शातिर अपराधियों का चुनाव लड़ पाना असंभव हो जाएगा

शेषजीकेंद्र सरकार ने ऐसी पहल की है कि आने वाले दिनों में अपराधियों के लिए चुनाव लड़ पाना बिलकुल असंभव हो जाएगा. कानून मंत्रालय ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद के विचार के लिए एक प्रस्ताव भेजा है जिस में सुझाया गया है कि उन लोगों पर भी चुनाव लड़ने से रोक लगा दी जाए जिनको ऊपर किसी गंभीर अपराध के लिए चार्ज शीट दाखिल कर दी गयी है.

अभी तक नियम यह है कि है जिन लोगों को दो साल या उस से ज़्यादा की सज़ा सुना दी गयी हो वे चुनाव नहीं लड़ सकते. इस नियम से अपराधियों को रोक पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा है. मौजूद समाज की जो हालत है उसमें इलाके के दबंग को सज़ा दिला पाना बिलकुल असंभव होता है. लगभग सभी मामलों में गवाह नहीं मिलते. उनको डरा धमकाकर गवाही देने से हटा दिया जाता है. अगर किसी मामले में निचली अदालत से सज़ा हो भी गयी तो हाई कोर्ट में अपील होते है और वहां कई कई साल तक मुक़दमा लंबित रहता है. अपने देश के हाई कोर्टों में बयालीस हज़ार से ज्यादा मुक़दमें विचाराधीन हैं. ऐसी हालत में अपराधी इस बिना पर चुनाव लड़ता रहता है कि उसका केस अभी अपील में है. लब्बोलुबाब यह है कि संसद और विधान सभाओं में अपराधी लोग बहुत ही आराम से पंहुचते रहते हैं. सब को मालूम रहता है कि चुनाव अपराधी व्यक्ति लड़ रहा है लेकिन कोई कुछ कर नहीं सकता क्योंकि कानून उसे अपील के तय होने तक निर्दोष मानने की सलाह देता है. यह भी देखा गया है कि चुनाव में बहुत सारे दबंग लोग आतंक के सहारे चुनाव जीत लेते हैं.

कानून मंत्रालय का नया प्रस्ताव अपराधियों को संसद और विधान सभाओं में पहुंचने से रोकने का कारगर उपाय साबित होने की क्षमता रखता है.  प्रस्ताव यह है कि गंभीर अपराधों के अभियुक्त उन लोगों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए जिनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो. प्रस्ताव में गंभीर अपराधों की लिस्ट भी दी गयी है,  जिस में आतंक, हत्या, अपहरण, नक़ली स्टैम्प पेपर या जाली नोटों से जुड़े हुए अपराध, बलात्कार के मामले, मादक द्रव्यों से सम्बंधित अपराध और देशद्रोह के मामले शामिल हैं. अगर प्रस्ताव को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली तो इसे संसद में विचार करने के लिए लाया जाएगा. वहां पास हो जाने के बाद इन अपराधों में पकडे़ गए लोगों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा.

पिछले कई वर्षों से अपराधियों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखने की कोशिश होती रही है लेकिन बात को यह कह कर रोक दिया जाता है कि अगर अभियुक्त को चुनाव लड़ने से रोकने की बात को कानून बना दिया गया तो पुलिस के पास अकूत पावर आ जाएगा और वह किसी को भी पकड़ कर अभियुक्त बनाकर उसे चुनाव लड़ने से रोक देगी. अपने देश में पुलिस की यही ख्याति है, हर इलाके में ऐसे कुछ न कुछ ऐसे मामले मिल जायेंगे जहां पुलिस ने लोगों को फर्जी तरीके से फंसाया हो. ज़ाहिर है जब भी इस तरह का मामला आया तो लोकतांत्रिक मूल्यों की पक्षधर जमातों ने विरोध किया. नतीजा यह हुआ कि राजनीति में अपराधियों की संख्या बढ़ती गयी.  पुलिस को किसी को राजनीति के दायरे से बाहर रख सकने की ताक़त देना लोकतंत्र के खिलाफ होगा लेकिन लोकतंत्र को अपराधियों के कब्जे से बचाने की कोशिश भी करना होगा. इसी सोच का नतीजा है कानून मंत्रालय का नया सुझाव.

