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पॉवर-पुलिस

लुच्चा लोकू, बेईमान बृजलाल…

[caption id="attachment_18732" align="alignleft" width="179"]लुच्चा लोकू और बेईंमान बृजलाललुच्चा लोकू और बेईंमान बृजलाल[/caption]: क्योंकि मां को न मिला न्याय : बेईमान इसलिए क्योंकि यूपी के एलओ साहब उर्फ लॉ एंड आर्डर के एडीजी उर्फ अघोषित डीजीपी बृजलाल ने निर्दोष मां को बिना वजह 15 घंटे थाने में बिठाने वाले गाजीपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एल. रवि कुमार उर्फ लोकू रवि कुमार उर्फ रवि कुमार लोकू उर्फ लोकू उर्फ लोक्कू को बख्श दिया है. सिर्फ थानेदार पर गाज गिराई, उसे लाइन हाजिर करके. मां को थाने में बिठाए जाने के वीडियो टेप होने के बावजूद, पुलिस प्रशासन के सभी फ्रंट पर घटना की शिकायत किए जाने के बावजूद बृजलाल बेईमानी कर गए और खुद को व लोकू को बचा ले गए. लोकू डीआईजी के पद पर लखनऊ में पीएसी का कामधाम देख रहा है.

लुच्चा लोकू और बेईंमान बृजलाल

लुच्चा लोकू और बेईंमान बृजलाल

लुच्चा लोकू और बेईंमान बृजलाल

: क्योंकि मां को न मिला न्याय : बेईमान इसलिए क्योंकि यूपी के एलओ साहब उर्फ लॉ एंड आर्डर के एडीजी उर्फ अघोषित डीजीपी बृजलाल ने निर्दोष मां को बिना वजह 15 घंटे थाने में बिठाने वाले गाजीपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एल. रवि कुमार उर्फ लोकू रवि कुमार उर्फ रवि कुमार लोकू उर्फ लोकू उर्फ लोक्कू को बख्श दिया है. सिर्फ थानेदार पर गाज गिराई, उसे लाइन हाजिर करके. मां को थाने में बिठाए जाने के वीडियो टेप होने के बावजूद, पुलिस प्रशासन के सभी फ्रंट पर घटना की शिकायत किए जाने के बावजूद बृजलाल बेईमानी कर गए और खुद को व लोकू को बचा ले गए. लोकू डीआईजी के पद पर लखनऊ में पीएसी का कामधाम देख रहा है.

दोषी बृजलाल भी है क्योंकि उसे सब पता था, उसे उसी रात फोन कर बता दिया गया था कि एक निर्दोष मां थाने में बिठाई गई है, पर बृजलाल सत्ता व पद के नशे में चूर नियम-कानून भूलकर लोकू की करनी पर चुप्पी की मुहर लगाए बैठा रहा. इसलिए दोषी खुद बृजलाल भी है. और शायद यही वजह है कि चोर चोर मौसेरे भाई के अंदाज में बृजलाल खुद की चमड़ी न फंसने देने के लिए रवि कुमार लोकू को भी दोषी नहीं मान रहा और इस तरह खुद भी दोषमुक्त बन बैठा है, मान बैठा है. पिछले दिनों मैं लखनऊ गया था. एक सेमिनार में निमंत्रित था. लगे हाथ बृजलाल और फतेहबहादुर से मिल बैठा. सिर्फ इन अधिकारियों के चेहरे को देखने के लिए.

फतेहबहादुर को पूरा मामला बताया और यह भी बताया कि इस मामले पर एक पुलिस अधिकारी जुगुल किशोर त्रिपाठी ने लिखा है कि यह शर्मसार करने वाला मामला है. इस पर फतेहबहादुर बोले बैठे कि अरे वो जुगुल किशोर नेतागिरी करते हैं, उनकी बात छोड़िए, आप अपनी समस्या बताएं. मैंने तब कहा कि मेरी कोई समस्या नहीं है और न ही मैं कोई शिकायत लेकर आया हूं. मैं सिर्फ यह बताने आया हूं आपको कि आपके इस प्रदेश में किस तरह एक निर्दोष मां को कई घंटे थाने में बिठाए रखा गया, प्रमाण स्वरूप वीडियो फुटेज भी हैं, लेकिन दोषी अधिकारी छुट्टा घूम रहे हैं, प्रमोशन पा रहे हैं, गाजीपुर की जगह लखनऊ में तैनाती पा जा रहे हैं.

