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लागा मीडिया में दाग..!

संजयनीरा राडिया प्रकरण ने भारतीय मीडिया की चूलें हिला दी है। मीडिया के शिखर पर बैठे मठाधीशों की भागीदारी ने मीडिया के एक बदनुमा दाग को सामने ला दिया है। भारतीय मीडिया में नीरा राडिया प्रकरण एक मिसाल के तौर पर है। इसने मीडिया के सफेदपोशों को नंगा कर दिया है। जनप्रहरी, लोकप्रहरी के सवालों के घेरे में हैं। मीडिया के लिए मिसाल बने बड़े जनाब, आज बहुत छोटे और ओछे नजर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर लगा मुखौटा हट चुका है। युवा पत्रकारिता के लिए आर्दश माने जाने वाले कथित पत्रकारों ने अपने निजी फायदे के लिए मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

संजयनीरा राडिया प्रकरण ने भारतीय मीडिया की चूलें हिला दी है। मीडिया के शिखर पर बैठे मठाधीशों की भागीदारी ने मीडिया के एक बदनुमा दाग को सामने ला दिया है। भारतीय मीडिया में नीरा राडिया प्रकरण एक मिसाल के तौर पर है। इसने मीडिया के सफेदपोशों को नंगा कर दिया है। जनप्रहरी, लोकप्रहरी के सवालों के घेरे में हैं। मीडिया के लिए मिसाल बने बड़े जनाब, आज बहुत छोटे और ओछे नजर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर लगा मुखौटा हट चुका है। युवा पत्रकारिता के लिए आर्दश माने जाने वाले कथित पत्रकारों ने अपने निजी फायदे के लिए मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

मुद्दे को खुद मीडिया ने ही सामने लाकर बहस की शुरूआत की है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है कि मीडिया में घुसते भ्रष्टचार पर सवाल उठा हों! मीडिया को मिशन समझने वाले दबी जुबां से स्वीकारते हैं कि नीरा राडिया प्रकरण ने मीडिया के अंदर के उच्च स्तरीय कथित भ्रष्टाचार को सामने ला दिया है और मीडया की पोल खोल दी है। हालांकि, अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन छोटे स्तर पर। छोटे-बडे़ शहरों, जिलों एवं कस्बों में मीडिया की चाकरी बिना किसी अच्छे मासिक तनख्वाह पर काम करने वाले पत्रकारों पर हमेशा से पैसे लेकर खबर छापने या फिर खबर के नाम पर दलाली के आरोप लगते रहते हैं।

खुले आम कहा जाता है कि पत्रकरों को खिलाओ-पिलाओ-कुछ थमाओ और खबर छपवाओ। मीडिया की गोष्ठियों में, मीडिया के दिग्गज गला फाड़ कर, मीडिया में दलाली करने वाले या खबर के नाम पर पैसा उगाही करने वाले पत्रकारों पर हल्ला बोलते रहते हैं, लेकिन आज हल्ला बोलने वाले मीडिया के ही दिग्गज खुद ही दलाली करते, भ्रष्टाचार में हिचकोले खाते, मीडिया के नाम पर अपनी दुकान चमकाते, पकड़े गये हैं।

स्वभाविक है, हो हल्ला तो होगा ही? नीरा राडिया, विकीलिक्स, पेड न्यूज, सीडी काण्ड, स्टिंग के नाम पर ब्लैकमेल सहित कई ऐसे मामले पड़े हैं, जिसने मीडिया को बेहद ही अविश्‍वासी नजरिये से देखने पर मजबूर कर दिया है। ये मामले इतने दबंग हैं कि मीडिया की दबंगई भी काम नहीं आ रही है। मीडिया की दलाली करने वाले मीडिया के अक्टोपसी संस्कृति वालों को जवाब सूझ नहीं रहा।

प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोषी ने जब मीडिया के अंदर पैसे लेकर खबर छापने यानी पेड न्यूज की खिलाफत करनी शुरू की थी तो मीडिया दो खेमें में बंट गयी। आरोप-प्रत्यारोप की गूंज सुनाई पड़ने लगी। मीडिया के अंदर की इस खबर से जनता पहली बार रू-ब-रू हुई। मीडिया अविश्‍वास के दायरे में आया। देश भर में घूम-घूम कर प्रभाष जोषी ने पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने और खबर को बेचने वालों के खिलाफ झंडा उठाया था। पत्रकारों का एक तबका पेड न्यूज के खिलाफ गोलबंद हुआ तो दूसरी ओर मीडिया हाउसों के मालिकों के हां-में-हां मिलाते पत्रकार, विरोधियों पर हल्ला बोलने से नहीं चूके। खैर, यह उनकी मजबूरी रही होगी, कहीं हाथ से नौकरी न चली जाये?

