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पॉवर-पुलिस

अच्छा, आप आईपीएस हैं, पहले क्यों नहीं बताया?

नूतनजीमेरठ आने से ठीक पहले मैं अपने पति अमिताभ जी के साथ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के कार्यालय गयी थी. हमें वहाँ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के जन सूचना अधिकारी से मिलना था. उसके पीछे पृष्ठभूमि यह थी कि पिछले साल जून में अमिताभ मेरा पटना तक का एक टिकट वापस करने गोमतीनगर रेलवे स्टेशन गए थे.

नूतनजीमेरठ आने से ठीक पहले मैं अपने पति अमिताभ जी के साथ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के कार्यालय गयी थी. हमें वहाँ डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के जन सूचना अधिकारी से मिलना था. उसके पीछे पृष्ठभूमि यह थी कि पिछले साल जून में अमिताभ मेरा पटना तक का एक टिकट वापस करने गोमतीनगर रेलवे स्टेशन गए थे.

वे उस समय आईआईएम लखनऊ में ही पढ़ रहे थे और उनके साथ कोई पुलिसवाले तो होते नहीं थे, नतीजतन वे अकेले ही स्टेशन गए थे. मैं उस समय पटना गयी हुई थी इसीलिए वही जानती हूँ जो इन्होंने मुझे बताया. इनके कहे के मुताबिक वहाँ टिकट-खिड़की पर जो बाबू थे वे आम जनता से बिलावजह खराब व्यवहार कर रहे थे. जो भी उनसे कुछ पूछता या निवेदन करता वे उससे ही उलझ पड़ते. अमिताभ जी की बारी आने पर उनसे भी इसी तरह की कुछ उटपटांग ढंग से बात की. टिकट वापस तो नहीं ही किया, ऊपर से कुछ ऐसी बातें कह दी जो इन्हें काफी बुरी लगीं. इन्होंने इस बारे में तुरंत वहीँ रेलवे स्टेशन से ही एके सिंह, डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे से मोबाइल पर बात की और सारी बात बताते हुए उनसे मिलने का समय माँगा. चूँकि उस टिकट बाबू से कई सारे लोग नाराज़ थे, अमिताभ जी ने जब एक दरख्वास्त लिखा तो वहाँ उपस्थित पांच-छह लोगों ने मिल कर उस पर स्वतः ही दस्तखत कर दिए. इन लोगों के साइन किये गए प्रार्थना पत्र को लेकर इन्होंने एके सिंह को मिल कर वह आवेदन दिया. एके सिंह ने मौखिक तो कहा कि जांच कर के कार्रवाई की जायेगी, पर लगता है उनकी मंशा कुछ और ही रही होगी. इसीलिए एक लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

जब मैं पटना से लौट कर लखनऊ घर आई तो मुझे यह सारी बात मालूम हुई. मैंने इन्हें कहा कि कहाँ बिना-मतलब की बात उठा कर चल देते हैं. आखिर कहाँ-कहाँ के मामलों में पीछे पड़े रहेंगे. मैंने यह भी समझाया कि चलिए बात खतम हो गयी पर चूँकि ये जिद्दी आदमी हैं, इसीलिए मेरी बात मानने से इनकार कर दिया. अब इनका टारगेट वे टिकट बाबू नहीं बल्कि डीआरएम एके सिंह थे. इनका यह कहना था कि यदि एके सिंह ने मेरी पूरी बात सुन कर उस टिकट बाबू को डांट-फटकार भी दिया होता तो मुझे बात आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा थी, पर एक तो उन्होंने मिलने पर भी सही रेस्पांस नहीं दिया और लगता है कि अब गलत ढंग से उसे बचाने पर लगे हैं. इसीलिए मैं तो इस प्रकरण का अंत तक पीछा करूँगा.