फतेहबहादुर यूपी के प्रमुख सचिव गृह हैं. वे बोले- शिकायत दीजिए. मैंने कहा- मैं अनुरोध पत्र लेकर नहीं घूम रहा हूं, अपनी मेल आईडी दीजिए, मेल कर दूंगा. वे बोले- मेरे पास मेल आईडी नहीं है. मैं सन्न. इतना बड़ा अधिकारी और ऐसी बात. मुझे लगा कि मैं अंधों की नगरी में हरियाली पर बहस करने चला आया हूं. फतेहबहादुर के यहां से उठा और लौट आया. कोई उम्मीद लेकर गया भी नहीं था, सो नाउम्मीद लौटने का सवाल ही नहीं. जब किसी से कोई स्वार्थ हो, काम हो तब तो नाउम्मीदी होती है लेकिन जब पता है कि यहां कुछ होने वाला नहीं क्योंकि यूपी में अफसरों ने जंगल का राज कायम कर रखा है, सो नाउम्मीदी का प्रश्न ही नहीं था, बल्कि जंगल राज की मेरी अवधारणा मजबूत हुई. अफसरों की सोच-समझ पर तरस आया.

अगले दिन बृजलाल के यहां पहुंचा. अपनी बहादुरी के किस्से गा रहे थे बृजलाल. अगले कुछ महीनों में उनके बैच के कौन-कौन रिटायर होंगे और कौन-कौन रह जाएंगे किन्हीं बड़े-बड़े पदों पर दावेदारी के लिए, टाइप बातें अपने किसी पुराने रिटायर साथी से कर रहे थे. शुरुआती परिचय के बाद जब उन्हें मां के प्रकरण के बारे में बताया तो उन्होंने जवाब में आलोक तोमर का लिखा और भड़ास4मीडिया पर छपा मां के पांव छुओ बृजलाल के अपने सामने रखे गए प्रिंट आउट को उठाकर पढ़ने-बाचने लगे, नाराजगी जताते हुए, अफसोस प्रकट करते हुए, दुख दिखाते हुए कि कितनी गंदी भाषा में यह सब लिखा गया है और कई गलत बातें लिखी गई हैं, बेहद अपमानजनक लेख है, इस लेख के आधार पर लोगों ने मुझे मुकदमा करने की सलाह दी थी आदि आदि.

मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो मां को दुखी करने वाले इस अफसर को भी किसी बहाने दुख तो पहुंचा. खुश हुआ कि भड़ास4मीडिया पर छपा कोई एक लेख तो इस मोटी चमड़ी वाले अधिकारी के पास पहुंचा. मैंने सिर्फ इतना कहा कि आपको एक लेख से इतना दुख हो रहा है तो कल्पना करिए कि जिसकी मां थाने में बिना वजह बिठा दी गई होंगी, उसे कितना दुख हुआ होगा और हो रहा होगा. पर ये अधिकारी दूसरे के दुखों को कहां सुनते हैं, अपने सुख-दुख को ही दुनिया का अंतिम सुख-दुख मानते हैं, बाकी लोग तो परजा की तरह होते हैं, जिनका काम दुखी रहना और ‘सरकार माईबाप हुजूर साहब सुब्बा’ लोगों के सामने गुहार लगाते रहना होता है. ऐसे गुहार लगाने वाले लोगों के आदी हैं ये अफसर. ये गुहारबाज कभी दुरदुरा दिए जाते हैं तो कभी इनकी झोली में न्याय की भीख डाल दी जाती है.

