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अनिता को लगा कि ये ‘घुमक्कड़ छोकरे’ हैं

भुवेंद्र त्यागी: मुम्बई पर आतंकी हमले की दूसरी बरसी पर विशेष : बुधवार का दिन। सन 2008 के नवंबर महीने की छब्बीसवीं तारीख। कटक के बारामती स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच पांचवां एकदिवसीय क्रिकेट मैच खेला जा रहा था। इस डे-नाइट मैच में इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी करके कप्तान केविन पीटरसन के शतक (नाबाद 111) की बदौलत 4 विकेट पर 270 रन बनाये थे। सचिन तेंदुलकर (50) और वीरेंद्र सहवाग (91) की शतकीय साझेदारी ने भारत को आतिशी शुरुआत देकर सात मैचों की इस शृंखला में लगातार पांचवीं जीत निश्चित कर दी थी। पूरा देश सचिन और सहवाग की बल्लेबाजी देखने में डूबा था। मुंबई भी।

भुवेंद्र त्यागी: मुम्बई पर आतंकी हमले की दूसरी बरसी पर विशेष : बुधवार का दिन। सन 2008 के नवंबर महीने की छब्बीसवीं तारीख। कटक के बारामती स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच पांचवां एकदिवसीय क्रिकेट मैच खेला जा रहा था। इस डे-नाइट मैच में इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी करके कप्तान केविन पीटरसन के शतक (नाबाद 111) की बदौलत 4 विकेट पर 270 रन बनाये थे। सचिन तेंदुलकर (50) और वीरेंद्र सहवाग (91) की शतकीय साझेदारी ने भारत को आतिशी शुरुआत देकर सात मैचों की इस शृंखला में लगातार पांचवीं जीत निश्चित कर दी थी। पूरा देश सचिन और सहवाग की बल्लेबाजी देखने में डूबा था। मुंबई भी।

मुंबई की सड़कों और इमारतों में लाइट्स जल चुकी थीं। जगमग मुंबई हर रोज की तरह दौड़ रही थी। दिन भर चली हवा शाम आते-आते थम सी गई थी। शाम की स्याही जैसे-जैसे रात की ओर बढ़ रही थी, मुंबई और जगमगाती जा रही थी। भारतीय बल्लेबाजों के हर शॉट पर तालियां बज रही थीं… जीत का जश्न मनाने को मुंबई भी उतावली थी!

और तभी… तभी मुंबई के दक्षिणी छोर पर स्थित गेटवे ऑफ इंडिया से कुछ दूर बधवार पार्क के मच्छीमार नगर के पास एक डिंगी (रबर की राफ्ट या छोटी नाव) किनारे आकर लगी। इसमें जींस, टी शर्ट पहनें दस स्मार्ट और हैंडसम नौजवान सवार थे। उनमें से आठ अजमल आमिर कसाब, इस्माइल खान, हफीज अरशद, जावेद, नजीर, शोएब, नासिर और बाबर रहमान उतर गए। बाकी दो अब्दुल रहमान छोटा और फराहदुल्ला डिंगी में ही बैठे रहे। जब उनके आठ साथी मच्छीमार में आगे बढ़ गए, तो उन्होंने डिंगी नरीमन प्वाइंट की ओर घुमा ली।

मच्छीमार नगर के मछुआरे आमतौर पर शाम के सागर तट पर बैठ गपशप करते रहते हैं। लेकिन मैच देखने के लिए उनमें से ज्यादातर टीवी के सामने जमे थे। डिंगी से उतरकर आठ नौजवान बेखटके आगे बढ़ते चले गये। उनमें से हरेक के कंधे पर एक-एक भारी बैग लटका था और नीले रंग के दो-दो बैग उन्होंने हाथों में ले रखे थे। इन बैगों के कारण वे सैलानी लग रहे थे।

रात के करीब साढ़े आठ बजे थे। मच्छीमार नगर में कचरा बीनने वाली अनिता उदैया अकेली सागर किनारे बैठी थी। वह उठती-गिरती लहरों को देख रही थी। उसने डिंगी को किनारे पर रुकते और आठ लड़कों को लाइफ जैकेट उतारकर, बैग लेकर जमीन पर कदम रखते देखा। उसे थोड़ा अचरज हुआ। सैलानियों या घुमक्कड़ों के आने की जगह तो यह नहीं है, उसने सोचा। वे तो गेटवे ऑफ इंडिया पर उतरते हैं। इसलिए उसने इन लड़कों को टोक दिया, ‘कौन हो तुम लोग? इदर कायकू आये?’

