एक बहुत लंबे संघर्ष के बाद मेरे पति अमिताभ जी को अंततः उत्तर प्रदेश शासन ने नियमों के अनुसार आईआईएम लखनऊ में मानव संसाधन प्रबंधन कोर्स हेतु अध्ययन अवकाश दे ही दिया. दिनांक 02/06/2011 के उत्तर प्रदेश शासन के आदेशों के अनुसार उन्हें को दिनांक 10/06/2009 से 17/02/2011 तक की अवधि के लिए अखिल भारतीय सेवा ( अध्ययन अवकाश) नियमावली 1960 के नियम चार के अंतर्गत अध्ययन अवकाश दिया गया.
इस अध्ययन अवकाश के दिए जाने से अब अमिताभजी को ना सिर्फ लगभग दो साल का वेतन एक साथ मिलेगा बल्कि अब यह दो साल की अवधि भी उनकी सेवा में शामिल की जायेगी और यह उनके पेंशन, ऐच्छिक सेवा-निवृत्ति जैसे सभी प्रकरणों में लाभकारी होगी. यही कारण भी थे कि उनको जानबूझ कर अध्ययन अवकाश नहीं दिया गया था क्योंकि शासन में बैठे कुछ अधिकारियों की इस मामले में व्यक्तिगत रूचि थी और उन्होंने नियमों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए ऐसा विधि-विरुद्ध कार्य किया. इस मामले में विशेष कर कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव, गृह और विजय सिंह, सचिव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश की भूमिका थी, जिन्होंने सीधे-सीधे लिखे नियमों को भी जानबूझ कर तोड़ा-मरोड़ा और क़ानून के साथ पूरी तरह खिलवाड़ किया. यही कारण था कि जब मेरे पति अध्ययन अवकाश के लिए बनी सारी अर्हताओं को पूरा करते थे, तब भी उन्हें किसी ना किसी प्रकार से इस अवकाश से वंचित रखा गया था. वह भी एक-दो महीने नहीं बल्कि पूरे तीन साल तक.
बात तब शुरू हुई थी जब अमिताभजी ने कैट परीक्षा के माध्यम से आईआईएम लखनऊ में अपने चयन के बाद 30/04/2008 को उत्तर प्रदेश सरकार को दो सालों के अध्ययन अवकाश हेतु अखिल भारतीय सेवा ( अध्ययन अवकाश) नियमावली 1960 के तहत आवेदन पत्र दिया था. यद्यपि वे इस नियमावली के अंतर्गत सभी अर्हताओं को पूरा करते थे पर उन्हें जानबूझ कर अवकाश नहीं दिया गया. बल्कि कुल मिला कर उनके फ़ाइल को पेंडिंग में डाल दिया गया. उन्होंने पूरे एक साल तक इन्तज़ार किया कि अब शायद कुछ निर्णय आये और जब कुछ नहीं हुआ तब उन्होंने पहले केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) लखनऊ और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ बेंच में वाद दायर किये. इन वाद में दिए गए निर्णय के आधार पर प्रदेश सरकार ने अमिताभजी के अध्ययन अवकाश के आवेदन को अस्वीकृत कर दिया. यहाँ तक कि उनके द्वारा मांगे गए असाधारण अवकाश को भी अस्वीकृत किया जो किसी भी अधिकारी का लगभग नैसर्गिक हक सा है और जो बहुत ही विशेष स्थितियों में ही अस्वीकृत होता है. शासन द्वारा इसके लिए तीन कारण बताए गए, एक तो यह कि अमिताभजी द्वारा कैट परीक्षा हेतु पूर्वानुमति नहीं ली गयी, दूसरा यह कि प्रदेश में एसपी स्तर के आईपीएस अफसरों की भारी कमी है और तीसरा यह कि चूँकि यह कोर्स चार साल का है अतः वे दो सालों में यह कोर्स कैसे कर पायेंगे.
यह अलग बात है कि अमिताभ जी इस मामले में लगे रहे और आगे चल के पुनः कैट में वाद संख्या 238/2009 में गए और कैट के आदेश पर उन्हें 08/06/2009 को राज्य सरकार द्वारा असाधारण अवकाश दिया गया और उन्होंने आईआईएम लखनऊ में दाखिला ले लिया. इसी वाद में अंत में 07/07/2010 को कैट ने आदेशित किया कि उत्तर प्रदेश सरकार आवेदक के अध्ययन अवकाश सम्बंधित मामले में पूर्व में लगाए गए आपत्तियों को दरकिनार करते हुए नियमों के अनुरूप चार सप्ताह में युक्तियुक्त निर्णय ले. उन्होंने उक्त निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार को 08/07/2010 को प्रेषित कर दिया किन्तु उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया. तब उन्होंने कैट में अवमानना याचिका संख्या 57/ 2010 दायर किया जिसमे गृह सचिव, भारत सरकार, प्रमुख सचिव, गृह तथा डीजीपी के विरुद्ध अवमानना नोटिस जारी किया गया.