बृजलाल ने बातचीत में मां को थाने में बिठाए जाने की घटना पर अफसोस जताया, इस घटनाक्रम को गलत बताया और थानेदार के खिलाफ एक्शन लिए जाने की जानकारी दी लेकिन रवि कुमार लोकू को दंडित न किए जाने का सवाल पूछे जाने पर वे रवि कुमार लोकू की ईमानदारी और शराफत की गाथा गाने लगे. अब बृजलाल को कौन बताए कि तेरा ये शरीफ लाडला मेरे लिए रावण की तरह है, मैंने अपने पत्रकारिता के करियर में इंचार्ज, चीफ रिपोर्टर और संपादक रहते हुए कई आईएएस और आईपीएस अफसर देखे, लेकिन रवि कुमार लोकू जितना घटिया अधिकारी नहीं देखा. इस लोकू को मैंने खुद फोन पर मां के थाने में होने के बारे में जानकारी दी लेकिन बृजलाल का यह लाडला चुप्पी साधे रहा. यही बात बृजलाल के बारे में भी है कि उसे पता था कि थाने में एक निर्दोष मां है लेकिन वह भी चुप रहा.

लोकू ने मां के साथ जो लुच्चापना किया है, उसे शायद इस जन्म में तो मैं नहीं माफ कर सकता. इस छिछोरी हरकत, इस लुच्चापना के लिए वह महिलाओं द्वारा, मीडियाकर्मियों द्वारा कतई माफी के काबिल नहीं है. जिन अफसरों के कंधों पर महिलाओं की रक्षा कराने का जिम्मा है, वे ही अफसर निर्दोष महिलाओं को अपमानित करने जैसे अपराध में लिप्त हैं तो न्याय की उम्मीद उनसे करें भी तो कैसे. महिलाओं को अपमानित करने जैसा कुकृत्य करने वालों के लिए कानून में दंड की व्यवस्था है लेकिन जब कानून लागू कराने वाले ही अपराधी बन बैठे हों तो उन्हें दंडित किए जाने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है. ऐसा सोचना तो इन साहब-सुब्बा लोगों की शान की तौहीन करना है.

मुझे पता है कि इन आईपीएस अधिकारियों का आपस में एक संगठित गैंग होता है जो एक दूसरे की गलतियों को इगनोर करते रहते हैं और एक दूसरे को बचाते रहते हैं और यह भी जानता हूं कि इनसे पंगा लेना बहुत नुकसानदायक हो सकता है लेकिन इसके बावजूद मैं यह कहना चाहता हूं कि लुच्चा लोकू और बेईमान बृजलाल को अपने अंतरमन में झांककर देखना चाहिए, और थोड़ी भी शराफत व ईमानदारी बची हो तो जाकर मां के पांव छूना चाहिए, माफी मांगनी चाहिए. पर खुद को जनता की बजाय सरकार के अधिकारी गर्व से कहने वाले यूपी के वरिष्ठ नौकरशाह इतने संवेदनशील नहीं हैं कि वे अपनी गलती मानें. वे जिस तरह मायावती सरकार को बदनाम करने में जुटे हुए हैं, वे जिस तरह प्रदेश सरकार की मिट्टी पलीद कराने में लगे हुए हैं, इसका खामियाजा इन अफसरों को नहीं मायावती को उठाना पड़ेगा क्योंकि ये छोटी छोटी घटनाएं माहौल बनाने का काम किया करती हैं. ये छोटी छोटी घटनाएं सरकार के चाल चरित्र और चेहरा को बताने का काम किया करती हैं.

बिहार गवाह है जहां भ्रष्टाचार और अराजकता के राज से त्रस्त लोगों को जब नीतीश के राज में थोड़ा सुशासन मिला तो उनका जात पात धर्म आदि से मोहभंग हो गया और सबने एकजुट होकर नीतीश को वोट दिया. मायावती हो सकता है कि एक बार और पांच साल के लिए सरकार बना लें लेकिन तब तलक जनता, उनकी जनता, दलित वोट बैंक को यह समझ में आ जाएगा कि शासक चाहे दलित हो या सवर्ण, उनके दुखों को दूर कोई नहीं कर सकता क्योंकि सत्ता का चरित्र ऐसा होता है जिसका हिस्सा बना आदमी सवर्ण हो जाया करता है और जो सत्ता से बाहर होता है वो दलित. मैं इस लोकतंत्र में अपने को दलित मानता हूं क्योंकि मैं सत्ता का हिस्सा नहीं हूं इसीलिए सत्ता के इन सवर्णों लोकूओं और बृजलालों की ये हिम्मत पड़ रही है कि वे सत्ता में न शामिल होने वाले लोगों, जिन्हें दलित कहा जा सकता है, को प्रताड़ित पीड़ित कर रहे हैं.

