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यह एडिटर कैसा एडिटर है…

: शशि शेखर ने अपने साप्ताहिक आलेख में फिर की गलती! : हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर कभी इतिहास की तारीखें बदल देते हैं तो कभी इतिहास। वे गलत लेखन के लिए माफी भी मांग चुके हैं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है। गलतियां चालू हैं। क्या इस ताजी गलती के लिए वे माफी मागेंगे, अपनी सुधी पाठकों और इब्ने इंशा से। मुश्किल यह है कि शशि शेखर अपने हिन्दुस्तान के कर्मचारियों की तरह पाठकों को भी मूर्ख समझते हैं। इसलिए कुछ भी लिख डालते हैं। ताजा बदलाव कविताओं में किया है। हिन्दुस्तान में हर रविवार प्रकाशित होने वाले शशि शेखर के ”आजकल” कालम में 14 -11-10 के अंक में शशि शेखर ने फिर से कमाल किया है।

<p style="text-align: justify;">: <strong>शशि शेखर ने अपने साप्ताहिक आलेख में फिर की गलती! </strong>: हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर कभी इतिहास की तारीखें बदल देते हैं तो कभी इतिहास। वे गलत लेखन के लिए माफी भी मांग चुके हैं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है। गलतियां चालू हैं। क्या इस ताजी गलती के लिए वे माफी मागेंगे, अपनी सुधी पाठकों और इब्ने इंशा से। मुश्किल यह है कि शशि शेखर अपने हिन्दुस्तान के कर्मचारियों की तरह पाठकों को भी मूर्ख समझते हैं। इसलिए कुछ भी लिख डालते हैं। ताजा बदलाव कविताओं में किया है। हिन्दुस्तान में हर रविवार प्रकाशित होने वाले शशि शेखर के ''आजकल'' कालम में 14 -11-10 के अंक में शशि शेखर ने फिर से कमाल किया है।</p> <p>

: शशि शेखर ने अपने साप्ताहिक आलेख में फिर की गलती! : हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर कभी इतिहास की तारीखें बदल देते हैं तो कभी इतिहास। वे गलत लेखन के लिए माफी भी मांग चुके हैं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है। गलतियां चालू हैं। क्या इस ताजी गलती के लिए वे माफी मागेंगे, अपनी सुधी पाठकों और इब्ने इंशा से। मुश्किल यह है कि शशि शेखर अपने हिन्दुस्तान के कर्मचारियों की तरह पाठकों को भी मूर्ख समझते हैं। इसलिए कुछ भी लिख डालते हैं। ताजा बदलाव कविताओं में किया है। हिन्दुस्तान में हर रविवार प्रकाशित होने वाले शशि शेखर के ”आजकल” कालम में 14 -11-10 के अंक में शशि शेखर ने फिर से कमाल किया है।

उन्होंने ‘शताब्दी को गढ़ते बच्चों’ के नाम शीर्षक से प्रकाशित आलेख के शुरुआत में इब्ने इंशा की पंक्तियों को उद्घृत किया है। इन्हें कोट करते हुए इनवरटेड कॉमा में लिखा है- ”ये बच्चा किसका बच्चा है, जो धूप में तन्हा लेटा है।” पहली पंक्ति तो ठीक है लेकिन दूसरी पंक्ति को पढ़कर मेरा माथा ठनका। मैंने जब इब्ने इंशा की इस प्रसिद्ध कविता को पढ़ा तो दूसरी पंक्ति जो ‘धूप में तन्हा लेटा है’, कहीं नहीं मिली। इस कविता में सात बंद हैं। पहला बंद इस तरह है-

यह बच्चा कैसा बच्चा है
यह बच्चा काला-काला सा
यह काला सा मटियाला सा
यह बच्चा भूखा-भूखा सा
यह बच्चा सूखा-सूखा सा
यह बच्चा किसका बच्चा है…

जहां तक तन्हा शब्द की बात है तो यह तीन जगह आया है..

यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पर तन्हा बैठा है..
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है..
यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहां बैठा है..

