट गई ना …..यशवंत जी ने वक्त के अनुशार जो भी किया सही था ..आप जेसे पल्टू आदमी के लिये वो अपने पोर्टल को सहीद कर दे …..? या फिर आप दोनों मिल कर राखी सावंत वाला खेल , खेलरहे है , की वो चेनेल को गरियाति कोशिती, फिर भी दीखाई जाती है ….आप के लेख को प्रकशित ही नहीं करनी चाहिये…लेकिन उनकी माहानता है ,एक कहावत है “निंदा करने वाले को नजदीक रखना चाहीये….. ”

  40. Rahulshankar

    September 26, 2010 at 12:38 pm

    Mr. Rahul mainey tumhare mard or aurat wale post par comment kiya thaa (Naya Naya chulla kat raha he), shayad pada nahi hoga, pad liya hota to shayad thodi akkal aa jati, abki baar jyada kuch nahi likhunga lekin itna jarur kahunga ki tu patrakarita mat kar. koi kabadi ki dukan khol le or wala apne grahkon ko apne lekh suna, tujhe waha se bahut wah-wahi milegi. kisi ko samajhna sikho, kisi ki ijjat karna sikho, kisi se kuch pana sikho, kisi ko kuch dena sikho, aur apne dimag se gandi mansikta wale vicharon ko hatao.

    Ishwar tumhe sadbuddhi de

  41. pramodpal singh meghwal

    September 26, 2010 at 1:24 pm

    yashwantji,aap aage badho.ham aapke sath hai.aap hi web ke prabhashji hai.

  42. Lila Dhar Sharma

    September 26, 2010 at 2:31 pm

    Rahuk g yeswant g ne police station main kya kaha ya us waqt police station ka mahol kya tha ya us leekh main kya likha tha jo main nahi padh ska ..lekin aapne jo yeswant ji ke baare main likha hai aur aapne do baar is baat ka khandan krne ki kosis kar rahe hain usse ye saaf lagta hai ki wastaw main aap canfuse hain aur patrkarita ke liye aapko kuch aur mehnat karni padegi …rahul g aap abhi is kaam ke liye naye hain aapko nahi pata ki patrkar ki life kitni kasmayi v har mod par pariksa lene wali hoti hai aur patrkarita main hos ki jagah josh dikha rahe ho toh fauj main bharti hon ya maowadi ho jayen toh aapke liya behter hain ..aapkokhud hi nahi pata ki aap likh kya rahen hain..main yeswant ji se kahna chaunga ki aise logo ke lekh yahan prakasit kake kya sabit karna chate hai..hum aapki izzat kaeten hai par aise patrkaron ke lekh likh kar humre saath aap anyay kar rahein ..main nahi samjta ki aise logon ke li koi bhi samajdar patrkar bhai faltu main apna time kharab karen …jis aadmi ko khud hi nahi pata ki wo likh kya rahi hai …maine iisse pehle rahuk g ka likha lekh padh kar unko sahi tharaya tha par ye sab padh kar muje afsos hai ki maine aise aadmi ki parokari ki hai … main ye toh manta hun ki us lekh main unki bhasa thik nahi thi …par us lekh ka matlab galat nahi tha par jo kuch maine aabhi padaha hai use dekh kar main is nirnay par pahuncha hun ki aise logo ke leekh B4M par nahi aane chahiye…yeshwant ji se hum kuch jyada hi ummed rakhtain hai agar aise logo ko yanha par jagah di jaigi toh ye B4M ke liye sarmnak hi hoga….

