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अतुल माहेश्वरी – मजदूर संपादक, मजबूत दोस्त

[caption id="attachment_19096" align="alignleft" width="179"]अतुल माहेश्वरीअतुल माहेश्वरी[/caption]अभी तक विश्वास नहीं हो रहा कि अतुलजी चले गए. अमर उजाला के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक रहे अतुल माहेश्वरी का लम्बी बीमारी के बाद गुड़गांव के एक अस्पताल में निधन की सूचना से मैं ही नहीं, हर कोई हतप्रभ है. हिंदी पत्रकारिता में आधुनिक प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटरों, सस्ती छपाई, पेनलेस-पेपरलेस तकनीक, प्रतिदिन पाठकों के लिए एक नये विषय पर केन्द्रित समाचारपत्र के संस्करण, मूल्ययुद्ध के दाव-पेंचों और कारपोरेट संस्कृति की शुरुआत करने वाले दो युवाओं को मैंने करीब से देखा और जाना है.

अतुल माहेश्वरी

अतुल माहेश्वरी

अभी तक विश्वास नहीं हो रहा कि अतुलजी चले गए. अमर उजाला के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक रहे अतुल माहेश्वरी का लम्बी बीमारी के बाद गुड़गांव के एक अस्पताल में निधन की सूचना से मैं ही नहीं, हर कोई हतप्रभ है. हिंदी पत्रकारिता में आधुनिक प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटरों, सस्ती छपाई, पेनलेस-पेपरलेस तकनीक, प्रतिदिन पाठकों के लिए एक नये विषय पर केन्द्रित समाचारपत्र के संस्करण, मूल्ययुद्ध के दाव-पेंचों और कारपोरेट संस्कृति की शुरुआत करने वाले दो युवाओं को मैंने करीब से देखा और जाना है.

उन दोनों युवाओं के साथ काम करने का मुझे सौभाग्य भी मिला है. उनमें एक थे तब बरेली अमर उजाला निकाल रहे अतुल माहेश्वरी और दूसरे आगरा अमर उजाला के प्रकाशन में अपने महान पिता स्वर्गीय डोरी लाल अग्रवाल तथा बरेली में बड़े भाई अशोक अग्रवाल का हाथ बंटा रहे अनिल अग्रवाल. अतुल जी, मैं उन्हें इसी नाम से संबोधित करता था, से मेरा परिचय प्रसिद्ध पत्रकार, साहित्यकार और कवि डॉ. वीरेन्द्र डंगवाल ने तब कराया जब डंगवाल जी अमर उजाला की पत्रिका का संपादन कर रहे थे. सरकारी नौकरी में आने से पहले मैं  दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं सरिता-गृह शोभा और मुक्ता का विभागीय लेखक, बाद में मित्र प्रकाशन की प्रसिद्ध पत्रिकाओं माया, मनोरमा तथा मनोहर कहानियों के दिल्ली ब्यूरो में वरिष्ठ उपसंपादक था और सूर्या, ब्लिट्ज, कर्रेंट, नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और नंदन आदि में पार्ट टाइम लेखन भी करता था.

मैं कभी नहीं भूल सकता कि अतुल जी ने किस परिश्रम से अमर उजाला के सहयोगियों की एक समर्पित टीम खड़ी की और किस तरह से उन्हें अपनी नयी सोच का संस्थान हित में उपयोग किया. देखते देखते अमर उजाला में हर तरह के स्वचालित उपकरण और मशीने स्थापित हो गए. हम अक्सर देखते थे कि कभी एक विभाग तो कभी दूसरे विभाग में, अतुल जी बिना थके अपने साथियों और सहयोगियों को प्रेरित करते. समस्याएं सुलझाते और ज़रूरी होने पर खुद भी कूद पड़ते. उनके छोटे भाई राजुल माहेश्वरी कॉलेज में थे और वह भी समय निकाल कर किसी न किसी विभाग में कुछ सीखते समझते नज़र आते.

अतुल जी की एक आदत थी. वह अखबारी कागज़ (न्यूज़प्रिंट) से बने पैड पर अपने नीले डॉट पेन से बहुत ही छोटी चिट्ठियाँ लिखते थे. ये चिट्ठियाँ अमर उजाला की टैक्सी के जरिए बहुत सुबह मुझे अखबार के साथ मिलती थीं. शायद १९८६ के आसपास की बात है, अतुल जी के बजाय उनके छोटे भाई राजुल की चिट्ठी डाक से मिली, ‘अतुल जी से मेरठ में बात कर लें, तुरंत.’ उसी दिन डॉ. वीरेन्द्र डंगवाल का सन्देश मिला कि बरेली आकर उनसे बात कर लूं. पता चला मेरठ से अमर उजाला का तीसरा संस्करण शुरू होना था. अतुल जी अपने विश्वस्त दोस्तों को वहाँ चाहते थे.  मैं वीरेन्द्र जी के साथ, सरकारी नौकरी से दस दिन का अवकाश लेकर मेरठ पहुँच गया. वहां कचहरी के पास एक तीन बेड रूम के फ्लैट में हम सभी ज़मीन पर गद्दे बिछा कर सोते थे, कोई जान ही नहीं सकता था कि कौन क्या है.

