सांसद और पत्रकार तरुण विजय : हिंदू राष्ट्रवादी का ये इश्क महंगा पड़ा

अपनों पे सितम, गैरों पे रहम। एक मुस्लिम महिला के प्रेमपाश के कैदी हिंदू राष्ट्रवाद के प्रवक्ता श्रीमान तरुण विजय का कच्चा चिट्ठा आखिरकार जनता के सामने आ ही गया। दिल्ली से लेकर भोपाल और यूरोप तक जिस शेहला मसूद के साथ रंगरेलियां मनाई गईं, वो शेहला मसूद किसके हाथों कत्ल हुई, ये सवाल तो बाद का है।

पहला और सबसे ख़ास सवाल है कि हिंदू राष्ट्रवाद का पहरुआ आखिर किसके मोहपाश में बंधा अपनी हिंदू बीवी और बच्चों को सड़क पर फेंकने को आमादा हो गया। जिस श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के निदेशक के तौर पर तरुण विजय ने बीजेपी में पारी शुरू की, उस फाउंडेशन के कार्यक्रमों के आयोजन का ठेका किसी स्वयंसेवक के द्वारा संचालित संगठन या संस्था को देने की बजाय शेहला मसूद की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को ही तरुण विजय ने क्यों सौंपे रखा। पुलिस जांच में तमाम बातें बेपर्दा हो गई हैं।

मसलन, शेहला मसूद सांसद तरुण विजय के लेटर हेड का इस्तमाल धड़ल्ले से कर रही थी। यहां तक कि हस्ताक्षरित ब्लैंक लेटर हेड भी उसके पास से बरामद हुए हैं। शक इस बात को लेकर भी है कि तरुण विजय और शेहला मसूद ने मिलकर हाल ही में भोपाल के पॉश इलाके में 80 लाख रुपये कीमत की कोठी भी खरीदी थी। शायद दोनों ने भावी जिंदगी के लिए भोपाल में आशियाना तलाश लिया था लेकिन आशियाना सजने से पहले ही इसे किसी की नज़र लग गई।

दोनों के बीच मुलाक़ातों का सिलसिला काफी बरस पहले शुरु हुआ और बात शादी तक पहुंच रही थी, अपनी हिंदू पत्नी वंदना विजय को तलाक देने की तरुण विजय की तैयारी भी मुकम्मल थी, ये तमाम चौंकाने वाली बातें मीडिया के जरिए छनकर जनता तक पहुंच गई हैं। बीते तीन सालों से तरुण विजय के भ्रष्टाचार की ख़बरें लगातार मीडिया में सुर्खिया बनीं। ख़ास तौर पर जब आरएसएस ने उन्हें अपने मुखपत्र पांचजन्य के संपादक पद से विदा किया। तब लोगों को लगा कि तरुण विजय का सूर्य अस्त हो गया लेकिन दिल्ली की सियासत में गहरी पैठ रखने वाले तरुण विजय इतनी जल्दी हिम्मत हारने वाले नहीं थे। उन्होंने एक एक कर आरएसएस में अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाना शुरू किया। शुरूआत आरएसएस के उस प्रचारक से हुई जिसने तरुण विजय के खिलाफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत को जांच रिपोर्ट सौंपी थी।

ये जांच तरुण विजय द्वारा पांचजन्य के संपादक पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये का वारा न्यारा करने से संबंधित थी। इस बारे में मार्च 2008 में पंजाब केसरी, द स्टेट्समैन, इंडिया टूडे, आऊटलुक समेत तमाम अख़बारों में खबरें प्रकाशित हुई थीं । दरअसल ये खबरें उस जांच रिपोर्ट से छनकर आई थीं जिसमें आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक दिनेश चंद्र ने तरुण विजय के खिलाफ जांच की और आरोपों को सही पाया।