इब्ने इंशा की कविता में बच्चा कहीं भी लेटा नहीं है। बच्चा बैठा हुआ है। लेकिन शशि शेखर ने बच्चे को लिटा दिया वह भी इब्ने इंशा के नाम से। वाह रे ज्ञानी। महान संपादक ने अपनी पंक्ति जो धूप में तन्हा लेटा है.. को इब्ने इंशा की पंक्ति बना दिया.. इसलिए हिन्दुस्तान के पाठक कह सकते हैं…

यह एडिटर कैसा एडिटर है
जो इतिहास गलत बताता है
अपनी बनाई पंक्ति को
इब्ने इंशा के नाम से लिखता है

आगरा से आई एक सुधी पाठक की चिट्ठी पर आधारित

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0 Comments

  1. ajay shukla

    November 15, 2010 at 10:42 am

    yashwant ji
    yah toh koi baat nahin hui. kisi bhi vidwan se aisi chook ho sakti hai. kai baar dimag cheezon ko apne dhang se yaad karta hai. woh kuchh ceezen jod deta hai toh kuchh ghata deta hai. hum yah jaan bhi nahin paatey aur samjhatey rahte hain ki humen woh cheez hurf-ba-hurf yaad hai.aap khud apni yaad cheezen RECALL kar ke meri baat ka tazurba kar sakte hain.
    ho sakta hai kuchh PARADKAR edit likhey samay encyclopedia aur doosre reference rakh kar likhtey hon magar shashi ji aisa nahin kartey. yah main tab kah raha hoon jabki main shashi ji ki lekhan prakriya nahin janta. magar main davey key saath kah sakta hoon ki ve extempore likhtey hain aur PREMISE mein doob kar likhtey hain. agar ve baisakhiyon ke saharey likh rahe hotey toh unke lehan mein LUCIDITIY na hoti. na hee usmen hoti EFFORTLESSNESS jo ki bahut manji hui kalam mein hee payee jaatee hai.
    phir aap yah bhi dekhiye ki shashi ji ne ibne inshaa ki panktiyan apne naam sey toh nahin likhin! poora samman diya hai mahan pakistani adeeb ko.
    patra lekhak inshaa sey maafi ki baat kahta hai. bataa doon ki inshaa ka nidhan 1978 mein ho chuka hai. jalandhar mein paida (1927) hua yeh leftist adeeb benazir vyangykaar thaa. unki eik kitaab devnagri lipi mein ab bhi uplabdh hai. naam hai URDU KI AAKHRI KITAAB.

    ant mein, aapka mitra aur bhdas ka shubh chintak hone ke naatey eik guzarish hai ki aapko yeh bharsak koshish karni chahiye ki koi shakhs aapkey portal ka beza istemal na kar payee
    ajay

  2. Raj Karan Singh

    November 15, 2010 at 10:44 am

    Jab Ahankar Shareer ke vajan se adhkik bhari ho jata hai, to is tarah ki galtiyan hone samanya baat rah jaati hai. Tab danbhi insaan khud ko Acharya Brihaspari se bhi uncha samajhne lagata hai.

  3. arun parashari

    November 15, 2010 at 11:15 am

    luck hai bhaiya——-hamesha yogyta se hi aadmi shikhar par nahin pahunchta

  4. SHUBHAM KASANA

    November 15, 2010 at 11:28 am

    NATIONAL DAILY MEIN AISI GALTIYAAN NAHIN CHAL SAKTI`n
    agr galtiyaan hi karni thi to meerut aur agra ke level par hi rahna chahiye tha
    yah aadmi editor kehlane layak nahi hai
    yeh kevel propety dealing aur daaru hi pii sakte hai

  5. shyam singhal

    November 15, 2010 at 11:47 am

    Ajay Shukla ji ne ekdam sahee likha hai. Ho sakta hai jo text Shashi ji parha hoga, usmen is tarah ki pankti ho. Kyonki mujhe bhi aisa hi yaad ata hai. Sab sea baree baat yah hai ki Bhaaw samaan hai. Aap naahak kisee ke peechhe par jate ho, yah theek naheen hai. Is se Bhadas ki bahut phajeehat ho rahee hai.
    Patrakaar banie, lekin negative uddeshya se prerit hokar naheen. varna bahut log aate hain, chale jaate hain.