मीडिया के चारणों और भाटों की बड़ी जमात है लखनऊ में. आईपीएस अधिकारी के आगे बैठकर पूछ हिलाने वाले और चाटुकारिता करने वाले भड़ुओं की बड़ी फौज है लखनऊ में. इनकी हिम्मत नहीं है कि वे कोई खरा सवाल अफसरों से पूछ ले. सरकारी आवासों में रहने वाले लोग, सत्ता की परिक्रमा कर अपने अखबार, अपने चैनल को हर तरह से चमकाते रहने वाले लोगों में अब इतना नैतिक साहस कहां कि वे जनता के किसी मुद्दे पर सत्ता से दो-दो हाथ करें. ये काम अब न्यू मीडिया के लोग ही कर सकते हैं जिनका अपना और अपनी कंपनियों का इन सत्ताधारियों से कोई लेना-देना नहीं होता, कोई स्वार्थ नहीं होता है, इसलिए ये न्यू मीडिया वाले लोग निष्पक्ष बात कह सकते हैं. महीने में निश्चित पगार पाने और सेफ जोन में रहने के आदी पत्रकारों में किसी मुद्दे पर निर्णायक संघर्ष करने वाला भाव आ ही नहीं सकता क्योंकि ये बिना नौकरी, बिना सेलरी अपने व्यक्तित्व की कल्पना ही नहीं कर सकते.

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पर तमाम किंतु-परंतु-लेकिन के बावजूद लखनऊ में ऐसे कुछ लोग हैं, ऐसे कुछ पत्रकार हैं, जो हर तरह के खतरों के बावजूद साहस के साथ सच पूछ लेते हैं, सच बोल देते हैं, सच के लिए भिड़ जाते हैं, सत्ता-सिस्टम की कमीनगी पर सवाल खड़ा कर देते हैं. इस तरह के कुछ पत्रकारों से इस बार मैं मिला भी. ऐसे लोगों से मेरी अपील है कि वे इन लोकुओं, बृजलालों से मां के साथ हुए अन्याय के मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के बारे में सवाल करें. क्या ये दोनों अफसर खुद को दोषी नहीं मानते, इनकी नजर में दोषी सिर्फ थानेदार है? सवाल किसी यशवंत की मां के साथ हुए अपमान का नहीं है, सवाल पुलिस वालों की मानसिकता का है. क्या इन्हें वर्दी पहनने के साथ लाइसेंस मिल जाता है कि ये जिसे चाहें जब चाहें अपमानित कर दें, थाने में बंद कर दें, गोली मार दें, अपहृत कर लें…. कल एक फिल्म देख रहा था. टीवी पर. पुरानी फिल्म है. लीड रोल में राजब्बर हैं. सीधा साधा प्रोफेसर बने हैं. पर घर में गुंडों के धावे के बाद वह चुपचाप राबिन हुड बन जाता है, रात के वक्त, बहुत शांत दिमाग से खोपड़ियों में बारूद उतार दिया करता था. पता नहीं क्यों, कल वो फिल्म देखकर बहुत देर तक मैं सोचता रहा. राजबब्बर के चरित्र में खुद को तलाशता रहा.

जब पुलिस और प्रशासन गुंडों सरीखा व्यवहार करने लगें और गुंडे पुलिस प्रशासन के संरक्षण में विधायक जी नेता जी बनकर जनता की छाती पर मूंग दलें तो ऐसे में सीधे-सरल-संवेदनशील लोगों का हथियार उठाकर ठोंकू बन जाना बहुत स्वाभाविक है. ये और बात है कि मजबूरी में हथियार उठाने वाले ऐसे इंसाफपसंद लोगों को बाद में यह सिस्टम और सत्ता क्रूर अपराधी के रूप में प्रचारित कर एक दिन निपटा देता है और कुछ मेडल वगैरह हासिल कर लेता है लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं है. अलग अलग नाम और रूप में लोग हथियार उठाते हैं और अपने साथ हुई नाइंसाफी के लिए इंसाफ खुद करते हैं. नक्सली इलाकों में, जैसे छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में, पुलिस वाले, फोर्स वाले, अपने सुरक्षित कैंपों-किलों के बाहर नहीं निकलते क्योंकि उन किलों से बाहर निकलते ही उनके हाथ या सिर अचानक काटे जा सकते हैं, और काटने का काम कोई और नहीं, बेहद सामान्य से लोग करते हैं जो इलाके के ठेकेदारों, पुलिस वालों, अफसरों, धन्ना-सेठों के उत्पीड़न से त्रस्त होकर बागी बन जाते हैं, और अचानक नक्सली कहकर संबोधित किए जाने लगते हैं.

