उंगलियों पर गिनेंगे तो भी नहीं मिलेंगे प्रमोद भागवत जैसे पत्रकार

मेरे एक पत्रकार मित्र थे प्रमोद भागवत। ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ में रिपोर्टर थे। मैं जब ‘नवभारत टाइम्स’ में काम करने मुम्बई आया, तो उनसे परिचय हुआ। वे ठाणे में रहते थे। मैं उन दिनों मुम्बई को समझने की कोशिश कर रहा था और इस सिलसिले में अक्सर भागवतजी से लम्बी चर्चाएं किया करता। हमारा मत यह था कि सरकार तमाम साधन होने के बावजूद लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम रहती है।

हम अक्सर इसकी वजह ढूंढ़ते। हर बार एक ही वजह पर आकर हमारा विमर्श रुक जाता- भ्रष्टाचार। मगर भागवतजी का एक मत और भी था। वे कहते, ‘हम हर बात का दोषारोपण सरकार या सरकारी संस्थाओं पर कर देते हैं। यह नहीं सोचते कि इतनी आबादी के बोझ से सरकार की कार्य पद्धति भी प्रभावित होती है। कहीं न कहीं नागरिकों को भी आगे बढ़कर विकास के काम में हाथ बंटाना चाहिए।’ एक बार मैंने उनके इस मत का तीखा प्रतिवाद किया, ‘यह कैसे संभव है? जो काम साधन-सम्पन्न सरकार नहीं कर सकती, वह काम साधनहीन जनता कैसे कर सकती है?’

भागवतजी ने मुस्कराकर कहा, ‘अगले रविवार को सुबह 6.30 बजे मेरे घर आओ। ठाणे में। तब मैं इसका नमूना दिखाऊंगा कि साधनहीन जनता क्या कर सकती है।’ मैं वसई में रहता था। रविवार को सुबह 6.30 बजे ठाणे में भागवतजी के घर पहुंचना मुश्किल होता। इसलिए शनिवार रात को काम करके दफ्तर में ही सो गया। सुबह 4.19 की पहली लोकल सीएसटी (तब वीटी) से पकड़ी। स्लो लोकल थी। सवा छह बजे ही भागवतजी के घर पहुंच गया। वे नीले रंग का गाउन जैसा कुछ पहने हुए थे। मुझे नाइट गाउन लगा।

बिस्कुटों के साथ चाय पीकर वे ठीक साढ़े छह बजे घर से चल दिये। उनके हाथों में एक बड़ी और एक छोटी झाडू थी और थी छाज जैसी कचरा उठाने की एक छोटी चीज। मैं उनके पीछे-पीछे। वे सड़क पर पहुंचे, तो पांच-छह नौजवान यही सामान लिये हुए वहां तैयार मिले। उन सबने मुंह पर कपड़ा बांधा और सड़क पर झाडू लगानी शुरू कर दी। करीब एक किलोमीटर की सड़क आधे घंटे में चमक गयी। कचरा इकट्ठा करके डस्टबिनों में डाल दिया गया। जो कुछ भंगार इकट्ठा हुआ, उसे बेचकर एक डायरी में वे पैसे दर्ज कर लिये गये।

म्युनिसिपेलिटी के नल पर साबुन से हाथ धोते हुए भागवतजी ने मुस्कराकर मुझसे कहा , ‘देखा, जनता क्या कर सकती है? हम चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं, पर करते नहीं। हमेशा दूसरों को जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।’ भागवतजी ने वह सड़क ‘गोद’ ले रखी थी। चंदे और बेचे गये भंगार के पैसों से रोज की सफाई को मैनेज करते। उसमें से भी अक्सर पैसे बच जाते थे, तो वृक्षारोपण करते, जनजागरुकता अभियान के पोस्टर लगवाते, जरूरतमंदों की मदद कर देते।

लौटकर भागवतजी के घर कांदा-पोहे का नाश्ता करते हुए मैंने उनसे कहा, ‘आपने आज मेरी आंखें खोल दीं। यह दिखा दिया कि हम भी चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं। आप समाज के असली हीरो हैं।’ आज भागवतजी हमारे बीच नहीं हैं। मुझे मुम्बई के कफ परेड इलाके के कुछ नागरिकों की इसी तरह की पहल के बारे में जानकर अचानक उनकी याद आ गयी। ताज रेजिडेंसी होटेल के पास चार एकड़ की जमीन का एक टुकड़ा बेकार पड़ा था। गड्ढेदार और बदबूदार। कफ परेड रेजिडेंट्स असोसिएशन ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि वह जमीन पार्क बनाने के लिए उन्हें दे दी जाये। अधिकारियों को ऐसी किसी जमीन की जानकारी नहीं थी। होती भी कैसे? वह कचराघर की तरह जो इस्तेमाल हो रही थी।

आज वही गंदी जमीन एक सुंदर और हरे-भरे गार्डन में तब्दील हो चुकी है। जनता ने राज्य सरकार या बीएमसी की मदद के बिना खुद ही यह करिश्मा कर दिखाया है। रेजिडेंट्स असोसिएशन के अध्यक्ष केके पुरी बताते हैं, ‘हमने सरकार और कॉर्पोरेट से मदद मांगी थी, पर उन्होंने हाथ खड़े कर दिये। आखिर हमें चंदा करना पड़ा। किसी ने पैसे दिये, किसी ने बेंच, किसी ने पौधे और किसी ने बच्चों के झूले और सी-सॉ।’ इस कचराघर को ठीक करने के लिए 16 मजदूर लगाये गये। दर्जनों ट्रक कचरा वहां निकला। फिर पौधे लगाये गये। एक महिला ने वहां झोपड़ी बना रखी थी। वह झोपड़ी हटाने के ऐवज में फ्लैट मांगने लगी। उसे पैसे देकर मामला सुलझाया गया।

इस पूरे काम में एक साल का वक्त और एक करोड़ रुपये लगे। अगले साल तक गार्डन लहलहाने लगा। जो लोग नाक पर रुमाल रखकर वहां से गुजरा करते थे, वे यहां टहलने के लिए आने लगे। अपने बच्चों को लाने लगे। हलके-फुलके व्यायाम और गपशप का अड्डा बन गया वहां। देश भर में ऐसी बहुत सी पहल चल रही हैं। बिना प्रचार-प्रसार के लाखों लोग ऐसे कामों में लगे हुए हैं। वे अंधेरे में मशाल की तरह हैं। खुद तो जन कल्याण और विकास के काम करते ही हैं, दूसरों को भी प्रेरणा देते हैं। भागवतजी जैसे सचमुच बहुत से लोग हैं, जो अपना फर्ज समझकर ऐसे कामों में लगे हैं। आज देश के विकास में इन लोगों का भी हाथ है। क्या सरकार इससे कुछ सीख ले सकती है?

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित भुवेंद्र त्यागी की रिपोर्ट

नौनिहाल के कारण किसान आंदोलन विशेषज्ञ बन गए ओमकार चौधरी

नौनिहाल
नौनिहाल
भाग -40 : जिस तरह से रिपोर्टिंग हुई उससे किसान आंदोलन एक बीट बन गया : नौनिहाल ने एक बार मंगलजी से कहा कि मेरठ के बाहर की बीट की खबरें कवर करने के लिए मेरठ से रिपोर्टर भेजे जाएं। स्ट्रिंगर वहां की सामान्य खबरें भेजें। पर बड़ी खबरें, खासकर बीट की खबरें अपने रिपोर्टर ही करें। मंगलजी समझे नहीं। ‘मने, आप जरा विस्तार से बताइये। कहना क्या चाहते हैं?’

‘जैसे सरधना और मवाना हैं। हापुड़ और हस्तिनापुर हैं। मुजफ्फरनगर और सहारनपुर हैं। इनमें से कहीं पर हमारे रिपोर्टर हैं, तो कहीं पर स्ट्रिंगर हैं। वहां की आम खबरें वे भेजते ही हैं। पर अगर कोई बड़ी घटना घट जाये, तो उसे कवर करने के लिए मेरठ से अपने रिपोर्टर भेजे जा सकते हैं।’

‘लेकिन ऐसा करने पर हमारे वहां के रिपोर्टरों को बुरा नहीं लगेगा?’

‘बुरा क्यों लगेगा?’

‘आखिर पूरे साल और सालों-साल तो कवरेज वही करते हैं। जाहिर है, किसी बड़ी घटना की कवरेज भी वही करना चाहेंगे। उनके लिए वह बड़ा अवसर होगा। उन्हें यह नहीं लगेगा कि जब कोई बड़ी घटना घटी, तो उनसे मौका छीन लिया गया।’

‘मैं कोई उनसे मौका छीनने की बात थोड़े ही कर रहा हूं। यह तो उनकी सुविधा के लिए ही होगा।’

‘वो कैसे?’

‘पहले हमें मेरठ में कोई स्पर्धा नहीं थी। अब हमारे सामने अमर उजाला की स्पर्धा है। आस-पास के शहरों की रोजाना की घटनाओं के अलावा हमें वहां की बड़ी घटनाओं पर भी नजर रखनी चाहिए। अगर ऐसी कोई घटना घटी, तो हमारा कवरेज अमर उजाला और दिल्ली के अखबारों से बेहतर होना चाहिए। हमें इसकी योजना बनाकर काम करना चाहिए।’

‘मने हमारे पास इतना मैन पावर कहां है, जो हम अपने रिपोर्टर मेरठ से बाहर भेजें?’

‘सोच लीजिए मंगलजी, जरा जोर जरूर पड़ेगा, पर अखबार की पौ-बारह हो जायेगी।’

‘पर किसे भेज सकते हैं यहां से?’

इस पर नौनिहाल ने कई नाम सुझाये। उनमें से कुछ मंगलजी ने माने, कुछ नहीं माने। लेकिन मेरठ से बाहर जाकर कवरेज करने का पहला मौका मिला अभय गुप्त को। सहारनपुर में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सभा थी। वहां के रिपोर्टर को बेशक यह अच्छा नहीं लगा हो, पर उन्होंने अभयजी का जोरदार स्वागत किया। अभयजी ने भी उनसे कहा कि बंधु, मैं बस भाषण की कवरेज करूंगा। आप बाकी सब लिख पेलिये। तो मुख्य समाचार अभयजी का छपा और झलकियां वहां के संवाददाता की।

इससे जागरण, मेरठ में एक नयी परंपरा शुरू हो गयी। गंगा की बाढ़ की कवरेज हस्तिनापुर जाकर विश्वेश्वर ने की। ओपी सक्सेना ने आस-पास जाकर कई साहित्यकारों के इंटरव्यू कर लिये। अनिल त्यागी ने किसानों और खेती पर कई समाचार किये। पर सबसे बड़ा काम किया ओमकार चौधरी ने। ये वो समय था, जब कई साल कम वर्षा के कारण फसलें हल्की रह गयी थीं। गंगा-यमुना के दोआबे के कारण मेरठ और उसके आप-पास के जिलों में अकाल भले ही नहीं पड़ा था, पर किसानों की हालत खस्ता थी। फसलें अच्छी नहीं हुई थीं। ऐसे में किसानों के लिए ट्यूबवैल के बिजली के बिल भरना कठिन हो गया था। सरकार पर बिल माफी का दबाव बढ़ रहा था। पर सरकार नहीं मान रही थी। मुजफ्फरनगर के एक गांव में बिल अदा न करने वाले किसानों के कनेक्शन काटने के लिए बिजली विभाग के कर्मचारी पुलिस लेकर गये। उन्हें ग्रामीणों ने बंधक बना लिया।

… बस, वहीं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेन्द्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन की शुरुआत हो गयी। नौनिहाल ने कुछ ही दिन पहले मंगलजी को सुझाया था कि आसपास के क्षेत्रों में बड़ी घटनाओं की कवरेज के लिए मेरठ से रिपोर्टर भेजे जायें। वह बात उनके ध्यान में थी ही। अभय गुप्त चीफ रिपोर्टर थे। इस आंदोलन को वे कवर करना चाहते थे। ओमकार चौधरी ने अपनी ग्रामीण पृष्ठ भूमि का हवाला देकर यह इस कवरेज का पहल की। मेरठ-सरधना रोड पर स्थित दबथुवा गांव के ओमकार के टिकैत और जाट खापों के अन्य नेताओं से अच्छे संबंध थे। उसी को मंगलजी ने यह जिम्मेदारी सौंपी। जब तक यह आंदोलन चला, ओमकार इसके लिए ‘जागरण’ का घुमंतू संवाददाता रहा। आंदोलन इतना बड़ा था कि उसे कवर करने के लिए न सिर्फ दिल्ली के अखबारों के रिपोर्टर आये, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी इस पर नजर थी। दिल्ली से बीबीसी के मार्क टुली भी आकर इसे कवर कर रहे थे।

हर महीने की 17 तारीख को टिकैत के गांव सिसौली में भारतीय किसान यूनियन की मीटिंग होती थी। ओमकार और फोटोग्राफर गजेन्द्र सिंह उस मीटिंग में जाते। पूरी मीटिंग कवर करते। उस कवरेज से ग्रामीण क्षेत्रों में जागरण का प्रसार काफी बढ़ गया। यहां तक कि जब दिल्ली के अखबारों के संवाददाता टिकैत से मिलते, तो वे उनसे कहते कि जागरण जैसी ही खबर छापना। वैसे टिकैत मनमौजी किस्म के किसान नेता रहे हैं। किसी से भी न डरने वाले, किसी के भी सामने न झुकने वाले। ओमकार ने उन्हें इतना कवर किया कि वह टिकैत और किसान आंदोलन का विशेषज्ञ बन गया। यहां तक कि दूसरे अखबारों के संवाददाता उसी से अंदरूनी खबरें लेने की ताक में रहते।

लेकिन इसके बावजूद जागरण प्रशासन ने इस खास कवरेज के लिए ओमकार और गजेन्द्र को कुछ भी सुविधा नहीं दी। उन्हें रोडवेज की बस से आना-जाना होता। फिर डग्गामार बस से सिसौली जाते। इसी तरह वापसी होती। लौटकर ओमकार खबर लिखने में जुट जाता और गजेन्द्र डार्क रूम में जाकर फोटो डेवलप करने में। ओमकार की खबर लिखने की गति बहुत तेज थी। खबर के नोट्स लेने का उसका तरीका भी नायाब था। उसके पास हमेशा छोटी सी नोटबुक होती। जेबी डायरी। उसके हर पेज पर बहुत बारीक अक्षरों में वह तेजी से नोट्स लेता। उससे भी तेजी से उन नोट्स के आधार पर खबर लिखता। ऐसी पचासों जेबी डायरियां थीं उसके पास। एक भर जाती, तो उसे अलमारी में रखकर दूसरी इस्तेमाल करता। वही डायरियां उसके रेफरेंस के रूप में काम आतीं। याददाश्त इतनी तेज कि कोई पुरानी घटना देखने के लिए एकदम सही डायरी निकाल लेता।

अब ओमकार डायरियां तेजी से भरने लगीं। किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग उसने जिस जोश और संजीदगी से की, वह एक मिसाल बन गयी। किसान आंदोलन न्यूज कवरेज की एक ‘बीट’ बन गया। अमर उजाला ने कई रिपोर्टरों से यह काम कराया। लेकिन जागरण का एक ही रिपोर्टर था- ओमकार चौधरी। दिल्ली के अखबारों के रिपोर्टर भी आकर आंदोलन कवर करने लगे। बीबीसी तक पर इसकी खबर आने लगी।

ओमकार की ये खबरें रोज छपती थीं। संपादकीय पेज पर लेख भी छपे। फिर दिल्ली के मीडिया से ओमकार के पास मांग आने लगी। ओमकार अब किसान आंदोलन विशेषज्ञ बन गया। दिल्ली के पत्रकार ओमकार से टिकैत के अगले रुख के बारे में पूछने लगे। दिल्ली के अखबार उससे अपने यहां लिखने को कहने लगे। वह अखबारों में तो लिख नहीं सकता था, पर दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘अभय भारती’ में लिखने लगा। कई कवर स्टोरी लिखीं। परेशनाथ खुद उससे कहकर ये स्टोरी लिखवाते थे।

मंगलजी खुश थे। उनका प्रयोग सफल रहा था। जागरण का सर्कुलेशन बढ़ गया। खासकर ग्रामीण इलाकों में। जागरण में छपी खबरों को किसान आंदोलन की सही और सच्ची खबरें माना जाने लगा। मंगलजी ने इसके नौनिहाल का दिल से धन्यवाद दिया। यह सोच दरअसल नौनिहाल की ही थी। वे हमेशा समय से आगे सोचते थे। अपने वक्त से दो-तीन दशक आगे थे। जो वे तब सोचा करते थे, वह आज भी नया लगता है। आज की पत्रकारिता के सकारात्मक पहलुओं में वे जितने फिट बैठते, नकारात्मक पहलुओं में उतने ही अनफिट!