  43. mannnnnn

    September 26, 2010 at 4:00 pm

    ram-ram bhaiya logon….. pahli baar dekha ki agar koi kamyaab ha, takatwar ho, or jugaadu ho to dunia uski jaijai kaar karti haiiiiiiiiiiiiii…… mai yashwant g ki kabiliat pr sawal nhi utha rha or na hi aukaat hai… shyad issi wajah se naam v nhi likh rha….. lkin b4m pr kabhi kabhi tucchi tucchi lekhon ko padhkr bahut irritation hoti hai…. or unhi lekhko me se ek rahul g v hain….. gujarish hai ki is pyor TRP chaap patrkarita se thoda upar uthen taki bhadas bhadas hi lage.. behudon ka nanga nach nhiii….

  44. chandan srivastava

    September 26, 2010 at 5:53 pm

    यशवंत भईया प्रणाम, राहुल कुमार का लेख एक वो औरत वाला और दूसरा माओवाद पर दोनों मुझे बहुत अच्छे लगे थे… उनकी एजुकेशन जो भी हो, उनमे गजब की आक्रामकता है (अब इस पर आपको वर्षों से जानने वाला कोई ये न कह या लिख दे की बिना औकात वालों की भी सलाह को स्थान देकर अहसान करते हैं यशवंत, जैसा की ऊपर किसी ने कहा है), मेरे ख्याल से पुलिस की एक मात्र नोटिस या उस से कुछ थोडा ज्यादा पर इतनी जल्दी हथियार डाल देने की जरुरत नहीं थी आपको. ये मामला कानूनी तौर पर देखा जाय तो महाश्वेता देवी को कबका जेल में डाल दिया होता या ऐसे कई बुद्धिजीवियों को (जैसा की राहुल ने अपनी बातो में लिखा है उस दिन चिदंबरम का बयान आया था कि अगर किसी ने भी माओवादियों के समर्थन में बोला तो उसे राष्ट्रद्रोही समझा जाएगा और उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी….पता नही इस बयान के बारे में नही जानता). मै देखता हू लोकल अख़बार चलाने वाले किसी नोटिस पर इतनी जल्दी आत्मसमर्पण नहीं करते जितनी जल्दी आपने किया. आप इतना बड़ा पोर्टल चला रहे हो और आये दिन मीडिया के बड़े बड़े महारथियों से पंगा किया करते हो..एक पुलिस नोटिस पर अगर आप सरेंडर कर जाओगे (और ये बात तो अब तमाम मीडिया महारथी जान गए होंगे) तो बात गड़बड़ है. हां दुसरे के मामले में ज्ञान देना आसान होता है जब अपने पर आती है तो अच्छे से अच्छे दिमाग वाले का दिमाग ठ़प हो जाता है. शायद इसीलिए आपने मामले को ख़त्म करना ही उचित समझा. पर ये तो बनिया की निशानी है और आपने कई बार कहा है की आप उतने ही बनिया हैं जितने में पोर्टल और आप का खर्चा चल जाय. भईया फिर से कह रहा हूँ लीगली इस मामले को बड़े आराम से फेस किया जा सकता था तमाम उदाहरण हैं आप भी जानते हो.

  45. Ramesh Kumar Sirfiraa

    September 27, 2010 at 5:55 am

    माननीय यंशवत जी, आपने राहुल कुमार को सहनशीलता से जवाब दिया है. उसके लिए आपकी महानता को नमस्कार करता हूँ. आपके तर्कों से सहमत भी हूँ. एक निम्न स्तर का पुलिस अधिकारी अगर अपनी शालीनता लांघता है तो उसके साथ अपनी शालीनता नहीं लांघी जाती है. कहीं बार दूसरों के हित के लिए डरपोक व दोगलापन दिखाना मैं बुरा नहीं मानता हूँ.
    इन्टरनेट या अन्य सोफ्टवेयर में हिंदी की टाइपिंग कैसे करें और हिंदी में ईमेल कैसे भेजें जाने हेतु और आम आदमियों की परेशानियों को लेकर क़ानूनी समाचारों पर बेबाक टिप्पणियाँ पढ़ें. उच्चतम व दिल्ली उच्च न्यायालय को भेजें बहुमूल्य सुझाव पर अपने विचार प्रकट करने हेतु मेरे ब्लॉग http://rksirfiraa.blogspot.com & http://sirfiraa.blogspot.com देखें. अच्छी या बुरी टिप्पणियाँ आप करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे.अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें.

