दैनिक भास्कर, रांची से अंकित शुक्ला को चंडीगढ़ भेजे जाने के बाद खबर है कि राघवेंद्र झा गुट काफी खुश है. भास्कर में अभी तक अघोषित रूप से तीन लॉबी काम कर रही थी. पहली लॉबी को ओम गौड़ का संरक्षण था तो दूसरी लॉबी को राघवेंद्र का. तीसरी लॉबी यहां के दबे कुचलों की थी, जो अंकित शुक्ला के साथ थी. अंकित शुक्ला के रहते इन दो लॉबियों की मनमानी नहीं चल पा रही थी, इसलिए दोनों लॉबी एक होकर अंकित को चंडीगढ़ का रास्ता नपवा दिए.
अपने लांचिंग के बाद से ही भास्कर कंटेंट लेबल पर कोई छाप नहीं छोड़ पाया है. यहां पर उसका नम्बर प्रभात खबर, हिंदुस्तान और जागरण के बाद चौथा है. लांचिंग के समय प्रबंधन ने प्रभात खबर, हिंदुस्तान और जागरण से कई पत्रकारों को ऊंचे वेतन का लालच देकर तोड़ लिया. कुछ भगोड़े टाइप के लोग भी भास्कर के साथ हो लिए थे. लांचिंग तक सब ठीक ठाक रहा, परन्तु लांचिंग के बाद जब आपस में अहम और हित टकराने लगे तो गुटबाजी शुरू हो गई, जिसके बाद यहां तीन गुट बन गए.
पहला गुट संपादक ओम गौड़ का बना, इसमें उनके साथ आए लोग तथा कुछ स्थानीय लोग शामिल हुए. कुछ सत्ता की नजदीकी देखकर जुड़ गए. दूसरा गुट भास्कर में पॉलिटिकल एडिटर बनकर आए राघवेंद्र झा ने तैयार किया. इसमें ज्यादातर ब्राह्मण लॉबी शामिल हुई. और खासकर जागरण से आए मैथिल ब्राह्मण. तीसरी लॉबी बनी अंकित शुक्ला की, जिसमें हिंदुस्तान से आए लोग तथा अपने को यहां दबा कुचला समझने वाले दूसरी जाति के लोग शामिल हुए. इसके बाद तीनों लॉबी अपनी अपनी टीम के साथ जुटी रही एक दूसरे को तरीके से सलटाने में.
असली खबर यह है कि खबरों के जरिए ब्लैकमेंलिंग, एवं खबरों को मेनुपुलेट करने वाली लॉबियों के बीच अंकित शुक्ला दीवार बन गए थे. वो खबरों को लेकर दूसरी टीम के लोगों से इतनी क्वेरी करते थे कि बाकी गुट उनसे परेशान था. खबरों को लेकर वो किसी भी स्थिति में समझौता करने को तैयार नहीं होते थे, जो बाकी दो टीमों को खटकता था. अंकित सीधे उपर से आए थे लिहाजा ये दोनों गुट अपने को असहज पाते थे. अलग-अलग अंकित गुट से निपटना इन दोनों गुटों के लिए मुश्किल हो रहा था. इनके अपने हित भी प्रभावित हो रहे थे.
लगातार प्रभावित हो रहे व्यक्तिगत हित ने ओम गौड़ और राघवेंद्र झा गुट को आपसी शीत युद्ध रोकने को मजबूर किया. इसके बाद ये लोग अपने राह में रोड़ा बने अंकित शुक्ल लॉबी को सलटाने में लग गए. इस तरह की स्थिति देखने के बाद इस गुट के कुछ लोग मौका मिलते ही अपने पुराने संस्थान या दूसरे संस्थानों में चले गए. जिसके बाद ये दोनों गुट मिलकर और मजबूत हो गए. पर इसके बावजूद खबरों को लेकर इस गुट की मनमानी नहीं चल पा रही थी. जिसकी काट खोजने में एका हुआ गुट लगा था.