भुवेंद्र त्‍यागी
भुवेंद्र त्‍यागी

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

मुकाबला धीरेंद्र मोहन व अतुल माहेश्वरी के बीच भी था

नौनिहाल शर्मा: भाग-38 : दैनिक जागरण के बाद अमर उजाला का भी मेरठ से संस्करण शुरू होने पर मेरठ के पुराने स्थानीय अखबारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया था। उस समय मेरठ से दो दर्जन से ज्यादा दैनिक अखबार और करीब 800 साप्ताहिक अखबार पंजीकृत थे। इनमें से ज्यादातर नियमित थे। दैनिकों में प्रभात, मेरठ समाचार, हमारा युग और मयराष्ट्र बिकते भी थे। पर नये माहौल में उनकी बिक्री पर बहुत असर पड़ा। मेरठियों को जागरण और अमर उजाला में अपने आसपास की तमाम खबरें पढऩे को मिलने लगीं।

इसलिए लोकल अखबारों का सर्कुलेशन गिरने लगा। उन्होंने हॉकरों को पटाने की भरपूर कोशिश की, पर वे भी मजबूर थे। बड़े और बेहतर अखबरों के आने से अब पाठकों को अच्छा विकल्प मिलने लगा। इससे इन अखबारों के अलावा दिल्ली से आने वाले अखबार भी परेशानी में पड़ गये। नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान की कॉपियां भी लगातार घटने लगीं। नवम्बर, 1987 में शुरू हुआ जनसत्ता जरूर लोगों को भा रहा था। पर उसमें भी मेरठ की खबरें कम ही रहती थीं। इसलिए अब सीधा मुकाबला जागरण और अमर उजाला में था। और इस मुकाबले में दो मोर्चे खुल गये थे। मेरठ शहर में जागरण आगे था, तो देहात में अमर उजाला। वैसे यह मुकाबला दोनों अखबारों के मालिकों धीरेन्द्र मोहन और अतुल माहेश्वरी के बीच भी था। धीरेन्द्र बाबू का ज्यादा ध्यान मार्केटिंग पर रहता था। उन्होंने संपादकीय विभाग पूरी तरह मंगल जायसवाल के हवाले कर रखा था। पर अमर उजाला में ऐसा नहीं था। अतुल जी खुद सारा काम देखते थे। संपादकीय विभाग पर भी उनकी पूरी नजर रहती थी। मीटिंग भी करते थे।

धीरेन्द्र बाबू केवल सोमवार को मीटिंग करते थे। अतुल जी रोज करते थे। धीरेन्द्र बाबू केवल उन खबरों पर ही जोर देते थे, जिनका असर मार्केटिंग पर पड़ता था। पर अतुल जी न केवल जागरण से, बल्कि दिल्ली के अखबारों से भी खबरों की तुलना करते थे। धीरेन्द्र बाबू संपादकीय विभाग के लोगों से सीधा संपर्क नहीं रखते थे, पर अतुल जी सबसे न केवल सीधा संपर्क रखते थे, बल्कि उन तक सब की पहुंच भी रहती थी। जागरण से एक पेस्टर मनोज जैरथ अमर उजाला में चला गया था। बीरू कुए पर रहता था। उसकी बहन की शादी में अतुल जी खुद गये थे। उनके विपरीत, धीरेन्द्र बाबू किसी स्टाफर से इस तरह के रिश्ते नहीं रखते थे। वे एलीट किस्म का व्यवहार करते थे। अतुल जी आम आदमी की तरह रहते थे। हालांकि बाद में उनमें भी काफी बदलाव आया, पर शुरुआती दिनों में वे बहुत सरल और स्टाफरों के दिलों को जीतने वाले व्यक्ति थे।

इलेक्ट्रा के अरुण जैन मेरठ के पहले मेयर थे। वे अखिल भारतीय टेबल टेनिस संघ के उपाध्यक्ष भी थे। देश का सबसे बड़ा इनामी टेबल टेनिस टूर्नामेंट मेरठ में कराते थे। खुद भी अच्छे खिलाड़ी थे। उस टूर्नामेंट में देश भर के सभी प्रमुख खिलाड़ी आते थे। शहर में उसका अच्छा-खासा माहौल रहता था। टूर्नामेंट के कई दिन पहले से खिलाड़ी मेरठ आने लगते थे। अमर उजाला का वह मेरठ में पहला साल था। सन 1986 की बात है। नौनिहाल की टेबल टेनिस में ज्यादा रुचि नहीं थी। पर वे देश के अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों को देखने के लिए जाते थे। पहले यह टूर्नामेंट स्टेडियम में होता था। फिर मवाना रोड पर अरुण जैन ने इलेक्ट्रा विद्यापीठ बना दिया, तो वहां होने लगा। उस साल यह टूर्नामेंट इलेक्ट्रा विद्यापीठ में हो रहा था। मैं कमलेश मेहता और मंजीत दुआ का सेमीफाइनल मैच कवर कर रहा था। नौनिहाल मेरे बराबर में बैठे थे। तभी प्लेइंग एरिना के एक कोने में हलचल हुई। कई लोग एक साथ आये। अरुण जैन तुरंत उस ओर लपके। मैं सुनील छइया को पहचानता था। वे मुरादाबाद से आये थे। मूलत: फोटोग्राफर थे। पर रिपोर्टिंग भी उतनी ही बेहतरीन करते थे। वे अमर उजाला के लिए बड़े एसेट साबित हुए। उनके साथ राजेन्द्र त्रिपाठी तथा और कई लोग भी थे। बीच में एक लंबे से, बहुत प्रभावशाली व्यक्ति थे। मैंने छइया जी से इशारे पूछा। उन्होंने कान में कहा, अतुल जी हैं।

अतुल जी यानी अतुल माहेश्वरी। अपने संपादकीय विभाग के छह प्रमुख लोगों से घिरे हुए। एक साथ कई काम करते हुए। अरुण जैन से बात कर रहे थे। मैच देख रहे थे। और राजेन्द्र को निर्देश देते जा रहे थे कि किस-किस एंगल से समाचार कवर किये जायें। उनकी नजर केवल खेल की खबरों पर ही नहीं थी। वे बड़े खिलाडिय़ों की निजी जिंदगी और यहां मिल रही सुविधाओं पर उनके विचारों पर भी खबरें चाहते थे। बाद में छइया जी ने उनसे परिचय कराया। हमें यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि वे जागरण के हर पत्रकार के बारे में काफी कुछ जानते थे। मसलन वह किस डेस्क पर काम करता है, उसकी कार्य शैली क्या है, अखबार में उसका क्या महत्व है और वह वहां संतुष्टï है। उनका दूसरे अखबार के बारे में ऐसा होमवर्क बहुत कुछ सिखाने वाला था। बाद में अमर उजाला के विस्तार में यह उनके काफी काम आया। उनकी नजर इस पर भी रहती थी कि  दोनों अखबारों में समाचारों की कवरेज में जो अंतर है, उसके लिए कौन-कौन से पत्रकार महत्वपूर्ण है। मसलन उन्होंने राजेन्द्र से कहा कि खेल में भुवेन्द्र जागरण के लिए अकेले डेस्क भी संभालता है और लोकल खेल समाचार भी कवर करता है, नौनिहाल लोकल खबरों के शीर्षकों के मास्टर हैं। इतना सब अतुल जी को पता था। यह उनके पेशेवर रुख के कारण था। इसका उनके अखबार को तो फायदा होता ही था, उनके लिए पूरा स्टाफ पूरी जी-जान से काम करता था।

बाद में नौनिहाल ने एक भष्यिवाणी की कि अतुल जी अब जागरण के पत्रकारों को लेना शुरू करेंगे। और उनके ज्यादातर अनुमानों के अनुसार यह भी सच निकला। कई लो जागरण से अमर उजाला गये। कई जाकर लौटे भी। हालांकि जैसा आजकल मेरठ से इसी महीने शुरू हो रहे ‘जनवाणी’ ने किया, वैसा जागरण और अमर उजाला कभी नहीं कर पाये थे। अब तो यशपाल ने जागरण की आधी टीम को ही इस नये अखबार में शिफ्ट करा दिया है।

बहरहाल। नौनिहाल ने जो कहा था, उसके अनुसार, वे खुद भी कुछ साल बाद अमर उजाला में चले गये। दरअसल, वे अतुल जी से बहुत प्रभावित थे। साकेत के गोल मार्केट में चाय की चुस्कियों के बीच अगले दिन उन्होंने कहा था कि अतुल माहेश्वरी प्रोफेशनल अखबार मालिक हैं।

‘1975 में आपात काल ने देश में पत्रकारिता को एक नयी दिशा दी। सेंसर के बंधन से मुक्त होने के बाद पत्रकारिता में एक नया जोश  गया। पत्रकार नयी जिम्मेदारी से काम करने लगे। खोजी पत्रकारिता में तेजी आयी..’

‘लेकिन गुरू, इसका अतुल जी से क्या मतलब?’

‘यार, तू बीच में बोल पड़ता है। पूरी बात सुने बिना।’

‘हां, बताओ आगे…’

‘तो बात ये है कि अब पत्रकारिता नयी दिशा-दशा में चलेगी। ऐसे में अखबारों के मालिकों और मैनेजमेंट का प्रोफेशनल होना जरूरी है। अब लाला टाइप अखबार नहीं चलेंगे।’

‘मतलब उनके दिन लद गये?’

‘नहीं। दिन तो नहीं लदे। हो सकता है कि वे अपने ढांचे के कारण खूब सफल भी रहें। पर पाठकों की नजरों में प्रोफेशनल अखबार ही चढ़ेंगे।’

‘मतलब ऐसे में उन मालिकों के अखबारों की पौ-बारह रहेगी, जो नये ढर्रे से अखबार चलायेंगे। बड़े कॉरपोरेट हाउसों के अखबारों को वह सफलता नहीं मिलेगी, क्योंकि वहां पुराने ढर्रे से काम होता है।’

भुवेंद्र त्यागीढाई दशक बाद भी ये बात सच है!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

क्या करें? किस-किससे लड़ें? पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है

भुवेंद्र त्यागी: पुराना साल –  नया साल : भुवेंद्र त्यागी की नजर में….. मेरा देहाती मन आज भी करियर को सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानता : आज मुझे नौचंदी मेले के वही जवान और किसान याद आ रहे हैं : व्यायाम छूट जाने का अफसोस है, नये साल में इसे फिर शुरू करने का संकल्प : मीडिया पर एक विराट उपन्यास लिख रहा हूं, यह हमारे दौर का दस्तावेज होगा और मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम : आज के दिये कल की मशाल हैं : सबसे बड़ी उम्मीद उन मीडियाकारों से जो आज भी इस पेशे में मिशन की भावना से आते हैं और पूंजी के चक्रव्यूह और करियरवादी दंद-फंद में नहीं फंसते-उलझते :

बरसों पुरानी बात है। मेरे चाचा हमारे पूरे परिवार को ट्रैक्टर-ट्रॉली में बिठाकर मेरठ का नौचंदी मेला दिखाने ले गये। वहां एक जगह जवान और किसान की मूर्ति थी। उस पर ‘जय जवान-जय किसान’ लिखा था। मैं उसे छू-छू कर देखता रहा। चाचा ने मेरा कौतूहल देखकर बताया कि ये हमारे देश के जवान और किसान हैं। जवान सीमा पर देश की आन-बान-शान के लिए जान लड़ता है। किसान देश के खेतों में हल चलाकर हम सबके लिए अनाज उगाता है। आज मुझे नौचंदी मेले के वही जवान और किसान याद आ रहे हैं। बीत रहे साल और आते हुए साल की दहलीज पर सबसे ज्यादा गर्व इन्हीं पर है। ये हैं, तो हम हैं। तमाम भय, आशंका, निराशा, हताशा, अवसाद और नाउम्मीदी के माहौल में यही हैं, जो हमें इन सबसे पार पाने के लिए विश्वास, शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जब भी किसी जवान को, किसान को या मेहनतकश को देखता हूं, तो लगता है कि जैसा भी जीवन हम जी रहे हैं इसमें सबसे बड़ा योगदान इन्हीं का है।

बीते साल में सबसे ज्यादा निराशा, बेचैनी, गुस्सा और आक्रोश सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार पर आया। खुशी इस बात की रही कि भ्रष्टïचार के खिलाफ लोग कुछ करना चाहते हैं। मगर बात यहीं खत्म हो जाती है। क्या करें? किस-किससे लड़ें? पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है।

… और अब तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया पर भी आक्षेप हैं। यह मन में आत्मग्लानि लाता है। आज आम आदमी, गरीब और मजबूर आदमी अपना कोई दुख-दर्द लेकर किसके पास जाता है? उसे किस पर सबसे ज्यादा भरोसा है। मीडिया पर। उसे लगता हे कि अखबार में छाप जाये, टीवी पर आ जाये, तो पुलिस उसकी शिकायत दर्ज कर लेगी… म्युनिसिपल्टी का बाबू उसकी फाइल ढूंढ लेगा… कोई दबंग उसे सतायेगा नहीं… उसकी बहू-बेटियों की इज्जत सुरक्षित रहेगी। वह मीडिया को भगवान समझता है। और मीडिया के कुछ लोग शैतान निकले। निश्चित ही, इससे उस आदमी के दिल में हूक उठी होगी… उसे सदमा पहुंचा होगा… उसे लगा होगा कि अब वह किससे गुहार लगाये?

हर साल की तरह बीते साल भी, प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवन से सफलता पा लेने लोग भावुक करते रहे। वी.वी.एस. लक्ष्मण की हर मैच जिताऊ पारी, हरियाणा की महिला खिलाड़ियों का ग्वांगझू एशियाड में पदक जीतना, किसी गरीब बच्चे का आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होना, भ्रष्टï सिस्टम में अब भी ज्यादातर लोगों का ईमानदार होना मन को छूता भी रहा और आशा का दीप भी जलाये रहा।

जीवन में जो लक्ष्य तय किये थे, उनमें से अभी तक तो ज्यादातर पूरे किये। मेरा देहाती मन आज भी करियर को सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानता। वह तो रोजी का, जिंदा रहने का एक साधन मात्र है। ऐसा नहीं होता, तो मैं इंजीनियर या लेक्चरर बन जाता। इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया और नैट क्वालिफाई कर लिया था। पर मैं कुछ अलग करना चाहता था। इसलिए मीडिया में आया। वो सब पूरी तरह नहीं कर पाया… कोई गिला नहीं… मौका मिलेगा, तो जरूर करूंगा।

यूं तो मैं जीवन में काफी अनुशासित हूं, पर बरसों से व्यायाम छूट जाने का अफसोस है। मुम्बइया जिंदगी की भागदौड़ और व्यस्तता के बीच यह छूट गया। पर नये साल में इसे फिर शुरू करने का संकल्प जरूर है।

कुछ गरीब बच्चों को पढ़ाता हूं। इच्छा है कि इसके लिए वक्त मिलता रहे। युवाओं से ऊर्जा लेता हूं। युवा व भावी पत्रकारों का मार्गदर्शन करना दिली खुशी का अहसास दिलाता है। ये आज के दिये हैं, भविष्य में मशाल बनेंगे। नीरा राडिया के चक्कर में हर कोई तो नहीं आता… इसलिए इस नयी पौद से बेहद आशाएं हैं।

बीते साल मीडिया पर मेरी दो किताबें ‘स्पेशल रिपोर्ट’ और ‘फिल्मी स्कूप’ आयीं। चार की योजना थी। कोई बात नहीं … दो इस साल सही।

बरसों से एक विराट उपन्यास पर काम कर रहा हूं। पिछले दो दशक में, यानी आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीडिया किस तरह और कितना कुछ बदला है, इसी पर। इसमें मीडिया के अंदर की सनसनीखेज और अविश्वसनीय कथाएं होंगी। इसका फलक मेरठ से शुरू होकर मुम्बई तक फैला है। कथावस्तु फिक्शन में होगी। पर किरदार और घटनाएं पकड़ में आ जायेंगे। 600 पेज का रफ ड्राफ्ट और नोट्स तैयार हैं। और भी जुड़ते जा रहे हैं। कह नहीं सकता, इसे अंतिम रूप देने में कितना वक्त लगेगा। पर यह हमारे दौर का दस्तावेज होगा और मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम – पूरी तृप्ति और संतुष्टि देने वाला। शायद यह कई दोस्तों से दूरी भी पैदा कर दे … क्योंकि इसमें सब कुछ सच होगा, सच के सिवा कुछ नहीं। … और सच अक्सर कड़वा होता है।

सबसे बड़ी उम्मीद उन मीडियाकारों से है, जो आज भी इस पेशे में मिशन की भावना से आते हैं, पूंजी के चक्रव्यूह में नहीं फंसते और करियरवादी दंद-फंद में नहीं उलझते। ये वो लोग हैं, जिनके लिए जीवन एक संघर्ष है, पर ये संघर्ष से नहीं घबराते। इनके सीने में आग है, दिल में ईमानदारी है और लबों पर सच है।

नये साल में यही ख्वाहिश है कि इनका ये सब बचा रहे, बना रहे, परवान चढ़ता रहे!