एक नये अखबार को खड़ा करना आसान काम नहीं होता. मगर अतुलजी इस विधा के माहिर थे. उनकी तकनीक, उस ज़माने के हिसाब से आधुनिकतम थी. वह छपाई, सामग्री, विज्ञापन, एजेंटों, हाकरों, स्टाफ, प्रसार और अखबार के प्रशासन पर बराबर ध्यान देते थे. डोरीलाल जी के छोटे बेटे अजय अग्रवाल न्यूज़ एजेंसियों के तमाम समाचारों के प्रस्तुतिकरण पर नियंत्रण और निगाह रखते थे. डंगवाल साहिब समाचार पत्र के एडिटोरिअल कंटेंट, डिस्प्ले, ले आऊट तथा वर्तनी जैसे बारीक मुद्दों को देखते थे और मुझे अमर उजाला की प्रतिदिन प्रकाशित होनेवाली पत्रिकाओं की सामग्री बनानी तथा सम्पादित करनी होती थी. तब अमर उजाला के प्रधान संपादक अशोक अग्रवाल आगरा से अक्सर आते रहते थे और सारी गतिविधियों की बारीकी से समीक्षा करते. खुद अतुल जी के पिता तथा अमर उजाला के दूसरे संस्थापक मुरारीलाल माहेश्वरी भी जीवित थे और ख़ास तौर से प्रसार तथा मुद्रण में मार्ग दर्शन करते थे.

अमर उजाला, मेरठ पूरी तरह से जैसे ही आत्म निर्भर हुआ, अतुल जी अपने साझीदार भाइयों के साथ दूसरे प्रांतीय संस्करणों के प्रकाशन में जुट गए. अमर उजाला की ही तरह उस समय दैनिक जागरण भी बेहद तेज़ी से विस्तार और नये प्रयोग कर रहा था. अतुल जी की कार्य प्रणाली इस मामले में बिलकुल स्पष्ट थी. वह अपने अखबार में अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वियों द्वारा उठाये जानेवाले हर बिंदु का अध्ययन करके उसे कोई न कोई जगह ज़रूर दिलाते थे, उनकी खासियत थी कि वह क्षेत्रीय खबरों को किसी भी तरह नज़रंदाज़ नहीं होने देते थे. भारतीय किसान यूनियन और उसके मुखिया चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को सबसे पहले अतुल जी के कहने पर अमर उजाला मेरठ ने ही तब ख़बरों की सुर्खियों का महानायक बनाया था, जब टिकैत का नाम भी कोई नहीं जानता था और वह कुछ किसानों के साथ मुज़फ्फरनगर में छोटा सा आन्दोलन करने में लगे थे. एक तरह से जनता की नब्ज़ पर हाथ रखना और किसी भी खबर को नया मोड़ देना उनके बांये हाथ का खेल था.

हिमाचल प्रदेश के ज्वालामुखी मंदिर में अपनी पत्नी और पुत्र के साथ अतुल माहेश्वरी.

हिमाचल प्रदेश के ज्वालामुखी मंदिर में अपनी पत्नी और पुत्र के साथ अतुल माहेश्वरी.

वह एक ऐसे संपादक थे जो मजदूर की तरह काम करना जानते थे. उनकी एक और खासियत थी, किसी भी कद और पद के राजनेता के सामने बिना झुके बराबरी के स्वर में बात करना और वक़्त पड़ने पर दोस्तों के बेहिचक काम आना. कई मौकों पर बाद में मैंने गौर किया कि वह काम के आदमी को हर कीमत पर अपने साथ रखने की कोशिश करते थे. उनके आकस्मिक निधन पर मुझे उनके कुछ विचार भी याद आ रहे हैं.