पिछले दिनों एक साथी ने एक वीडियो सेंड किया जिसमें दिखाया जाता है कि गांव के प्रधान की हत्या नक्सलियों ने की लेकिन पुलिस वाले मारे डर के उस लाश को कुछ किमी दूर पोस्टमार्टम हाउस तक नहीं ले जा सके क्योंकि उन्हें डर था कि वे रास्ते में नक्सली हमले के शिकार हो सकते हैं. ऐसे में पुलिस वालों ने बैलगाड़ी पर लाश को रखकर गांव के गरीबों को जोत दिया कि बेटा ले जाओ लाश और करा लाओ पोस्टमार्टम. तब गरीबों ने उस लाश को बैलगाड़ी पर रख, बैल की जगह खुद को गाड़ी में जोता और चल पड़े. नदी नाले पार कर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे. (इस वीडियो को देखने के लिए क्लिक करें- कायर पुलिस) तो यहां ये है पुलिस का हाल. इन लोकूओं और बृजलालों को इन इलाकों में भेज दिया जाए तब शायद इनकी बहादुरी का अंदाजा लग पाता लेकिन ये तो हैं गाजीपुर और लखनऊ में जहां कोई नियंत्रण, डर, दबाव, अनुशासन इनके उपर नहीं है, सो, ये किसी निरीह मां को थाने में बंद कर दें, किसी निरीह युवक को उठाकर अचानक पिटाई शुरू कर दें, तो कोई इन्हें कुछ कहने वाला नहीं है.

लेकिन मायावती के लाडलों, तुम्हारे बुरे दिन भी आएंगे. अभी तुम सत्ता में हो, पावर में हो तो अपनी लठैती दिखा लो, कुर्सी पर अकड़ कर बैठे लोगों, पुलिस प्रशासन में होने की ताकत का बेजा इस्तेमाल कर लो. और, जो कुछ कर सकते हो, जो कुछ भी उखाड़ सकते हो, कर लो और उखाड़ लो, क्योंकि राज तुम्हारा है, दिन तुम्हारे हैं और हम लोग तो निरीह प्रजा हैं, परजा हैं, पर याद रखना समय का पहिया जब घूमता है तो उससे कुचलकर बड़े बड़े शूरमा भीगी बिल्ली बन जाया करते हैं.

फिलहाल तो मैं लुच्चा लोकू और बेईमान बृजलाल की निंदा करता हूं, जिन्हें अभी तक अपनी गलती का एहसास ही नहीं हुआ है कि इन लोगों ने क्या अपराध किया है. ये दोनों मजे में अपनी अपनी वर्दी अपने आरोपी शरीरों पर धारण कर कानून के रखवाले बने हुए हैं. शायद, मायावती के राज में उनके अधिकारी इस कदर बदतमीज हो चुके हैं कि उन्हें सही और गलत का ज्ञान ही नहीं रहा, वे जनता के सेवक की जगह जनता के शासक के रूप में व्यवहार कर रहे हैं. ईश्वर मायावती को भी सदबुद्धि दे ताकि उनकी आंखें खुल सकें और अपने राज में अफसरों द्वारा किए जा रहे अनाचार के कारण भयानक रूप से खराब हो रही अपनी छवि को दुरुस्त कर सकें. मायावती की दिक्कत ये है कि उन्होंने किसी नेता को अपने इर्द-गिर्द व अपनी पार्टी में पनपने नहीं दिया और वे हर काम के लिए अफसरों पर डिपेंड हो गईं.