आमीन!

अपने दिल की बात को बेबाकी से बयान करने वाले भुवेन्द्र त्यागी इन दिनों मुंबई में नवभारत टाइम्स में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

अनिता को लगा कि ये ‘घुमक्कड़ छोकरे’ हैं

भुवेंद्र त्यागी: मुम्बई पर आतंकी हमले की दूसरी बरसी पर विशेष : बुधवार का दिन। सन 2008 के नवंबर महीने की छब्बीसवीं तारीख। कटक के बारामती स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच पांचवां एकदिवसीय क्रिकेट मैच खेला जा रहा था। इस डे-नाइट मैच में इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी करके कप्तान केविन पीटरसन के शतक (नाबाद 111) की बदौलत 4 विकेट पर 270 रन बनाये थे। सचिन तेंदुलकर (50) और वीरेंद्र सहवाग (91) की शतकीय साझेदारी ने भारत को आतिशी शुरुआत देकर सात मैचों की इस शृंखला में लगातार पांचवीं जीत निश्चित कर दी थी। पूरा देश सचिन और सहवाग की बल्लेबाजी देखने में डूबा था। मुंबई भी।

मुंबई की सड़कों और इमारतों में लाइट्स जल चुकी थीं। जगमग मुंबई हर रोज की तरह दौड़ रही थी। दिन भर चली हवा शाम आते-आते थम सी गई थी। शाम की स्याही जैसे-जैसे रात की ओर बढ़ रही थी, मुंबई और जगमगाती जा रही थी। भारतीय बल्लेबाजों के हर शॉट पर तालियां बज रही थीं… जीत का जश्न मनाने को मुंबई भी उतावली थी!

और तभी… तभी मुंबई के दक्षिणी छोर पर स्थित गेटवे ऑफ इंडिया से कुछ दूर बधवार पार्क के मच्छीमार नगर के पास एक डिंगी (रबर की राफ्ट या छोटी नाव) किनारे आकर लगी। इसमें जींस, टी शर्ट पहनें दस स्मार्ट और हैंडसम नौजवान सवार थे। उनमें से आठ अजमल आमिर कसाब, इस्माइल खान, हफीज अरशद, जावेद, नजीर, शोएब, नासिर और बाबर रहमान उतर गए। बाकी दो अब्दुल रहमान छोटा और फराहदुल्ला डिंगी में ही बैठे रहे। जब उनके आठ साथी मच्छीमार में आगे बढ़ गए, तो उन्होंने डिंगी नरीमन प्वाइंट की ओर घुमा ली।

मच्छीमार नगर के मछुआरे आमतौर पर शाम के सागर तट पर बैठ गपशप करते रहते हैं। लेकिन मैच देखने के लिए उनमें से ज्यादातर टीवी के सामने जमे थे। डिंगी से उतरकर आठ नौजवान बेखटके आगे बढ़ते चले गये। उनमें से हरेक के कंधे पर एक-एक भारी बैग लटका था और नीले रंग के दो-दो बैग उन्होंने हाथों में ले रखे थे। इन बैगों के कारण वे सैलानी लग रहे थे।

रात के करीब साढ़े आठ बजे थे। मच्छीमार नगर में कचरा बीनने वाली अनिता उदैया अकेली सागर किनारे बैठी थी। वह उठती-गिरती लहरों को देख रही थी। उसने डिंगी को किनारे पर रुकते और आठ लड़कों को लाइफ जैकेट उतारकर, बैग लेकर जमीन पर कदम रखते देखा। उसे थोड़ा अचरज हुआ। सैलानियों या घुमक्कड़ों के आने की जगह तो यह नहीं है, उसने सोचा। वे तो गेटवे ऑफ इंडिया पर उतरते हैं। इसलिए उसने इन लड़कों को टोक दिया, ‘कौन हो तुम लोग? इदर कायकू आये?’

उनमें से एक ने जवाब दिया, ‘तुम्हें क्या? अपना काम करो।’ और वह अपने एक साथी के गले में हाथ डालकर आगे बढ़ गया। उनमें से छह गेटवे की ओर बढ़ गये और दो ससून डॉक की ओर। अनिता ने देखा कि अलग होने से पहले उन्होंने हाथ मिलाये और एक-दूसरे की ओर ‘थम्स-अप’ का इशारा किया। अनिता को लगा कि ये ‘घुमक्कड़ छोकरे’ हैं और मस्ती करते घूम रहे हैं। उसे जरा भी अहसास नहीं था कि कॉलेज के छात्र लगने वाले ये स्मार्ट नौजवान एक घंटे में मुंबई पर मौत बनकर टूट पड़ेंगे।

बधवार पार्क के मच्छीमार नगर से निकलकर अजमल और इस्माइल खान ने सीएसटी के लिए, हफीज अरशद और जावेद ने पियोपोल्ड कैफे के लिए और नजीर व शोएब ने ताज होटल के लिए टैक्सी ली। नासिर और बाबर रहमान पैदल ही कोलाबा मार्केट की ओर बढ़ गए, जहां उन्हें नरीमन हाउस पहुंचना था। दरअसल, उन्हें शक था कि इस बिल्डिंग को शायद कोई टैक्सी वाला नहीं जानता होगा और अगर उन्होंने उस इलाके में टैक्सी को घुमाया तो नाहक ही लोगों को शक होगा। डिंगी में बचे दो सवारों अब्दुल रहमान छोटा और फहादुल्ला ने डिंगी को नरीमन प्वाइंट की ओर घुमाया। प्वाइंट के आखिरी सिरे पर जाकर उन्होंने डिंगी को किनारे लगाया। उससे पत्थरों पर कूदकर वे सड़क पर आये और सधी चाल से होटल ट्राइडेंट-ओबेरॉय की ओर बढऩे लगे। इस इलाके में भी सैलानी इसी तरह घूमते रहते हैं। इसलिए उन पर किसी को कोई शक नहीं हुआ।

असल में उन्हें करीब पांच बजे मुंबई पहुंचना था। लेकिन कुबेर शिप से डिंगी में आने के बाद उन्हें कई जगह रफ्तार कम करनी पड़ी, क्योंकि उन्हें नेवी और कोस्ट गार्ड से भी खुद को बचाना था। उन्हें मुंबई की धरती पर कदम रखने में अपने निर्धारित समय से साढ़े तीन घंटे ज्यादा लग गए थे। अब उन्हें अपने-अपने लक्ष्य पर पहुंचने की जल्दी थी। अपनी-अपनी जगह पहुंचकर सबको अपने ग्रुप लीडर इस्माइल खान को सूचित करना था, लेकिन उसका मोबाइल फोन एक्टिवेट ही नहीं हो पाया, हां, बाकी ग्रुप जरूर आपस में संपर्क में रहे। ओबेरॉय, ताज और लियोपोल्ड पहुंचे ग्रुप इस्माइल और कसाब से तो संपर्क नहीं कर पाये, पर उन्हें बाकी सबसे ‘लोकेशनों’ पर पहुंचने का पता चल गया। केवल नासिर और बाबर रहमान को नरीमन हाउस ढूंढने में देरी हुई, क्योंकि इस यहूदी धार्मिक केंद्र के बारे में ज्यादातर स्थानीय लोगों तक को पता नहीं था।

मुंबई पर आतंकी कार्रवाई के एलर्ट कई बार आ चुके थे। इसलिए यहां सुरक्षा भी चाक-चौबंद रहती है। मगर शायद किसी ने भी यह कल्पना तक नहीं की होगी कि यहां कश्मीरी की तरह का फिदायीन (आत्मघाती) हमला हो सकता है- वह भी एक कैफे, एक यहूदी धार्मिक केंद्र, दो फाइव स्टार होटलों और महानगर के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन पर।

असल में टैक्सी विस्फोटों से पहले, 9.30 बजे लियोपोल्ड से लेकर 9.52 बजे सीएसटी तक- यानी केवल 22 मिनट के अंदर पांच जगह हमला हो चुका था। इससे हर कोई सकते में आ गया। जब तक पुलिस कुछ समझती, तब तक आतंकवादी लियोपोल्ड में 10 लोगों की जान ले चुके थे, सीएसटी पर खूनी खेल शुरू हो चुके थे और ताज, ट्राइडेंट-ओबेरॉय व नरीमन हाउस पर कब्जा कर चुके थे।

टीवी चैनलों पर एक-एक करके ये खबरें आईं, तो पूरा देश भौंचक्का रह गया। मुंबई पुलिस के मुख्यालय में सक्रियता बढ़ गई। केरल गए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख इतने बड़े आतंकी हमले की सूचना मिलते ही मुंबई के लिए रवाना हो गए। स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव भूषण गगरानी ने मंत्रालय में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। दक्षिणी मुंबई की सड़कों पर सायरन बजाती पुलिस की गाडिय़ां और फायर ब्रिगेड के इंजन दौडऩे लगे। मुख्य सचिव जॉनी जोसेफ ने मुख्यमंत्री को घटनाक्रम से अवगत कराकर केंद्र से संपर्क साधा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) चितिकला जुत्शी सेना को बुला में जुट गई।

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी या तो पुलिस मुख्यालय पर पहुंचने लगे, या घटनास्थल पर। इनमें से कई तो दिन भर की व्यस्तता के बाद घर पहुंचकर खाने के लिए बैठे थे। वे खाना बीच में छोड़कर ही दक्षिण मुंबई के लिए रवाना हो गये।

अपने घर पहुंचकर मुंबईवासी भय और आश्चर्य से टीवी न्यूज चैनलों पर यह सब देखते रहे। जो आतंकवादियों की शोले उगलती बंदूकों के सामने पड़ गये, वे या तो असमय ही काल के गाल में समा गए या घायल होकर तड़पने लगे। पूरी दक्षिण मुंबई फायरिंग और धमाकों की आवाज से दहल उठी। दक्षिण मुंबई में काम करके अपने घरों की ओर लौट रहे लोग भय के सागर में डूबने-उतराने लगे। सड़कों पर पहले भगदड़ मची। फिर देखते ही देखते सड़कें वीरान हो गईं। जिसको जहां जगह मिली, वह उधर भागकर छिप गया। चर्चगेट से पश्चिम रेल की उपनगरीय ट्रेनों केचलते रहने के कारण इस मार्ग के लोग तो फिर भी अपने घरों की ओर बढ़ते रहे। मगर सीएसटी से मध्य रेल की उपनगरीय ट्रेनें सीएसटी पर हुई फायरिंग के कारण कई घंटे बंद रहीं। खबर जंगल में आग की तरह फैली। दक्षिणी मुंबई में सड़कों पर टैक्सियां अचानक घट गईं। फिल्म देखने या रेस्तरां जाने के लिए निकले लोग बदहवास होकर अपने घर की ओर लौट पड़े। सभी टीवी न्यूज चैनलों की ओबी वैन दक्षिणी मुंबई की ओर रवाना हो गई। पुलिस ने चारों ओर नाकाबंदी कर दी- खासकर सीएसटी, ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस के पास।

पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी की किताब ‘दहशत के 60 घंटे‘ से साभार

इन्हें भी पढ़ सकते हैं-

उसने मेरे सिर पर एके47 लगा दी थी : जयप्रकाश सिंह

’26/11 : वे 59 घंटे’ : एक रिपोर्टर का हलफनामा

15 पत्रकार : आंखों देखी : दहशत के 60 घंटे

नजदीक से किसी वेश्या को देखने की उत्सुकता

नौनिहाल शर्मा: भाग 37 : अल्ला कसम, तुम पहले इंसान हो जिसने मुझे हाथ भी नहीं लगाया, मैं रंडी हूं, पर हराम का नहीं खाती : वह लड़का दो-दो सीढ़ी एक साथ चढ़ रहा था। हम ठंड से ठिठुरे जा रहे थे। उस लड़के के पीछे-पीछे ऊपर सीढिय़ां चढ़ते हुए हमारी नजर नीचे की ओर भी थी और ऊपर की ओर भी। नीचे इसलिए कि किसी जान-पहचान वाले की नजर हम पर ना पड़ जाये। ऊपर इसलिए कि हमें पहली बार नजदीक से किसी वेश्या को देखने की उत्सुकता थी। रोमांच की हद तक !

सीढिय़ां चढ़कर हम ऊपर पहुंचे। वहां एक लाइन में कमरे बने हुए थे। कुछ कमरों के सामने लड़कियां खड़ी थीं। वो लड़का कई कमरों के सामने से गुजर गया। हम सकुचाये से उसके पीछे-पीछे चलते रहे। किसी-किसी लड़की से सौदेबाजी भी की जा रही थी। गाली-गलौच के जुमले भी तैर रहे थे। अकेली खड़ी लड़कियां हमारी ओर इशारे करतीं, हमारे आगे जा रहे लड़के के गाल पर हल्का सा चपत लगातीं। वह उनका हाथ झटक देता। छठे या सातवें कमरे के सामने जाकर लड़का रुका। दरवाजा बंद था। उसने दरवाजे पर दस्तक दी।

अंदर से जनाना आवाज आयी, ‘पांच मिन्ट मै आना। अभी मैं बैठी हूं।’

लड़के ने दूसरी बीड़ी सुलगा ली थी। बोला, ‘साब, अंदर गराहक है। हियां रुकोगे या कुछ चा-चू हो जा?’

ये 1980 के दशक का मेरठ था। तब पीने के नाम पर, और वो भी दिसम्बर की कड़कड़ाती रात में, चाय की ही बात हो सकती थी। जो पीने का शौक रखते थे, वो इंतजाम करके चलते थे। या फिर देसी शराब की तलाश करते थे। हमने उसे चाय पीने का इशारा किया। वो उतनी ही फुर्ती से नीचे उतरा। सड़क पार करके एक ठेले की ओर बढ़ गया। वहां हमने चाय पी। कुल्हड़ में। लड़के ने जरा शरारत से पूछा, ‘कुछ खाने-वाने कू बी चइयै या उप्पर जाकै ई खाओगे?’

उसका हमने कोई जवाब नहीं दिया। कोई दसेक मिनट बाद हम फिर ऊपर के कमरे की ओर बढ़े। दरवाजा खुला था। लड़के ने आवाज लगायी, ‘आ जावैं?’

‘किसै लाया है तू आज? कल वाला यईं बैठ कै चढ़ा रा था।’

‘नई। ये पीनै-वीनै वाले ना हैं। सीद्दे से लगै हैं।’

लड़के के इशारे पर हम अंदर चले गये। वो कोई 18-19 साल की लड़की थी। एक तख्त बिछा था। उसी पर बैठी थी। छोटे कद, गोल चेहरे और सांवली रंगत की। उसने सलवार-कुर्ता पहन रखा था और वो बीड़ी पी रही थी। हमें देखकर लड़के पर जरा भड़की।

‘ये क्या चक्कर है? एक साथ दो कू क्यू लाया तू?’