इस जांच में भीतर ही भीतर आरएसएस के पूर्व प्रवक्ता राम माधव, आर्गनाइज़र के पूर्व संपादक शेषाद्रिचारी, आरएसएस के दिल्ली के बड़े नेता बजरंग लाल गुप्ता, सूर्या इंडस्ट्री के मालिक जय प्रकाश, संतोष तनेजा ने सहयोग किया। ये सभी पांचजन्य के निदेशक मंडल का हिस्सा थे लिहाज़ा तरुण विजय के खिलाफ जांच हुई तो तरुण विजय ने इन सभी को निशाने पर लिया। और तरुण विजय को इस काम में मदद मिली, पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी से, जो जिन्ना प्रकरण के चलते संघ नेताओं से भन्नाए बैठे थे। संघ ने तरुण विजय को पैदल किया तो आडवाणी ने तरुण विजय को सहारा दिया हालांकि उन्हें इस बात की पूरी जानकारी थी कि तरुण विजय को भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत हटाया जा रहा है। क्या थे आरोप?

  • आरोप 1- तरुण विजय ने एनडीए सरकार में गृहमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी की नज़दीकी का लाभ उठाकर सिंधु दर्शन यात्रा का सरकारी बंदोबस्त अपने हाथ में लिया। करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा इसी काम में हुआ। आज भी आरटीआई के तहत अगर कोई जानकारी मांगें तो इसका खुलासा मंत्रालयों से हो सकता है कि आख़िर सिंधु दर्शन यात्रा का आयोजन तरुण विजय को किसके हुक्म से मिला। आयोजन का दफ्तर पांचजन्य कार्यालय क्यों बनाया गया। आयोजन से जुड़े सारे दफ्तरी काम पांचजन्य, केशव कुंज के कर्मचारी करते रहे और तरुण विजय ने सारे कामों का फर्जी बिल-बाउचर लगाकर लाखों रुपये तो इसी में सरकार से भजा लिए। कई साल तक सिंधु दर्शन का घोटाला चला लेकिन किसी ने आवाज़ तक नहीं उठाई। यूपीए सरकार बनने तक सारा आयोजन तरुण विजय के हाथों में ही सिमटा रहा। बगैर आडवाणी की मर्जी के क्या ये संभव था।

  • आरोप 2- पांचजन्य के पते पर नचिकेता ट्रस्ट का गठन तरुण विजय ने किया। नचिकेता ट्रस्ट ने शुरुआती कई साल पत्रकारों को सम्मानित किया। इस ट्रस्ट में सुदर्शन से लेकर अटल बिहारी तक शामिल थे। इसके सचिव तरुण विजय थे। ट्रस्ट का कार्यालय पांचजन्य का दफ्तर था, इस ट्रस्ट को बीजेपी सरकारों और केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालयों से विभिन्न प्रकाशनों के नाम पर करोड़ों रूपये के विज्ञापन मिले। इस पैसे का पूरा हिसाब तरुण विजय ने किसी को नहीं दिया। ये ट्रस्ट अब कहां चल रहा है किसी को खबर नहीं।

  • आरोप 3- एडीए सरकार के जमाने में पांचजन्य के दफ्तर से फर्जी प्रकाशनों का सिलसिला शुरू हुआ। प्रकाशन सिर्फ विज्ञापन जुटाने के लिए हुए। दस-बीस प्रतियां छपीं, विज्ञापन का चेक भुनाया, काम खत्म। पैसा तरुण विजय ने ठिकाने लगा दिया।

  • आरोप 4- देहरादून में आदिवासी बच्चों के लिए बीजेपी सरकार से अरबों रुपये की पचासों एकड़ जमीन हथिया ली। कहा गया कि आरएसएस का ट्रस्ट इस पर स्कूल खोलेगा। आदिवासी बच्चों के नाम पर स्कूल तो खुला लेकिन ट्रस्ट तरुण विजय का निजी था। आरएसएस के तो तोते उड़ गए…तरुण विजय की ये हरकत देखकर। आरएसएस के स्कूल के नाम पर करोड़ों रूपये इसमें भी बटोरे गए। सुषमा स्वराज ने राज्यसभा सांसद के कोष से पचास लाख रुपये दिए, अटल बिहारी वाजपेई ने प्रधानमंत्री कोष से 50 लाख रूपये दिए।

