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अखबार के साथ ब्रा – पैंटी फ्री!

चैतन्य भट्ट: लगता है कि अब अंडरगारमेन्ट ही शेष रह गए हैं : ज्यादा वक्त नहीं बीता है उस जमाने को गुजरे जब अखबारों की पहचान उसमें प्रकाशित होने वाली सामग्री से हुआ करती थी. अच्छे से अच्छी सामग्री देने के लिये अखबारों में प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी. किसी अखबार का यदि कोई फटा हुआ पन्ना भी किसी को मिल जाता था तो उसमें प्रकाशित सामग्री को देखकर वह बतला सकता था कि यह पन्ना अमुक अमुक अखबार का है.

चैतन्य भट्ट: लगता है कि अब अंडरगारमेन्ट ही शेष रह गए हैं : ज्यादा वक्त नहीं बीता है उस जमाने को गुजरे जब अखबारों की पहचान उसमें प्रकाशित होने वाली सामग्री से हुआ करती थी. अच्छे से अच्छी सामग्री देने के लिये अखबारों में प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी. किसी अखबार का यदि कोई फटा हुआ पन्ना भी किसी को मिल जाता था तो उसमें प्रकाशित सामग्री को देखकर वह बतला सकता था कि यह पन्ना अमुक अमुक अखबार का है.

समय बदला,  प्रतिस्पर्धा और प्रसार संख्या बढाने की अंधी दौड़ में अखबारों के मालिकान इस कदर दीवाने हो गये कि उनके लिये सामग्री, कंटेंट गौड़ हो गये. प्राथमिक हो गया येन केन प्रकारेण पाठकों को अपनी ओर खींचना. इसके लिये पाठकों पर उपहारों की बौछार की जाने लगी. अखबार जगत में सबसे कमजोर और छोटी कही जाने वाली कड़ी हॉकरों को लुभाने और पटाने के हर तरीके अपनाये जाने लगे. स्थिति ये है कि करोड़पति और अरबपति अखबार मालिक जो संपादकों और पत्रकारों को अपने अंगूठे तले दबाकर रखते हैं, इन हॉकरों के सामने घिघियाते दिखाई देते हैं. उन्हें लगता है कि यदि हॉकर नाराज हो गया तो उनका अखबार कहीं का नही रहेगा. पिछले कुछ सालों में तो हॉकरों का जलवा कहां से कहां तक पहुंच गया. कोई उन्हें सैर करवा रहा है तो कोई उन्हें उपहारों से लाद रहा है, कोई उनके लिये पार्टियां आयोजित कर रहा है तो काई उन्हें शाल और नारियल से सम्मनित कर रहा है.

मध्यप्रदेश के प्रमुख जिले जबलपुर में अखबारों के बीच जो गलाकाट स्पर्धा चल रही है उसने जहां हॉकरों को मालदार बन दिया है वहीं पाठकों के घरों में भी तमाम तरह के उपहार पहुंचा दिये है. अपनी अपनी प्रसार संख्या बढाने के लिये ये हर संभव उपाय कर रहे हैं. जहां सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार ‘‘दैनिक भास्कर’’ अपने आप को शिखर पर बनाये रखने के लिये तरह तरह की स्कीमों को सहारा ले रहा है तो उसके आभामंडल को तोड़ने के लिये ‘‘पत्रिका’’ ‘‘नईदुनिया’’ ‘‘राज एक्सप्रेस’’ ‘‘हरिभूमि’’ ‘‘पीपुल्स समाचार’’ जैसे अखबार रात-दिन एक कर रहे हैं. प्रसार सख्या बढाने के चक्कर में कंटेंट और सामग्री गौड़ हो गई है, स्कीम प्रमुख. यहां तक कि अपनी सामग्री से पहचान बनाने वाले ‘‘नईदुनिया’’ ने भी उन तमाम तरह के उपायों को अपनाना शुरू कर दिया है जो पहले कभी उसने नहीं अपनाये. पाठकों को अपनी ओर खींचने और उन्हें लुभाने के लिये शहर का शायद ही कोई ऐसा अखबार होगा जो अपने पाठकों को उपहार न बांट रहा हो. इतना ही नहीं, पृष्ठों की संख्या में भी जबरदस्त बढोतरी की गई है ताकि पाठक अखबार की रद्दी को बेचकर अखबार पढने का खर्च निकाल सके. शायद यही कारण है कि अब पाठक किसी भी अखबार को लेने के पहले सबसे पहला सवाल यही करता है कि ‘‘गिफ्ट’’ क्या है और अखबार कितने पेजों का है. यानी उसे भी अब सामग्री से कोई सरोकार नहीं है. उसकी निगाह में पृष्ठ संख्या और गिफ्ट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं. इसके लिये तमाम अखबार वाले ही दोषी कहे जायें तो गलत न होगा.