अफसर आजतक न किसी के हुए हैं और न ही मायावती के होने वाले हैं. ये ड्रामेबाज और नौटंकी टाइप अफसर उगते सूरज को प्रणाम करते हैं. सो, मायावती से वरदहस्त हासिल कर ये अफसर पूरे प्रदेश में अपनी मनमानी किए हुए हैं. लखनऊ में बैठी अफसरों की चौकड़ी मायावती तक न तो सही सूचनाएं पहुंचने देती है और न ही मायावती को समाज-प्रदेश में दौड़ने वाली अंडरकरेंट से रूबरू कराती है. आंकड़ेबाजी और फाइलबाजी में माहिर अफसर गुडी गुडी बातें लिख कह कर मायावती को संतुष्ट किए हुए हैं लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती.

मैंने मां के लिए न्याय अभियान को बंद नहीं किया है, केवल स्थगित किया है. जब तक मां को अपमानित करने वाले अपराधी पुलिस अधिकारी बेईमान बृजलाल और लुच्चा लोकू खुद को दोषी नहीं मान लेते, मां से माफी नहीं मांग लेते, हम लोग समय-समय पर इस प्रकरण को उठाते रहेंगे. अगली तैयारी दिल्ली में गिरिजा व्यास से मिलने की है. हफ्ते दो हफ्ते में गिरिजा व्यास से एक प्रतिनिधिमंडल मिलेगा और इस मामले की पूरी जानकारी उन्हें देकर दोषियों को दंडित कराने की मांग करेगा. मुझे अब निजी तौर पर लगता कि भ्रष्ट नौकरशाहों से घिरी हुई मायावती तक मां के अपमान की खबर ये नौकरशाह ही नहीं पहुंचने देंगे इसलिए जरूरी है कि इस मुद्दे पर दिल्ली के स्तर पर अब दबाव बनाया जाए ताकि मायावती तक बात पहुंचे और दोषी अफसरों पर लगाम लगाने की कवायद शुरू हो सके.

मां से संबंधित अन्य खबरों-लेखों-टिप्पणियों को पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद में आ रहे शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं और पढ़ते जाएं. आपके राय, आपके सुझावों का इंतजार रहेगा. मीडिया के साथियों, खासकर दिल्ली व लखनऊ के साथियों से अपील करता हूं कि वे यथासंभव इस मुद्दे को उचित जगहों पर उठाएं, लुच्चा लोकू और बेईमान बृजलाल की घटिया हरकत व मानसिकता के बारे में लिखें, मायावती के शासनकाल में अफसरों द्वारा प्रदेश में कायम किए गए जंगलराज के बारे में आम जन को बताएं.

मीडिया के साथी मायावती तक इस बात को पहुंचाएं कि कैसे उनके अधिकारी निरीह व आम जनता का उत्पीड़न करने में लगे हैं और उत्पीड़न के प्रमाण के बावजूद दोषी अधिकारी अपनी-अपनी कुर्सियों पर बेशर्मी, ढिठाई और थेथरई से बिलकुल सुरक्षित जमे हुए हैं. मैं सच-सच बोलने और साफ-साफ लिखने के बदले सजा पाने, जेल जाने, पुलिसिया लाठी खाने को तैयार हूं क्योंकि अगर मां के लिए न्याय मांगना अपराध है तो मैं इस अपराध का दोषी हूं और मां को न्याय न मिलने पर दोषियों का नाम सार्वजनिक करना, उनकी निंदा करना अपराध है तो मैं अपराधी हूं. लुच्चा लोकू और बेईमान बृजलाल में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके जेल में बंद करा दें. मेरे गांव का पता, दिल्ली का पता, मेरा मोबाइल नंबर सब कुछ सार्वजनिक है.

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यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क- फोन: 09999330099 मेल: [email protected]

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0 Comments

  1. JANARDAN YADAV

    December 3, 2010 at 6:28 am

    UP KE ADHIKARIPRAVARG ME MURDANGI CHHANEY VALEE HAIN. AB TO AANEY WALA WQAT BATAYEGA. JAROORAT HAIN RAKH ME JHHIPI HUE CHINGARI KO KHOJNA HOGA. SWASTHYAPARAKH LEKH A SANSMARAN
    KE LEYE SADHUBAD.

  2. shishu sharma

    December 2, 2010 at 11:33 am

    भाई यशवंत जी,इस पुलिसिया व्‍यवहार से हर कोई आजिज आ चुका है।इसी प्रकार की घटनायें रोज होतीं है।एक मॉ के साथ यह इतेंहा है।पुलिस को ज्‍यादा जिम्‍मेदारपूर्ण बनाना टेढी खीर है।जो पुलिस के व्‍यवहारों से रूबरू होना चाहतें हैं,हो सके तो किसी जायज काम के लिये पुलिस थाने में जाकर देख ले।कभी आपका वास्‍ता सडक पर खडे सिपाही से पडा है,शायद आपको तब पता लगेगा कि कहीं आप अपराधी तो नहीं है।हम सब कभी न कभी पुलिस की बदतमीजी से दुखी होते हैं।पुलिसवाले स्‍वयं को बहुत पावरफुल मानते हैं।इसी कारण किसी भी पुलिसवाले से मिलना आपको भयभीत कर देगा।

  3. पंकज दीक्षित

    December 2, 2010 at 2:10 pm

    उत्तर प्रदेश में इन दिनों सरकार और सेवक सेवा नहीं व्यापार कर रही है| मगर उत्तर प्रदेश में पुलिस की दूकान बहुत पुरानी है| यहाँ पुलिस का सिस्टम जनता से वसूली से चलता है| इस वसूली में हिस्सा ऊपर तक जाता है| मात्र इसी वजह से ऊपर से लेकर नीचे तक कानून को ताक पर रख कर पुलिस वाले अनैतिक और गैर संवैधानिक कामो में एक दुसरे का बचाव करते है|
    यहाँ तबादले और दंड गलतियो पर नहीं मिलते बल्कि ऊपर तक माल सही और समय से न पहुचने पर मिलता है|
    यशवंत जी जीभ खुजला कर रह जाती है मगर इन सब पर कोई असर नहीं है| बहुत मोटी खाल हो गयी है इन सब की|
    यहाँ भ्रष्टाचार की माया चलती है| जब आप की मा को हिरासत में रखा गया था उस समय आप ने सभी अधिकारियो को फोन कर सूचना दी थी मगर उन्हें नहीं छोड़ा गया अगर आप ने किसी दलाल के मार्फ़त पैसे पंहुचा दिए होते तो आपकी माँ को पुलिस खुद जीप में घर छोड़ आती|
    यहाँ माया राज चल रहा है| माया के आगे सब फेल हो चूका है| मगर कभी कभी माया भी फेल हो जाती है तब तक बहुत देर हो चुकी होगी|

  4. krishan murari singh

    December 2, 2010 at 3:46 pm

    maa ka swaroop to sabhi ke liye ek sa hi hota hai ab chahe maa adg brij lal ki ho ssp pac L.RAVI KUMAR KI ho galti police ki hai so sabhi sor macha lo par barkha dutta ki 200 caror rs ki kahani ke liye koi presaan nahi to ab kyo nahi socha ki aakhir barkhha bhi kisi ki maa hai

  5. mahandra singh rathore

    December 4, 2010 at 6:55 am

    shri yashwant ji ki baaten bahut kuch kahti hai.kya yah mayawati nahi janti hogi? brij lal ho ya ravikumar loku police tantra hi kuch essa hai. maa ki pirra ko yashwant ji ne shiddat se mahsus kiya hai. un medi ke logo ko bhi sikh di hai jo chahlusi ke alawha kuch nahi kerte. jo chunoti di hai usse unki himmat ka pata chalta hai. luccha loku beiman brijlal. kuhb khari khari sunai hai.

  6. RAJESH RANJAN , narsinghpur

    December 4, 2010 at 1:53 pm

    क्या माँ को प्रताड़ित कर के कोइ सुखी रह सकता है .

    माँ तो सबकी होती है . ममता कि प्रतिमूर्ति ,

    ऐसे में एक माँ के चरण छू लेने से इन पुलिस के कुतो को आशीर्वाद ही मिलेगा.

    लेकिन ये नरक के कीड़े माँ कि ममता को भी अपनी वर्दी के गर्मी दिखा गए .भगवान सदबूधी दे..

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