  • आरोप 5- 1991 में संपादक बनने के वक्त तरूण विजय की तनख्वाह थी मात्र 6000 रूपये, जो साल1998 में बढ़कर 10 हजार रूपये हुई और 2003 में 20हज़ार रूपये। 2008 में जब पद से हटाए गए तो तनख्वाह थी मात्र 25000 रूपए…यानी 16 साल में ज्यादा से ज्यादा सफेद कमाई हुई 25 से 30 लाख रुपये। लेकिन पद से हटते वक्त रोहिणी से लेकर ग्रेटर नोएडा और देहरादून तक संपत्ति इतनी कि थाह लगाना मुश्किल हो जाए। रोहिणी समेत कई जगहों पर मकान खरीदे गए और बाद में बेचकर पैसा भी भुना लिया गया।

  • आरोप 6- सबसे घिनौना आरोप था…पांचजन्य कार्यालय में शराब पीने और महिला कर्मी से अंतरंग संबंधों का। संपादक बनते वक्त 36 साल के तरूण विजय ने 18 साल की लड़की को अपना प्राइवेट सेक्रेट्री नियुक्त किया और वो लड़की बाद में इस कदर हावी हुई कि जिसने भी तरुण विजय को समझाने की कोशिश की या बात संघ के प्रचारकों तक पहुंचाई, पांचजन्य से उन सभी पत्रकारों का बोरिया-बिस्तर उठ गया। अखबार रद्दी में भले ही बदलता चला गया लेकिन किसी ने इसकी सुध लेने की जरूरत नहीं समझी। अपनी पत्नी वंदना विजय से तरुण विजय के संबंधों का बिगाड़ भी इसी प्राइवेट सेक्रेट्री के चलते ही शुरू हुआ, जिसमें शेहला मसूद का चेप्टर भी बाद में शामिल हो गया। वैसे इस फेहरिस्त में अभी नाम कई और हैं जिसका खुलासा आने वाले वक्त में होगा।

2007 और साल 2008 में जाते जाते तरुण विजय पांचजन्य में घोटाला करते गए। आरएसएस ने साल 2006 को सामाजिक समरसता वर्ष घोषित किया तो तरुण विजय ने रानी झांसी रोड के सिंडिकेट बैंक में समरसता के सूत्र ग्रंथ नाम से बैंक एकाउंट खोलवा दिया। क्या किसी किताब के नाम से अकाउंट खुल सकता है? लेकिन इस भी सच कर दिखाया घोटालगुरु ने, इसके लिए रातों रात फर्जी संस्था ‘समरसता के सूत्र’ का गठन हुआ, रजिस्ट्रेशन तक कराया गया, कुछ चेले-चपाटे जिसमें प्राइवेट सेक्रेट्री शामिल थी, से हस्ताक्षर कराए गए, और बीजेपी की राज्य सरकारों से समरसता के सूत्र ग्रंथ के नाम पर विज्ञापन मद में चंदा बटोरा गया। ईमानदार मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी तक ने इसमें अपनी ओर से 18 लाख रूपये का सहयोग दिया, बाकियों ने कितना दिया होगा, अंदाज़ा लग सकता है जो रबर स्टांप की तरह आए और चलता किए गए…जैसे मध्य प्रदेश में बाबू लाल गौर। गौर ने तो तरुण विजय को अलग से स्मारिका के लिए लाखों रूपये का भुगतान भी कराया।

