लाबीइंग और पीआर कंपनियों की न्यूजरूम में घुसपैठ

आनंद प्रधान: क्या देश पीआर डेमोक्रसी बनने जा रहा? : मीडिया के अंडरवर्ल्ड से सबसे अधिक खतरा लोकतंत्र को : …..”भारतीय गणतंत्र अब बिकाऊ है. इसके लिए लग रही बोली में ताकतवर लोग, कारपोरेट घराने, दलाल, नौकरशाह और पत्रकार सभी शामिल हैं.” – साप्ताहिक ‘आउटलुक’ (कवर स्टोरी, 29 नवंबर’10)… समाचार मीडिया का एक अंडरवर्ल्ड है. यह किसी से छुपा नहीं है. हाल के वर्षों में उसका न सिर्फ तेजी से विस्तार हुआ है बल्कि वह बेरोक-टोक फल-फूल रहा है. यह एक ऐसा सच है जिसके बारे में सब जानते हैं, समाचार मीडिया को नजदीक से जाननेवालों और पत्रकारों की निजी बातचीत में उसके बारे में खूब चर्चा भी होती है लेकिन सार्वजनिक चर्चाओं में शायद ही उसका कभी जिक्र होता हो. हालांकि यह अनेक कारणों से लोक महत्व का बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने को लेकर एक खास तरह की ‘षड्यंत्र भरी चुप्पी’ (कांस्पिरेसी आफ साइलेंस) मीडिया और अन्य मंचों पर दिखाई पड़ती है.

मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड के बारे में चर्चा से परहेज की कई वजहें हो सकती हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि संख्या में कम होते हुए भी यह अंडरवर्ल्ड बहुत संगठित, ताकतवर, प्रभावशाली और इसका नेटवर्क बहुत व्यापक है. इसमें मीडिया समूहों के मालिक, टाप मैनेजर, वरिष्ठ संपादक और टाप रिपोर्टर शामिल हैं. इस अंडरवर्ल्ड का सीधा सम्बन्ध पावर लाबीज़ और पावर ब्रोकर – सत्ता के दलालों- से है या कहिये कि मीडिया का अंडरवर्ल्ड पावर लाबीज़ का अनिवार्य हिस्सा है. इस पावर लाबी में टाप उद्योगपतियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और उनके दलालों के साथ-साथ मीडिया समूहों के मालिक, संपादक और वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं.

आज बिना किसी जोखिम के कहा जा सकता है कि यही पावर लाबीज़ और सत्ता के दलाल केन्द्र और राज्यों की सरकारें चला रहे हैं. सरकारें चाहें जिस पार्टी या गठबंधन की हों लेकिन उनकी नीतियों और फैसलों पर इन पावर लाबीज़ और पावर ब्रोकर्स की छाप साफ देखी जा सकती है. इस पावर लाबी की ताकत और प्रभाव का अंदाज़ा 2 जी घोटाले में आ रहे नामों से लगाया जा सकता है जिसमें टेलीकाम मंत्री ए. राजा के अलावा उद्योगपतियों, कारपोरेट समूहों, अफसरों, राजनेताओं के साथ-साथ नीरा राडिया जैसे पी.आर और लाबीइंग मैनेजरों और एन.डी.टी.वी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त और हिंदुस्तान टाईम्स के संपादकीय निदेशक वीर संघवी भी शामिल हैं.

यहां यह उल्लेख करते चलना जरूरी है कि टाटा समूह और मुकेश अम्बानी के रिलायंस समूह जैसे बड़े कारपोरेट समूहों के लिए सत्ता के गलियारों में लाबीइंग करनेवाली नीरा राडिया (वैष्णवी कम्युनिकेशन और नोएशिस स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन आदि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों की मालिक) और बरखा दत्त, वीर संघवी, प्रभु चावला और एम.के वेणु जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की प्राइवेट फोन बातचीत के टेप हाल ही में जारी हुए हैं. हालांकि इन सभी पत्रकारों का अपनी सफाई में यह कहना है कि ये बातचीत एक पत्रकार और उसके सूत्र (सोर्स) के बीच की बातचीत है जिसमें कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन इन टेपों में बातचीत के ऐसे कई प्रसंग हैं जो एक पत्रकार और उसके सूत्र के बीच वैध बातचीत की सीमाओं का उल्लंघन लगती हैं. उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि ये वरिष्ठ पत्रकार भी सत्ता की दलाली और लाबीइंग के खेल में कहीं न कहीं से शामिल हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि 2 जी घोटाले और उससे जुड़े इस टेप प्रसंग की चर्चाएं पिछले कई महीनों से हवाओं में थीं. यहां तक कि नीरा राडिया के टेप्स का उल्लेख संसद से लेकर बाहर तक भी हुआ लेकिन मीडिया के स्टार पत्रकारों की भूमिका पर फिर भी किसी ने बात करने की हिम्मत नहीं की. लेकिन अब उनके छपने और कई वेबसाइट्स पर आ जाने के बाद यह सवाल उठाने लगा है कि मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड पर खुद मीडिया में और उससे बाहर बात क्यों नहीं होती है? असल में, आपसी गलाकाट प्रतियोगिता के बावजूद इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सभी मीडिया समूहों और संपादकों में एक तरह की अलिखित सहमति है कि एक-दूसरे के बारे में खासकर एक-दूसरे के अवैध और अनुचित कामों के बारे में तब तक न कुछ छापेंगे और न दिखाएंगे जब तक कि वह बिल्कुल सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बन जाए और जिसे छुपाना असंभव हो.

