पैण्डुलम की तरह हाथ हिलाते हुए
यही कहेंगे आप
बावजूद इसके कि
साल दर साल
मजबूत होते गये आपके पाये
और इधर भरभराती रही हमारी नींव
दायां बाजू बढ़ाकर
लपक लीजिये हाथों को
संवेदनशील मुद्दों की तरह
जैसे दायें बाजू के मुस्टंड पहलवान
संस्कृति के अखाड़े में
विचारों को धोबीपाट देने के करतब में मस्त हैं
और हर नयी सोच को
सोलहवीं सदी के जंग लगे औजारों से
ऑपरेट करने की
हो चुकी है पूरी व्यवस्था
भेजिये आर्चीज के
रंग-बिरंगे चिकने चकमक कार्ड
जो होली-दीवाली से लेकर
तीज-छठ तक के ग्लोबलाइजेशन में
पूरी ईमानदारी से व्यस्त है
ताकि मुटल्ले डॉलर के मुकाबले
मरघिल्ले रूपये की सेहत
थोड़ी और गिर सके
मुबारकबाद की चाशनी में पेश कीजिये
मिठाई के टुकड़े
जिसके लिये ई-तकनीक का इस्तेमाल करते हुए
मुद्रा के ई-विनिमय से मंगायी गयी है विदेशी चीनी
और उधर आंध्र या विदर्भ में कहीं
गन्ने के किसी किसान ने
कर ली है आत्महत्या
जिसका सूचना तकनीक के क्षेत्र में
कोई खास महत्व नहीं है
लाशों के ढेर में
कहकहे लगाने की तंत्र-साधना में
जब हासिल कर ही ली है आपने सिद्धि
तो बकौल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
”मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना है।”












suryakant
January 4, 2011 at 1:57 pm
good… very good