इसके बाद इन्होंने तुरंत आरटीआई के अंदर डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे के लिए एक आवेदन बनाया कि उनकी शिकायत किस अधिकारी को प्रेषित की गयी, किसके द्वारा जांच की गयी, जांच में क्या निष्कर्ष निकले और उनके आधार पर क्या कार्रवाई हुई. आश्चर्यजनक रूप से इस आरटीआई का कोई उत्तर नहीं आया. तब इन्होंने प्रथम अपीलीय अधिकारी को चिट्ठी लिखी. वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आया. तब एक तरफ तो केन्द्रीय सूचना आयोग, नयी दिल्ली को पत्र प्रेषित करके शिकायत किया और दूसरी तरफ रेलवे बोर्ड को भी इस पूरे घटनाक्रम से अवगत कराते हुए शिकायती पत्र भेज दिया. मैंने मना भी किया लेकिन एक बार जो बात इनके मन में बैठ जाती है, वह जल्दी जाती नहीं. इनका कहना था कि चूँकि हम लोग इसी तरह हर बात को चुपचाप वैसे ही मान लेते हैं, तभी हमारे देश में आम आदमी को इस तरह की तमाम समस्याएं आती हैं. यदि हर व्यक्ति अपने हक के लिए वाजिब तरीके से लड़ेगा तो स्थिति में निश्चित सुधार आएगा. खैर सुधार आएगा या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती पर इतना जरूर जानती हूँ कि यदि ये किसी चीज़ के पीछे पड़े हैं तो तब तक पीछे पड़े रहेंगे जब तक इनकी पूरी हिम्मत ही नहीं टूट जाए. और मुझे इनके इन सारे मामलों में साथ निभाना ही है.

डीआरएम कार्यालय से तो कोई पत्र नहीं आया पर रेलवे बोर्ड से जरूर किसी जांच के आदेश हुए. एक दिन अचानक डीआरएम कार्यालय के एक अधिकारी इनसे मिलने आये कि आपने रेलवे बोर्ड में जो शिकायत की है उसमें मुझे जांच सौंपी गयी है. मेरे सामने ही अमिताभ जी ने चार पन्ने का अपना लंबा-चौड़ा बयान लिख कर उस अधिकारी को दिया, जिसमें अपनी तमाम बातें लिखीं. यह बताया कि ना तो उनसे और ना ही अन्य तमाम लोगों, जिनके मोबाइल नम्बर उस प्रार्थना पत्र में दिए गए थे, से किसी प्रकार की कोई पूछताछ की गयी.

इस घटना को घटे भी अब लगभग तीन महीने बीत चुके हैं कि अब लगभग एक सप्ताह पहले केन्द्रीय सूचना आयोग से एक पत्र आया जिसमें इनके शिकायत का उल्लेख था. इसमें लिखा था कि अमिताभ के पत्र को एक शिकायत के रूप में लेते हुए आयोग डीआरएम, पूर्वोत्तर रेलवे कार्यालय के जन सूचना अधिकारी को निर्देशित करता है कि वह एक महीने के अंदर इन्हें पूरी सूचना उपलब्ध कराये. साथ ही यह भी कहा गया कि जन सूचना अधिकारी अब तक हुए विलम्ब के सम्बन्ध में भी अपना स्पष्टीकरण दें.