‘मैनै तो कहया बी था अक एक्केक करकै जाओ। पर ये ना मान्ने। इसमै मेरा का कसूर?’

‘ठीक है। तू फूट अब यां सै। अर तैनै अपने पैसे ले लिए?’

‘हां। ले लिए।’

वह लड़का हमारी तरफ आंख मारकर चला गया। अब लड़की ने हमें पहली बार ध्यान से देखा। उसे थोड़ा अचरज हुआ। दो को देखने से ज्यादा शायद हमें एक-दूसरे से इशारों में बात करते देखकर। आखिर वह पूछ ही बैठी, ‘क्या बात है? इस तरह बिना बोल्ले क्यू बात कर रे हो? गूंग्गे-बहरे हो का?’

मैंने उससे कहा, ‘दोनों नहीं, पर ये (नौनिहाल की तरफ देखकर) बहरे हैं। ठीक से बोल भी नहीं सकते।’

उसकी आंखें जरा चौड़ी हुईं। बोली, सुन-बोल सकते नहीं और चो…. चले आये।’

मैं शरमाया।

‘नहीं-नहीं उस काम के लिए नहीं आये हैं।’

‘तो फिर क्या मुजरा सुनने आये हो?’

मुझे लगा कि अब संकोच छोड़कर सीधे बात कह देनी चाहिए।

‘बहनजी बात…’

‘अबे ओ भैनचो… भैन-वैन भूल जा। सीद्दी तरा सै बोल दै क्या बात है।’

‘आप मुझे बोलने तो दो…’

‘अर या आप-वाप बी भूल जा। यां ना कोई बोलता ऐसी बोल्ली।’

‘ठीक है। बात ये है कि ये मेरे गुरु हैं। इन्हें एक कहानी लिखनी है..’

‘तो मै क्या दाद्दी-नान्नी लगू हैं जो कथा-कहानी कऊंगी?’

‘नहीं ये बात नहीं है। इन्हें आपके बारे में कुछ जानकारी चाहिए…’

उसने फिर मेरी बात काटने की कोशिश की। पर मैंने हाथ जोड़कर कहा, ‘आप पहले पूरी बात सुन लो। ये बहुत अच्छे आदमी हैं। लेखक हैं। कहानियां लिखते हैं। एक कहानी एक वेश्या पर लिख रहे हैं। इसीलिए आपके पास आये हैं। आपकी सच्ची कहानी जानने के लिए। आपका नाम कहीं नहीं आयेगा। घटनाएं सच्ची लिखेंगे। नाम झूठा होगा। कोई नहीं जान पायेगा कि यह आपकी कहानी है। बस आप इनकी मदद कर दो।’

वह जरा गंभीर हुई। उसके माथे पर शिकन आयी। बीड़ी का धुआं छोड़ते हुए बोली, ‘यू तै अजीब बात है। लोग यां चू… लेने आवैं हैं, अर तुम मदद लेने आए हो। पर मै अपना धंदा खराब ना करू। नोट पूरे गिनूंगी। वो बी तुम दोनो के। पूरे तीस रुपय्ये गिनवा दो पैले।’

मैंने जेब से निकालकर उसे 30 रुपये दे दिये। नौनिहाल ने मेरी ओर इशारा किया। मैंने अपने बैग में से डायरी निकाली। उसमें नौनिहाल ने मुझे वे सवाल लिखवा दिये थे, जो उन्हें किसी वेश्या से पूछने थे। मैंने सवाल करने शुरू किये। वह जवाब देती गयी । पहले थोड़ी झिझक के साथ, फिर खुलकर। उसकी कहानी भी कमोबेश वैसी ही थी, जैसी कि अमूमन कोठों पर पहुंचने वाली ज्यादातर लड़कियों की होती है। उसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं। नौनिहाल उसे एकटक देखे जा रहे थे। उसके होठों को पढ़ते हुए। मैं सवाल पूछता जा रहा था। वो जवाब देती जा रही थी। मैं लिखता जा रहा था। उसने कई बार पूछा कि उसका नाम तो नहीं आयेगा कहीं। अब तक मेरा हौसला भी कुछ खुल गया था। मैंने मुस्कराकर कहा, ‘आपको क्या लगता है, आपका असली नाम हमने बसंती मान लिया? असली नाम तो कुछ और ही होगा।’

इस पर वह पहली बार खुलकर हंसी। उसने एक और बीड़ी जलायी। इशारे से हमसे पूछा, ‘चाहिए क्या?’ हमने एक साथ, उसी तरह इशारे से मना किया। चूंकि नौनिहाल उसके होठों को पढ़ रहे थे, इसलिए उन्हें उसकी कही हर बात का पता चल रहा था। इसीलिए वे भी उससे सवाल पूछते जा रहे थे। ये और बात है कि उनकी आवाज को वह समझ नहीं पा रही थी और मुझे दोहराना पड़ रहा था।

इस सबमें कोई एक घंटा हो गया। सर्दी बढ़ती जा रही थी। ‘बसंती’ ने एक पुराना सा शॉल ओढ़ लिया था। हम सिहर रहे थे। उस कमरे में कुछ भी सामान नहीं था। बस, एक बक्से में शायद उसके कपड़े-वपड़े होंगे। हमारी बात पूरी हो गयी। हमने चलने का उपक्रम किया। नौनिहाल ने उससे पूछा, ‘हमने तुम्हारा शायद ज्यादा ही समय ले लिया। और पैसे चाहिए, तो बोलो।’

मुझे लगा, वह और पैसे मांगेगी। पर अचानक वह रोने लगी। पहले धीरे-धीरे, फिर बुक्का फाड़कर। हम हैरान। अब इसे क्या हुआ। उसने हमें 30 रुपये लौटा दिये। बोली, ‘अल्ला कसम, तुम पहले इंसान हो जिसने मुझे हाथ भी नहीं लगाया। मैं रंडी हूं, पर हराम का नहीं खाती।’

हमने बहुत इसरार किया कि हमने उसका समय तो लिया ही है। इसलिए उसका हक है इन पैसों पर।

लेकिन वो नहीं मानी। उसने हमें अल्ला को मुंह दिखाने का वास्ता दिया। हम संकोच से गड़ गये। बुझे मन से मैंने वे रुपये अपनी जेब में रख लिये। उसने हमें ‘अल्ला हाफिज’ कहा। बाहर 4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान था। हमने ठेले पर जाकर एक-एक गिलास चाय और पी। न जाने क्यों, अब मेरे मन से किसी के देखे जाने का डर चला गया था।

हम घर की ओर चले। नौनिहाल मुझे मेरे घर के सामने छोड़कर आगे बढ़ गये।

कुछ महीने बाद सारिका में नौनिहाल की कहानी ‘बसंती रो पड़ी’ छपी। हमने किसी को यह नहीं बताया कि यह सच्ची कहानी है।

भुवेंद्र त्यागीहां, नौनिहाल ने मेरे सामने बरसों बाद एक राज खोला। वे हर साल रक्षा बंधन पर ‘बसंती’ से मिलने जाते थे। उसने कई कोठे बदले। पर नौनिहाल के पास उसका हर नया पता रहता था। शायद भाई बनकर किसी कोठे पर जाने वाले गिने-चुने ही होंगे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

छह साल से बीमार मंगलजी चले गए

दीवाली का दिन। त्योहार की व्यस्तता के बीच, दिन भर के कई मिस कॉल अनदेखे रह गये। रात को देख रहा था, तो यशवंत सिंह के मिस कॉल पर नजर पड़ी। शायद दीवाली की शुभकामना के लिए कॉल किया होगा। यह सोचकर मैंने उनका नंबर मिला दिया। राम-राम और दीवाली की शुभकामना के बाद वे अचानक बोले, ‘सर, मंगलजी नहीं रहे!’ मैं अवाक रह गया।  पूछा, कब हुआ ये? ‘पिछले महीने। किसी ने मेरठ से फोन करके बताया। 15 दिन से ज्यादा हो गये।’

‘ताज्जुब है। उन्होंने मेरठ में दैनिक जागरण को जमाया और उनके निधन का उतने दिन बाद पता चल रहा है।’ ‘जिनका फोन था, वे यह कह रहे थे कि आपने जागरण में उनके साथ काम किया है। नौनिहाल की सीरीज में भी कई बार जिक्र आया है उनका… ‘

अगले दिन मैंने मंगलजी के बड़े बेटे विवेक को फोन किया। जब मंगलजी 1984 में मेरठ आये थे, तो विवेक पांचवीं क्लास में पढ़ता था। कभी-कभी दफ्तर भी आ जाता था। उसने बताया कि किस तरह 78 साल की उम्र में मंगलजी अचानक ही चले गये। 17 अक्टूबर को उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई, तो उन्हें धन्वंतरी अस्पताल में एडमिट किया गया। रात को उनका बीपी बढ़ता गया और हार्ट बीट घटती गयी। आधी रात के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली। 29 अक्टूबर को उनकी तेरहवीं हुई।

मंगलजी पिछले छह साल से बीमार थे। 2004 में पर्किंसन के कारण उन्हें लिखने में तकलीफ होने लगी थी। तब से वे घर पर ही थे।

मूल रूप से बनारस के थे मंगलजी। ‘आज’ के जाने-माने चेहरे। आज, कानपुर में काम करते थे। वहां से एक ग्रुप ने अलग होकर अपना अखबार ‘लोकजन समाचार’ शुरू किया। वह अब भी चलता है। जब जागरण, मेरठ में भगवतजी की जगह नया संपादक लाने की बात हुई, तो नरेन्द्र मोहन ने मंगलजी को चुना। उन्हें समाचार संपादक बनाकर लाया गया। और भगवतजी के रहते मंगलजी ने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वे अगले संपादक हैं।

मंगलजी के बहुत संस्मरण हैं। मैं 18 साल का भी नहीं था, जब मैंने 1984 में जागरण, मेरठ में जॉइन किया था। तब संपादक भगवतशरणजी थे। उनका प्रशासन सख्त था। उनके सामने ही, कुछ महीने बाद कानपुर से मंगलजी मेरठ आये। भावी संपादक के रूप में। करीब चार महीने मंगलजी ने भगवतजी के अंडर में काम किया। पर उन्होंने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वे भावी संपादक हैं। उनके सामने वे न्यूज डेस्क पर काम करते रहे। चीफ सब की कुर्सी पर आकर बैठ जाते और एजेंसियों की खबरों की छंटाई में जुट जाते। उसी दौर में हम नौजवान उनसे छंटाई का गुर सीखते। राकेशजी, नरनारायणजी और सुनील पांडेजी के साथ जब मंगलजी न्यूज डेस्क का नेतृत्व करते, तो वह टीम देखते ही बनती।

मंगलजी का व्यक्तित्व साधारण था, पर उनका काम करने का तरीका बहुत प्रभावशाली था। वे बहुत सादगी से रहते थे। मुंह में हमेशा पान रहता था। जब किसी से कुछ कहना होता, तो मुंह ऊपर की ओर करके, गरदन हिलाकर कहते, ‘मने, क्या बात है?’

किसी के काम से खुश होते तो कहते, ‘खूब। बहुत खूब।’

किसी के काम से नाराज होते तो कहते, ‘तुमने कर ली पत्रकारी!’

पर उनका गुस्सा टिकता नहीं था। वे बहुत जल्दी अपना गुस्सा भूल जाते थे। नये पत्रावरों को पूरी तन्मयता से काम सिखाते। नौजवानों को जिम्मेदारी देते। सीनियरों को पूरा मान देते। खबरों के चयन में सबसे सलाह लेते। सबसे जूनियर की सलाह को भी पुरा महत्व देते थे। उनके संपादन में काम शुरू करने वाले जितने युवा पत्रकार आज स्थानीय संपादक हैं, संपादको की वैसी फौज शायद और किसी ने तैयार नहीं की होगी।

जागरण में लम्बी पारी खेलकर मंगलजी 1998 में रिटायर हुए। उन्होंने अपनी बेटी विभा के नाम पर विभा पब्लिक स्कूल शुरू किया था, जिसे अब विभा ही चला रही है। 1998 से 2004 तक मंगलजी ने स्थानीय न्यूज चैनल ‘मेरठ दर्शन’ में काम किया। फिर पर्किंसन होने पर वे घर पर ही रहे। इस बीच उन्होंने 1996 में विभा, 1998 में विवेक और 2002 में प्रज्ञा की शादी की। विवेक ने 1995 में जागरण में काम शुरू किया। पेज डिजाइनर के रूप में। अब वह ‘आईनेक्स्ट’ में है। सबसे छोटे बेटे अंकुर ने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया। कुछ दिन नौकरी भी की। पर पिछले कुछ समय से वह मंगलजी की ही देखभाल करता था।

अब पूर परिवार की जिम्मेदारी विवेक की है। और वह इसे निभाने के लिए पूरी तरह तैयार भी है…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी लंबे समय तक मेरठ के विभिन्न अखबारों में कार्यरत रहे हैं. इन दिनों मुंबई में नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

नौनिहाल बोले- हमें बसंती ही चाहिए

नौनिहाल शर्मा: भाग 36 : नौनिहाल के साथ की गयी खुराफातों की मेरी जितनी यादें हैं, उनमें एक घटना सबसे रोमांचक और आज भी सिहरा देने वाली है। वो जनवरी की एक सर्द सुबह थी, जब नौनिहाल शॉल ओढ़कर और बंदर टोपी पहनकर मेरे घर आये। मुझे आश्चर्य हुआ। किसी अनहोनी की आशंका भी हुई। वरना इतनी सर्दी में सुबह-सुबह आने का भला क्या मकसद हो सकता था? शाम को तो हम दफ्तर में मिलते ही थे रोज। मैंने पूछा, ‘क्या गुरू! सब खैरियत?’

‘हां सब खैरियत है। आज एक बहुत जरूरी काम से आया हूं। दफ्तर से जरा जल्दी निकलेंगे। एक जगह जाना है।’

‘रात को? पता है, कितनी ठंड होगी?’

‘काम बहुत जरूरी है। तू दस्ताने-टोपी वगैरह से लैस होकर आना। देर हो सकती है।’

‘पर जाना कहां है?’

‘वो मैं दफ्तर में ही बताऊंगा।’

‘तो फिर वहीं बता देते। इतनी ठंड में इतनी दूर साइकिल चलाकर आने की क्या जरूरत थी?’

‘तू अपने घर कैसे बताता कि आज देर होगी आने में।’

‘मैं फोन कर देता।’

‘इतनी रात को तू बताता, तो तेरे घर वाले चिंतित नहीं हो जाते कि ïऐसा क्या काम आ गया। मैं बस इसलिए कहने के लिए आया कि तू घर पर देर से आने को कहकर दफ्तर आये।’

‘पर जाना कहां है? ये भी तो बताना पड़ेगा…’

‘वो जगह घर पर नहीं बतायी जा सकती। चाहे तो ये कह देना कि आज पहले पेज पर नाइट शिफ्ट भी करनी पड़ेगी।’

‘मतलब इतनी देर हो जायेगी?’

‘हां। आधी रात भी हो सकती है।’

चाय पीकर नौनिहाल तो चले गये, पर मैं अगले कई घंटे तक अजीब कशमकश में रहा। नौनिहाल ने पहली बार घर से कुछ छिपाने को कहा था। जरूर कोई बहुत गंभीर और संवेदनशील बात है। शायद निषिद्ध भी। पर ऐसा भला क्या हो सकता है? मेरे मन में ये सवाल घूमते रहे। इनका जवाब मिला दफ्तर पहुंचकर। मैं रोज की तरह साढ़े तीन बजे अपनी सीट पर पहुंच गया। एजेंसी की खेल की खबरों को छांटकर संपादित करने लगा। पर मन लोकल डेस्क की ओर लगा रहा। आखिर चार बजे नौनिहाल आये। दुआ-सलाम हुई। उन्होंने संकेत किया कि छह बजे चाय पीने गोल मार्केट जायेंगे, तब चर्चा की जायेगी। आखिर इंतजार खत्म हुआ। ठंड बहुत थी। दफ्तर में हीटर लगा हुआ था। इसलिए और कोई नहीं आया। चाय सुड़कते हुए नौनिहाल ने रहस्य खोला।

‘बात ये है कि आज कबाड़ी बाजार चलना है…’

‘पर दिन में चलते। कुछ सामान लेना हो, लकड़ी वगैरह का तो हमारे मोहल्ले के कई लोगों की वहां दुकानें हैं। उनसे खरीदा जा सकता था।’

‘सामान-वामान कुछ नहीं चाहिए।’

‘तो फिर वहां सर्दी में सिकुडऩे के लिए जाना है?’