तेजी से मीडिया के बदलते हालातों के बीच पत्रकारिता के एथिक्स और मापदण्डों पर बात करना बेमानी-सी प्रतीत होने लगी है। लोकतंत्र पर नजर रखने वाला मीडिया भ्रष्टाचार के जबड़े में है। हालांकि, इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि मीडिया की आड़ में दलाली करने एवं खबर को बेचने जैसे भ्रष्ट तरीके के खिलाफ मीडिया ने ही सवाल उठाये गए हैं। प्रभाष जोषी ने जिस खतरे से अगाह किया था, वह साफ दिखने लगा है। और इस बार का मामला ऊंचाई वालों का है। मीडिया को सत्ता पक्ष के लिए कंट्रोल करने वालों के खिलाफ है। निशाने पर जिले और कस्बे में पत्रकारिता करने वाले पत्रकार नहीं हैं, जो एक खबर छपने पर दस रूपये पाते हैं। मामला मीडिया को कंट्रोल करने वालों से जुड़ा है।

यकीनी तौर पर भारतीय गणतंत्र के सामने मौजूदा भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर है। ऐसे में गणतंत्र के प्रहरी मीडिया का भ्रष्टाचार के आगोश में आ जाने पर विषय चिंतनीय प्रतीत होता है। सवाल भ्रष्ट होते पत्र और पत्रकारों का है और यह छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक है। हालांकि, छोटे स्तर के पत्रकारों के ऊपर अक्सर भ्रष्ट होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। ऊपर से नसीहतें भी दी जाती रही है कि पत्रकारिता करनी है तो मिशन के तहत काम करो। दलाली करनी है, तो पत्रकारिता छोड़ कोई और काम करों..? मीडिया के अंदर भ्रष्टाचार के घुसपैठ पर भले ही आज हो हल्ला हो जाये, यह कोई नयी बात नहीं है। पहले निचले स्तर पर नजर डालना होगा। जिलों-कस्बों में दिन-रात कार्य करने वाले पत्रकार इसकी चपेट में आते हैं, लेकिन सभी नहीं। अभी भी ऐसे पत्रकार हैं, जो संवाददाता सम्मेलनों में खाना क्या, गिफ्ट तक नहीं लेते हैं। संवाददाता सम्मेलन कवर किया और चल दिये। वहीं कई पत्रकार खाना और गिफ्ट के लिए हंगामा मचाते नजर आते हैं। पिछले कुछेक वर्षों में मीडिया की दुकानदारी जिस तरह से खुली, वह अब कहानी नहीं हकीकत बन चुकी है। पैसे लेकर खबर छापने के मसले पर, पूंजीपतियों के साथ मीडिया हाउसों का वैचारिक मजबूत दीवारें ढहीं।

वहीं देखें, तो छोटे स्तर पर पत्रकारों के भ्रष्ट होने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक शोषण का आता है। छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रूपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम लिया जाता है। उपर से प्रबंधन की मर्जी, जब जी चाहे नौकरी पर रखे या निकाल दे। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह है। वेतन के मामले में कलम के सिपाहियों का हाल, सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है। ऐसे में यह चिंतनीय विषय है कि एक जिले, कस्बा या ब्लाक का पत्रकार अपनी जिंदगी पानी और हवा पी कर तो नहीं गुजारेगा? लाजमी है कि खबर की दलाली करेगा? वहीं पर कई छोटे-मंझोले मीडिया हाउसों में कार्यरत पत्रकारों को तो कभी निश्चित तारीख पर तनख्वाह तक नहीं मिलती है।

सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान पर काम करने वाले पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है? उपर से मीडिया हाउस का विज्ञापन लाने और अखबार की बिक्री को बढ़ाने का दबाव। पत्रकारों को भ्रष्ट बनाने में बड़े समाचार पत्र समूह भी शामिल हैं। एक स्ट्रिंगर को प्रति समाचार 10 रु. देते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालमों की। सुपर स्ट्रिंगर को प्रति माह दो से तीन हजार पर रखा जाता है। छोटे मंझोले समाचार पत्र तो, कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान तक नहीं करते। हां उनके समाचार जरूर छप जाते हैं। ऐसे में उन पत्रकारों का आर्थिक शोषण और साथ ही साथ उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है, जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयों में कार्यरत स्ट्रिंगर और सुपर स्ट्रिंगर को तीन हजार से 14 हजार रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। अमूमन हर अखबार, कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं, उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है, उस पर उसे कमीशन दिया जाता है। अखबार का संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा। जो उसकी मजबूरी बन जाती है। आखिर दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या? हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद हैं? इसके पीछे के कारण को मीडिया में सब जानते है लेकिन इस परिपाटी को खत्म करने के लिए किसी भी स्तर पर प्रयास नहीं दिखता।