यह है हमारे डीआरएम कार्यालय जाने के पीछे की पृष्ठभूमि. जब मैं और ये डीआरएम कार्यालय पहुंचे तो पहले हम जन सूचना अधिकारी से मिले. उन्होंने एक अन्य अधिकारी, जो उनके कनिष्ठ थे और यह काम देखते थे, के पास भेजा. ये साहब भी असली सरकारी अधिकारी थे, सीधे मुंह बात नहीं करने वाले. उनकी बातचीत का ढंग ऐसा था कि इनकी जगह खुद मुझे ही बहुत गुस्सा आया. मैंने एक बार फिर जन सूचना अधिकारी से मिल कर आयोग के आदेश का अनुपालन करने की बात कही. उन्होंने अपने उस कनिष्ठ अधिकारी को बुलाया पर उस अधिकारी के बातचीत का अंदाज़ ऐसा था, जिसे देख कर अंदर से वितृष्णा के भाव जगे जा रहे थे. मैं सोच रही थी कि क्या ऐसे ही कुपात्र और घृणित किस्म के सरकारी अधिकारियों पर रेलवे की और सरकार की छवि सुधारने की जिम्मेदारी दी गयी है, जिन्हें आम पब्लिक से बात करने तक की तमीज नहीं है, बाकी काम की कौन कहे. मैंने देखा कि जल्दी मेरी और उस अधिकारी की बहस होने लगी और उसने कोई ऐसी बात कह दी कि इन्हें भी गुस्सा आया और इन्होंने उसे डांटा. इस पर तैश खा कर उस अधिकारी ने कहा कि अभी आरपीएफ यानी रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स को बुलाता हूँ. इस पर मेरे पति से रहा नहीं गया और उन्होंने अपनी आइडेंटीटी बतायी.

यही वह मुख्य बात है, जिसे मैं बताना चाहती हूँ. मेरे पति के बारे में जानते ही जन सूचना अधिकारी, जो अब तक शांत भाव से यह पूरा तमाशा देख रहे थे, एकदम से सक्रिय और चौकन्ने हो गए. उन्होंने छूटते ही कहा- “अरे, आपने पहले क्यों नहीं बताया?”. फिर कहने लगे कि आप तो जिस पद पर हैं उस पर अपनी बात बताने पर लोग ऐसे ही आपका सारा काम कर देंगे. फिर उन्होंने चाय-कॉफी के लिए पूछना शुरू कर दिया और अंत में ठंडा पानी पिला कर ही माने. यह बात तो मैं भी जानती हूँ और अमिताभ जी भी कि उनका पद ऐसा है जो बहुत सारे काम ऐसे ही आराम से हो जाते हैं. पर मेरा और उनका मुख्य मुद्दा भी यही है कि क्या इस देश में और यहाँ की व्यवस्था में हर आदमी को अपना कोई भी काम करवाने के लिए कुछ ना कुछ होना जरूर है? यानी जो इस तरह का कुछ नहीं है, अधिकारी नहीं है, नेता नहीं है, पत्रकार नहीं है, पैसे वाला नहीं है, क्या वह इस देश का नागरिक ही नहीं है? क्या उसे किसी भी सरकारी दफ्तर में जाने का हक ही नहीं है?

इस तरह के सभी अनुभवों से हमें सोचना पड़ेगा और “हम फलां व्यक्ति हैं” की सोच से हम सभी लोगों को आगे निकलना होगा. यह सही है कि ताकतवर और सामान्य व्यक्ति मे अंतर होगा पर यह अंतर इतना अधिक और इतना घृणित नहीं हो कि आम आदमी इस व्यवस्था पर पूरी तरह विश्वास ही खो बैठे. ऐसे हालात किसी भी तरह से अच्छे नहीं हैं. अमिताभ जी तो धुन के पक्के हैं और अपनी भेजी गयी दरख्वास्तों पर तब तक लगे रहेंगे जब तक उनकी अंतिम परिणति नहीं हो जाती है, पर हम सभी को यह सोचना होगा कि क्या कोई आदमी अपनी आइडेंटीटी बताया तभी उसकी इस देश के सरकारी दफ्तरों में पूछ है अन्यथा नहीं?

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. Abhishek sharma

    March 22, 2011 at 10:50 am

    bapu ka bharat..

