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साहित्‍यकार सेवा राम यात्री बने हिंदी विश्‍वविद्यालय के राइटर-इन-रेजीडेंस

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्‍यकार से.रा. यात्री (सेवा राम यात्री) राइटर-इन-रेजीडेंस के रूप में नियुक्‍त हुए हैं। हाल ही में उत्‍तर प्रदेश सरकार ने उन्‍हें महात्‍मा गांधी पुरस्‍कार दिये जाने की घोषणा की है, आगामी 19 मई के कार्यक्रम में उन्‍हें दो लाख रूपये की राशि, सरस्‍वती की कांस्‍य प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र व शॉल प्रदान कर सम्‍मानित किया जाएगा।

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्‍यकार से.रा. यात्री (सेवा राम यात्री) राइटर-इन-रेजीडेंस के रूप में नियुक्‍त हुए हैं। हाल ही में उत्‍तर प्रदेश सरकार ने उन्‍हें महात्‍मा गांधी पुरस्‍कार दिये जाने की घोषणा की है, आगामी 19 मई के कार्यक्रम में उन्‍हें दो लाख रूपये की राशि, सरस्‍वती की कांस्‍य प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र व शॉल प्रदान कर सम्‍मानित किया जाएगा।

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार से.रा.यात्री आज साहित्य जगत की एक अज़ीम शख़्शियत हैं क्योंकि उनके लेखन का सरोकार संसार के सबसे कमजोर तबके के साथ उनकी प्रतिबद्धता है साथ ही उनके साहित्य में भारतीय समाज एवं संस्कृति का यथार्थ चित्र झलकता है। 1971 ई. में ‘दूसरे चेहरे’ नामक कथा संग्रह से शुरू हुई उनकी साहित्यिक यात्रा अनवरत जारी है। तकरीबन चार दशकों के अपने लेखकीय यात्रा में उन्होंने 18 कथा संग्रह, 33 उपन्यास, 2 व्यंग्य संग्रह, 1 संस्मरण तथा 1 संपादित कथा संग्रह हिंदी जगत के पाठकों को दी है।

कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा विश्‍वविद्यालय में राइटर-इन-रेजीडेंस पद पर नियुक्ति पर खुशी जाहिर करते हुए उन्‍होंने कहा कि मैंने लेखनकार्य को ही अपना साथी समझा है। विश्‍वविद्यालय की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि यह विश्‍वविद्यालय अपने मिशन और विजन में सफल हो रहा है। उन्‍होंने कहा कि इस विश्‍वविद्यालय को अपने नाम के अनुरूप, पूरी तरह से अंतरराष्‍ट्रीय बनना चाहिए, जिस तरह प्राचीन काल में नालंदा अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय था, जहां पर विश्‍व के अनेक देशों से छात्र-अध्‍यापक अध्‍ययन-अध्‍यापन के लिए आते थे, उसी प्रकार इस विश्‍वविद्यालय का सही मायने में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍वरूप हो, इसके लिए विदेशी छात्रों को भी सुविधाएं दी जाएं तथा विदेशी अध्‍यापकों, विशेषज्ञों को अतिथि के रूप में अध्‍यापन के लिए बुलाया जाय। हिंदी विश्‍वविद्यालय में परंपरागत पाठ्यक्रमों से इतर मानविकी, समाजविज्ञान, प्रबंधन, आई.टी. जैसे विषयों में हिंदी माध्‍यम से उच्‍च स्‍तर पर अनुसंधान कार्य कराए जाने के संबंध में उन्‍होंने कहा कि इससे हिंदी का भूमंडलीकरण होगा।

हाईस्कूल पास करते ही कविता लेखन करने वाले यात्री के प्रसाद, निराला, महादेवी, पंत, बच्चन और नरेन्द्र शर्मा आदर्श कवि हैं। कविता से जन-जीवन के कठिन संघर्षों को पूर्णरूपेण व्यक्त करने में असमर्थता के कारण ही वे कहानी लेखन में प्रवृत हुए। उनकी पहली कहानी ‘नई कहानियाँ’  सर्वप्रथम 1963 ई. में ‘गर्द गुबार’  नाम से प्रकाशित हुई। उनका मानना है कि प्रत्येक रचनाकार की अपनी रूचियां, प्रवृतियाँ और वैचारिक संपदा उसकी रचनात्मकता की पूंजी होती है।

स्वतंत्र विचार किसी वैचारिक धारा विशेषकर वाद विशेष का अनुगामी नहीं हो सकता क्योंकि विचार को वादों से जोड़ने के बाद कालांतर में रूढ़ हो जाता है तथा वह बदलते समय और उसकी बहुविध आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ सिद्ध होता है। इसलिए लेखक का बड़ा सरोकार बड़े विचार से अनुश्रुत होता है किंतु वह किसी राजनीतिक विचारधारा का अनुकरण नहीं कहा जा सकता है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि विचार से ही साहित्य की उत्पति होती है जैसे गांधीवाद, मार्क्सवाद आदि। लेकिन साहित्य तो सतत है, वाद तो कालांतर में जड़ होते चले जाते हैं। लेखक की जो रचनाएं हैं वह तो कालातीत होती है। वह किसी भी भौगोलिक बंधन, भाषा बंधन को पार कर जाती है लेकिन कोई वाद अभी तक वैचारिकता के इतिहास में ऐसा कालजयी बन सका हो, यह देखने में नहीं आता है। वे आजकल अपने पुराने उपन्यास ‘बीच के दरार’  का पुनर्लेखन कर रहे हैं। प्रेस रिलीज

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0 Comments

  1. Girish Mishra

    April 21, 2011 at 3:31 am

    Does this so-called international university have anything to do with social sciences and inter-disciplinary studies? Will it ever go on doing “ganesh parikrama” around poetry, short stories, novels, and so on completely unconcerned with society and its problems?

  2. मनोज

    April 22, 2011 at 6:59 pm

    महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय , वर्धा के कुलपति के अकादमिक समझ की अपनी सीमाएँ हैं . लोगों को बुला कर पैसा बाँटने से और बिल्डिंग्स बनवाने से अगर कोई प्रबुद्ध हो जाता तो शायद किताबों की दूकान पर बैठने वाला देश का सबसे समझदार व्यक्ति होता ..इस विश्वविद्यालय के कुलपति की अकादमिक समझ केवल उतनी है जितना की अन्य अँग्रेज़ी में एम ए पास व्यक्ति की होती है ..इसके पहले राजकिशोर को भी ऐसे ही लाया गया था जिन्होने आज तक कोई कुलपति ही नहीं देखा है ..ऐसे ज़िम्मेदार पदों पर किसी उच्च शिक्षित अकादमिक व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए ..आप ट्रेक्टर के ड्राइवर से हवाई जहाज़ चलवाएँगे तो यही होना है….

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