‘कोठे पर जाना है…’

‘मत… मतलब… मतलब…’

‘हां। कोठे पर। किसी वेश्या के पास।’

इतनी सर्दी में भी मुझे पसीना आ गया। मैं घबरा गया। मैं तब 19 साल का था। किसी ने देख लिया और घर पर बता दिया, तो क्या होगा?

मेरी घबराहट भांपकर नौनिहाल ने असली बात बतायी।

‘वहां जाने में कुछ गलत नहीं है। हम उस काम से नहीं जायेंगे, जिस काम से सब लोग जाते हैं। दरअसल, मुझे एक वेश्या पर कहानी लिखनी है। इसका प्लॉट बुहत दिन से मेरे मन में था। हाल में कमलेश्वरजी को पत्र लिखा, तो इसकी चर्चा कर दी। उनका जवाब आया कि कहानी तुरंत भेज दो। मेरे पास महज रफ ड्राफ्ट है। मैं उसमें विश्वसनीयता लाने के लिए किसी वेश्या से मिलना चाहता हूं। मैं बोल-सुन नहीं सकता। इसलिए तुझे साथ ले जाना है।’

‘पर गुरू, ये तो बहुत खतरे वाली बात है।’

‘इसीलिए मैंने तुझे सुबह नहीं बताया था। इस काम के लिए तो तेरे मम्मी-पापा तुझे मेरे पास नहीं भेजते।’

‘कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी?’

‘गड़बड़ क्या होगी? हमारा इरादा नेक है।’

दूसरा कप चाय पीकर और मुंह से भाप उड़ाते हम दफ्तर लौटे। मेरे मन में डर भी था… कुछ नया करने का अहसास भी।’

खैर। हमने अपना काम खत्म किया। मैंने साढ़े आठ बजे खेल पेज छोड़ दिया। नौनिहाल ने भी मंगलजी से यह कहकर जाने की अनुमति ले ली कि बीवी बीमार है, उन्हें घर जाकर खाना बनाना पड़ेगा।

हम अपनी साइकिलों पर निकले, सड़कें खाली थीं। कोई 20 मिनट में हम गुजरी बाजार पहुंचे। वहां दुकानें बढ़ायी (बंद की) जा रही थीं। हमने एक दुकान से 200 ग्राम रेवड़ी लीं। वहीं खड़े होकर खायीं। फिर आगे बढ़े। करीब सवा नौ बजे हम कबाड़ी बाजार पहुंच गये। कबाड़ी बाजार में नीचे दुकानें थीं। उनके ऊपर कोठे। उनमें वेश्याएं रहती थीं। दिन में वे कोठे सुनसान रहते थे। शायद वे सोती रहती होंगी। लेकिन शाम होते ही उनमें चहल-पहल शुरू हो जाती थी। कई बार वहां से गुजरते हुए मेरी नजर उधर पड़ी, तो झुरझुरी सी हुई। एकदम फिल्मी माहौल लगता था। शाम होते ही नीचे खाने-पीने के सामान और पान व फूलों वगैरह के ठेले लग जाते थे।

वहां भी दुकानें बढ़ायी जा रही थीं। कुछ पहले ही बंद हो चुकी थीं। हमने पहले एक चक्कर लगाकर मुआयना किया। फिर नौनिहाल ने एक कोठे के नीचे साइकिल रोकी। पसीना मेरी रीढ़ की हड्डी तक चुहचुहा गया… मैं मन ही मन मना रहा था कि कोई जान-पहचान का यहां से ना गुजर रहा हो… कहीं घर तक यह बात न पहुंच जाये… और सबसे अंत में यह कि कोई परिचित ऊपर से ही उतरकर ना आ रहा हो…

हम साइकिलें हाथ में थामे खड़े थे। पहली बार मैंने नौनिहाल को भी पसोपेश में देखा। वे अपनी गरदन खुजलाते हुए सोच रहे थे। जब भी वे कुछ गंभीर बात सोचते, उनकी उंगलियां गरदन को खुजलाने लगती थीं। मैंने इशारे पूछा, ‘क्या गुरू, क्या बात है? अब क्या हो गया?

उन्होंने अपनी हथेली पर उंगलियों से लिखकर बताना शुरू किया। हम आपसे में इसी तरह या फिर हाथों के इशारों से बात किया करते थे।’

‘यहां आ तो गये यार, पर हमें किसी के माध्यम से आना चाहिए था।’

‘क्यों, तुम्हें भी डर लग रहा है क्या?’

‘डर की बात नहीं। यहां तो देह व्यापार होता है। हम जिसके पास भी जायेंगे, वह हमें उसी काम के लिये आया हुआ समझेगी। ऐसे में, उसे यह समझाना मुश्किल हो सकता है कि हम किस काम से आये हैं।’

‘ये बात तो पहले सोचनी चाहिए थी। अब तो हम यहां खड़े हैं। कोठे के नीचे। लोग यहां आ-जा रहे हैं। हमें घूर रहे हैं। इस तरह ज्यादा देर खड़े रहे, तो लगों को बिना मतलब शक हो जायेगा… कहीं पिटने की नौबत ना आ जाये…’

‘खैर, पिटने की नौबत तो नहीं आयेगी, पर मामला जरा गंभीर हो गया है।’

‘अब क्या किया जाये?’

नौनिहाल मेरी बात का जवाब देने ही वाले थे कि दूर से हमें देख रहा एक लड़का हमारे पास आया। वह एक बंद दुकान के पत्थर पर खड़ा था और बीड़ी पी रहा था। मुश्किल से 15-16 साल का रहा होगा। उसने एकदम हमारे नजदीक आकर ठंड से कांपते हुए कहा, ‘नये हो का? पहली बेर आये हो? सरमा रहे हो?’

‘……..’

‘यहां सरमाने सै काम नाय चलै। जे तो तड़-तड़ करकै उप्पर चढ़ जाओ सीड्डी पै, नाय तौ बेभाव की पड़ैगी।’

‘क्यों पड़ेगी बेभाव की? हम क्या यहां कोई चोरी करने आये हैं?’, मुझे गुस्सा आ गया।

‘गुस्सा तै दिखाओ ना। जे तो पड़ेगी, नाय तै सीद्दे उप्पर चले जाओ। सरम आ री हो तै मैं पहोंचा दू। दो रुपय्ये मेरे लगेंगे।’

‘और ऊपर कितने लगेंगे?’

‘रूपा का रेट दस रुपय्ये है। पर बसंती पंदरै सै कम पै पास बी आने दे…’

‘क्यों?’

‘मरजी की मालकिन ठहरी। 5 सै जादा ना लेत्ती एक रात मैं।’

‘हमें बसंती ही चाहिए।’,  नौनिहाल बोले। उस लड़के को उनकी बात समझ में नहीं आयी। मैंने उसे समझाया। वह फटाक से बोला, ‘दो मेरे, पंदरै-पंदरै तुमारे, बत्तिस लगैंगे।’

भुवेंद्र त्यागीनौनिहाल ने उसके हाथ पर फटाक से दो रुपये रख दिये। बाकी सीधे बसंती को ही देने को कहकर हम उस लड़के के पीछे-पीछे कोठे की सीढिय़ां चढ़ गये…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

ये तो मार्क टुली है, बीबीसी वाला!

नौनिहाल शर्मा: भाग-32 : प्रगति मैदान, पुस्तक मेला और हम : दिल्ली के प्रगति मैदान में हर दो साल के बाद विश्व पुस्तक मेला लगता था। उसका अखबारों में और दूरदर्शन पर काफी विज्ञापन आता था। मेरठ से सुबह को दिल्ली के लिए शटल जाती थी, रात को लौटती थी। उसमें ज्यादातर नौकरीपेशा दैनिक यात्री सफर करते थे। रोडवेज की बसें भी चलती थीं। लेकिन आम लोग ट्रेन से सफर करना ही बेहतर समझते थे।

तो एक बार नौनिहाल ने पुस्तक मेले में चलने का आदेश दिया….

‘चल, इस शनिवार को दिल्ली घूम आते हैं। पुस्तक मेले में जायेंगे। सरिता और हिन्दुस्तान में कुछ दोस्तों से भी मिलना हो जायेगा।’

‘गुरू, पैसे कितने ले चलें?’

‘वैसे तो पांच हजार भी कम पड़ेंगे, पर हमारी जेब तो खाली रहती है। इसलिए जितने संभव हों, उतने ले चलो। उनमें जितनी किताबें आयेंगी, ले लेंगे। पैसे खत्म होने पर किताबों के दर्शन करके लौट आयेंगे।’

‘तो एक काम किया जाये। खाना घर से बनवाकर ले चलें। इससे बाहर खाने पर खर्चा नहीं होगा। इस तरह बचे पैसों की भी किताबें खरीदी जा सकेंगी।’

‘ठीक है। मैं पराठे और आलू की सब्जी ले आऊंगा।’

‘मैं चने और गुड़ लाऊंगा, क्योंकि तेरी भाभी इतनी सुबह उठकर खाना नहीं बना सकती।’

‘चला कैसे जायेगा?’

‘शटल जिंदाबाद। मेरठ सिटी पर बैठेंगे। तिलक ब्रिज पर उतरेंगे। वहां से पैदल टहलते हुए प्रगति मैदान पहुंच जायेंगे।’

‘ठीक है। शनिवार को स्टेशन पर मिला जाये।’

और शनिवार को हम मेरठ सिटी स्टेशन पहुंच गये। सुबह साढ़े छह बजे ही। स्टैंड पर साइकिलें खड़ी कीं। टिकट लिये। शटल भी स्टेशन पर आ लगी। हमने दौड़कर सीट पकड़ी। कई जान-पहचान के लोग भी मिल गये। रोज शटल से सफर करने वाले। शटल चलने में दो-तीन मिनट बाकी थे। तभी नौनिहाल को चाय की तलब हुई। हम पास की सीट वाले से अपनी जगह देखते रहने को कहकर चाय लेने उतर गये। चाय का ठेला करीब दस मीटर दूर था। हमने वहां जाकर कुल्हड़ों में चाय ली। एक घूंट भरा। फिर ट्रेन में अपनी सीट की ओर बढ़े। तभी इंजन ने सीटी दी। मैंने नौनिहाल को कोहनी मारकर इशारा किया। हमने कदम जरा तेज किये। तब तक शटल गति पकडऩे लगी थी। हमने गति और बढ़ायी। पर अब चाय के कुल्हड़ के साथ ट्रेन नहीं पकड़ी जा सकती थी। इसलिए हमने एक साथ अपना-अपना कुल्हड़ फेंका और दौड़ लगा दी। किसी तरह डिब्बे में चढ़ गये। हमारे परिचित ने मजाक में कहा, ‘हमें तो लगा था कि अब तुम्हारा सामान भी वापस हमें ही लाना होगा।’

खैर! तिलक ब्रिज तक का हमारा सफर किताबों की बातें करते हुए ही बीता। ट्रेन से उतरकर हम पैदल ही प्रगति मैदान की ओर चल दिये। वहां गेट से ही माहौल देखने लायक था। मेले के नाम पर मैंने तब तक सरधने का बूढ़े बाबू का मेला और मेरठ का नौचंदी का मेला ही देखा था। किताबों का इतना बड़ा मेला मैं पहली बार देख रहा था। चारों ओर स्टॉल। उनमें किताबें ही किताबें। मैंने इससे पहले अबसे ज्यादा किताबें मेरठ में टाउन हॉल की लायब्रेरी में ही देखी थीं। नौनिहाल इस पुस्तक मेले में हर बार आते थे। इस बार वे अपने साथ मुझे लेते आये थे। इसका मुझे बहुत फायदा भी हुआ।

पहले हमने हिन्दी की किताबें देखीं। देश भर के प्रकाशकों की। मैं कहानी, उपन्यास, कविता की किताबें लेने के चक्कर में था। नौनिहाल ने बरज दिया।

‘फिक्शन वही लो, जो क्लासिक हो। उसी को बार-बार पढ़ा जा सकता है। बाकी फिक्शन एक बार ही पढऩे लायक होता है।’

‘तो फिर पढऩे के लिए रिपीट वैल्यू वाली किताबें कैसे चुनी जायें?’

‘रैफरेंस बुक्स सबसे पहले लो। विज्ञान, समाज और आम जन के उपयोग तथा रुचि की किताबें लो। तुलनात्मक अध्ययन की आदत डालो। यही असली पढ़ाई है।’

मैंने नौनिहाल की वो बात गांठ बांध ली। उसके दो साल बाद जब मैं जागरण से नवभारत टाइम्स, मुम्बई में आया, तो यही सलाह मुझे संजय खाती ने दी। अपने पत्रकारिता जीवन में मुझे इन्हीं दो लोगों से मानसिक खुराक मिली।

बहरहाल, हम प्रगति मैदान में घूम रहे थे। किताबों के बीच। किताबों की महक हम पर नशे का असर कर रही थी। इस बीच मैंने चार किताबें ले ली थीं। नौनिहाल ने भी सात-आठ किताबें ली थीं। तभी हमने एक स्टॉल के पास भीड़ देखी। नौनिहाल ने मुझे उस ओर खींचते हुए कहा, ‘शायद कोई बड़ा लेखक आया है।’

वहां एक लंबे-चौड़े विदेशी को लोगों ने घेर रखा था। मेरे मुंह से निकला, ‘ये तो मार्क टुली है।’

‘बीबीसी वाला?’

‘हां।’

हम भी उनके पास पहुंच गये। मार्क टुली हिन्दी में बात कर रहे थे।

किसी ने कहा, ‘बहुतै नीक हिन्दी बोलत हई।’

मार्क ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जानत हैं, जानत हैं, हमहू तोहार भासा जानत हैं’ और पूरा माहौल ठहाकों से गूंज गया। दसवीं क्लास में मैंने बीबीसी की एक स्लोगन प्रतियोगिता जीती थी। उसका पुरस्कार लेने मैं दिल्ली में बीबीसी के दफ्तर में गया था। मैंने मार्क को वो वाकया बताया। उन्हें याद आ गया। फिर वे हमें अपने साथ लंच पर ले गये। मैंने घर से बनवाकर लायीं पूडिय़ां निकालीं। मार्क की ओर बढ़ायीं। वे खुश हो गये।

‘आलू की सब्जी और अचार भी है?’