क्या इसकी वजह यह है कि इस खेल में अलग-अलग स्तरों पर सभी कहीं न कहीं से शामिल हैं? अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. दूसरे, जो इक्का-दुक्का मीडिया समूह और पत्रकारों का बड़ा हिस्सा इस खेल में शामिल नहीं है, वह भी उनके ताकत और प्रभाव के कारण कुछ बोलने-कहने में हिचकिचाता है. आखिर इन मीडिया समूहों को भी कारपोरेट समूहों से विज्ञापन और सरकार से सहूलियतें चाहिए और दूसरी ओर, अधिकांश पत्रकारों के सामने नौकरी और कैरियर की चिंता होती है. माना जाता है कि अगर आपने मीडिया के अंडरवर्ल्ड की कारगुजारियों पर सार्वजनिक चर्चा की तो एक प्रोफेशनल पत्रकार के रूप में मीडिया में आपका टिके रहना मुश्किल हो जायेगा.

कुछ ऐसे संजीदा और समझदार लोग भी हैं जो एक खास समझदारी के तहत मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड के बारे में चर्चा नहीं करना चाहते हैं. उनका मानना है कि देश में अब कुछ ही संस्थाएं ऐसी बची हैं जिनसे अभी भी लोगों को उम्मीद है और जो कुछ भटकावों के बावजूद अपनी भूमिकाएं और जिम्मेदारियां निभा रही हैं. न्यायपालिका, चुनाव आयोग और सी.ए.जी के साथ-साथ समाचार मीडिया भी इनमें से एक है. उनका मानना है कि अगर इनकी भी साख पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो देश में लोकतंत्र का चलना और उसका जीवित रहना मुश्किल हो जायेगा. खुद चुनाव आयोग के मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी ने कुछ समय पहले एक गोष्ठी में यह चिंता जाहिर की थी. इसी तरह, नीरा राडिया टेप्स के सामने आने के बाद सुचेता दलाल जैसी पत्रकार भी इस तरह की आशंका जाहिर कर रही हैं. इस चिंता की मूल भावना से सहमत होते हुए सवाल यह है कि जो समाचार मीडिया सबकी जिम्मेदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करता है, उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या उसकी कोई जवाबदेही नहीं है? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मीडिया की साख बचाने के नाम पर उसके अंडरवर्ल्ड और उसकी कारगुजारियों पर चुप रहने से लोकतंत्र बच जायेगा?

असल में, मीडिया के अंडरवर्ल्ड से सबसे अधिक खतरा लोकतंत्र को ही है क्योंकि वह धीरे-धीरे पूरे समाचार मीडिया को हाइजैक करता जा रहा है. चिंता की बात यह है कि पावर लाबीज़ और ब्रोकर्स के साथ मिलकर मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड ने समाचार मीडिया को उसकी लोकतान्त्रिक भूमिका और जिम्मेदारियों से दूर करना और सत्ता, बड़ी पूंजी और ताकतवर लोगों की सेवा में लगाना शुरू कर दिया है. यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि आज मीडिया का यह अंडरवर्ल्ड खुद लोकतंत्र के साथ क्या खिलवाड़ कर रहा है? पेड न्यूज का विवाद सबके सामने है. खबरों की खरीद-फरोख्त के इस संगठित खेल ने सबसे अधिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही नुकसान पहुँचाया है. इसने न सिर्फ पाठकों-दर्शकों के जानने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया है बल्कि उनके साथ दिखा भी किया है. इस प्रसंग को यहीं छोड़ते हैं क्योंकि इस बारे में पिछले कई महीनों से काफी चर्चा हो रही है. लेकिन पेड न्यूज का यह खेल सिर्फ चुनावों के समय खबरों की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रहा है. इसका दायरा बहुत बड़ा है और यह धीरे-धीरे सभी तरह की खबरों, फीचर और संपादकीय विचारों तक फ़ैल चुका है.