उनमें से एक ने जवाब दिया, ‘तुम्हें क्या? अपना काम करो।’ और वह अपने एक साथी के गले में हाथ डालकर आगे बढ़ गया। उनमें से छह गेटवे की ओर बढ़ गये और दो ससून डॉक की ओर। अनिता ने देखा कि अलग होने से पहले उन्होंने हाथ मिलाये और एक-दूसरे की ओर ‘थम्स-अप’ का इशारा किया। अनिता को लगा कि ये ‘घुमक्कड़ छोकरे’ हैं और मस्ती करते घूम रहे हैं। उसे जरा भी अहसास नहीं था कि कॉलेज के छात्र लगने वाले ये स्मार्ट नौजवान एक घंटे में मुंबई पर मौत बनकर टूट पड़ेंगे।

बधवार पार्क के मच्छीमार नगर से निकलकर अजमल और इस्माइल खान ने सीएसटी के लिए, हफीज अरशद और जावेद ने पियोपोल्ड कैफे के लिए और नजीर व शोएब ने ताज होटल के लिए टैक्सी ली। नासिर और बाबर रहमान पैदल ही कोलाबा मार्केट की ओर बढ़ गए, जहां उन्हें नरीमन हाउस पहुंचना था। दरअसल, उन्हें शक था कि इस बिल्डिंग को शायद कोई टैक्सी वाला नहीं जानता होगा और अगर उन्होंने उस इलाके में टैक्सी को घुमाया तो नाहक ही लोगों को शक होगा। डिंगी में बचे दो सवारों अब्दुल रहमान छोटा और फहादुल्ला ने डिंगी को नरीमन प्वाइंट की ओर घुमाया। प्वाइंट के आखिरी सिरे पर जाकर उन्होंने डिंगी को किनारे लगाया। उससे पत्थरों पर कूदकर वे सड़क पर आये और सधी चाल से होटल ट्राइडेंट-ओबेरॉय की ओर बढऩे लगे। इस इलाके में भी सैलानी इसी तरह घूमते रहते हैं। इसलिए उन पर किसी को कोई शक नहीं हुआ।

असल में उन्हें करीब पांच बजे मुंबई पहुंचना था। लेकिन कुबेर शिप से डिंगी में आने के बाद उन्हें कई जगह रफ्तार कम करनी पड़ी, क्योंकि उन्हें नेवी और कोस्ट गार्ड से भी खुद को बचाना था। उन्हें मुंबई की धरती पर कदम रखने में अपने निर्धारित समय से साढ़े तीन घंटे ज्यादा लग गए थे। अब उन्हें अपने-अपने लक्ष्य पर पहुंचने की जल्दी थी। अपनी-अपनी जगह पहुंचकर सबको अपने ग्रुप लीडर इस्माइल खान को सूचित करना था, लेकिन उसका मोबाइल फोन एक्टिवेट ही नहीं हो पाया, हां, बाकी ग्रुप जरूर आपस में संपर्क में रहे। ओबेरॉय, ताज और लियोपोल्ड पहुंचे ग्रुप इस्माइल और कसाब से तो संपर्क नहीं कर पाये, पर उन्हें बाकी सबसे ‘लोकेशनों’ पर पहुंचने का पता चल गया। केवल नासिर और बाबर रहमान को नरीमन हाउस ढूंढने में देरी हुई, क्योंकि इस यहूदी धार्मिक केंद्र के बारे में ज्यादातर स्थानीय लोगों तक को पता नहीं था।

मुंबई पर आतंकी कार्रवाई के एलर्ट कई बार आ चुके थे। इसलिए यहां सुरक्षा भी चाक-चौबंद रहती है। मगर शायद किसी ने भी यह कल्पना तक नहीं की होगी कि यहां कश्मीरी की तरह का फिदायीन (आत्मघाती) हमला हो सकता है- वह भी एक कैफे, एक यहूदी धार्मिक केंद्र, दो फाइव स्टार होटलों और महानगर के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन पर।