आरएसएस प्रचारक दिनेश चंद्र ने इन सभी बातों की जांच की और मय दस्तावेज इन्हें आरएसएस के केंद्रीय नेतृत्व को थमा दिया। माहौल बिगड़ता देख, तरुण विजय की छुट्टी तो आरएसएस ने कर दी लेकिन ताज्जुब की बात देखिए….आडवाणी और सुषमा स्वराज ने तरुण विजय को राज्यसभा में पहुंचा दिया। जबकि इन सभी को आरएसएस नेतृत्व ने तरुण विजय के घोटालों की जानकारी दे दी थी…यहां तक कि शेहला मसूद के साथ तरुण विजय की नज़दीकियां भी बहुत पहले इन नेताओं को पता लग चुकी थीं लेकिन विचारधारा के नाम पर गंदगी को पाल-पोसकर बड़ा करने में महारथी बीजेपी नेताओं ने किसी की नहीं सुनी। आर्गनाइज़र के संपादक शेषाद्रिचारी ने तरुण विजय को राज्यसभा में भेजने के फैसले पर खुला विरोध किया। अध्यक्ष को चिट्ठी तक लिख डाली, उत्तराखंड के तमाम नेताओं ने विरोध दर्ज कराया लेकिन जीत तरुण विजय की हुई क्योंकि आडवाणी का आशिर्वाद जो हासिल था।

बड़ा सवाल है कि ये हो क्या रहा है भगवा परिवार में। इसके पूर्व संपादक का क्या यही असल चरित्र है जो सत्ता के साथ इतना मतवाला हो गया है कि ये पहले किसी लड़की की आबरू से खेलता है फिर उसे ठिकाने लगा दिया जाता है। अब ये शेहला मसूद के हत्यारों के लिए फांसी की सजा मांग रहा है लेकिन कब? हत्या के 15 दिनों तक इसे इस बात की याद नहीं आई कि उसकी एक अंतरंग मित्र का क़त्ल हो गया है, फांसी की सजा तब मांगी गई जब आरोपों के छींटे मीडिया के जरिए गर्दन तक पहुंच गए। पत्नी वंदना विजय बीते डेढ साल से चीख-चीखकर कह रही है कि राष्ट्रवाद के इस पहरुए ने उसे छोड़ दिया है और सांसद के सरकारी बंगले में कोई परायी महिला उसके साथ रहने आ गई है। बीजेपी नेता क्यों चुप्पी साधे रहे। आखिर वो महिला कौन थी, तरुण विजय का उससे क्या संबंध था। जिंदगी भर संघ का गीत गाने वाले तरुण विजय को क्या पुरूष मित्र कम थे जो महिला मित्र की जरूरत पड़ गई। वक्त चिंतन और आत्ममंथन का है, बीजेपी के लिए भी और आरएसएस के लिए भी। ऐसे व्यभिचारी चरित्र वाले शख्स को और कब तक बर्दाश्त करेंगे?

राम कुमार

दिल्ली

इन्हें भी पढ़ें:

बहन ने पूछा- शेहला के इतने अच्छे दोस्त थे तरुण तो अब तक दुख जताने क्‍यों नहीं आये?

फेसबुक के जरिए हुई थी शेहला मसूद और तरुण विजय की दोस्ती!

Comments on “सांसद और पत्रकार तरुण विजय : हिंदू राष्ट्रवादी का ये इश्क महंगा पड़ा

  • ajay singh rawat says:

    wake up BJP and RSS also.
    whats wrong with both of you???
    BJP this is your strategy to obtain the position in parliament…
    just think about it deeply…………

    Reply
  • haramjaade tere baap ne manai rangraliya kutte kitane paise liye chutiye sarkar se? bhadas for media nahi bhadas for rss hai suar ki aulado

    Reply
  • नूतन ठाकुर says:

    यह कह पाना तो मेरे जैसे गैर-जानकार के लिए संभव नहीं होगा कि तरुण विजय पर जो आरोप यहाँ बताए गए हैं वे कितने सही-कितने गलत हैं. पर इतना अवश्य है कि जितना खुल कर राम कुमार जी ने इस व्यक्ति पर आरोप लगाए हैं, वह बिना किसी बुनियाद के लगा पाना आसान नहीं है. तरुण विजय एक बड़े आदमी हैं, सांसद हैं, प्रभावशाली पत्रकार हैं. पर मेरी निगाह में जो आरोप उन पर लगाए गए हैं, वे इतने गंभीर और कुत्सित हैं कि यदि वे सत्य हुए तो ऐसे ओछे आदमी को शर्म से डूब जाना चाहिए जो एक तरफ तो उग्र राष्ट्रवाद और आदर्शवाद की बड़ी-बड़ी बातें करता है और खुद अपनी पत्नी और बच्चों को त्याग कर जमाने भर में रंगरेलियां मन रहा है. मैं इससे शर्म की बात और किसी को नहीं मानती.