मैंने दूसरे डिब्बे में से निकालकर उन्हें आलू की सब्जी और अचार दिया। हम मिलकर देसी भोजन करने लगे। मजा आ गया। इस बीच मैंने मार्क से नौनिहाल का परिचय कराया। नौनिहाल ने उन्हें नमस्ते करके कहा, जब मैं सुनता था, तो पूरी शाम बीबीसी सुनते हुए ही गुजरती थी। अब मजबूरी है। सुन नहीं सकता।’

मार्क ने उठकर नौनिहाल का कंधा थपथपाया। बोले, ‘इस नौजवान ने मुझे बताया है कि आप जीनियस हो। सुनने, बोलने और देखने से भी बड़ी चीज है महसूस करना। इंसानियत। अंदर की प्रतिभा। मन की कोमलता। और इस नौजवान ने मुझे बताया है कि आप में ये सब गुण हैं।’

हम करीब एक घंटा साथ रहे। खूब बातें हुईं। गये थे किताबें देखने-खरीदने, मुलाकात हो गयी मार्क टुली से। और उनसे बातें भी खूब जमीं। वे लंच करके अपनी कार की ओर बढ़ गये। हम फिर किताबों की ओर। इस बार हम पहुंचे विदेशी प्रकाशकों के स्टॉलों पर। नौनिहाल ने सबसे पहले ली स्टीफन हॉकिंग की किताब ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’। मैंने सिमोन की ‘द सेकंड सेक्स’ ली। हॉकिंस की किताब नौनिहाल ने पढऩे के बाद मुझे भेंट कर दी थी। ये दोनों किताबें आज भी मेरे पास हैं।

हमने करीब 25-30 प्रकाशकों के सूची पत्र भी ले लिये। उनमें से छांटकर मैं बरसों तक किताबें लेता रहा। हमने शाम को करीब पौने पांच बजे चाय पी। बची हुई पूडिय़ों के साथ। भागकर तिलक ब्रिज से शटल पकड़ी। सुबह वाले लोग ही मिल गये। सफर अच्छा कटा। टछठ बजे ट्रेन मेरठ सिटी पहुंची। स्टैंड से साइकिलें लेकर हम घर की ओर चल दिये। रास्ते में घंटाघर पर चाय पी। गप्पें लड़ायीं। नौ बजे घर पहुंचा। मम्मी-पापा, भाई-बहन को पूरे दिन का हाल सुनाया। सोते-सोते 12 बज गये। अगले कई दिनों तक हमारी चर्चा अपनी इस दिल्ली यात्रा के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। खासकर मार्क टुली से हुई मुलाकात।

उस घटना को करीब ढाई दशक हो गया है। पर मार्क टुली की एक बात मुझे अब तक याद है। नौनिहाल ने उनसे भारत के राजनीतिक भविष्य के बारे में पूछा, तो वे बोले थे, ‘भारत में कुछ सालों में अनेक पार्टियां होंगी। उन्हीं से कांग्रेस और भाजपा को गठजोड़ करने होंगे। तब राजनीति दूषित होती चली जायेगी। समर्थन देने के बदले हर क्षेत्रीय पार्टी केन्द्रीय पार्टी को भुवेंद्र त्यागीब्लैकमेल करेगी।

मार्क टुली कितने सही थे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

अखबारी जंग पर 20 वर्ष पहले की एक बहस

नौनिहाल शर्मा: भाग 31 : मेरठ में ‘दैनिक जागरण’ और ‘अमर उजाला’ के बीच मुकाबला कड़ा होता जा रहा था। उजाला हालांकि जागरण से दो साल बाद मेरठ में आया था, पर उसने पाठकों से जल्दी रिश्ता बनाया। वो 1980 का दशक था। तब आज की तरह ब्रैंडिंग तो होती नहीं थी। समाचारों पर ही ध्यान दिया जाता था। अखबार एक ही फार्मूले को मानते थे कि अगर खबरें अच्छी हैं, तो पाठक खुश रहेंगे। अपने साथ बने रहेंगे। इसलिए संपादकों की नजरें हमेशा जनरुचि की खबरें तलाशती रहती थीं। तो जागरण और उजाला में सीधी टक्कर खबरों को लेकर ही थी।

उस दौर में क्षेत्रीय अखबारों ने राष्ट्रीय अखबारों को चुनौती देनी शुरू कर दी थी। वो जागरण, अमर उजाला, नई दुनिया और राजस्थान पत्रिका के विस्तार का दौर था। राष्ट्रीय अखबारों ने क्षेत्रीय अखबारों के इस ‘विजय अभियान’ को देखा, तो उन्हें भी इसकी ललक लगी। उनके भी कुछ संस्करण हिन्दी भाषी राज्यों की राजधानियों से शुरू हुए। अजब नजारा था। क्षेत्रीय अखबार राज्यों की राजधानियों से छोटे जिलों, शहरों और कस्बों की ओर जा रहे थे। राष्ट्रीय अखबार दिल्ली से राज्यों की राजधानियों में पहुंच रहे थे। इस मुद्दे पर एक दिन गोल मार्केट में चाय पीते हुए जागरण के हम करीब 10 जन में गंभीर चर्चा हो गयी। चर्चा शुरू की अभय गुप्तजी ने। उन्होंने परिदृश्य सामने रखते हुए पूछा कि 20 साल बाद पत्रकारिता के कैसे हालात रहेंगे?

रमेश गोयल ने कहा, ’20 साल किसने देखे हैं? पता नहीं 20 साल बाद क्षेत्रीय अखबार राष्ट्रीय अखबारों के सामने टिकेंगे भी या नहीं।’

ओ. पी. सक्सेना बोला, ‘जो हमें, मतलब कर्मचारियों को ज्यादा पगार देगा, वही टिकेगा।’

नरनारायण गोयल ने कहा, ‘यह गंभीर बहस है। इसमें मजाक नहीं होना चाहिए।’

अपनी मूंछ को सहलाते हुए विश्वेश्वर बोला, ‘साधन तो इन राष्ट्रीय अखबारों के पास ज्यादा हैं। इसलिए बढ़त तो उनकी ही रहेगी।’

दादा रतीश झा ने बहस को मुद्दे की ओर लाते हुए कहा, ‘अखबार तो पाठक लोग ही ना खरीदेगा। तो उन लोगन को जो उनकी रुचि और आसपास की ज्यादा खबरें देगा, ऊ तो ओई पढ़बे करेंगे।’

नीरज कांत राही ने अपने बाल संवारते हुए कहा, ‘पाठक के एकदम पास की खबरें सबसे बड़ा फैक्टर बनेंगी।’

बाकी ने भी अपने मत रखे। मैं सबसे छोटा था। सबकी बातें सुनकर बाद में बोलता था।

आखिर में मैंने नौनिहाल से पूछा कि इस बारे में उनकी क्या राय है। वे बोले-

यह मुद्दा भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता की दिशा तय करेगा। यह एक लंबी दौड़ है। गुप्तजी ने इसीलिए 20 साल बाद के परिदृश्य के बारे में पूछा था। इस दौड़ को पाठकों की सहायता से ही जीता जा सकता है। राष्ट्रीय अखबारों के पास साधन ज्यादा हैं। फंड बड़े हैं। वे घाटे को ज्यादा समय तक सह सकते हैं। इसके विपरीत, क्षेत्रीय अखबारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी क्षेत्रीयता है। यही उन्हें दौड़ जिताने में मदद करेगा। इसके अलावा, क्षेत्रीय अखबारों को कोई घमंड नहीं है। वे खुद को तीसमारखां नहीं समझते। उनका ऑपरेशन कम बजट में होता है। उनमें बाबूगिरी नहीं है। मालिक खुद ही डायरेक्टर और संपादक होते हैं। सबसे सीधे संपर्क में होते हैं। कोई उनके अखबार का बेजा इस्तेमाल नहीं कर सकता। खबरों पर उनकी सीधी नजर होती है। खबरों के स्रोतों पर भी। वे सब कुछ अपने हाथ में रखते हैं। राष्ट्रीय अखबारों के क्षेत्रीय संस्करण दो-चार साल में ढीले पड़ जायेंगे। तब तक क्षेत्रीय अखबार दूर-दराज तक पहुंच जायेंगे। उसके बाद दौड़ एकतरफा हो जायेगी। यानी क्षेत्रीय अखबारों की तूती बोलेगी।

नौनिहाल ने यह बात 1986 में कही थी। समय गवाह है। सब कुछ लगभग इसी तरह हुआ। राष्ट्रीय अखबार अपने अहंकार में दिल्ली में बैठे रह गये। क्षेत्रीय अखबार पहले अपने राज्यों में बढ़े। फिर दूसरे राज्यों में पहुंचे। इस सिलसिले में उनमें आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्धाएं हुईं। फिर वे दूर के राज्यों तक पहुंचे। उनका विस्तार होता रहा। राष्ट्रीय अखबार अपने दिल्ली के संस्करण का प्रसार बढ़ाने में ही लगे रहे। आज हालत यह हो गयी कि जागरण और भास्कर दुनिया में सबसे ज्यादा रीडरशिप वाले अखबार बन गये हैं। किसी भी देश के किसी भी और भाषा के अखबारों से आगे हैं वे। अंग्रेजी अखबारों से भी।

क्या नौनिहाल को इस परिदृश्य का अंदाज रहा होगा?

बिल्कुल!

नौनिहाल ने कई बार यह चर्चा की थी कि हालंकि देश में अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ेगा, पर हिन्दी उससे भी तेजी से बढ़ेगी। इसकी वजह वे बढ़ती साक्षरता बताते थे। दरअसल 1990 के दशक के बाद साक्षरता में काफी वृद्धि हुई है। इसीलिए देश में भाषाई, खासकर हिन्दी अखबारों का प्रचार-प्रसार भी तेजी से बढ़ा।

एक और मौके पर नौनिहाल से हिन्दी-अंग्रेजी अखबारों के बारे में बहस हो गयी। उन्होंने एकदम सधा हुआ विश्लेषण किया-

‘अंग्रेजी अखबारों के साधनों और पेजों की संख्या का हिन्दी अखबार कभी मुकाबला नहीं कर सकते। सामग्री की वैसी विविधता भी नहीं दे सकते। उनके पास लोकल खबरों को ज्यादा से ज्यादा महत्व देने के अलावा कोई चारा नहीं है। यही इनकी सफलता की वजह बनेगा। अंग्रेजी अखबार कभी आम जनता तक, गांव-देहात तक, गरीब-गुरबे तक नहीं पहुंच सकते। वे संप्रभु वर्ग तक ही सीमित रहेंगे।’

‘लेकिन आम लोगों में भी तो अंग्रेजी का दायरा बढ़ेगा।’

‘पढ़ाई का स्तर सुधरने, रोजगार की जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में बदलाव आने से अंग्रेजी का प्रसार निश्चित रूप से बढ़ेगा। पर वह कभी भारतीय भाषाओं की जगह नहीं ले सकती।’

‘लेकिन साक्षरता बढऩे पर अंग्रेजी का प्रसार भी तो बढ़ेगा… ‘

‘जरूर बढ़ेगा। पर देश के ज्यादातर लोगों की पहुंच से अंग्रेजी दूर ही रहेगी। शुरू में तो गांव का गरीब आदमी अंग्रेजी सीखने की कल्पना तक नहीं कर पायेगा। बाद में जब उसकी मजबूरी और जरूरत होगी, तब तक उसके और अंग्रेजीदां लोगों के बीच अंतर और बढ़ जायेगा। यानी हालात में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आयेगा।’

‘ये तो रही भाषा की बात। समाचार सामग्री के स्तर पर क्या बदलाव आयेंगे?’

‘अभी 1000-1200 शब्दों तक के समाचार छपते हैं। आज से 20 साल बाद इतने विस्तृत समाचार पढऩे का समय किसी के पास नहीं होगा। शहरों का विस्तार होगा। इससे दूरियां बढ़ेंगी। और दूरियों के कारण पढऩे के लिए समय घटेगा। मतलब ये कि समाचार छोटे लिखे जायेंगे। पाठकों की ज्यादा रुचि के होंगे। नेताओं से जनता का मोहभंग होगा। इसलिए नेताओं के भाषण छपने कम होते चले जायेंगे।’

कितना सटीक विश्लेषण और पूर्वानुमान था नौनिहाल का! वे अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी की पहुंच के साथ-साथ पाठकों के मन और खबरों के बारे में अखबारों के नजरिये की मानो चौथाई सदी पहले एकदम सही भविष्यवाणी कर रहे थे। आज 24 साल बाद उनकी कही सभी बातें सच साबित हो रही हैं। आज अंग्रेजी के तमाम प्रसार के बावजूद दुनिया के अंग्रेजी अखबारों में सबसे ज्यादा पाठक संख्या वाला अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ भारत में पाठक संख्या के मामले में 11 वें नंबर पर है। पहले 10 नंबर पर भाषाई अखबार हैं। उनमें भी पहले तीन नंबर पर हिन्दी अखबार हैं। इसका सीधा मतलब यही हुआ कि साक्षरता बढऩे का संख्यात्मक रूप से ज्यादा फायदा भाषाई अखबारों को हुआ है। आज भले ही ये अखबार पेजों की संख्या और सामग्री की अधिकता में तो अंग्रेजी अखबारों का मुकाबला नहीं कर सकते, पर पाठकों की संवेदनाओं को यही छू सकते हैं।

भुवेंद्र त्यागीलेकिन अपने इस विश्लेषण और पूर्वानुमान को हकीकत में बदलते देखने के लिए आज नौनिहाल हमारे बीच नहीं हैं। अगर होते, तो वे जरूर अगले दशक या अगली चौथाई सदी के मीडिया के बारे में कुछ और आगे की बात बता रहे होते!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

माफ करना साहब! तुम जीते, मैं हारा

नौनिहाल शर्मा: भाग 30 : काम की अधिकता के बीच ‘दैनिक जागरण’ में हल्के-फुल्के क्षण भी आते रहते थे। और ऐसे क्षण पैदा करने में नौनिहाल को महारत हासिल थी। वे हमेशा मजाक के मूड में रहते थे। गंभीर चर्चा के बीच भी फुलझडिय़ां छोड़ते रहते थे। अक्सर इसमें सबको मजा आता। लेकिन कभी-कभी लेने के देने पड़ जाते।

ऐसा ही एक बार रतीश झा यानी दादा से मजाक करने के चक्कर में हुआ। दादा मेरठ में अकेले रहते थे। खुद ही बनाते-खाते थे। हुआ ये कि एक दिन मैं दफ्तर पहुंचा, तो एक महिला को संदूक के साथ गेट के पास बैठे देखा। वाचमैन से पूछा कि किससे मिलने आयी हैं। उसने जरा तल्खी से कहा, ‘इतनी देर से पूछ रहे हैं। पर ये कह रही हैं कि हम उनके घर से हैं। किसके घर से, यह पूछने पर कहती हैं कि अब उनका नाम कैसे लें?’

मैं उनके पास गया। उन्हें अपना परिचय देकर कहा कि वे अपने ‘उनका’ नाम भले ही ना बतायें, हुलिया बता दें। वे बोलीं, ‘गोरे-गोरे से हैं। धोती-कुर्ता पहनते हैं। खाना खुद ही बना लेते हैं।’

इतना परिचय काफी था। मैं समझ गया, ये दादा की पत्नी हैं। स्टेशन से सीधे यहां आ गयी हैं। मैंने अपने विभाग में जाकर देखा, तो रमेश गोयल और नौनिहाल कुछ बात कर रहे थे। मैंने उन्हें माजरा बताया। नौनिहाल बोले, ‘दादा पेशाब करने गये हैं। आयें तो कहना कि दादा, दादी आयी हैं। बाहर बैठी हैं।’ इतने में दादा सचमुच आ गये। मैं बात का मतलब समझता, उससे पहले ही नौनिहाल ने इशारा किया कि दादा को तुरंत सूचना दी जाये। … और मेरे मुंह से निकल ही गया, ‘दादा, दादी आयी हैं।’

‘कौन दादी? किसकी दादी?’

‘आपकी दादी। बाहर संदूक लेकर बैठी हैं।’

दादा बाहर गये। अपनी पत्नी को देखा। उनके पास जाने के बजाय हमारी ओर पलटे। हम उनके पीछे-पीछे वहां तक आ गये थे। और दादा ने मुझे दौड़ा लिया, ‘बदमाश, हमारी महरारू को लेकर मजाक करता है! छोड़ूंगा नहीं।’

मैं आगे-आगे, दादा पीछे-पीछे। वो तो भला हो रमेश गोयल का, जो उन्होंने मुझे बचा लिया। दादा को यह बताकर कि ये डायलॉग मेरा नहीं, बल्कि नौनिहाल का है। दादा उनसे वैसे ही खार खाये रहते थे। बोले, ‘वो तो शरारतियों का अगुआ है। पर अगर वो आपको कुआ में कूदने को कहेगा, तो आप कूद जाइयेगा का?’

इस बीच वहां काफी लोग जमा हो गये थे। हंसते -हंसते सबका बुरा हाल था।

लेकिन इससे भी मजेदार किस्सा हुआ गोल मार्केट में। हम वहां रोज की तरह चाय पीने गये थे। अचानक हाथ में धोती की लांग संभाले दादा आ गये। हम चाय-समोसे के साथ गपशप कर रहे थे। दादा की नजर कढ़ाही से निकलते रसगुल्लों पर पड़ी। हलवाई से बोले, ‘दादा, रसगुल्ले क्या किलो दिये?’