जबलपुर में हालात ये है कि अखबार अब तक अपने पाठकों को ‘‘पापड’’, ‘‘बडी’’ ‘‘अचार’’ ‘‘चाय पत्ती’’ ‘‘साबुन’’ ‘‘शेम्पू’’ ‘‘लोटा’’ ‘‘गिलास’’ ‘‘प्यलियां’’  ‘‘टब’’ ‘‘मग’’ ‘‘बाल्टी’’ ‘‘चादर’’ ‘‘तौलिया’’ ‘‘बैग’’ ‘‘डिनर सेट’’ ‘‘टार्च’’ ‘‘इमरजेन्सी लाईट’’ ‘‘सिर में लगाने का तेल’’ ‘‘खाने का तेल’’ ‘‘फ्राईपेन’’ जैसी चीजें बांट चुके हैं. अब उनके सामने सवाल खड़ा है कि अब वे क्या बांटें और जो स्थिति दिखई दे रही है उसके आधर पर कहा जा सकता है कि अब केवल ब्रा, पैंटी, बनियान, चड्ढियां ही शेष बचे हैं. इन ‘‘अंडरगारमेन्ट’’ को शायद अभी तक इसलिये नही बांट पाये क्योंकि इनकी ‘‘साइज’’ और ‘‘नंबर’’ अलग अलग होते हैं. पर लगता है कि अखबार वाले इसका भी तोड़ निकाल कर अपने पाठकों को गारमेन्ट की कुछ खास दुकानों के कूपन बांट देंगे जहां से पाठक अपने अपने नाप के ‘‘अंडरगारमेन्ट’’ ले सकेंगे. अखबारों की इससे बढकर और दुर्गति भला क्या हो सकती है. इसका जवाब वे ही दे सकते हैं जो प्रतिस्पर्धा के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार हैं.

लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क  09424959520 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है

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0 Comments

  1. Haresh Kumar

    October 6, 2010 at 8:48 pm

    इस स्थिति के लिए भी वे प्रकाशक ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने ऐसे हालात पैदा किए। उन्हें सिर्फ अपने व्यापार से मतलब है। कंटेंट जाये भांड़ में। एक समय ऐसा बी था जब लोग अखबार को समूह में पढ़ा करते थे। और मेरे जैसे कई लोगों ने तो अखबारों को पढ़कर ही वर्तनी को जाना। यह हकीकत है। तब बिहार में आर्यावर्त अखबार का बोलबाला था। नवभारत टाइम्स भी वहां से छपता था। अब न वो बात रही ना ही अखाबर निकालने का उत्साह। आगे क्या होगा पता नहीं।

  2. rupesh gupta , dabra

    October 6, 2010 at 9:04 pm

    sir aapne jo likha hai bahut badhiya likha hai . aapne paper walo ki sahi kwality bata di hai . sir aap badhai ke paatr hai . sir aapko is ke liye bahut – 2 badhai .

    rupesh kumar gupta
    dabra , gwalior

  3. Virendra Singh

    October 6, 2010 at 9:33 pm

    Aaapne bazaarwad ka jo sahi chitran kiya hai, kabile tareef hai. Akhir mission kahi jane wali patrakarita ka vision kahan kho gaya.Vyavasay to ban gaya lekin vyavasayika gayab ho gayi. Ab hum wah parosate hain jo pathak chahata hai. Chatpati, sensational aur atiranjit khabaren. Pratisapardha honi chahiye thee content me, jan jagran me aur watchdog ki bhoomika me, Lekin ho raha hai ulta. Circulation badhane ki hod lagi huyi hai. Bhatt Ji aapko badhayi ki aapne is mudde ko uchhala. sambhav hai aane wale samay me pathkon ki size ka sarvekshan ho aur inke number ki bra aur panty gift ke roop me dee jaye.

  4. BIJAY SINGH

    October 7, 2010 at 4:02 am

    BAJAR hai bhaiya sab chalta hai.competition joron par hai,ab aise me roj nayi nayi schemes to ayengi hi na.aur phir ab pathak aur hawkers bhi gift ke aadi ho gaye hain,bina RK/HK ke akhbar ka maja kahan?

  5. jabalpurphoto

    October 7, 2010 at 5:55 am

    aap se accha is baat ko koun bata sakta hi
    kyonki is swikarokti ka dam jabalpur ki kisi bhi swayambhoo top me nahi hi
    aakhi kar sab ki dukane chal rahi hi koi garden ke contrect leta hi to koi zameen ki dalali me vyast hi koi neta ya officer se mahina aap nirvivad rahe hi ya mujh se accha koi nahi jaan saka tabhi to aaj aap swasth jivan ji rahe hi baki ko ekh lijiye haram ki kamai se ilaj karwa rahe hi
    aap yoon hi likhte rahiye main jaroor aapka samrthn karta rahoonga
    jabalpurphoto

  6. sanjay mandla wala

    October 7, 2010 at 6:07 pm

    abi to kya
    ruko thode din aur……………..

    abi to bra n painty hi de rahe hai
    vo din b aane wala hai jab inko pahnne wali b gift mei denge ye news paper wale.

    sachhi

    dekh lena k sanjay sach bola tha

  7. rakesh pandey

    October 7, 2010 at 6:47 pm

    patrakarita bazaarwaad me dab gai hai. media corporate jagat ki kathputli ban gai hai. ab yah proffession ho gaya hai. kuchh logon ke liye ye paisa banane ka mission ban gaya hai.

  8. Hemant Tyagi(Journalist) Ghaziabad

    October 7, 2010 at 9:53 pm

    woh din bhi door nahi hai jab patrakaro gali gali ghoom kar aawaz lagakar subji waale k Andaaz mei kahna hoga khabar chapwa lo khabar.Ek zamana tha jab kisi ki khabar ya interview chaapte they to woh aadmi khush hota tha.Aaj akhbaaron ki prati spardha ne sab kuch khatam kar diya hai.Agar ye hi haalat rahi to Under Garments K baad Rozana Nirodh, Dypers,and sanitary napkins bhi pathakon ko diye jaayege akhir circulation ka Maamla hai.

  9. satish singh

    October 7, 2010 at 10:57 pm

    dear chaitanya bhatt ji

    today media is not the guard of democracy.it has transformed into the new corporate house.and corporate understands only one thing profit at any cost.and the biggest shame is the ambition of youth to become a journalist.they think being journalist thay also can bring revolution in socity against the evils of society.but when they enter they find themself into the biggest evil of society

  10. satish pranami

    October 8, 2010 at 1:27 am

    bilkul sahi kaha aapne. sab jagha ye hi halat hai. yaha meerut me bhi HT,DJ aur AU me galakat spardha machi hai. HAWKRO aur agency holdero ki balle balle ho rahi hai.

  11. naresh

    October 8, 2010 at 5:25 am

    चैतन्य भट्ट जी मैंने आपकी न्यूज़ पढ़ी. न्यूज़ के शीर्षक से लग रह था की वास्तव में किसी अखबार ने ऐसी गन्दी हरकत की होगी. लेकिन खबर पढने के बाद में मुझे आपकी सोच पर शर्म आने लगी. कल्पना करनी चाहिए, लेकिन इतनी बदसूरत कल्पना आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार को शोभा नहीं देती. अगर कल्पना ही करनी हैं तो देश के लिए कुछ सुन्दर कल्पना करिये जिससे पढ़ने वाले को भी शर्म नहीं आये. अब: आप से निवेदन हैं की भविष्य में इस टाइप की बेहूदा कल्पना नहीं करें, ये सस्ती लोक प्रसिद्धि पाने का आसान तरीका हैं और कुछ नहीं. [b][/b][b][/b]

  12. vasundhara

    October 9, 2010 at 5:02 am

    chetan ji aap yadi kisi samachar patr ki vichardhara se ya us samchar ki visayvastu se santusth nahi hai to aap aun samachar patro ko na to padha kigeye or na he un samchar patro ke purvaanuman ka kasht uthaye .
    yadi aap jese varesth patrkaar is taraha ke samchar patro ki kalpan karege to aage aane vale pede ka leya aap majak ka patr bankar najar aayege.

  13. ambuj sharma

    October 9, 2010 at 10:32 pm

    भट्ट जी ,
    एक समय वह भी था जब जनसत्ता को अपने पाठको के लिए ये अपील छापनी पड़ी थी कि वह उनका अखबार मिलजुल कर पड़ें और आज अगर ये हालत है तो इसके जिम्मेदार हम सभी हैं ! एक तो टी वी के चेनल्स….. जो — सबसे पहले मै, सबसे तेज मै ,सबसे ज्ञानी मै, सबसे ऊपर मैं , ये जो येन – केन – प्रकारेंण सबसे आगे भागना चाहता है और दुसरे….. अखबार के मालिक लोग जिनकी नजर में आज घोडे और गधे का फर्क ही न रह गया हो तो कोई क्या कर सकता है उसे तो बस पाठक संख्या बड़ाने की चिंता है ! इस तरह की गलत परम्परा के खिलाफ आज कौन बोल या लिख रहा है.
    अम्बुज शर्मा , उत्तराखंड ,०९७६०१३४६६५

  14. Manpreet

    October 11, 2010 at 1:14 am

    are siraap jaise budhijivi se is parkar ke comment aache nahi laghte

  15. brth

    October 11, 2010 at 9:28 am

    Yashwant g,

    Ab to Shayad Bra & Panti ke Saath Kuch Aur ????????? Bhi Milne lage to ashchrya ki baat nahi hai may be Bra & Panti Wali

  16. GUDDU NAMDEO

    October 12, 2010 at 4:36 am

    bhaya, ma apka purana shathe hu. apka lakhe padkar acha laga

  17. vikash

    March 29, 2011 at 4:44 pm

    shyai likah app ne

  18. शुधाकर शुक्ल

    November 18, 2014 at 12:32 am

    भट्ट सर आपने सही कहा समाचार पत्र मे अब वैसी पाठक सामग्रि नही लिखी जो असर कारि हो.. ईसि लिये अखबार मालिक प्रसार संख्या बढने के लिये तरह तरह के प्रलोभन देते है पत्रकरीता अब हंसी का खेल हो गयी है इस खेल मे सम्पादक की ही कमी है

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