असल में टैक्सी विस्फोटों से पहले, 9.30 बजे लियोपोल्ड से लेकर 9.52 बजे सीएसटी तक- यानी केवल 22 मिनट के अंदर पांच जगह हमला हो चुका था। इससे हर कोई सकते में आ गया। जब तक पुलिस कुछ समझती, तब तक आतंकवादी लियोपोल्ड में 10 लोगों की जान ले चुके थे, सीएसटी पर खूनी खेल शुरू हो चुके थे और ताज, ट्राइडेंट-ओबेरॉय व नरीमन हाउस पर कब्जा कर चुके थे।

टीवी चैनलों पर एक-एक करके ये खबरें आईं, तो पूरा देश भौंचक्का रह गया। मुंबई पुलिस के मुख्यालय में सक्रियता बढ़ गई। केरल गए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख इतने बड़े आतंकी हमले की सूचना मिलते ही मुंबई के लिए रवाना हो गए। स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव भूषण गगरानी ने मंत्रालय में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। दक्षिणी मुंबई की सड़कों पर सायरन बजाती पुलिस की गाडिय़ां और फायर ब्रिगेड के इंजन दौडऩे लगे। मुख्य सचिव जॉनी जोसेफ ने मुख्यमंत्री को घटनाक्रम से अवगत कराकर केंद्र से संपर्क साधा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) चितिकला जुत्शी सेना को बुला में जुट गई।

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी या तो पुलिस मुख्यालय पर पहुंचने लगे, या घटनास्थल पर। इनमें से कई तो दिन भर की व्यस्तता के बाद घर पहुंचकर खाने के लिए बैठे थे। वे खाना बीच में छोड़कर ही दक्षिण मुंबई के लिए रवाना हो गये।

अपने घर पहुंचकर मुंबईवासी भय और आश्चर्य से टीवी न्यूज चैनलों पर यह सब देखते रहे। जो आतंकवादियों की शोले उगलती बंदूकों के सामने पड़ गये, वे या तो असमय ही काल के गाल में समा गए या घायल होकर तड़पने लगे। पूरी दक्षिण मुंबई फायरिंग और धमाकों की आवाज से दहल उठी। दक्षिण मुंबई में काम करके अपने घरों की ओर लौट रहे लोग भय के सागर में डूबने-उतराने लगे। सड़कों पर पहले भगदड़ मची। फिर देखते ही देखते सड़कें वीरान हो गईं। जिसको जहां जगह मिली, वह उधर भागकर छिप गया। चर्चगेट से पश्चिम रेल की उपनगरीय ट्रेनों केचलते रहने के कारण इस मार्ग के लोग तो फिर भी अपने घरों की ओर बढ़ते रहे। मगर सीएसटी से मध्य रेल की उपनगरीय ट्रेनें सीएसटी पर हुई फायरिंग के कारण कई घंटे बंद रहीं। खबर जंगल में आग की तरह फैली। दक्षिणी मुंबई में सड़कों पर टैक्सियां अचानक घट गईं। फिल्म देखने या रेस्तरां जाने के लिए निकले लोग बदहवास होकर अपने घर की ओर लौट पड़े। सभी टीवी न्यूज चैनलों की ओबी वैन दक्षिणी मुंबई की ओर रवाना हो गई। पुलिस ने चारों ओर नाकाबंदी कर दी- खासकर सीएसटी, ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस के पास।

पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी की किताब ‘दहशत के 60 घंटे‘ से साभार

इन्हें भी पढ़ सकते हैं-

उसने मेरे सिर पर एके47 लगा दी थी : जयप्रकाश सिंह

’26/11 : वे 59 घंटे’ : एक रिपोर्टर का हलफनामा

15 पत्रकार : आंखों देखी : दहशत के 60 घंटे

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0 Comments

  1. abeer

    November 26, 2010 at 10:31 am

    उस दिन भारत माता रोई थी और अल्लाह के बन्दे हँ से थे

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