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अखिल भारतीय सम्‍मेलन में बिखरा अवधी का रंग

: येऊर में जुटे कई देशों के लोग : मैं आ गया हूं बहुत दूर/ लेकिन नहीं हूं मजबूर/ महसूस हुआ मुझे पूरे हिंदुस्थान में हैं फूल/ इसे मैंने हमेशा के लिए कर लिया कुबूल/ चाहे दूर रहूं या नजदीक/ मैं हमेशा रहूंगा उनके करीब। यह प्यारी भावना सात समंदर पार के हिंदी-हिंदुस्तान प्रेमी अदम महमत येस्केइमी की है। येस्केइमी भले ही चाड गणतंत्र (दक्षिण अफ्रीका) के नागरिक हैं, पर उनका दिल हिंदुस्तानी है। उनका यह दिल ठाणे के येऊर स्थित स्वानंद बाबा आश्रम में आयोजित अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन में एकदम अवधी रंग में रंग गया।

: येऊर में जुटे कई देशों के लोग : मैं आ गया हूं बहुत दूर/ लेकिन नहीं हूं मजबूर/ महसूस हुआ मुझे पूरे हिंदुस्थान में हैं फूल/ इसे मैंने हमेशा के लिए कर लिया कुबूल/ चाहे दूर रहूं या नजदीक/ मैं हमेशा रहूंगा उनके करीब। यह प्यारी भावना सात समंदर पार के हिंदी-हिंदुस्तान प्रेमी अदम महमत येस्केइमी की है। येस्केइमी भले ही चाड गणतंत्र (दक्षिण अफ्रीका) के नागरिक हैं, पर उनका दिल हिंदुस्तानी है। उनका यह दिल ठाणे के येऊर स्थित स्वानंद बाबा आश्रम में आयोजित अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन में एकदम अवधी रंग में रंग गया।

गोस्वामी तुलसीदास, अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, रहीम, कबीर, कुतुबन व मंझन की भाषा अवधी के कुछ शब्दों का उच्चारण कर येस्केइमी ने वहां पर मौजूद लगभग 2000 भाषा प्रेमियों को मोहित कर दिया। चाड गणतंत्र के एक अन्य हिंदी प्रेमी अदुम इदरीस अदुम की कविता में प्यार, सपने, जानेमन, तमन्ना व दुल्हन की बात थी- जाने मन तुम हमेशा मेरे ख्यालों में आती हो, मेरी यादों में आती हो/ मेरी तमन्ना है कि तुम्हें जीवनसाथी बनाऊं/ तुम्हें अपनी दुल्हन बनाऊं। याराना एसोसिएशन के जरिए हिंदुस्थान-चाड गणतंत्र के बीच सांस्कृतिक भाषागत संबंध मजबूत कर रहे इदरीस भी मन से पक्के हिंदुस्तानी हैं तो नेपाल से पधारे लोकनाथ वर्मा राहुल अवधी संस्कृति में रचे बसे नजर आए। इसी तरह येऊर हिल्स पर अवधी ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघते हुए कई अलग-अलग दिलों को एक कर दिया।

दीप प्रज्ज्‍वलन व अशोक टाटंबरी (फैजाबाद) की सरस्वती वंदना से प्रारंभ सम्मेलन में प.पू. स्वानंद बाबा सेवा न्यास के मुख्य न्यासी प्रेम शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अवधी के संरक्षण, संवर्द्धन हेतु भरसक प्रयास करने का वचन दिया। अवधी की चुनौतियां पर परिचर्चा के अध्यक्ष के रूप में पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी ने कहा कि अवधी भाषा की ताकत पहले ही साबित हो चुकी है। गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी को समृद्ध भाषा का दर्जा दिया था।

अवध सम्‍मेलन

अवधी अकादमी के अध्यक्ष जगदीश पीयूष ने कहा कि 1976 में अमेठी स्थित मलिक मोहम्मद जायसी की मजार से शुरू हुआ अवधी जागरण आंदोलन देश-विदेश भ्रमण करते हुए 36 साल बाद ठाणे के स्वानंद आश्रम तक आ पहुंचा है। इस प्रकार के आंदोलनों ने काफी शक्ति मुहैया कराई है। उन्होंने यह भी कहा कि मेरे विचार से प्रेम शुक्ल को विश्व अवधी सम्मेलन का नेतृत्व भी करना चाहिए।

अवध ज्योति के संपादक डॉ. राम बहादुर मिश्र ने अवधी गद्य के सूने कोने को चुनौती मानते हुए अपनी थाती को संभालने की बात कही। अवधी विकास संस्थान के अध्यक्ष एड. विनोद ने कहा कि आज कई अवधी सीरियल आ रहे हैं। भाषा संस्कृति नहीं बचेगी तो देश कैसे बचेगा। इसलिए सभी को मिलजुल कर प्रयास करना है। प्रवासी संसार के संपादक राकेश पांडेय ने सवाल उठाया कि अवधी माटी के कलाकार अवधी का खाते हैं पर गाते हैं भोजपुरी की। क्यों वे अपनी बोली व गायन को अवधी कहने में शर्म महसूस करते हैं? सुप्रसिद्ध अवधी विद्वान डॉ. आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने कहा कि हजारों साल से अवधी देश की साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक रही है। अवध क्षेत्र के ही महावीर प्रसाद द्विवेदी व निराला सरीखे साहित्यकारों ने ही हिंदी के वर्तमान स्वरूप का निर्माण किया था।

