लगता है कि मैं फिर से अनाथ हो गया

आदरणीय यशवंत जी, प्रणाम, सादर चरण स्पर्श, हजारों शाम नर्गिस अपनी बे नूरी पे रोती है.. बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा… क्षमा कीजिएगा, अपना नाम नहीं बता सकता क्योंकि आपकी तरह मैंने भी दोस्तों से ज्यादा दुश्मन बनाये हैं. भड़ास का शुरू से ही नियमित पाठक हूँ. बहुत से लेखों पर कुछ कहने लिखने का मन भी करता है लेकिन एक अनजाना डर मुझे रोकता है. कायर मत समझिएगा क्योंकि आपके गृह जनपद के पास का ही हूँ और पूर्वांचल के लोग कायर नहीं होते.

दरअसल गाँव घर के विवादों के बीच पढ़-लिख कर बड़ा हुआ. पत्रकार बना और घर के दुश्मनों ने पत्रकारिता के दुश्मनों का साथ पकड़ लिया और मिल कर योजनायें बनने लगी. पिता को खोया, पितामह को खोया और वो भी प्राकृतिक नहीं अप्राकृतिक म्रत्यु के बाद. पत्रकारिता की मुख्य धारा को छोड़ कर “घोस्ट रिपोर्टिंग” करने लगा.

परिचय स्वर्गीय प्रभाष जी से हुआ और उन्होंने कहा की अरे तुम उनके लड़के हो (मेरे पिताजी के लिए) काम करो पीछे मैं हूँ, लेकिन वे चले गए. उनके पहले यही बात वाराणसी के आदरणीय सुशील त्रिपाठी जी ने भी कही थी, वे भी चले गए, दिल्ली में अलोक जी से मिला था उनके विचार भी इस प्रकार ही थे. डांट कर कहा करते थे कि अघोर तो भय से परे है बे, क्यों नहीं सामने आता है, मैं हूँ तेरे साथ लेकिन आज वे भी नहीं हैं, लगता है कि फिर से अनाथ हो गया.

सब कुछ जानता हूँ. सबके बारे में जानता हूँ. भड़ास पढ़ कर खुश भी होता हूँ कि आप तक भी सूचना सही समय पर पहुँच जाती है, जिस दिन महसूस होगा कि आप तक बातें नहीं पहुँच रही हैं, उस दिन अपने घर के दरवाज़े पर किसी गुमनाम घंटी से चौंकिएगा मत. मेरा ही कोई आदमी आप तक बातें पहुंचा देगा, लेकिन आज मन बहुत व्यथित है. त्योहार मनाना कब का छोड़ दिया था. होली-दिवाली कुछ भी अब अच्छी नहीं लगती. शादी विवाह भी न करने की कसम खा ली है, लेकिन इस बार की होली ने जीवन के बचे खुचे रंग भी उड़ा लिए हैं, लगा जैसे कि सब कुछ एक साथ एक बार में ख़त्म हो गया.

आप तो कभी भी नहीं डरते और आपके मित्र भी वैसे ही हैं, चाहे अमिताभ जी हों, नूतन जी या अन्य कोई, सब एक जैसे हैं, दिलेर और जीवट. और यही लोग मुझे काम करने के लिए प्रेरित भी करते हैं, लेकिन अलोक जी बार-बार यही कहते थे कि तुम बहुत कुछ कर सकते हो, किया करो लेकिन मेरा तरीका हमेशा अलग रहता है. भाषा, विज्ञान, तंत्र, पत्रकारिता और अपराध सब पर काम करता हूँ, मन लगाकर पूरे दिल से.. डरता मैं भी नहीं हूँ, लेकिन आज डर लगा रहा है कि अब हम लोगों का क्या होगा?  किसी भी भाषा में शब्द नहीं बचे कि कुछ और लिखूं. सबके लेख और वक्तव्य पढ़ रहा हूँ. मन बोझिल हो रहा है दिल्ली फोन करके बार-बार उनके घर के बारे में पूछ रहा हूँ, उनके घर में भी मुझे कोई नहीं जानता, अब उनके चले जाने के बाद नाम बताना ज़रूरी भी नहीं समझता.

क्षमा कीजियेगा थोड़ा भावुक हूँ. ये मेल आईडी भी फर्जी है क्योंकि मैं अपना नाम किसी को नहीं बताना चाहता. मैं आपसे यह भी नहीं कह रहा कि आप इस बात को अपने पोर्टल में छापें. मन हो तो छापियेगा न मन हो तो पढ़ कर डिलीट कर दीजियेगा लेकिन आज अपने आपको रोक नहीं पाया..अंत में अघोर परंपरा के प्रवर्तक की वाणी के साथ सिर्फ इतना ही लिखूंगा – “जो नित्य है वही सत्य है.”

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darvesh.baakalam@gmail.com

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