    कष्ट इस बात पर भी होता है कि लाल कृष्ण आडवानी पूरे देश में अपने चरित्र और अपने कृत्यों का स्वयं ही गुणगान करते रहते हैं पर वे संघ के लोगों द्वारा प्रस्तुत किये गए जांच को दरकिनार कर अपनी पत्नी और बच्चों से अमानवीय हरकत करने वाले व्यक्ति को किस प्रकार से समर्थन देते हैं?

    मैं इस पत्र के माध्यम से तरुण विजय को यह खुली चुनौती देती हूँ कि या तो राम कुमार जी द्वारा लिखी गयी बातों को गलत बताते हुए उनके विरुद्ध कार्यवाही करें और अपनी बेगुनाही का सबूत दें अन्यथा अब जीवन पर्यंत बड़ी-बड़ी बातें कहना छोड़ कर पहले अपने दुष्कृत्यों के लिए अपनी पत्नी और बच्चों से माफ़ी मांगे और उनकी माफ़ी मिलने पर अपना शेष जीवन एक भले आदमी के रूप में व्यतीत करें.

    डॉ नूतन ठाकुर

    Reply
  • Majority of our political leaders, unfortunately, are alike. Easy Power, Easy Money, Easy Women, Easy Pleasure and Easy Publicity make their lives Easy Living ! The Common Men, the Voters and the Tax Payers always suffer, whereas the Political Leaders always prosper !!

    Reply
  • Girish Mishra says:

    Even if 50% of what has been said is true, it rubbishes the claim of the RSS that its members have unimpeachable character.

    Reply
  • डॉक्टर नूतन ठाकुर की बातों से सहमत हूँ, ऐसे लोग रास्ट्र वादियों के नाम पे एक धब्बा हैं . . . . . .

    Reply
  • sageer khaksar says:

    मैं नूतन ठाकुर साहिबा की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ .या तो आरोपों का खंडन करें या फिर अपनी पत्नी से माफ़ी मांगकर आम आदमी की तरह जीवन बिताएं .खोखले आदर्श व नैतिकता की बातें तरुण विजय जैसे लोगों के मुंह से बिलकुल अच्छी नहीं लगती.

    Reply
  • dev singh rawat says:

    egkdky us ‘ksgyk izdj.k ls r:.k fot; lfgr Hkktik o la?k usr`Ro dks Hkh fd;k csudkc
    ‘ksgyk o r:.k fot; izdj.k ls ,d gh ckr Li”V gks x;h gS fd Hkktik vc la?k ;k fl}kaUrksa ds fy, lefiZr yksaxksa dh ugha vfirq lq”kek&vkMok.kh tSls inyksyqiq usrkvksa dh dVksjh cu dj jg x;h gSAa jke jkT;] lqfprk] jk”Vªokn o Hkz”Vkpkj&nqjkpkj jfgr lq’kklu nsus dh nqgkbZ Hkjus okyh Hkktik dk eq[kksVk ‘ksgyk&r:.k fot; izdj.k ij csudkc gks x;k gSA ;gka dsoy ckr r:.k fot; dh ugha gS] lq”kek Lojkt dk Hkktik ds ‘kh”kZ ij iagqpuk o la?k ds rFkkdfFkr fl}krksa ds fy, lefiZr ns’k ds lcls tehuh fpard xksfoUnkpk;Z dks tcju ouokl fnykus okyh vkfn ?kVuk;s rFkk mÙkjk[k.M esa lkQ Nfo ds ofj”B Hkktik usrkvksa dks njfdukjs djds turk dh utjksa o izns’k esa ?kksVkyksa ls jksanus okys orZeku Hkktik ds eq[;ea=h fu’kad dh rktiks’kh djds lkQ gks x;k fd Hkktik dk jk”Vªokn] lq’kklu vkfn cksy vkt vkMok.kh dh dVksjh dh ca/kd cu dj Hkz”Vkpkfj;ksa o tkfroknh yksxksa dk vH;kjg.k cu x;h gSA [kkldj Hkktik ds vkyk usrkvksa o la?k dh ukd ds uhps gq, r:.k fot; dks mÙkjk[k.M tSls ikou nsoHkwfe ls jkT;lHkk lkaln cukus ls lkQ gks x;k fd vc Hkktik esa jk”Vªokfn;ksa o lnpfj= yksxksa ds ctk; dsoy r:.k o fu’kad tSls yksxksa dks gh lÙkklhu fd;k tkrk gSA r:.k fot; ds reke d`R;ksa dks tkudj Hkh vkSj ofj”B la?k usrk ‘ks”kkfæpkjh }kjk iqjtksj fojks/k fd;s tkus ds ckctwn jkT;lHkk dh lkalnh uokth tkrs le; ‘kk;n Hkktik o la?k ds gqDejkuksa us lkspk gksxk fd ‘kk;n os gh egkjFkh gS ijUrq egkdky us u dsoy r:.k fot; dks vfirq Hkktik o la?k usr`Ro dks iwjh rjg ls csudkc dj fn;k A vkt viuk eq[kksVk egkdky }kjk csudkc fd;s tkus ij Hkh ‘kk;n gh bu lÙkkyksyqi usrkvksa dks dgha jÙkh Hkj Hkh ‘keZ vk jgh gksxhA mÙkjk[k.M esa [kaMwMh o fu’kad tSls tkfroknh usrkvksa dks vklhu djus ds ckn ftl izdkj ls egkdky us buds eq[kksVksa dks csudkc fd;k mlls budks le> ysuk pkfg, fd Hkxoku va/ks ugha vfirq le; ij lÙkka/kksa dks nf.Mr djrs gSaA bu dkyusfe;ksa us Hkkjr ekWa ds yk[kksa liwrksa ds cfynku o n’kdksa dh riL;k dks vius fufgr LokFkksZ ds fy, xyk ?kksaV fn;k gSA blh ds dkj.k jk”Vªfgrksa ls f[kyokM djus okyh dkaxzsl lÙkklhu gSA
    ;s fo’okl?kkfr dkaxzsl o paxst vkfn ls cnrj lkfcr gks jgs gSaA blh dkj.k vkt ns’k ds yksxksa dk eksg Hkktik ls gha ugha la?k ls Hkh Hkax gks x;k gS A vxj le; ij bldks lq/kkjk ugha x;k rks Hkkjr dha nqnZ’kk dh dYiuk djuk Hkh Hk;kud gksxhA see also http://www.rawatdevsingh.blogspot.com[b][/b%5D

    Reply
  • dev singh rawat says:

    महाकाल ने षेहला प्रकरण से तरूण विजय सहित भाजपा व संघ नेतृत्व को भी किया बेनकाब
    षेहला व तरूण विजय प्रकरण से एक ही बात स्पश्ट हो गयी है कि भाजपा अब संघ या सिद्वांन्तों के लिए समर्पित लोंगों की नहीं अपितु सुशमा-आडवाणी जैसे पदलोलुपु नेताओं की कटोरी बन कर रह गयी है।ं राम राज्य, सुचिता, राश्ट्रवाद व भ्रश्टाचार-दुराचार रहित सुषासन देने की दुहाई भरने वाली भाजपा का मुखोटा षेहला-तरूण विजय प्रकरण पर बेनकाब हो गया है। यहां केवल बात तरूण विजय की नहीं है, सुशमा स्वराज का भाजपा के षीर्श पर पंहुचना व संघ के तथाकथित सिद्वातों के लिए समर्पित देष के सबसे जमीनी चिंतक गोविन्दाचार्य को जबरन वनवास दिलाने वाली आदि घटनाये तथा उत्तराखण्ड में साफ छवि के वरिश्ठ भाजपा नेताओं को दरकिनारे करके जनता की नजरों व प्रदेष में घोटालों से रोंदने वाले वर्तमान भाजपा के मुख्यमंत्री निषंक की ताजपोषी करके साफ हो गया कि भाजपा का राश्ट्रवाद, सुषासन आदि बोल आज आडवाणी की कटोरी की बंधक बन कर भ्रश्टाचारियों व जातिवादी लोगों का अभ्यारहण बन गयी है। खासकर भाजपा के आला नेताओं व संघ की नाक के नीचे हुए तरूण विजय को उत्तराखण्ड जैसे पावन देवभूमि से राज्यसभा सांसद बनाने से साफ हो गया कि अब भाजपा में राश्ट्रवादियों व सदचरित्र लोगों के बजाय केवल तरूण व निषंक जैसे लोगों को ही सत्तासीन किया जाता है। तरूण विजय के तमाम कृत्यों को जानकर भी और वरिश्ठ संघ नेता षेशाद्रिचारी द्वारा पुरजोर विरोध किये जाने के बाबजूद राज्यसभा की सांसदी नवाजी जाते समय षायद भाजपा व संघ के हुक्मरानों ने सोचा होगा कि षायद वे ही महारथी है परन्तु महाकाल ने न केवल तरूण विजय को अपितु भाजपा व संघ नेतृत्व को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया । आज अपना मुखोटा महाकाल द्वारा बेनकाब किये जाने पर भी षायद ही इन सत्तालोलुप नेताओं को कहीं रत्ती भर भी षर्म आ रही होगी। उत्तराखण्ड में खंडूडी व निषंक जैसे जातिवादी नेताओं को आसीन करने के बाद जिस प्रकार से महाकाल ने इनके मुखोटों को बेनकाब किया उससे इनको समझ लेना चाहिए कि भगवान अंधे नहीं अपितु समय पर सत्तांधों को दण्डित करते हैं। इन कालनेमियों ने भारत माॅं के लाखों सपूतों के बलिदान व दषकों की तपस्या को अपने निहित स्वार्थो के लिए गला घोंट दिया है। इसी के कारण राश्ट्रहितों से खिलवाड करने वाली कांग्रेस सत्तासीन है।
    ये विष्वासघाति कांग्रेस व चंगेज आदि से बदतर साबित हो रहे हैं। इसी कारण आज देष के लोगों का मोह भाजपा से हीं नहीं संघ से भी भंग हो गया है । अगर समय पर इसको सुधारा नहीं गया तो भारत कीं दुर्दषा की कल्पना करना भी भयानक होगी। http://www.rawatdevsingh.blogspot.com

