महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्त्री अध्ययन संघ के संयुक्त तत्वावधान में स्त्री अध्ययन के 13 वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतर्गत पांच दिवसीय सम्मेलन में ‘हाशिएकरण का प्रतिरोध, वर्चस्व को चुनौती : जेंडर राजनीति की पुनर्दृष्टि पर गंभीर विमर्श करने के लिए गांधीजी की कर्मभूमि वर्धा में देशभर के 650 स्त्री अध्ययन अध्येताओं का सम्मेलन हो रहा है। हर चौथे वर्ष आयोजित होने वाले स्त्री अध्ययन संघ का यह अधिवेशन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हो रहा है, इसके पहले 11वां अधिवेशन गोवा में और 12 वां लखनऊ में आयोजित किया गया था।
पांच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में अधिवेशन पूर्व कार्यशाला में दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पुदूचेरी सहित देशभर के 60 से अधिक विश्वविद्यालयों के तकरीबन 250 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। स्त्री अध्ययन के शोधार्थियों ने पहले सत्र के दौरान ‘स्त्री अध्ययन : शिक्षा शास्त्र और पाठ्यक्रम’ पर विमर्श करते हुए कहा कि स्त्री अध्ययन महिला मुक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप निकला हुआ एक विषय है, जबकि स्त्री अध्ययन को लेकर केंद्रों, विभागों और स्नातकोत्तर व उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुत सारे संघर्ष हुए हैं और किए जाने हैं। विद्यार्थियों ने स्त्री अध्ययन के मुख्य अनुशासन के अभ्यासों और उससे पड़ने वाले प्रभावों के अनुभवों को साझा किया। विद्यार्थियों ने विशेषकर इस विषय को पढ़ते वक्त परिवार द्वारा मिलनेवाली चुनौतियों को भी बताया कि किस तरह जब वह अपने विषय के तत्वों पर परिवार और समाज में बात करते हैं तो लोग उनका विरोध करते हैं। कुछ विद्यार्थियों ने यह अनुभव किया है कि यह मात्र समानता का सवाल नहीं है परंतु यह मानव की तरह व्यवहार किए जाने का सवाल है।
विद्यार्थी इस तरह के सिद्धांतों के विकास की जरूरत महसूस करते हैं जो समकालीन सच्चाईयों और चुनौतियों से सामंजस्य स्थापित करने वाला हो। विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि स्वयं शिक्षा व्यवस्था में जेंडर स्टडीज को एक पूर्ण विषय के तौर पर मान्यता नहीं मिल पायी है। यहां यह कहना समीचीन होगा कि स्त्री अध्ययन के अधिकांश केंद्रों व विभागों के विभिन्न पद पर या तो दूसरे विषय के शिक्षकों को लाया जाता है या फिर वह पद रिक्त छोड दिया जाता है, इस पर हमें गंभीर विमर्श करने की जरूरत है। विद्यार्थियों ने सारांशत: यह रेखांकित किया कि समाज को बदलने वाले इस विषय पर जब भी बात की जाती है तो इसे उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। अकादमिक बहस में विद्वानों ने स्त्री अध्ययन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अभी तक इस तरह के विषय उच्च शिक्षा के केंद्रों और विभागों में है। शिक्षा शास्त्र का महत्व यह हो जाता है कि इसके मूल तत्व सभी प्रचलित ज्ञानानुशासन के संतुलन और स्त्री-चेतना के संवेदनशीलता का संचार करें। द्वितीय सत्र के दौरान स्त्री अध्ययन: अनुभव और सरोकार पर चर्चा की गई।
21 जनवरी को इस राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन समारोह में स्त्री अध्ययन संघ की अध्यक्ष अनीता घई द्वारा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय को लोकतंत्र और लैंगिक समानता का पौधा प्रदान करेंगी। कुलपति राय द्वारा देश-विदेश से आए प्रतिभागियों का औपचारिक स्वागत करने के बाद स्त्री अध्ययन संघ की अध्यक्ष अनीता घई अपना उदघाटन वक्तव्य देंगी। वरिष्ठ दलित लेखिका नागपुर की कुमुद पावडे माधुरी शाह स्मृति पर अपना व्याख्यान देंगी। ‘हाशिएकरण एवं स्त्रीवादी चिंताएं : प्रतिरोध और चुनौतियां’ विषय पर आधारित सत्र के दौरान स्त्रीवादी संघर्ष से जुडी कार्यकर्ता पश्चिम भारत की चयनिका शाह, दक्षिण भारत की जमीला निशात व मध्यभारत की दयामणि बार्ला बतौर वक्ता के रूप में अपना वक्तव्य देंगी। सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम के तहत छत्ीसगढ की पूनम तिवारी व दल तथा नागपुर की लोकनृत्य दल द्वारा रंगारंग प्रस्तुति की जाएगी।
सम्मेलन के स्थानीय संयोजक व स्त्री अध्ययन की विभागाध्यक्ष प्रो. इलीना सेन ने बताया कि 21 वीं शताब्दी का पहला दशक एक बडे जनसमूह के लगातार हाशिएकरण और राज्य, पूंजी तथा अन्य ताकतों द्वारा अदृश्य तथा महत्वहीन बनाए जाने का गवाह रहा है। अनेक संघर्ष सार्थक नागरिकता वाली राज्य व्यवस्था एवं समाज की कल्पना करते हैं लेकिन वहीं स्त्रीवादी, जमीनी अनुभव के प्रति नए नजरिए, पुराने प्रश्नों पर पुनर्विचार एवं नवीन चुनौतियों का सामना करने के लिए नए गठबंधनों की तलाश कर रहे हैं। वर्धा में आयोजित ऐसे बहस से हम स्त्री विमर्श की एक नई शुरुआत कर सकते हैं।