लेकिन अब बात यहीं तक सीमित नहीं रही. जैसाकि नीरा राडिया के टेप्स से जाहिर है कि वरिष्ठ पत्रकार अब सीधे सत्ता के गलियारों में बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स के हक में दलाली कर रहे हैं. वे पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के टाप मैनेजरों से सिर्फ खबरों के लिए बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उससे कहीं आगे बढ़कर उनके लिए काम कर रहे हैं. पी.आर और लाबीइंग कंपनियां उनके लेखन/खबरों का एजेंडा तय कर रही हैं. हालांकि बरखा दत्त का अपनी सफाई में कहना है कि जो लोग ऐसे आरोप लगा रहे हैं, उन्हें यह साबित करना चाहिए कि “मुझे दलाली के बदले में क्या मिला है? क्या मैंने खबरों से कोई समझौता किया है?”

लेकिन क्या बरखा दत्त यह बताएंगी कि 2 जी घोटाले में ए. राजा को क्या मिला है? राजा को अनियमितताओं के बदले में क्या मिला है, यह अभी किसी को पता नहीं है और न ही यह साबित हुआ है कि राजा ने पक्षपात के बदले में क्या लिया है? इसलिए सवाल यह नहीं है कि दलाली के बदले क्या मिला है बल्कि सवाल यह है कि नीरा राडिया जैसे लाबीइंग और पावर ब्रोकिंग की खुली खिलाड़ी से बात करते समय एक पत्रकार की लक्ष्मण रेखा क्या होनी चाहिए? दूसरे, वीर संघवी के सन्दर्भ में उससे बड़ा सवाल यह कि एक पत्रकार को अपनी टिप्पणियां लिखते या टी.वी पर बोलते हुए किस हद तक पी.आर और लाबीइंग मैनेजरों पर निर्भर रहना चाहिए?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि हाल के वर्षों में न सिर्फ पेड न्यूज के रूप में बल्कि बड़े देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों, पार्टियों, मंत्रियों-नेताओं और सरकार के लिए पी.आर और लाबीइंग करनेवाली कंपनियों की घुसपैठ समाचार कक्षों में बढ़ी है. यह चिंता की बात इसलिए है कि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के प्रभाव से न सिर्फ खबरों की स्वतंत्रता, तथ्यात्मकता और निष्पक्षता प्रभावित होती है बल्कि खबरों का पूरा एजेंडा बदल जाता है.

पी.आर और लाबीइंग कंपनियों को खबरों में अपने क्लाइंट के हितों के मुताबिक तोड़-मरोड़ करने, मनमाफिक खबरें प्लांट करने और नकारात्मक खबरों को रुकवाने के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि समाचार मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संपादकों की एक जिम्मेदारी पी.आर और लाबीइंग कंपनियों और उनके मैनेजरों को समाचार कक्ष से दूर रखने की भी रही है. लेकिन जब संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ही पी.आर और लाबीइंग कंपनियों से प्रभावित और उनके लिए काम करने लगें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इन कंपनियों ने किस हद तक समाचार कक्षों का टेकओवर कर लिया है. नीरा राडिया प्रकरण इसी टेकओवर का सबूत है. असल में, भारत में लाबीइंग की घनघोर ताकत पर अभी बात नहीं हो रही है जबकि देश में अधिकांश बड़े आर्थिक और व्यावसायिक फैसले उसी के जरिये हो रहे हैं.

लाबीइंग के महत्व को स्पष्ट करते हुए जानी-मानी पी.आर और लाबीइंग कंपनी परफेक्ट रिलेशंस के मालिक दिलीप चेरियन कहते हैं कि, “ ..सभी चाहते हैं कि सरकार उनके पक्ष में रहे. इस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में कई लोग कह सकते हैं कि उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है अगर सरकार उनके पक्ष में नहीं है बशर्ते वह उनके खिलाफ न हो. लेकिन यह सच नहीं है. सच यह है कि फ़िलहाल और आनेवाले वर्षों में भी सरकार को प्रभावित करना किसी भी कंपनी के सी.इ.ओ का सबसे महत्वपूर्ण काम होगा.”

