
नमिता
पेरने से लेकर मप्सा, पणजी, वास्को, मार्गो और कनकोना तक इसका असर दिखा. ज्यादातर दुकान और स्कूल बंद रहे. हालाँकि कुछ जगहों पर बंद का असर कम भी दिखा. कई रास्ते सुनसान थे तो कई जगहों पर आगजनी भी देखने को मिली. प्रशासन ने भारी तादाद में पुलिस की व्यवस्था की थी और आरएएफ़ के जवान भी तैनात थे. ये सब जिक्र करना जरूरी है क्योंकि 7 जून को गोवा के सभी अखबारों का प्रथम पृष्ठ इसी खबर से पटा हुआ था, जो स्वाभाविक भी है, लेकिन जो अस्वाभाविक चीज़ देखने में आयी वो ये कि सभी अख़बारों ने अपने-अपने हिसाब से 6 जून की गोवा बंद की तस्वीर खींच डाली है.

गोवा का एक बेहद प्रतिष्ठित अखबार अपने फोटो और आलेखों के जरिये ये दर्शाने की कोशिश कर रहा था कि बंद बिलकुल असफल रहा. वहीं दूसरी तरफ एक और अखबार ये बताने में जुटा था कि बंद पूरी तरह से सफल रहा. एक तीसरे अखबार ने संतुलन बनाये रखने की कोशिश की कि बंद का असर फिफ्टी-फिफ्टी रहा. गोवा कि ये सभी अखबार मुख्यधारा के अखबार हैं, ना कि किसी जाति या धर्म के मुखपत्र. ऐसे में इस गंभीर विषय, जो बच्चों के भविष्य से जुड़ी है, पर गंभीरता से विचार करने की बजाये अगंरेजी बनाम क्षेत्रीय भाषा ( कोंकणी, मराठी ) की लड़ाई में फँस कर रह गयी लगती है.
मुख्यधारा के एक अखबार की या पत्रकारिता क़ी जो गरिमा या जिम्मेदारी दिखनी चाहिए, वो 7 जून को प्रकाशित होने वाले अख़बारों में देखने को नहीं मिला. हर जगह भटकाव देखने को मिला, जो बेहद दुःखदाई है. मीडिया का काम व्यकितगत विचारों से परे उठ कर तथ्यों को सामने लाना है और वो भी पूरी पारदर्शिता के साथ, परन्तु गोवा के बड़े अखबार पूरी तरह से असफल दिखे.
नमिता शरण
एडिटर, गोवासमाचार.कॉम