  2. मदन कुमार तिवारी

    March 22, 2011 at 11:11 am

    नूतन जी अब आप बतायें , अगर कोई ऐसे सरकारी कर्मचारी को गाली देता है , मारता है तो वह अराजकता है , गुंडागर्दी है । अमिताभ जी ने एकदम सही कहा , उनकी और अन्य लोगों ने जिन्होने दस्तखत किये , कोई निजी दुश्मनी तो थी नही , उस डीआरएम को ईतनी तो समझ होनी चाहिये थी , बुलाकर डांटने की भी उस नीच ने जहमत नही उठाई । खुद तो परेशानी में पडा हीं , अमिताभ जी के भी समय को बर्बाद किया , बस यही बातें है , जिससे इतना गुस्सा आता है की भरपेट गाली देने और मारने का मन करता है । अभी दिल्ली से आ रहा था नरेन्द्र सिंह एस एस न्यू देलही रेलवे स्टेशन है , सरदaार जी है । उसको महाबोधी के बबaार-बार लेट होने के समय को बढाने के कारण गुस्से में चोर -चोट्टा सब बोला , यह भी कहा की बेचकर खा जाओ देश को , इतेफ़ाक से एक बहादुर महिला भी पहले से वहां थी , वो भी उसको किडा -मकोडा बोल चुकी थी। खैर अमिताभ जी आपको भी एक सलाह है अब आप पुन: नौकरी पे लौट आये हैं , अगर इस तरह का कोई मामला आयेगा , जहां सरकारी कर्मचारी के ससaाथ कोई मारपीट करे तो , मारपीट करने वाले का भी केस दर्ज किजियेगा , सिर्फ़ सaकaारी कर्मचारियों का नही ।

  3. anil

    March 22, 2011 at 11:13 am

    यह है हमारे देश की महान नौकरसाही का असली रूप

  4. anil

    March 22, 2011 at 11:16 am

    यह है हमारे देश की महान नौकरसाही का असली रूप

  5. Ajit

    March 22, 2011 at 12:11 pm

    Amitabh and Nutan Thakur, Andhere me ek diya jo lakho aise diyo ko jalayenge…..

  6. Ranjan

    March 22, 2011 at 12:32 pm

    I salute the spirit of Mr Amitabh.

  7. Rajendra mishra

    March 22, 2011 at 4:02 pm

    agar ham galat ke khilaf thoda hi pratirodh karne ki jahmat karen

    to vyvashtha sudharne ki achi pahal hogi

  8. vijay srivastava

    March 23, 2011 at 5:46 am

    nootan ji, main e tv ka darbhanga se samvaaddata hoon. ec rail ke gm k.k srivastava se jab bhi darbhanga aaye humne rail se sambandhit mithilanchal ki kai mahatwapoorna samasyaon ko uthane ka prayas kiya. lekin aashcharya janak dhang se humne ye paaya ki unko na to samasyaon ki zyada jankari hai aur na hi we janne me ruchi rakhte hain. unke mathat samastipur drm office ke log bhi waise hi hain.
    jab bhi hum kisi adhikari-karmi se samasya ke bare me poochte hain, jawab wahi hota hai, aap patrakar hain, aapka kaam to ho hi jayega.
    sach me yehi pravirti hai rail ki. hum aapki ladai me aapke sath hain. kyonki identitiy batakar samasya ka samadhaan hone lage to 90 feesadi logon ki samasya ka samadhaan nahi hoga.
    vijay srivastava, reporter, e tv news, darbhanga

  9. M.K.Taneja

    March 23, 2011 at 7:16 am

    Nutan ji,

    This is the real and exact picture of today’s Democratic India.
    Your real life experiences reflect the handicap situation of a comman man.
    We all shall unite and start searching the solutions.

    M.K.Taneja
    KMMPL

  10. Rahul Kumar Thakur

    March 23, 2011 at 10:18 am

    kya yahi hai bharat ki apni mahanta.

  11. प्रशान्त (PD)

    March 23, 2011 at 11:24 am

    देश मेरा रंगरेज ये बाबू..

  12. सात्यकी यादव

    March 23, 2011 at 4:38 pm

    मैंने भी एक आर टी आई भेजी है और एक महीना हो गया लेकिन अभी तक जवाब नहीं आया.

  13. Rajnish

    March 26, 2011 at 5:14 pm

    Ground level reality hai yah. System me baithe adhisankhya log bina bhay athva lobh ke thik se bat bhi nahi karte.

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