उर्दू रोजनामा हिंदुस्तान के संपादक सरफराज आरजू ने अवधी को गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक बताया तो नई दुनिया के रीजनल एडीटर पंकज शुक्ल ने कहा कि आज का जमाना इंटरनेट का है, इसलिए अवधी के समग्र साहित्य को इंटरनेट पर लाना होगा,  तभी यह समाज में अपनी जड़ें तेजी से जमा पाएगी। परिचर्चा में नवनीत के पूर्व संपादक डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी, साहित्यकार, डॉ. आशारानी लाल, अभियान के अध्यक्ष अमरजीत मिश्र व दोपहर के संपादक निजामुद्दीन राइन व सिटी चैनल (कानपुर) के प्रमुख संवाददाता सौरभ ओमर ने भी शिरकत की। सम्मेलन में यूपी भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी ने भी सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन अवधी सम्मेलन, मुंबई के संयोजक राजेश विक्रांत ने किया।

लोक काव्य संध्या में देवमणि पांडेय के कुशल संचालन में द्वारिका प्रसाद त्रिपाठी बृजनाथ, डॉ. अशोक गुलशन (बहराइच), डॉ. रजनीकांत मिश्र, मुरलीधर पांडेय, राम प्यारे सिंह रघुवंशी, कमलेश पांडेय तरूण, उबैद आजम आजमी, देवराज मिश्रा, आशीष पांडेय, लक्ष्मी यादव, रास बिहारी पांडेय, जवाहर लाल निर्झर, रुस्तम घायल, शीतल नागपुरी व रवि यादव ने अपनी विविध रचनाएं प्रस्तुत की।

जमाने गुजर जाते हैं, सदिया बीत जाती हैं, पर कहते हैं कि अपनी बोली बानी की खुशबू कभी नहीं बदलती। अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा बढ़ती जाती है। धर्म के साथ जब भाषा, कविता व संस्कृति मिल जाती है तब अखिल भारतीय अवधी सम्मेलन सरीखे ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जो सदा आपको अपनी बोली-बानी की याद दिलाते रहते हैं।

कार्यक्रम में विकलांग की पुकार के अभय मिश्र के अतिथि संपादन में प्रकाशित अवधी गौरव विशेषांक तथा अनिल गलगली संपादित अग्निशिला मासिक पत्रिका के नए अंक का विमोचन प.पू. स्वानंद बाबा सेवा न्यास के प्रमुख पं. दुर्गा प्रसाद पाठक द्वारा किया गया।

इसमें राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) के प्रमुख संवाददाता के. बख्श सिंह, सुवर्णस्पर्श जेम्स एंड ज्वेलरी के पार्टनर विमल पटेल, मुंबई कांग्रेस के महासचिव जाकिर अहमद, अर्थकाम डॉट काम के संपादक अनिल सिंह, मेट्रोकार्ड्स एंड हालिडेज के ऑलिवर स्टेंस, मुंबई मित्र / वृत्त मित्र समाचार पत्र के संपादक अभिजीत राणे, उद्योगपति बबलू पांडेय, लेखिका डॉ. कृष्णा खत्री, पत्रकार रवि कुमार राठौर (दैनिक सवेरा), लाइव इंडिया के रवि तिवारी, गायक रवि त्रिपाठी, प्रभाकर कश्यप, पत्रकार शेषनारायण त्रिपाठी, श्रीश उपाध्याय, उदयभान पांडेय, संगीतकार शिवम् पांडेय, एनडी टीवी के वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह, सिद्धि विनायक मंदिर के पूर्व ट्रस्टी उदय प्रताप सिंह, नवभारत टाइम्स की पत्रकार कंचन श्रीवास्तव व रीना पारीक, वीमेंस वेल्फेयर फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री अर्चना मिश्र (पुणे), विकलांग की पुकार के संपादक सरताज मेहदी, डॉ. रमाकांत क्षितिज, डॉ. वेद प्रकाश दुबे, पत्रकारिता कोश के संपादक आफताब आलम, लेखिका-उद्घोषिका सलमा सैयद, साहित्यप्रेमी महेश शर्मा, अमरदेव मिश्रा, जगदंबा प्रसाद पाठक समेत साहित्य, पत्रकारिता, समाजसेवा व कला क्षेत्र के अनेक महानुभाव उपस्थित रहे।

आफताब आलम की रिपोर्ट.

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