    # निष्पक्ष, निडर, अपराध विरोधी व आजाद विचारधारा वाला प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकार, कवि व लेखक रमेश कुमार जैन उर्फ़ “सिरफिरा” फ़ोन: 09868262751, 09910350461 email: [email protected], महत्वपूर्ण संदेश-समय की मांग, हिंदी में काम. हिंदी के प्रयोग में संकोच कैसा,यह हमारी अपनी भाषा है. हिंदी में काम करके,राष्ट्र का सम्मान करें.हिन्दी का खूब प्रयोग करे. इससे हमारे देश की शान होती है. नेत्रदान महादान आज ही करें. आपके द्वारा किया रक्तदान किसी की जान बचा सकता है

  46. payal

    September 27, 2010 at 5:02 pm

    राहुल जी ने अभी अभी पत्रकारि‍ता में कदम रखा है उन्‍हें कब कहां क्‍या लि‍खना है, शायद इसकी तमीज नहीं है। पत्रकारि‍ता में डि‍प्‍लोमेटि‍क होकर चलना पडता है। भई माना ि‍क डेमोक्रेसी है लेकि‍न इसका मतलब ये नहीं है ि‍क हम कुछ भी बोलें और देशवि‍द्रोह की बात करें। इस तरह के लेखन से राहुल जी लोगों को भडकाने का प्रयास का रहे हैं और बेवजह अपनी कि‍रकि‍री करवा रहे हैं। पत्रकारि‍ता में उनसे सीनि‍यर होने के नाते मैं उन्‍हे देना चाहूंगी ि‍क वो अपने जज्‍बातों को काबू में रखें । मैं वि‍कास मिश्रा जी के कंमेट से सहमत हूं यशवंत जी से ज्‍यादा साफदि‍ल इंसान मैने अपने पत्रकारि‍ता के अब तक के दौर में नही देखा और मेर सर्पोट हमेशा उनके साथ रहेगा।

  47. VSNandan

    September 27, 2010 at 6:42 pm

    Yashwant jee ye aapne kya kar dala bandar ke hath me nariyal dekar, use kya pata ye kya chij hai. Sayad aap bhi Patrakarita ke mulmantra ko tak par rakh kar aire-gaire ko post karne ki chhut de di,aur wo samjhne laga ki ab to uske hath me toap aa gaya hai. jigyasabas wo to use chlayega hi ,uspar patrkar shabd ka nasha har koi nahi pacha pata hai, aapse aisi asha nahi thi. sahar ki bhidbhad me to har koi chal leta hai jara gaown me chlkar dikhayo to jane….padmshree rahul ko …………

  48. राजीव कुमर

    September 28, 2010 at 3:13 pm

    यशवंत जी कभी डरपोक नही हो सकतेृ मैंने पुलिस के खिलाफ आर्टिकल बना कर दिया था यशवंत जी ने पब्लिश किया थाृ पुलिस के बेल्‍ट नंबर सहित वो आर्टिकल थाृ जबकि मैं सोच रहा था कि वो लेख पब्लिश करेंगे कि नहीृ यशवंत जी बहुत साहसी व्‍यक्ति हैं

  49. Arjun Sharma

    October 8, 2010 at 7:56 pm

    yashwant aapne apni ninda karne wala lekh chap kar hi bata diya ki aapki neeti main koi problem rahi bhi ho per aapki neeyat main koi khot nahin. Rahul aapko bhi dhorha dhyan rakhna chahiye. aapke lekh ki bhasha mujhe theek nahin lagi jo aapne yashwant ke bare main likha hai. abhi nae ho aur jyada tarraki karo, shubhkaamnayen

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