  6. pooja

    November 15, 2010 at 11:58 am

    Idiot…
    Kya Unhone tujhse kaha hai ki wo apne karmchariyo ko bewakoof samajhte hain.. ha tujhe jarur samajhte honge..yah to tay hai

    Ek Employee

  7. avinash aacharya

    November 15, 2010 at 12:28 pm

    मेरा दावा है कि हममे से सब को जो कविताएं याद हैं, उनके भाव एक जैसे ही होंगे शब्द और कहीं-कहीं पंक्ति भिन्न होगी। इस विषय पर शोध हो सकता है कि एक मूल रचना के कितने रूप हैं। इसे विस्तार का विषय मानना चाहिए विवाद का नहीं। श्लोक या कुरआन की आयत नहीं है कि शब्द इधर-उधर होते पाप चिपक जाएगा। लिखने वाले अनामदास, पत्रकार खुद को भी जांच लें तो पाएंगे कि कितनी कविताओं की कितनी पक्तिं उनहें शुद्ध याद है। भाषण में इस्तेमाल किए जाने वाले शेर में तो बड़े-बड़े नेता मिसरे से बहक जाते हैं। वहां यह देखा जाता है कि वे किस संदभॆ में क्या कह रहे हैं। यहां भी एक लेख में कविता के हवाले से कुछ कहा जा रहा हो, कोई पक्तिं में कुछ गलत हो तो उसपर आपत्ति तो जताई जा सकती है। लेकिन इतनी आपत्तिजनक भाषा को भड़ास का नाम देकर जायज ठहराया जाए तो अलग बात है।

  8. karn dev

    November 15, 2010 at 1:13 pm

    एक संपादक होकर ऐसी गल्तियां अशोभनिय है। लेकिन जो लोग इस विषय पर टिप्पणी कर रहे है वह पहले हिन्दी में टाइप करना सीख लें। पूजा जी आप एक एम्पलोई हें पत्रकार नहीं काहे को इधर ध्यान देती हैं

  9. pooja

    November 15, 2010 at 1:20 pm

    karn dev….
    Aaap pahle apna GK Sudhariye..
    Patrakar bhi company ka Employee hi hota hai..aur mai bhi patrakar hi hu..

  10. humari bhadas

    November 15, 2010 at 6:22 pm

    insaan galtion ka putla hai, kaahe ko itna uchal rhe ho……. faaltu me kisi ki chavi kharab karne ko tule hai….. galtiyan sab se hoti hai. jo editor bana hota hai, wo ese thode hi editor ki post par pahuncha hai, kuchh na kuch kabliyat to hogi us insaan me…

  11. अपर्णा

    November 15, 2010 at 6:46 pm

    जो शख्स अपना नाम उजागर करने का नैतिक साहस नहीं रखता उसे चूड़ियाँ पहनकर घर बैठ जाना चाहिए। शशि शेखर जी को लेकर भड़ास के रवैये से उसका पूर्वाग्रह साफ़ झलकता है। किसी के भी समर्थन या विरोध में बहुत कुछ कहा जा सकता है। भड़ास अब जिस मुकाम पर है वहां उसे अपनी गरिमा का ख्याल रखना होगा। जहाँ तक इतिहास ज्ञान का प्रश्न है या पंक्तियों की शुद्धता का सवाल है, मुझे नहीं लगता कि निंदक महोदय को इसकी तनिक भी समझ है।

  12. dhanish sharma

    November 16, 2010 at 4:22 am

    main shashi ji ki lakhan ka big fan hu.dont worry.chalta hai.shashi ji is my ideal.ya sab chalta rahta hai…

  13. dhanish sharma

    November 16, 2010 at 4:24 am

    i m dying fan of shashi sir writting.he is my idial writter.dont worry.ya sub laga rahta hai..