चेरियन का कहना बिल्कुल सही है. हालत यह हो गई है कि सरकार को अपने पक्ष में और विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कार्पोरेट समूह अपने मनपसंद मंत्री और अफसर भी नियुक्त कराने लगे हैं. टेलीकाम मंत्री के रूप में ए. राजा की नियुक्ति के लिए लाबीइंग इसका एक उदाहरण है. इसी तरह, अन्य आर्थिक मंत्रालयों में हुई मंत्रियों और अफसरों की नियुक्ति में भी लाबीइंग की जबरदस्त भूमिका रही है. हाल के वर्षों में खासकर आर्थिक उदारीकरण के बाद जहां एक-एक सौदे और लाइसेंस में एक-दो नहीं बल्कि सैंकडों-हजारों करोड़ दांव पर लगे हुए हैं, वहां सौदे हासिल करने में पी.आर और लाबीइंग की ताकत का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

लाबीइंग कंपनियां सरकार को अपने कारपोरेट क्लाइंट के पक्ष में रखने के लिए हर तिकडम आजमाती हैं. उनमें से ही एक है- मीडिया और पत्रकारों का इस्तेमाल. कई बार उनका इस्तेमाल मंत्रियों और अधिकारियों तक पहुंचने के लिए किया जाता है और कई बार उनके जरिये अपने अनुकूल राजनीतिक माहौल और जनमत तैयार किया जाता है. इस कारण पी.आर अब सिर्फ पी.आर नहीं है बल्कि वह लाबीइंग और उससे बढ़कर क्राइसिस मैनेजमेंट, इमेज मैनेजमेंट और इश्यू मैनेजमेंट तक पहुंच चुका है जहां पी.आर कंपनियां अपने क्लाइंट्स के हितों को पूरा करने के लिए अपने प्रतिकूल हर सूचना और जानकारी को न सिर्फ मैनेज कर रही है बल्कि जवाब में झूठी सूचनाएं और जानकारियां प्रचारित कर रही हैं.

जाहिर है कि इसके लिए समाचार मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया जाता है. मीडिया एक तरह से पी.आर और लाबींग कंपनियों का अखाडा है जहां वे जनहित के नाम पर अपने क्लाइंट के हितों को आगे बढाती हैं. खबरों को नया स्पिन देती हैं. इसलिए अगर आप कभी ध्यान से देखें कि चैनलों पर प्राइम टाइम की स्टूडियो चर्चाओं में चाहे वह राजनीतिक मुद्दा हो या आर्थिक या कोई अन्य मुद्दा- कुछ खास चेहरे ही आपको सभी मुद्दों पर स्वतंत्र एक्सपर्ट या सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई पड़ेंगे. इनमें सुहेल सेठ, अलिक पद्मसी, शोभा डे, प्रह्लाद कक्कर आदि अत्यधिक मौजूदगी एक खास पैटर्न की ओर इशारा करती है. इसी तरह, कुछ खास स्वतंत्र पत्रकारों जैसे विनोद शर्मा, स्वपन दासगुप्ता, चन्दन मित्र, विनोद मेहता, शेखर गुप्ता आदि की उपस्थिति भी एक स्पष्ट संकेत है.

ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे देश एक “पी.आर. डेमोक्रेसी” की ओर बढ़ रहा है जहां पी.आर और लाबीइंग की आड़ में मीडिया का अंडरवर्ल्ड बड़ी पूंजी और सत्ता के गठजोड़ के हक में जनमत बनाएगा. वह दिन दूर नहीं जब हालत कुछ कुछ ब्रिटेन की तरह होंगे जहां पत्रकारों की तुलना में पी.आर प्रोफेशनलों की संख्या ज्यादा हो चुकी है. निक डेविस के मुताबिक इस समय ब्रिटेन में 47800 पी.आर प्रोफेशनल्स और 45 हजार के आसपास पत्रकार हैं. साफ है कि पी.आर और लाबीइंग की ताकत दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. मीडिया में सच की कीमत पर झूठ का सिक्का चल निकला है. दर्शकों-पाठकों को सच के नाम पर मैनेज्ड खबरें और विचार परोसे जा रहे हैं. वह दिन दूर नहीं है जब लाबीइंग को पूरी तरह से एक वैध प्रोफेशन बनाने की मांग उठने लगेगी.

लेखक आनंद प्रधान इन दिनों देश के प्रतिष्ठित पत्रकारिता शिक्षण संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) में हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के निदेशक हैं. छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय आनंद बनारस हिंदी विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रसंघ अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनका वामपंथी विचारधारा से गहरा अनुराग है. अपने जीवन और करियर में जनपक्षधरता का झंडा हमेशा बुलंद रखने वाले आनंद प्रखर वक्ता और चिंतक भी हैं. देश के सभी बड़े अखबारो-पत्रिकाओं में सामयिक मुद्दों पर गहरी अंतदृष्टि के साथ लगातार लिखने वाले आनंद का यह आलेख उनके शिष्यों के ब्लाग ‘तीसरा रास्ता’ से साभार लिया गया है. इस आलेख का सर्वप्रथम प्रकाशन ‘कथादेश’ के दिसंबर’10 अंक में हुआ. आनंद प्रधान से संपर्क करने के लिए  apradhan28@gmail.com का सहारा ले सकते हैं.

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