इसमें काम आए पंजाब में प्रभार देख रहे कमलेश सिंह. कमलेश सिंह राघवेंद्र झा के इलाके के हैं. राघवेंद्र झा की एंट्री भी भास्कर में कमलेश सिंह के जरिए ही हुई थी. सूत्रों का कहना है कि दोनों ग्रुप ने कमलेश सिंह को आधी अधूरी सूचना देकर अंकित से होने वाली परेशानी का हवाला दिया. परन्तु प्रबंधन में अंकित की अच्छी छवि के चलते तत्काल उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाना किसी के लिए संभव नहीं था, लिहाजा उनको बुलाने के लिए उनके प्रमोशन की योजना बनी. इसमें भास्कर के कुछ और उच्च प्रबंधन के लोग लगे. जिसके बाद अंकित शुक्ला को प्रमोशन देकर चंडीगढ़ बुला लिया गया. यानी शिकारी जीत भी गए और शिकार को कोई गिला शिकवा भी नहीं हुआ.
अब ताजा खबर है कि यहां ओम गौड़ की वजह से यहां जोधपुर वाला कल्चर तो बना ही है, अब अंकित से नजदीकी रखने वालों को भी किनारे किए जाने की रणनीति तैयार की जाने लगी है. अब यहां जागरण से आने वाली लॉबी ज्यादा हावी हो गई है. हिंदुस्तान से आने वाले लोग अब अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं. बताया जा रहा है कि जिस तरह मैथिली ब्राह्मण लॉबी हावी है, उससे अन्य लोग काफी परेशान है. कई लोग भास्कर छोड़कर दूसरे संस्थानों में जाने के लिए अपने संपर्कों को खंगालना भी शुरू कर दिया है.












pradeep
August 19, 2011 at 8:47 am
दुखद आश्चर्य हुआ कि राघवेन्द्र जी का नाम गुटबाजी को लेकर उछाला जा रहा है। ईटीवी में मेरा उनके साथ काम करने का भी अनुभव रहा है। लगभग बारह सालों से उनको देख रहा हूं। तब वे प्रभात खबर, पटना के संपादकीय प्रभारी हुआ करते थे। निजी हित साधने के लिए इस प्रकार का आरोप लगाना सही नहीं है। ध्यान रहे कि अनगर्ल आरोप से कोई आहत हो सकता है। ईश्वर इस रिपोर्ट को प्रेषित करने वाले को सदबुद्धि दें।
प्रदीप , रांची
anandkaushal
August 19, 2011 at 12:46 pm
मुझे भी पढ़कर काफी दुख हुआ। राघवेंद्र जी के साथ मैनें भी ईटीवी में काम किया है। व्यक्तिगत रूप से किसी पर टिप्पणी करना जायज नहीं है। राघवेंद्र जी पत्रकारिता में अपने सिद्धांतों के लिए मशहूर हैं और राजनीति करने की बात होती तो वे कोई पार्टी ज्वाइन कर लेते। वैसे जहां तक मेरी जानकारी है राघवेंद्र भैया वामपंथ विचारों से थोड़े प्रभावित हैं इस लिहाज से ये आरोप सरासर गलत हैं।
आनंद कौशल
हमार टीवी
madhur sheel
August 20, 2011 at 10:21 am
राघवेन्द्र सरीखे लोगों पर गुटबाजी का आरोप लगाने वाला दिमागी रुप से बीमार लगता है,जिस आदमी का सही नाम भी नहीं जानता उसके बारे में वाहियात टिप्पणी करने की जुर्रत कर बैठा.मेरा और राघवेन्द्र जी का साथ पिछले 20 वर्षों का है,अब तक संस्थान में गुटबाजी और राजनीति करने का अहसास मुझे नहीं हुआ है.आरोप लगाने वाले को कम से कम तना तो पता कर लेना चाहिए कि उनका पूरा नाम क्या है राघवेन्द्र झा नहीं हैं.राघवेन्द्र जी के राजनीतिक सम्पादक बनने का मतलब यह कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि अब उन्हें राजनीति करना भी आ गया है.हां उनकी एक कमी जरुर है कि अपने लोगों का काल अटेण्ड नहीं करते.
shailesh
August 21, 2011 at 5:14 pm
आश्चर्य हुआ कि राघवेंद्र भैया का नाम गुटबाजी को लेकर उछाला जा रहा है। ध्यान रहे कि अनगर्ल आरोप से कोई आहत हो सकता है। मुझे भी पढ़कर काफी दुख हुआ। है। व्यक्तिगत रूप से किसी पर टिप्पणी करना जायज नहीं है। राघवेंद्र जी पत्रकारिता में अपने सिद्धांतों के लिए मशहूर हैं लिहाज से ये आरोप सरासर गलत हैं।