  14. vijay mishra

    November 16, 2010 at 8:12 am

    pooja ji ke sabad pryog sahi nahi hai

  15. maanvendra singh

    November 16, 2010 at 10:25 am

    यह एडिटर, ऐसा एडिटर है

    देखिए भई ऐसा है सबसे पहले तो मैं यह कह दूं कि भड़ास को निजी तेल लगाने और खुन्नस निकालने का मंच न बनाए। यही करना है तो कहीं और करें।
    दूसरी बात गलती हुई है, यह साफ है। और इसे छिपाने वाले और भी बड़ी गलती कर रहे हैं। कहा गया कि शशि ने इंशा जी की लाइने अपने नाम से तो नहीं लिखीं। शशि इतने महान नहीं हैं कि वे इतनी अच्छी लाइनें लिख सकें। जो व्यक्ति दूसरों की लाइनें ठीक से टीप नहीं सकता वह खुद क्या लिखेगा। अगर सही जानकारी नहीं है तो कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि गलत न लिखें।
    देव जी की बात से मैं सौ फीसद सहमत हूं कि पहले हिन्दी पत्रकार हिन्दी में लिखना सीखें उसके बाद कुछ बात करें।
    सच कहा जाए तो शशि शेखर एक असफल संपादक साबित हुए हैं। उनके कार्यकाल में अमर उजाला की एक यूनिट और हिन्दुस्तान की दो यूनिटेंं बंद हो चुकी हैं। शशि जहां जाते हैं बंटाढार ही करते हैं।

  16. vinay verma

    November 16, 2010 at 11:08 am

    chhote aur laghu kshetriya sthanon par akhbaron ke netritwa karne wale jab chook jate hain to aise tathakathit editoron ka danda chalta hai. lekin samaj ke prabudh jan jise padhkar niti ka nirdharan karte hon agar vahi chookenge to is patrakarita jagat ka kya hoga.sochniya hai.

  17. karn dev

    November 16, 2010 at 2:21 pm

    मेरा जीके सुधारने के लिए धन्यवाद पूजा जी !
    क्या आपको मालूम है जब पत्रकार एक एम्पलोई की तरह का काम करता है तो वह केवल अपने संपादक के इशारो पर ही नाचता रहता है वह अपने संपादक के प्रति तो बफादार रहता है अपने समाज के प्रति नहीं। कृपया पत्रकार बने बाद में एम्पलोई।

  18. संजय कुमार सिंह

    November 16, 2010 at 4:15 pm

    ऊंचे पद पर बैठा कोई व्यक्ति गलती करे और लोग (मुफ्त में ही) उसे सही ठहराने की कोशिश करें तो वह सही नहीं हो जाएगा। न ही यह कहने से काम चलेगा कि यशवंत जी आपके पोर्टल का दुरुपयोग हो रहा है। भइया गलती तो गलती है और इनवर्टेड कॉमा में वही लिखा जाता है जो मूल रूप से लिखा होता है। इसीलिए, संपादक के पास पूरा संदर्भ सेक्शन, पुस्तकालय सब कुछ होता है, होना चाहिए। और कोई न रखे, उपयोग न करे तो तीसमार खां होगा। पर गलती करे और उसपर इसलिए टिप्पणी न की जाए उसने आवश्यक संदर्भ सेक्शन नहीं रखा है या उसका उपयोग नहीं करता है तो काम नहीं चलेगा।

    इसी तरह, संपादक अगर योग्य लोगों को अपने मातहत रखे, उन्हीं से लिखवाए या अपने लिखे पर उनकी सलाह ले तो भी गलती नहीं होगी। पर समस्या यह है कि जो योग्य होता है वह चमचा नहीं होता और जी हुजुरी नहीं करता। कुछ लोगों का यह भी कहना होता है कि गलती मामूली है। तो ऐसे लोगों को यह बताना जरूरी है कि प्रकाशित आलेख के साथ लिखा गया है कि वह एक सुधि पाठक की चिट्ठी पर आधारित है। बड़े लोगों के बचाव में कूद पड़ने से पहले सुनिश्चित तो कर लीजिए कि उसे इसकी जरूरत है भी कि नहीं। शशिशेखर के तेवर तो ऐसे हैं जैसे उन्हें इन सारी चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

  19. Sheo Prasad Narayan Singh

    November 17, 2010 at 4:10 am

    ये तय है कि आप शशिशेखर नामा डाल दें और कमेंटबाज अवतरित हो जाएंगे। भड़ास ने इसे चालाकी से साध लिया है। इसलिए साप्ताहिक-पाक्षिक और कभी-कभी मासिक अंतराल पर शशिशेखर का स्मरण होता रहता है। यह भी तय है कि विषय पर एक लाइन लिखने के त्तत्काल बाद निजी चरित्र और व्यवहार दोनों के हवाले शुरू हो जाते है। इससे लगता है कि खुन्नस कहां-कहां से टपक रही है। जैसे कुछ लोग हर सफल आदमी को सही ठहराने लगते हैं, उसी तरह विघ्नसंतोषी बिरादरी भी है जो अपनी महानता के किस्से बताने और विद्ववता का बोरा दूसरे के सिर पर लादने को तैयार रहती है, लेकिन किसी सफल आदमी का नाम इनके सामने लें तो दस गालियों का प्रसाद टपका देंगे। हर किसी को चरित्रहीन और बेईमान का प्रमाण-पत्र बांटते फिरेंगे, जैसे गोया इन्हीं के प्रमाण-पत्र से पेंशन मिलने वाली हो। शाऱीरिक व्यायाम भले देह को फायदा पहुंचाएं लेकिन निंदा का बेवजह मानसिक व्यायाम किसी को कुछ दे सकेगा, संभव नहीं।

  20. dhanish sharma

    November 17, 2010 at 7:26 am

    duniya jisa salam kara
    asa hain shashi shakher
    media k vo brand hain
    vo hain ek king maker. writter. dhanish sharma.shashi ji plz do read my kavita. this is for u.

  21. bigulgarjan murar kandari

    November 17, 2010 at 9:14 am

    sakar ji ab[b] budaa[/b] gay hai;)

  22. bigulgarjan murar kandari

    November 17, 2010 at 9:14 am

    sakar ji ab[b] budaa[/b] gay hai;)

  23. anamisharanbabal

    November 17, 2010 at 9:46 am

    bada hue to kya hue jaise ped khajur panchhi ko chhaya na mile fal lage ati dur is poec ko satik banate hue mr ss ne sabit kiya h ki tikdam lagakar bhidakar post paya ja sakta h garima nahi kitab jama karke library open kiya je skta h par ghan budhi nahi becharess ko el wrytup likhne me to dem nikel jete h bhala m pandey jaise lekhak banna ss ke bute se bahar ki bat h magar yaswant yar b4m nikalna to thik h bt itne mahan sampadko ka hal ya lekhajokha lene ? ye aadat to thik nahi khair ss ht me rahe kyoki madam ko ab mp ki bajay ss jaise log jyada bhate h kyoki ye editor hone ke sath 2 danda baji b karna janle h aur aaj ke jamane me aise sampadak durlabh class ke h ht me sabko pani pila kaj rakhna kya sabke boote me h ht ke tamam big boss ko rat bana diya h sb madam kolong time ke bad to ss mile h god se pray h meri ki we sb mem ke sath bane rahe sll the best ss sahab all the best ek kahawat h ki jyadatar log dusro ka sukhi dekh kar dukhi hote h aap aise nalayako jalankhoro ko jalne de logo ka kam bhukna hota h par aapka kam to lagatar aage chalte rhna h

  24. kumar kalpit

    November 17, 2010 at 8:16 pm

    yar, yah eetna bada mudda nahi hai ki etna tool diya jay. galti sase hati hai. behatar ho ki shekhae ji pathakon se chama mang le.

  25. geetanjali

    November 21, 2010 at 4:37 pm

    kya hai ki sekhar ji ko ghamand jyada hai. kahabat hai ki ati sabhi jagah kharab hoti hai. ghamand ne to mahabali Ravan ko khatm kar diya, Ye Kya hain.

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