नए सुझाव में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति पुलिस की मनमानी का शिकार नहीं होगा. गंभीर अपराधों के आरोप में पुलिस जिसको भी गिरफ्तार करेगी वह तब तक चुनाव लड़ने के लिए योग्य माना जाता रहेगा जब तक कि पुलिस की अर्जी पर अदालत अभियुक्त के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का हुक्म न सुना दे. यानी नए प्रावधान में पुलिस की मनमानी की संभावना पर पूरी तरह से नकेल लगाने की व्यवस्था कर दी गयी है. नए सुझावों में यह भी इंतज़ाम किया गया है कि उन लोगों को भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा,  जिनको निचली अदालत से सज़ा मिल चुकी है और उनका केस ऊपरी अदालतों में अपील के तहत विचाराधीन है. अभी तक अपील के नाम पर चुनाव लड़ने वाले अपराधियों को भी इस नए सुझाव से रोका जा सकेगा.

करीब तीस वर्षों से अपराधी छवि के लोग चुनाव मैदान में उतरने लगे है. इसके पहले बड़े नेताओं की सेवा में ही अपराधी तत्व पाए जाते थे. लेकिन अस्सी के लोकसभा चुनाव में बहुत सारे शातिर अपराधियों को टिकट मिल गया था. उसके बाद तो यह सिलसिला ही शुरू हो गया. हर पार्टी में अपराधी छवि के लोग शामिल हुए और चुनाव जीतने लगे. बाद के वर्षों में जब टिकट दिया जाता था तो इंटरव्यू के वक़्त टिकटार्थी यह दावा करता था कि वह ज्यादा से ज्यादा बूथों पर क़ब्ज़ा कर सकता है. बूथ पर क़ब्ज़ा कर सकने की क्षमता के बल पर राजनीति में अपराधियों की जो आवाजाही शुरू हुई, उसी का नतीजा है कि आज राजनीति में अपराधियों का चौतरफा बोलबाला है. कई बार अपराधियों को रोकने की पहल हुई लेकिन लगभग सभी पार्टियां उसमें अडंगा लगा देती थीं क्योंकि उनकी पार्टियों के बहुत सारे नेताओं पर आर्थिक अपराध की धाराएं लगी हुई होती थी.

देश भर में बहस शुरू हो जाती थी कि निजी दुश्मनी निकालने के लिए पुलिस वाले किसी को भी फंसा सकते हैं और इस तरह से मुक़दमों के चलते कोई भी चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो सकता है यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है. वैसे भी देश के बहुत सारे बड़े नेता आर्थिक अपराधों में फंसे हुए हैं. ज़ाहिर है वे ऐसा कोई भी कानून नहीं बनने देंगे जो उनकी राजनीतिक सफलता की यात्रा में बाधक होगा. कानून मंत्रालय से जो नए सुझाव आये हैं उनकी खासियत यह है कि आर्थिक अपराध वालों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखने की बात नहीं की गयी है. इसका नतीजा यह होगा कि राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेता इस कानून के दायरे के बाहर हो जायेंगे. गंभीर अपराधों की श्रेणी से आर्थिक अपराधों को बाहर रखकर सरकार ने बड़े नेताओं को बचाने की कोशिश की है लेकिन इसका फायदा यह होगा कि यह सुझाव संसद में पास हो जायेगा. हत्या, बलात्कार, देशद्रोह जैसे अपराधों में देश का कोई भी बड़ा नेता शामिल नहीं है.

अपनी राजनीतिक बिरादरी को जानने वालों को विश्वास है कि अगर बड़े नेता खुद नहीं फंस रहे हैं तो वे शातिर अपराधियों को दरकिनार करने में संकोच नहीं करेंगे. वैसे भी नए प्रस्तावों में पुलिस पर लगाम लगाने की पूरी व्यवस्था है. पुलिस के आरोप लगाने मात्र से कोई चुनाव लड़ने से वंचित नहीं हो जाएगा. पुलिस अगर किसी को गंभीर अपराध के आरोप में पकड़ती है तो उसे तफ्तीश करने के बाद ट्रायल कोर्ट में जाना होगा. अगर अदालत से चार्ज फ्रेम करने की अनुमति मिलेगी तभी कोई नेता चुनाव लड़ने से वंचित हो सकेगा. ज़ाहिर है कि नए कानून में राजनीतिक व्यवस्था को अपराधियों से मुक्त करने की दिशा में क़दम उठाने की क्षमता है. हालांकि अभी बहुत ही शुरुआती क़दम है लेकिन आज देश के एक बड़े अखबार में खबर छप जाने के बाद इस विषय पर पूरे देश में बहस तो शुरू हो ही जायेगी और उम्मीद की जानी चाहिए कि बहस के बाद जो भी सुधार चुनाव प्रक्रिया में होगा, उससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को फायदा होगा.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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Comments on “शातिर अपराधियों का चुनाव लड़ पाना असंभव हो जाएगा

  • Shailesh Tripathi. says:

    Parties are not go away from crime.Its example ch.election commissioner meeting with parties chief.

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