आरोप छोटे स्तर तक ही नहीं है। राजधानी के बड़े पत्रकार भी भ्रष्टाचार के घेरे में हैं। सत्ता के गलियारे में वे दलाली करते देखे जा सकते हैं, मीडिया हाउस के मालिकों या अपने निजी कार्यों के लिए। ऐसे पत्रकार, पत्रकारों के गलियारे में फ्रॉड और दलाल के रूप में पहचाने जाते हैं। कमोबेश, बड़े स्तर यानी मीडिया का हब यानी देश की राजधानी दिल्ली में भी राष्ट्रीय स्तर पर यह सब कायम है। जाहिर है, राष्ट्रीय स्तर के पत्रकरों का स्तर भी, राष्ट्रीय स्तर का होगा! देश की राजनीति को कंट्रोल करने वाले तथाकथित ये पत्रकार, आज अपनी दुकानदारी से मीडिया हाउस के मालिक तक बन चुके हैं।

छोटे स्तर पर कथित भ्रष्ट मीडिया को तो स्वीकारने के पीछे, पत्रकारों का आर्थिक शोषण सबसे बड़ा कारण समझ में आता है, जिसे एक हद तक मजबूरी का नाम दिया जा सकता है। लेकिन दिन के उजाले में पत्रकारिता के स्तंभ माने जाने वाले तथाकथित पत्रकार, रात के अंधेरे में दलाली का जो गुल खिलाते हैं उससे पत्रकारिता शर्मसार हुई है। इन तथाकथित पत्रकरों के समक्ष जिलों व कस्बों के पत्रकारों जैसा आर्थिक अभाव नहीं रहता। लक्ज़री गाड़ी में घूमना, हवाई यात्रा का मजा लेना और कॉरपोरेट जगत में उठना-बैठना इनके दैनिक कार्यो में शामिल होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि मीडिया की आड़ में सुविधाभोगी पत्रकार आखिर दलाली क्यों करते है..? कहीं सत्ता, पॉवर या फिर, ज्यादा से ज्यादा धन की लालसा तो नहीं?

भ्रष्टाचार में फंसे बडे़ पत्रकारों के नाम आने से मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ खड़ा हुआ है। शर्मसार मीडिया को इस झटके से उबरने में समय लगेगा। धर्मवीर भारती, रधुवीर सहाय, एसपी सिंह, उदयन शर्मा सरीखे पत्रकारों की पीढ़ी ने अपने खून पसीने से मीडिया को एक आधार दिया था, जो भारतीय पत्रकारिता के स्तंभ बने और जो अपने तेवर से जाने जाते हैं। जन संचार के शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले पत्रकारिता के छात्रों के लिए आर्दश के रूप में जाने जाते हैं। इन नामों में कई नाम ऐसे भी हैं, जो आज पत्रकारिता के क्षेत्र में स्तंभ के रूप जाने जाते हैं। युवा पत्रकारों के लिए आर्दश हैं, लेकिन राडिया प्रकरण के घेरे में आने से पत्रकारिता के छात्रों को धक्का तो लगा ही, साथ ही जनमानस के पटल पर भी घात हुआ है। मीडिया के उपर दाग लग चुका है। सवाल है कैसे छूटेगा यह…?

लेखक संजय कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. फिलहाल वे आकाशवाणी पटना में संमाचार संपादक हैं. 

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0 Comments

  1. Rizwan Chanchal lko

    December 28, 2010 at 6:25 am

    सच्चाई तो यह है कि जर्नलिस्ट का दायित्व जज वा पुजारी की तरह एक नैतिक पेषे से संबद्व माना जाता है और उससे सामूहिक हित को हमेषा निजी लाभ से ऊपर रखने की अपेक्षा की जाती है तथा जर्नलिस्ट को खरेपन में यकीन रखने वाले , गंभीर और सहृदय व्यक्ति के रूप में देखा समझा जाता है। यह पत्रकारिता से जुड़ी नैतिक छवि का दबाव ही है , जो इसके सबसे ऊंची पगार पाने वाले प्रतिनिधियों को भी राजनीतिक अखाड़ेबाजों या व्यापारियों की तरह व्यवहार करने से रोकता है। जब वे इस अंतर को नजरअंदाज करते हैं तो लोगों की असहमति का जोखिम उठाना ही पड़ता है और फिर इन्हे अपनी विरादरी के लोग भी नंगा करने में कोई कोरकसर नही छोड़ते काष! पत्रकारिता की मर्यादा भंग करने वाले इन लेागों को भी इस बात का एहसास होता जो कल तक पत्रकारिता के लिए आर्दष माने जाते रहे जिन्होने अपने निजी फायदे के लिए समूचे मीडिया को कटधरे में ला खड़ा कर दिया है संजय जी फिलहाल तो ऐसा कोई पाउडर नजर नही आता जिससे मीडिया के इस दाग को ……………………..?

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