    Reply
  • एक सभ्य और शालीन सा दिखने वाला शख्स तरुण विजय…हर समय मुस्कुराता हुआ चेहरा…मीठी मीठी भाषा…मन मोह लेने वाला अंदाज…सामने वाले को पूरी तरह से प्रभावित करने वाले ये कुछ काफी अच्छे गुण हैं तरुण विजय के…इस गुण के साथ ही स्वनामधन्य तरुण जी का एक और गुण है अपना काम निकलते ही सामने वाले को निपटा देने का…. लेकिन इन गुणों को अच्छी तरह से वे ही जानते हैं जिन्होंने अति ‘महान पत्रकार’ के साथ काम किया हो…मैंने तरुण विजय के साथ काम किया है…पांचजन्य का दफ्तर जब रानी झांसी मार्ग पर था तब भी और जब देशबंधु गुप्ता रोड पर केशव कुंज के बाहर वाली बिल्डिंग में गया तब भी…और पांचजन्य में काम करने के दौरान इस ‘महान पत्रकार’ की एक करतूत को सामने सामने न केवल देखा है…बल्कि महसूस भी किया है…भाई रामकुमार जी को मैं नहीं जानता…हो सकता है कि वो किसी छद्म नाम से लिख रहे हों…लेकिन उनकी लिखी एक एक बात मैंने और मेरे जैसे पांचजन्य में काम कर चुके तमाम मित्र देख और महसूस कर चुके हैं…
    जहां तक घोटालों की बात है तो इससे तरुण विजय का रिश्ता पत्रकारिता में आने से भी काफी पहले का है….जब तरुण विजय संघ के प्रचारक हुआ करते थे और वनवासी क्षेत्र में काम करने की उनको जिम्मेदारी दी गई थी…तब भी उन्होंने घोटाला किया था…पांचजन्य में रहते हुए तरुण विजय संस्थान की ओर से मानसरोवर की यात्रा पर गए थे…और वहां से लौटने के बाद झट से एक किताब लिख मारी…किताब की कंपोजिंग पांचजन्तय के कंप्यूटर पर तब के कंपोजिटर वेद प्रकाश और श्री रावत ने ड्यूटी आवर के दौरान की… और प्रूफ रीडिंग…महाराज कृष्ण भरत, अशोक वाजपेयी, बिक्रम उपाध्याय, विनय पाठक, अशोक श्रीवास्तव, कमल किशोर मालवीय और फकीरचंद गौतम जैसे लोगों से उन्होंने मुफ्त में कराई…वो भी ड्यूटी टाइम में…1994-95 का ये वो दौर था, जब तरुण विजय पर कुप् सी सुदर्शन के साथ ही संघ के तत्कालीन प्रदेश संघचालक, जो तब भारत प्रकाशन (पांचजन्य के प्रकाशन का काम देख रहा ट्रस्ट) में भी अहम स्थान रखते थे, का पूरा आशीर्वाद था…नतीजतन तरुण विजय लगातार निजी हित में संस्थान का उपयोग करते रहे…संघ के संपर्कों का उपयोग करते रहे…साथ में आडवाणी जी भी न जाने किस खास वजह से तरुण विजय को बढ़ावा देते रहे…आपलोगों को ये जानकार भी आश्चर्य होगा कि एक लंबे अरसे तक तरुण विजय जिस फियट कार पर चला करते थे…वो कार भी आडवाणी जी के परिवार से जुड़े एक शख्स की थी…जो एक तरह से आडवाणी जी ने तरुण विजय को हमेशा के लिए दे दी थी…ये आडवाणी जी का ही आशीर्वाद था कि जब स्वर्गीय भानु प्रताप शुक्ल ने इस व्यक्ति की कारगुजारियों से त्रस्त होने के बाद अपना फ्लैट खाली करवा लिया…तो तरुण विजय को बीजेपी कोटे से आईएनएस बिल्डिंग के ऐन सामने वीपी हाउस में एक फ्लैट मिल गया…और ये भी आडवाणी जी का ही आशीर्वाद था कि तमाम घपलों…नशाखोरी…और इश्कबाजी के किस्सों के बाद भी संघ का ये काला घोड़ा संसद तक पहुंच गया..
    अभी भाई जिग्नेश जी की भी एक प्रतिक्रिया पर नजर पड़ी…जिसमें उन्होंने रामकुमार जी की इस रिपोर्ट पर काफी नाराजगी वाली बात कही है…लेकिन जिन भाइयों को तरुण विजय की काली करतूतों पर भरोसा न हो…वे पांचजन्य के किसी भी पुराने कर्मचारी से कभी भी बात कर सकते हैं…और एक एक बात की सत्यता की परख कर सकते हैं…जिन कर्मचारियों के नाम का उल्लेख मैनें किया है…उनमें से एक महाराज कृष्ण भरत ने पत्रकारिता और दिल्ली दोनों ही छोड़ दी है, फकीर चंद गौतम और मालवीय जी शायद रिटायर हो चुके हैं…बाकी सारे लोग आज भी पत्रकारिता के क्षेत्र में न केवल सक्रिय हैं, बल्कि आसानी से उनसे संपर्क भी किया जा सकता है….
    तो अगर तरुण विजय की सचाई जाननी है तो जाइए इन लोगों से खुद बात कीजिए…इस गंदे आदमी की एक एक गंदगी का पता चल जाएगा…

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *