विधानसभा में गूंजा पत्रकारों के उत्‍पीड़न का मामला

विधान सभा के मानसून सत्र में राज्य में पत्रकारों के उत्पीड़न को लेकर जोरदार बहस हुई। कांग्रेस विधायक और सदन में नेता प्रतिपक्ष डा. हरकसिंह रावत ने इस मामले को उठाते हुए कहा कि राज्य में पत्रकारों का उत्पीड़न किया जा रहा है और छोटे पत्र-पत्रिकाओं पर सरकार के पक्ष में खबर लिखने का दबाव डाला जा रहा है। उन्होंने एक पत्रकार संगठन द्वारा विगत दिनों सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग के सामने किए गए प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थिति विस्फोटक हो गई है और पत्रकारों को अपनी बात कहने के लिए धरना-प्रदर्शन का सहारा लेना पड़ रहा है।

डा. हरक सिंह रावत ने इस विषय को नियम-58 के तहत उठाते हुए इसे लोक महत्व का बताया और विधानसभा अध्यक्ष से इस पर अविलंब चर्चा करवाने की मांग की। इस मांग को विधानसभा अध्यक्ष ने तुरंत स्वीकार कर लिया और इस पर चर्चा हुई। इसी मुद्दे को वीरोंखाल से कांग्रेस विधायक अमृता रावत ने भी उठाया और उन्होंने कहा कि क्या अब प्रदेश में छोटी पत्र-पत्रिकाओं के प्रतिनिधियों को कोई अधिकार नहीं दिया जाएगा। श्रीमती रावत ने कहा कि प्रदेश के एक जिला सूचनाधिकारी ने पिछले दिनों जिस तरह से छोटी पत्र-पत्रिकाओं के संवाददाताओं के साथ बदसलूकी की वह निन्दनीय है। उन्होंने सरकार पर वार करते हुए कहा कि सरकार सदन को इसका जवाब दे कि डीआईओ द्वारा ऐसा व्यवहार क्यों किया गया।

कांग्रेस नेताओं के आरोपों का सरकार की तरफ से उत्तर देते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा कि इन नेताओं को कम से कम सदन में सही बात को रखना चाहिए। उन्होंने एक पत्रकार संगठन के धन्यवाद पत्र का हवाला देते हुए कहा कि इस संगठन ने अपनी 11 सूत्रीय मांगों को सरकार के सामने रखा था, जिसपर सरकार ने त्वरित कार्रवाई की और बाकी मांगों पर भी कार्रवाई प्रक्रियाधीन है।

श्री पंत ने पत्रकारों के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे कल्याणकारी कार्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार ने पत्रकार कल्याण-कोष की स्थापना की है। जिसमें अभी भी तीन करोड का फंड पड़ा है। उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेश में ५२६ मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा तय की गई सभी सुविधाएं दी जा रही हैं। श्री पंत ने कहा कि सितम्‍बर महीने में सरकार ने कुल 12 करोड़ रूपए के विज्ञापन जारी किए। उन्होंने कहा कि विज्ञापन देने में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है और जो जिस लायक था, उसको उतना विज्ञापन दिया गया।

संसदीय कार्य मंत्री श्री पंत ने कहा कि प्रदेश में हर नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने प्रदेश के अधिकांश जिलों में प्रेस क्लब की स्थापना की है, जहां पर पत्रकारों के हितों को लेकर कार्य होता है। हालांकि सरकार के इस बयान से कांग्रेस विधायक भड़क गए। कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर भ्रामक जानकारी देने का आरोप लगाते हुए सदन से वाक आउट किया। इस बीच सदन में उस समय भी माहौल गंभीर हुआ, जब सदन में 70 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपात की चर्चा संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने उठाई।

मामला कांग्रेस द्वारा नियम 58 के तहत पत्रकार उत्पीड़न का मुद्दा उठाए जाने का है। कांग्रेस नेताओं ने जब सरकार पर प्रदेश के पत्रकारों के उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए जवाब मांगा तो सरकार की तरफ से जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि कांग्रेस के इस सवाल ने मुझे 70 के दशक में देश में घोषित आपातकाल की याद करा दी। उन्होंने कहा कि तत्कालीन केन्द्र सरकार ने देश के पत्रकारों को सलाखों में ठूंस दिया था और सभी समाचार-पत्रों की बिजली काट दी थी। उन्होंने कहा कि वास्तविक पत्रकार उत्पीड़न ऐसी घटनाओं को कहा जाता है। श्री पंत ने कहा कि उत्तराखंड सरकार पत्रकारों के हितों के लिए सतत प्रयत्नशील है।

उन्होंने कहा कि इस समय प्रदेश में 50 छोटे दैनिक अखबार, 213 साप्ताहिक और 15 पाक्षिक समाचार-पत्रों के अलावा 7 पंजीकृत पत्रिकाएं भी है। इसके साथ ही प्रदेश में 35 बड़े दैनिक, 319 बड़े साप्ताहिक, 97 पाक्षिक समेत कुल 818 समाचार-पत्र, पत्रिकाएं है। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि इन सभी पत्र-पत्रिकाओं को सरकार की तरफ से पूरा सहयोग दिया जा रहा है। उनके इस उत्तर से विपक्ष ने असहमति जताते हुए सदन से वाक आउट किया। लेकिन इस चर्चा से प्रदेश के पत्रकारों में खुशी व्याप्त है। पत्रकारों का कहना है कि विधानसभा में पत्रकारों की समस्याओं पर इस गंभीर चर्चा से विपक्ष और सरकार की पत्रकारों को लेकर संवेदनशीलता दिखाई देती है।

देहरादून से धीरेन्द्र प्रताप सिंह की रिपोर्ट.

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Comments on “विधानसभा में गूंजा पत्रकारों के उत्‍पीड़न का मामला

  • umesh kumqr pant says:

    halanki uttrakhand rajy banane ke bad patrakar utpeedan ke kafi kam mamle samne aaye h aur jo mamle samne aaye bhi to ve niji rhhe.sarkar ki taraf se adhik se adhik vigypan jari n kiye jane ko utpeedan batay ja raha h to yah kisi bhi dristi se uchit nahi h. vahi sarkar ko patrakaro ki artik sthti aur unke dwara ki jane wali mehnat ka parisramik diye jane ke bare me avsy sochna chahiye kyo ki vartaman me sube ke mukhiya ek patrakar bhi h is liye patrakaro ki unase apekshaye jyada h.

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