‘एक रुपये का एक।’

‘नहीं दादा, किलो बताओ।’

‘किलो में नहीं मिलता।’

‘हम तो किलो में ही लेंगे।’

‘कितना किलो?’

‘दाम बताओ।’

‘आप बात तो ऐसे कर रहे हो जैसे 100 रसगुल्ले लेने हैं।’

‘एक किलो में कितना रसगुल्ला आयेगा?’

‘तकरीबन 25।’

‘ठीक है। हम चार किलो खा लेंगे।’

‘चार किलो?’

‘दादा, ऐसे बुड़बक की तरह क्या देख रहे हो? चार किलो में 100 ठो ही तो हुआ ना? उतना खा लेंगे हम।’

‘अगर आपने 100 रसगुल्ले खा लिये, तो मैं आपसे एक भी पैसा नहीं लूंगा। पर अगर नहीं खा पाये तो?’

‘सुनिये दादा, अगर हमने 100 खाये, तो एक पैसा नहीं देंगे। अगर 99 पर रुक गये, तो दूसो का पैसा देंगे।’

इस तरह मजाक में शुरू हुई बात में दादा और हलवाई के बीच शर्त लग गयी। बात पूरे गोल मार्केट में फैल गयी। वहां करीब 50-60 लोग इकट्ठा हो गये। सबको अचरज हो रहा था। 100 रसगुल्लों की शर्त!

दादा ने एक चुल्लू पानी पिया। एक कटोरी उठायी। बोले, ‘दादा, इसमें चार-चार रसगुल्ले रखते जाओ। हम खाते जायेंगे। आप गिनते जाओ। हर 25 रसगुल्ले खाने के बाद हम थोड़ा सा पानी पियेंगे। थोड़ा टहलेंगे। फिर आकर खाने लगेंगे। अब हमें ऐसे घूरिये मत। कहीं जायेंगे नहीं। यहीं सबके सामने शर्त पूरी करेंगे।’

इस तरह दादा ने 100 रसगुल्ले खाना शुरू किया। वे चार रसगुल्ले फटाफट गड़प कर जाते। फिर हलवाई के आगे कटोरी कर देते। जब तक दादा 20 तक पहुंचे, गोल मार्केट में 100 से ज्यादा लोग इकट्ठे हो गये। भीड़ देखकर आसपास से गुजरने वाले लोग भी वहां जमा होने लगे। 25 रसगुल्ले खाकर दादा ने कुछ घूंट पानी पिया। तोंद पर हाथ फेरा। गोल मार्केट के पार्क के दो चक्कर लगाये। फिर आकर रसगुल्ले खाने लगे।

गिनती 50 तक पहुंची।

75 तक पहुंची।

दादा आधे घंटे में 90 पार कर गये। अब गोल मार्केट खचाखच भर गया था। हलवाई का चेहरा उतर गया था। जो कुछ हो रहा था, उसे इसकी उम्मीद नहीं थी।

97, 98, 99, 100 …

दादा ने 100 वां रसगुल्ला खाकर डकार ली। आगे बढ़कर देखा। कढ़ाही में अब भी करीब 10-12 रसगुल्ले बचे थे। दादा बोले, ‘लाओ दादा, ये भी खिला दो। अभी और खा सकते हैं।’

हलवाई रिरियाकर बोला, ‘माफ करना साहब। तुम जीते, मैं हारा। अब ये तो छोड़ दो।’

‘ठीक है। छोड़ो। अब तो कभी शर्त नहीं लगाओगे?’

‘नहीं साहब। अपने बच्चों से भी कह जाऊंगा।’

हम दफ्तर की ओर चले। दादा के विजय जुलूस के रूप में। दादा मदहोशी की चाल में आगे-आगे। रमेश चपरासी उनकी साइकिल लेकर उनके साथ-साथ। और पीछे नारे लगाते हम – 100 रसगुल्ले खाकर दादा दफ्तर को चले!

इस बात की चर्चा महीनों तक रही। लेकिन उन्होंने ऐसा ही एक पराक्रम एक बार मेरे साथ कर दिया। मेरे परिजन गांव गये थे। मैं अकेला था। मैं दिन में कॉलेज की कैंटीन में खाना खा लेता था। रात को दफ्तर से निकलकर बेगम पुल पर मारवाड़ी भोजनालय में खाता था। एक दिन दादा ने पूछ लिया कि खाना कहां खाते हो? मैंने बता दिया।

‘कैसा खिलाता है?’

‘अच्छा होता है।’

‘नहीं दादा, हम पूछ रहे हैं कि कितने में खिलाता है?’

‘छह रुपये में।’

‘कितना।’

‘भरपेट।’

‘तो दादा, एक दिन हम भी चलेंगे।’

नौनिहाल को मैंने यह बताया, तो वे बोले, ‘पेमेंट पहले कर देना। नहीं तो वहां अपमान भी हो सकता है।’

खैर। एक बार रात को ड्यूटी खत्म करके मैं दादा को लेकर मारवाड़ी भोजनालय पहुंच गया। मैनेजर मेरा परिचित था। मैंने उसे 12 रुपये दे दिये कि दो लोगों को खाना है। हम बैठ गये। वेटर ने परोसना शुरू किया। थाली में कटोरियां रखकर दाल-सब्जी वगैरह दीं, तो दादा बोले, ‘अरे दादा, ये पतीली इधर ही रख जाओ।’

इस तरह दादा बार-बार पतीली रखवा लेते। यही हाल रोटियों और चावल का हुआ। पापड़ भी खत्म होते चले गये। अब तक सारे ग्राहक पलट-पलट कर दादा को कौतुक से देखने लगे थे। मुझे अजीब सा लग रहा था। थोड़ी देर में मैनेजर हमारी टेबल पर आया। मेरे कान में फुसफुसाकर बोला, ‘इन साहब को ये मत बताना कि खाने के साथ खीर भी मिलती है।’

उन्हें डर था कि कहीं दादा सारी खीर भी चट न कर जायें।

भुवेंद्र त्यागीअगले दिन मैंने दफ्तर में सबको ये किस्सा सुनाया। हंसते-हंसते सबके पेट में बल पड़ गये। इसके बाद दादा ने कई बार खाने को लेकर शर्त लगाने की कोशिश की। पर कोई कभी उनसे शर्त लगाने को तैयार नहीं हुआ। आखिर दादा ने दफ्तर में चूड़ा लाना शुरू कर दिया। वे मेज पर एक अखबार पर चिवड़ा रख देते। फिर सब मिलकर खाते। लेकिन कोई भी उनके साथ बाहर खाने नहीं जाता था।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

ये नाम और ना-उम्मीदी

नौनिहाल शर्मा: भाग 29 : आफिस में नौनिहाल के कुछ दुश्मन भी बनने लगे थे : रह-रह कर नौनिहाल के बड़े बेटे मधुरेश की बात याद आ रही है- इतने दोस्त थे पापा के, कितनों ने सुध ली? पुष्पेन्द्र शर्मा, नीरजकांत राही, ओमकार चौधरी, विश्वेश्वर कुमार, राजबीर चौधरी, कौशल किशोर सक्सेना, सूर्यकांत द्विवेदी।

ये सभी या तो आर.ई. हैं, या बड़े पदों पर हैं। नरनारायण गोपाल आर. ई. रहे हैं। केवल संतोष वर्मा की मदद मधुरेश को याद है। संतोष ने ही नौनिहाल के असामयिक निधन के बाद मकान के कागजात, पीएफ और ‘अमर उजाला’ के मालिक अतुल माहेश्वरी द्वारा मिली एफ. डी. उनके परिवार तक पहुंचायी थी। पर बाकी कोई इस बेसहारा परिवार के काम नहीं आया, जबकि इन सभी को पत्रकार बनने के दौर में नौनिहाल से कभी न कभी कोई बेशकीमती सलाह या सीख जरूर मिली थी। रमेश गौतम, अभय गप्त, विवेक शुक्ल और ओ. पी. सक्सेना से भी नौनिहाल के अच्छे रिश्ते रहे थे। मधुरेश को इन सबके नाम याद हैं। बचपन में, नौनिहाल की साइकिल के डंडे पर बैठा वह कहीं न कहीं इन सबसे मिल चुका है। इनसे भी उसे उम्मीद थी। कोरी उम्मीद ही रह गयी।

जीवन सचमुच क्रूर रहा है नौनिहाल के परिवार के लिए। तमाम विषमताओं के बावजूद वे अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। मैं बरसों पहले की यादों में खो जाता हूं। पुष्पेन्द्र शर्मा हमसे मिलने ‘दैनिक जागरण’ के दफ्तर में आया है। ‘प्रभात’ की नौकरी छोड़कर वह विदेश जा रहा है। अपनी लाइन बदल रहा है। नौनिहाल का प्रस्ताव है उसे पार्टी देने का। हमारे टी-ब्रेक का भी समय हो गया है। हम सब गोल मार्केट चल देते हैं। डी-144 के अपने दफ्तर से 5 मिनट का रास्ता गपशप में पूरा हो जाता है। पुष्पेन्द्र बार-बार गाये जा रहा है- आयी पायल की झंकार, खुदा खैर करे।

हम अपने अड्डे पर जम जाते हैं। चाय की दुकान की बेंच कम पड़ती हैं, तो गोल मार्केट के पार्क में घास पर बैठ जाते हैं। चाय के साथ समोसों और इमरती का ऑर्डर दिया जाता है। गरमागरम समोसे और इमरती बातों को अपने साथ ना जाने कहां-कहां तक उड़ा ले जाते हैं। चाय के कप से उठती भाप को पुष्पेन्द्र एकटक घूर रहा है। कल ही उसकी फ्लाइट है। शायद वह खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रहा है। नयी जगह और नये काम के लिए।

हमारा फोटोग्राफर गजेंद्र सिंह उससे मजाक करता है, ‘क्यों भई, लौटकर आयेगा या नहीं?’

पुष्पेन्द्र मुस्कराता है।

रमेश गोयल कहते हैं, ‘पूरी प्लानिंग से जा रहा होगा। लौटकर क्यों आयेगा?’

अभय गुप्त बात आगे बढ़ाते हैं, ‘बच्चू, पत्रकारिता की लत छूटती नहीं है आसानी से। देखना, तुझसे भी नहीं छूटेगी।’

ओ. पी. सक्सेना उनका समर्थन करता है, ‘हां, सोलह आने सच बात है। यहां आने के रास्ते तो कई हैं, पर बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं है।’

पुष्पेन्द्र मुस्कराता रहता है। उसके होठों पर वही गाना है- आयी पायल की झंकार, खुदा खैर करे। वह सिगरेट सुलगा लेता है।

नीरजकांत राही चुप्पी को तोड़ता है, ‘संपर्क बनाये रखना।’

अभी तक चुप बैठे नौनिहाल सबकी ओर देखकर उनकी कही बातें समझ रहे हैं। वे नहले पर दहला मारते हैं, ‘पुष्पेन्द्र आयेगा। जरूर लौट आयेगा। सीमा के लिए आयेगा। …देख लेना, आकर फिर पत्रकारिता भी करेगा।

हम सब जोर से ठहाका लगाते हैं। पुष्पेन्द्र के गाल शर्म से लाल हो जाते हैं। तब उसका सीमा से अफेयर चल रहा था। वह टीचर थी। नौनिहाल के जबरदस्त सूत्र थे। उन्हें सबकी इतनी निजी बातें भी पता रहती हैं, मुझे इसका अचरज हो रहा था।

…और नौनिहाल की दोनों बातें सच निकलीं। कुछ साल बाद पुष्पेन्द्र विदेश से मेरठ लौट आया। सीमा से शादी की। ‘अमर उजाला’ में काम शुरू किया। आगरा और गाजियाबाद में आर. ई. रहा। अब मेरठ में ‘हिन्दुस्तान’ का आर. ई. बन गया है।

पुष्पेन्द्र की तरह नीरज और ओमकार चौधरी भी पत्रकारिता को ‘प्रभात’ की देन हैं। ‘जागरण’ और ‘अमर उजाला’ के मेरठ आने से पहले ‘प्रभात’ ही मेरठ में सबसे बड़ा अखबार था।

मैंने एक बार नौनिहाल से पूछा, ‘गुरु, तुमने मेरठ समाचार के बजाय प्रभात में काम क्यों नहीं किया?’

‘प्रभात में मुझे खुद इतना सीखने और दूसरों को इतना सिखाने का मौका नहीं मिलता।’

‘वो क्यों?’

‘प्रभात में सुबोध कुमार विनोद मालिकाना हक ज्यादा ही जताते हैं। वे सबसे खुद को रिपोर्ट करने को कहते हैं। उनका बंधा-बंधाया ढर्रा है। उसी को मानना पड़ता है। प्रयोग करने की कोई गुंजाइश नहीं है वहां।’

‘मेरठ समाचार में थी ये गुंजाइश?’

‘हां। बाबूजी (राजेंद्र गोयल) और दिनेश गोयल रोजमर्रा के काम में ज्यादा दखलंदाजी नहीं करते थे। इसलिए वहां काम की पूरी जिम्मेदारी होती थी और इसीलिए सीखने का ज्यादा मौका मिलता था। नये-नये प्रयोगों का संतोष तो खैर रहता ही था।’

‘लेकिन गुरु, नाम तो प्रभात का ही ज्यादा रहेगा।’

‘प्रभात चमक-दमक वाली दुकान है। मेरठ समाचार सादी दुकान है। नाम चमक-दमक का ज्यादा होता है, पर क्वालिटी सादी दुकान में भी हो सकती है।’

यह नौनिहाल की शैली थी बात को समझाने की। और उनकी बात सोलह आने सही थी। अगर मुझे शुरू में ‘मेरठ समाचार’ में मौका नहीं मिलता, तो ना जाने पत्रकारिता का मेरा सफर कैसा रहता! वैसे प्रभात से मेरठ के कई पत्रकार निकले। पर मेरठ समाचार एकदम शुरू में अपने पत्रकारों को ऑलराउंडर बना देता था। नौनिहाल ने वहां मुझसे 17 साल की उम्र में रिपोर्टिंग, उप संपादन और फीचर लेखन जैसे तमाम काम करा लिये थे। और उस सबको मुझे जागरण में बहुत फायदा हुआ।

लेकिन जब ‘प्रभात’ से पुष्पेन्द्र, ओमकार व नीरज और ‘हमारा युग’ से अनिल त्यागी ‘जागरण’ में आये तो जागरण की टीम बहुत ठोस बन गयी। संपादक मंगल जायसवाल को बड़ा नाज था कि उन्हें एक शानदार टीम मिली है। भगतशरणजी ने ठोक-बजाकर नियुक्तियां की थीं। भागवतजी तो कुछ महीने बाद लौट गये, मंगलजी को बनी-बनायी टीम मिली।

नौनिहाल अक्सर मंगल जी को अखबार की गलतियां दिखाते रहते थे। इससे बाकी सहयोगी कभी-कभी नाराज भी हो जाते। कहते, यार क्यों पचड़े में फंसता है, अपना काम कर और घर जा। पर नौनिहाल अड़ जाते कि कुछ गलती देखकर आंखें कैसे बंद कर लूं। मंगल जी इसीलिए उन्हें बहुत मानते थे। उनकी हर राय और सुझाव को गंभीरता से लेते। ये सुझाव रिपोर्टिंग, एडिटिंग और ले-आउट तक हर क्षेत्र के होते।

लेकिन इससे विभाग में नौनिहाल के कुछ दुश्मन भी बनने लगे थे…

कुछ लोगों को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था। किसी को लगता कि उसकी गलतियां निकाली जा रही हैं। किसी को लगता कि नौनिहाल बिना मतलब टांग अड़ा रहे हैं। चूंकि नौनिहाल सुन नहीं सकते थे, इसलिए कई बार उनकी मौजूदगी में भी उनकी निंदा चल निकलती। ऐसे में मुझसे रहा नहीं जाता। मैं उन निंदकों से भिड़ जाता। सबसे बड़े निंदक थे रतीश झा। वे आदमी बहुत बढिय़ा थे। पर उनमें अहं बहुत था। अपनी गलती निकाला जाना वे बिल्कुल नहीं पचा पाते थे। अक्सर नौनिहाल की बुराई करते सुने जाते। और अक्सर ही मैं उनसे भिड़ जाता। वे कहते, ‘अरे दादा, आप काहे बीच में पड़ते हैं? आपको कुछ नहीं ना कह रहे हैं?’