इस पर भी राज्य सरकार द्वारा कैट के निर्णय का अनुपालन नहीं कर के उलटे हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में रिट याचिका 268/2011 के जरिये कैट के आदेशों को चुनौती दी गयी, पर हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की रिट याचिका को खारिज कर कैट के आदेशों के अनुरूप कार्रवाई करने को कहा. जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके बाद भी कार्रवाई नहीं की तब अमिताभजी ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर किया. अब इतना कुछ करने के बाद अब अंत में जा कर उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें स्टडी लीव दिया है, जो उन्हें प्रारम्भ में ही मिल जाना चाहिए था.
इस तरह इस मामले में हाई कोर्ट और कैट में कुल आठ मुकदमे चले जिस में चार हाई कोर्ट और चार ही कैट में हुए और इन सब के बाद ही उन्हें उनका विधिक अधिकार मिल सका. वह भी तब जब इस मामले में बहुत पहले ही फ़तेह बहादुर को निर्वाचन आयोग द्वारा हटाये जाने के बाद कुछ दिनों के लिए प्रमुख सचिव गृह रहे मंजीत सिंह ने फ़ाइल पर साफ़ लिखा भी था कि मानव संसाधन प्रबंधन आईपीएस अफसरों के लिए बहुत उपयोगी है और अतः इन्हें स्टडी लीव अवश्य मिलना चाहिए. इसके अलावा इस दौरान कई ऐसे दृष्टांत आये जब दूसरे आईपीएस अधिकारियों को उन्हीं आधारों पर छुट्टी मिलती रही जिस आधार पर अमिताभजी को स्टडी लीव मना किया गया था.
मुझे इस जीत की खुशी तो है ही पर इससे अधिक इस पूरी लड़ाई के लिए खुशी है क्योंकि इसमें लाख परेशानियों के बावजूद हम लगे रहे- कई बार परिणाम की चिंता किये बगैर.
डॉ. नूतन ठाकुर












अखिलेश
June 3, 2011 at 10:07 am
इस खबर में मीडीया का क्या रोल है? मेरे पूछने का तात्पर्य यह है कि आप अपने पोर्टल पर मीडीया से संबंधित खबरें ही छाते हैं ना या फिर सरकारी अधिकारियों की निजी खबरों को भी प्रकाशित करते हैं?
मदन कुमार तिवारी
June 3, 2011 at 12:23 pm
हमलोग भी खुश हैं। अमिताभ जी को मेरी बधाई ।
rajan singh
June 3, 2011 at 1:51 pm
tik hai, yh bhi bta do ki kal kya khana hai, tumhaare ghar ki bhadas hai, ghar ki hi ho, to bhi sarvjanik to hai hi, kam se kam apne aur apne parivaar ke alava bhi kuchh likh diya karo maidam
anuj agarwal
June 3, 2011 at 2:39 pm
RESPECTED AMITABH JI
JEET KI BADHAI.
ANUJ AGARWAL
9412334700
Sanjaya Kumar Singh
June 3, 2011 at 2:53 pm
जीत के लिए आप दोनों बधाई के पात्र हैं। वैसे तो यह जीत मिलनी ही थी पर उत्तर प्रदेश सरकार से इतने लंबे समय तक लोहा लेना आसान नहीं था। खास कर तब जब वेतन बंद हो। अमिताभ जी को चाहिए कि वेतन न मिलने से हुई परेशानियों की भरपाई के लिए एक क्षतिपूर्ति का मुकदमा भी करें और ऐसा नियम बनवाने की दिशा में काम करें जिससे अनुकूल न रहने वाले कर्मचारियों / अधिकारियों का वेतन रोककर उन्हें कमजोर / परेशान करने की परंपरा रोकी जा सके। पुनः बधाइयां।
सृजन शिल्पी
June 4, 2011 at 5:47 am
सिस्टम में सुधार की गुंजाइश ऐसे ही संघर्षों से बनती है। नौकरशाही का हमारा मौजूदा सिस्टम ऐसा है कि इसमें उच्च अधिकारियों के मनमानेपन और पक्षपात को रोकने के लिए कोई अंदरूनी मैकेनिज्म नहीं है। अदालतों में लंबी लड़ाइयां लड़ना ही एकमात्र विकल्प बचता है, जिसमें बहुत सारा पैसा और समय तो बर्बाद होता ही है, साथ-साथ ऊर्जा भी झोंकनी पड़ती है। इतना धैर्य और माद्दा सबमें होता नहीं है।
नूतन जी, आप जैसी धर्मपत्नियां वाकई धन्य हैं, जो अपने जीवनसाथी के संघर्ष में इस तरह साथ दे पाती हैं।
kumar sauvir
June 4, 2011 at 7:48 am
do saal ka vetan !
aaila re !
itti badi rakam !
vo bhi ek-saath !
ganpati bappa moliya !
ab kuchhaq to mera bhi banta hae, berojgaar patrakaar aur uske baal-bachcho par kuchh to raham kar mere policiya maula !
to ho jaye iske pahle ek party se shuruaat
kumar sauvir
berojgaar
Shyam kumar
June 4, 2011 at 6:18 pm
Sangharsh ki safalta par aap dono ko badhai.