वह कहते थे, ‘टीवी के विस्तार से अखबारों को तब तक खतरा नहीं है जब तक वह टीवी माध्यमों की कमियों और कमजोरियों से अपने उत्पादों को अपडेट रखेंगे. साक्षरता के विस्तार का अभी और लाभ अखबारों को मिलना है. अभी प्रकाशन और मुद्रण के क्षेत्र में कई क्रांतियाँ होंगी और उनका भी लाभ मुद्रित पत्रकारिता को ही मिलना है. यह पत्रकारिता किसी संयंत्र, बिजली और अन्टीना पर निर्भर तो है नहीं. अभी कई छोटे नगरों का विकास हो रहा है, आबादी भी बढ़ रही है, सो इसका भी फायदा अखबारी जगत को ही मिलेगा.’ अनिल अग्रवाल के बाद अतुल महेश्वरी का निधन अमर उजाला के साथ डा. अशोक कुमार शर्माही हिंदी पत्रकारिता के आरंभिक आधुनिकीकरण के दौर में दो महत्वपूर्ण स्तंभों के ना रहने के समान है. नयी पीढी को उनके जीवन से ज़रूर प्रेरणा लेनी चाहिए.

लेखक डा. अशोक कुमार शर्मा इन दिनों उत्‍तराखंड के मुख्यमंत्री के ओएसडी के रूप में कार्यरत हैं. डा. शर्मा 27 किताबें लिख चुके हैं. मौलिक लेखन के लिए इन्‍हें तीन राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिला हैं. वे ब्‍लागर हैं तथा 42 से ज्‍यादा ब्‍लागों से जुड़े हुए हैं. ये पत्रकारिता एवं पब्लिक रिलेशन से जुड़े देश भर के कई विश्‍वविद्यालयों तथा विद्यालयों में में विजिटिंग प्राध्‍यापक के तौर पर व्‍याख्‍यान दे चुके हैं.

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0 Comments

  1. Dr.Saood Husain

    January 7, 2011 at 3:21 pm

    I am really shocked to know the untimely and sad demise of your friend and a competent person Mr.Atul Maheshwari. It is a big loss to all in general and Hindi in particular. Truly Hindi journalism lost a pillar. Because very few people are honest devoted and dedicated,who did a lot for Hindi to be establish as a language of masses. His unending efforts created awareness among the people of our country. I have seen people are addict of his writing. Being your friend I extend my condolence to the bereaved family.

  2. Dr.Saood Husain

    January 7, 2011 at 3:39 pm

    I am really shocked to know the sad to know about untimely demise of your friend and competent person Mr.Atul Maheshwari. It is a big loss to all in general and Hindi in particular. Truly Hindi journalism lost pillar. Because very few people are honest,devoted and dedicated who did a lot for Hindi to be establish as a language of masses. His efforts create awareness among people of our country. I have seen people are addicted of his writing.

  3. Dr.Saood Husain

    January 7, 2011 at 3:40 pm

    I am really shocked to know the sad to know about untimely demise of your friend and competent person Mr.Atul Maheshwari. It is a big loss to all in general and Hindi in particular. Truly Hindi journalism lost pillar. Because very few people are honest,devoted and dedicated who did a lot for Hindi to be establish as a language of masses. His efforts create awareness among people of our country. I have seen people are addicted of his writing.

  4. Ved Bhanu Arya

    January 7, 2011 at 7:56 am

    Respected Dr. Sharmaji
    Apne Atul ji ke bare me jo likha vo bahoot hi sateek tippadi hai. Maine jaha tak suna evam pada hai uske anusar atulji ne patarkarita ke liye bahoot karya kiya jo kabhi bhi bhulaya nahi ja sakta. Unki kami pura patrkarita jagat kabhi bhi pura nahi kar sakta.

  5. ramesh kumar singh

    January 5, 2011 at 12:50 pm

    dooon

  6. ramesh kumar singh

    January 5, 2011 at 12:51 pm

    bbbnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn

  7. irfan ali bly

    January 5, 2011 at 11:22 am

    dr ashok sharma ne atul ji ki life ka bahaut hi sajeev chitran kiya hai jis unki shakhsiyat ke kayi pahlu ujager huy hain

  8. anil mehta

    January 5, 2011 at 6:43 am

    I never knew Mr. Atul Maheshwary and only came to know of his sad demise in news, and his profile in your write-up. Obviously the persons with high integrity and honesty earn the praise for their deeds during and after their lives, from intellectuals, writers, friends, and one and all. I extend my condolences to the bereaved family and peace for the departed soul.

  9. ramesh kumar singh

    January 4, 2011 at 5:01 pm

    Rk singh journalist bareilly
    Mr Ashok kumar Sharma je ka likha ka ta nahi ja sakta.atul je se mera sedha osta nahi raha. Sharma je ne Atul je ke liye jo likha gai har kisi ko pata nahi hai. Ashok je ko sadhuwad.AShok je jise achcha likh rahe hia wh achcha ho ga.

  10. achyut patwardhan

    January 4, 2011 at 6:15 am

    Though I never knew him but I have high regards for this man. I saw him speaking about Indian Journalism in a function at Delhi. After the function I came to know that he was Atul Maheshwari, the youngest multi edition editor.
    Great content. Lively written obituary.

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