‘मेरे सामने आप बिना मतलब उनकी बुराई करेंगे तो मैं सुनने वाला नहीं हूं।’

‘लेकिन हम सही बतिया कर रहे हैं।’

‘माफ करना दादा, आप उनके सामने कहिये ये सब।’

‘अरे दादा, उनके सामने कह कर भी क्या फायदा। ऊ सुन तो सकते नहीं हैं।’

भुवेंद्र त्यागी‘ठीक है। आप उनकी बुराई उनके सामने कागज पर लिखकर कीजिये।’

और दादा वहां से खिसक लेते।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

‘इतने दोस्त थे पापा के, कितनों ने सुध ली?’

नौनिहाल शर्मा: भाग 28 : दिवाली के बाद पहली बार छुट्टी लेकर मेरठ आया हूं। अपने पापा को देखने के लिए। उनकी तबियत जरा खराब चल रही थी। चैकअप में चिन्ता की कोई बात नहीं मिली। सुकून मिला। फिर मैं चल पड़ा नौनिहाल के घर की ओर। दिसंबर में सुधा भाभी को पैरेलिटिक अटैक होने के बाद उनके बच्चों से फोन पर बात होती रही थी। दो बार भाभीजी से भी बात हुई थी। फोन पर उन्होंने पहचान लिया था। मुझे लगा था कि वे बहुत ठीक हो चुकी हैं।

शास्त्री नगर के पास जागृति विहार के तीसरे सैक्टर में उनके घर के सामने खड़ा हूं। बहुत कुछ बदला-बदला सा लगता है। छोटा सा घर। लगभग सड़क पर ही दरवाजा। बाहर के कमरे में ही भाभीजी लेटी हुई हैं। बड़ा बेटा मधुरेश दरवाजा खोलता है। मैं अपने छोटे भाई अरुण के साथ अन्दर दाखिल होता हूं। नमस्ते करके भाभीजी से पूछता हूं, ‘पहचाना क्या?’ वे थोड़ा तिरछी होकर हमें देखती हैं। मुझे नहीं पहचान पातीं। शायद मेरा नाम उन्हें याद नहीं आता। लेकिन आश्चर्य की बात, अरुण को पहचान लेती हैं। कहती हैं, ‘ये तो अरुण त्यागी हैं।’ (मेरे मुबई जाने के बाद अरुण का ही उनके घर ज्यादा आना-जाना रहा।) मधुरेश मेरी ओर इशारा करके बोलता है, ‘और ये?’ वे कहती हैं, ‘अरुण के बड़े भाई।’ मुझे राहत मिलती है कि वे पहचान तो रही हैं पर उन्हें मेरा नाम याद नहीं आ रहा था।

नौनिहाल की बड़ी बहन हरदम सुधा भाभी के साथ ही रहती हैं। उनका पूरा ख्याल रखती हैं। बच्चों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मधुरेश पुरानी यादों में डूब जाता है। तीनों बच्चों में केवल उसे ही नौनिहाल की बहुत सारी बातें याद हैं। वास्तव में नौनिहाल ने मधुरेश को भी बहुत कम उम्र में ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। उसे वे बहुत से काम सिखाने लगे थे। मधुरेश एक पुरानी सी फाईल ले आता हैं। उसमें कई कागजात हैं। उनके बीच से एक पोस्ट कार्ड निकलता है। सामने का हिस्सा बहुत बारीक लिखावट से पूरी तरह भरा हुआ। पते वाली तरफ करीब 1 ईंच जगह खाली। मुझे यह तो मालूम था कि नौनिहाल पोस्ट कार्ड पर सबसे ज्यादा शब्द लिखने का रिकार्ड बनाने में लगे थे, पर ये पता नहीं था कि अपनी इस धुन में वे इतना ज्यादा काम कर चुके थे। लिखावट इतनी बारीक है कि मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आता। पर मधुरेश उसे पढ़ लेता है। वह सुनाता है, ‘पाठको, यूं तो आपने हजारों कहानियां सुनी होंगी। सुनाने के लिए एक से एक किस्सागो मिले होंगे। उनमें अपने लहू से लिखने वाले भी रहे होंगे. . .’

इतना पढ़ने से बाद मधुरेश ने अमर गोस्वामी की 11 कहानियों का संकलन ‘उदास राघोदास’ निकालकर दिखाया। वह ये बताकर अचरज में डाल देता है कि 112 पेज की इस किताब के लगभग 100 पेज पापा ने से पोस्ट कार्ड पर लिख लिए थे। बाकी बची एक इंच जगह में 12 पेज भी लिखकर वे इस पोस्ट कार्ड पर पूरी किताब उतार देते। अक्टूबर, 1992 में मु्जफ्फरनगर के आलोक गुप्ता ने एक पोस्ट कार्ड पर 22 हजार 761 शब्द लिखकर लिंमका बुक आॅफ रिकाॅड्र्स में अपना नाम शामिल कराया था। नौनिहाल इस पोस्ट कार्ड पर उससे ज्यादा शब्द लिख चुके थे। चूंकि अभी एक इंच जगह और बची थी, इसलिए वे गिनीज आॅफ वल्र्ड रिकाड्र्स में अपना नाम शामिल कराना चाहते थे। लेकिन उनका ये काम अधूरा रह गया. . .

हम सब गमगीन हो उठे हैं। अचानक सुधा भाभी सुबकने लगती हैं। शायद वे अपनी यादों में चली गयी हैं। और यादें आंसुओं में बदल जाती हैं। अरुण मुझे इशारा करता है कि पुरानी बातें इनके सामने मत दोहराओ। नौनिहाल की बहन सुधा भाभी को बैठा देती हैं। उन्हें दायीं ओर पैरेलिसिस है। बायीं ओर का हिस्सा ठीक है। पर अब वे अटैक से काफी हद तक उबर चुकी हैं। यहां तक कि दायें हाथ को भी थोड़ा ऊपर-नीचे कर लेतीं हैं। मगर न जाने क्यों उन्हें लगता रहता है कि अपनी सारी जिम्मेदारियां उन्हें जल्दी पूरी कर लेनी चाहिएं। इसीलिए मधुरेश का रिश्ता कर दिया है। सर्दियों में उसकी शादी है। मधुरेश खुश भी है और उदास भी। 28 साल का हो गया है। अभी तक नौकरी नहीं मिली। ट्यूशन पढ़ाकर किसी तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश कर रहा है। चाहता था कि अच्छी तरह सैटिल होने की बाद ही शादी करें। पर भाभीजी की इच्छा के सामने उसे झुकना पड़ता हैं।

हमेशा शान्त और संयत रहने वाले मधुरेश की आवाज में धीरे-धीरे थोड़ी तुर्शी आने लगती है- इतने दोस्त थे पापा के। एक-दो को छोड़कर किसी ने कोई सुध नहीं ली। कई के पास तो मैं खुद गया। कई को फोन किया। किसी ने मदद नहीं की। ऐसे में तो गैर भी काम आ जाते हैं, इन सबको तो फिर भी हम अपना ही समझते थे।

मधुरेश की आवाज में नमी आ जाती है। सहसा मुझे ख्याल आता है, कोई आधा दर्जन तो आज ऐसे आरई ही हैं, जिनसे नौनिहाल की खासी नजदीकी रही थी। वे चाहते तो मधुरेश को खुद नौकरी दे सकते थे या उसे कहीं नौकरी दिला सकते थे। लेकिन ये दूसरा वक्त है, वो दूसरा वक्त था। तब नौनिहाल मुफलिसी में भी दूसरों के लिए अपनी बाहें और दिल खुले रखते थे। आज लोग बेहद अच्छी स्थिति में होने के बावजूद बाहंे और दिल, दोनों बंद रखते हैं। सबको केवल अपना ही हित दिखता है। दूसरों की किसी को कोई परवाह नहीं है।

नौनिहाल का छोटा बेटा प्रतीक और बेटी ज्योति भी आकर बैठ जाते हैं। प्रतीक बीआईटी से मैकेनिकल में बीटैक कर रहा है। फाइनल ईयर में है। एनटीपीसी में इन्टर्नशिप कर चुका है। एनटीपीसी, भेल और रेलवे में से कहीं नौकरी करना चाहता है। मैं उसे डीआरडीओ या इसरो के लिए तैयारी करने को कहता हूं। उसे थोड़ी हिचक है, ‘मेरी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है।’

‘तो क्या हुआ? अभी एक साल है। उसकी तैयारी की जा सकती है। ये कोई बड़ी समस्या नहीं है।’

वह सहमति में सिर हिलाता है।

ज्योति डीएन कालेज से बीएससी कर रही है। पीसीएम की फाईनल ईयर की स्टूडेंट है। मैथ्स में एमएससी करके लैक्चरर बनना चाहती है। इसके लिए एमएससी के बाद एमफिल, पीएचडी और नैट क्वालीफाई करना होगा। यानी कम से कम आठ साल की मेहनत और। उसे मैथ्स के बजाय एनवायरमेन्टल साइंस में एमएससी करने की सलाह देता हूं। इसका स्कोप वह तुरन्त समझ जाती है। हालांकि इसमें उसे ज्यादा मेहनत लगेगी, लेकिन अच्छा स्कोप देखकर वह मेहनत करने को तैयार हो जाती है।

प्रतीक और ज्योति को अपने पापा की ज्यादा याद नहीं है। उन्होंने अपनी मां और बड़े भाई से काफी सुना है। दूसरों से भी। उसी के आधार पर उनके दिमाग में एक छवि है कि उनके पिता एक जीनियस थे। उन्हें इसका अहसास है कि पिता के न रहने और मां के बीमार होने के कारण उन पर बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। फिर भी वे पूरी शिद्दत से जिन्दगी से जूझ रहे हैं। उनके कुछ गिले-शिकवे हैं। कुछ शिकायतें हैं। कुछ कड़वाहट भी उनके मन में है। इस सब के बावजूद उन्हें गर्व इस बात का है कि नौनिहाल उनके पिता थे और बहुत से लोग मानते हैं कि वे एक अच्छे और सच्चे पत्रकार थे।

नौनिहाल की यादों में डूबते-उतराते हमें करीब एक घंटा हो चला है। बैठे-बैठे भाभीजी थकने लगती हैं। हम उन्हें लेटने को भुवेंद्र त्यागीकहकर विदा लेते हैं। वे कुछ उदास सी हैं। बाहर शाम भी उदास है। मधुरेश, प्रतीक और ज्योति हमें छोड़ने बाहर तक आते हैं। मधुरेश अपनी शादी में आने का आग्रह दोहराता है। अब हम उनसे विदा ले रहे हैं। अचानक मधुरेश बोलता है, ‘पोस्ट कार्ड पर विश्व रिकार्ड लिखने का पापा का अधूरा काम मैं जरूर पूरा करूंगा!’

उसकी आवाज में दृढ़ता है। हौसले में मानो पंख लगे हैं। उसकी ये जिद बिल्कुल नौनिहाल जैसी है।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

बच्चू, अभी तू आदर्शवाद से ऊपर नहीं उठा

नौनिहाल शर्मा: भाग 27 : ‘दैनिक जागरण’ और ‘अमर उजाला’ ने मेरठ की पत्रकारिता का परिदृश्य ही बदल दिया था। पहली बार मेरठ के पाठकों को अपने शहर और उसके आसपास की खबरें इतने विस्तार से पढऩे को मिलीं। अपने बीच की हस्तियों का पता चला, जिनके बारे में दिल्ली के अखबारों में कुछ नहीं छपता था। मेरठियों को इन अखबारों की आदत पड़ गयी। इससे इन अखबारों का सर्कुलेशन तेजी से बढ़ा।

फिर शुरू हुई ‘सर्कुलेशन वार’। इसकी योजना बड़े स्तर पर बनायी जाती। मध्यम स्तर इसके क्रियान्वयन की देखरेख करता। क्रियान्वित करने का जिम्मा होता निचले स्तर का। इस स्तर के लोग हॉकरों को पटाते कि भइया, हमारा अखबार ऊपर रखना। उच्च स्तर जरूरत पडऩे पर ही सामने आता।

हॉकरों को पार्टियां दी जातीं। उपहार दिये जाते। बड़े डीलरों के सामने यह सब होता, ताकि हॉकर अपने वादे से ना मुकरें। पहले तो हॉकरों को समझ ही नहीं आया कि ये हो क्या रहा है। उन्हें इसका जरा भी अनुभव नहीं था। दिल्ली के अखबारों की ‘सैटिंग’ डीलर ही कर देते थे। हॉकर उनके हाथों की कठपुतली थे। किसी भी अखबार के सर्कुलेशन की घट-बढ़ का उन्हें कोई फायदा नहीं होता था। पर ‘दैनिक जागरण’ और ‘अमर उजाला’ ने खेल ही बदल दिया। बाजी धीरे-धीरे बड़े डीलरों के हाथों से निकलकर हॉकरों के हाथों में आने लगी। इसकी एक वजह हॉकरों की संख्या का बढऩा भी था।

दोनों अखबारों ने नये हॉकर बनाने का चलन शुरू किया। इन नये हॉकरों को सर्कुलेशन के खेल के नये नियम सिखाये गये। हॉकरों में भी गुट बन गये। दोनों अखबारों के धड़े बन गये। कई बार टकराव की नौबत आ जाती। तब डीलर ही बीच-बचाव कराते। दोनों अखबारों के सर्कुलेशन विभाग के लोगों के सामने बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती रहती। इसलिए वे कई बार सीमाएं भी लांघ जाते। तब मामला उच्च स्तर पर सुलझाया जाता। इस स्पर्धा में हॉकरों की बन आयी। वे अपना कमीशन बढ़ाते चले गये। आखिर दोनों अखबारों में शीर्ष स्तर पर फैसला किया गया कि अपने सर्कुलेशन वार में हॉकरों को शामिल ना किया जाये।

कई हॉकर नौनिहाल के दोस्त थे। उनसे नौनिहाल को सर्कुलेशन का सारा दंद-फंद पता चलता रहता था। इसके लिए वे महीने में एक चक्कर टाउन हॉल का लगा देते थे। कई बार मैं भी उनके साथ गया। वहां अंदर की बातें भी पता चल जाती थीं। एक बार एक हॉकर ने बेहद राज की बात बतायी। अमर उजाला के धड़े की जागरण की धड़े से बहस हो गयी। जागरण बोला, ‘हमसे दो साल बाद आये हो मेरठ में। इसलिए हमेशा पीछे ही रहोगे सर्कुलेशन में। चाहे जितनी मर्जी कोशिश कर लो।’

जागरण ने जवाब दिया, ‘ये पहले-बाद में आने का राग छोड़ो। तुम्हें कई दंगे मिल चुके हैं यहां जमने के लिए। हमें अभी केवल एक दंगा मिला है। दो-तीन दंगे और हो जाने दो। फिर बात करना सर्कुलेशन की।’

‘हां-हां, देख लेंगे। दंगे की हमारी रिपोर्टिंग का जवाब है क्या तुम्हारे पास?’

‘दिखा देंगे। जवाब भी देंगे। बस, हमें दो-तीन दंगे और मिल जायें।’

हमें ये पता चला, तो काटो खून नहीं। दंगों से पूरा शहर परेशान हो जाता था। जान-माल का नुकसान होता था। महीनों तक गरीबों का बजट बिगड़ा रहता था। रोज मजदूरी करके कमाने-खाने वालों को कर्ज लेना पड़ता था। वे कभी-कभी तो सालों तक उस कर्ज को चुका नहीं पाते थे। और अखबारों के सर्कुलेशन वाले इन्हीं दंगों को अपने लिए फायदेमंद मान रहे थे…

मेरा मूड ऑफ हो गया। नौनिहाल ने कमर पर धप्पा मारते हुए कहा, ‘यार तू बहुत जल्दी इमोशनल हो जाता है। ये तो अपने धंधे की बात कर रहे हैं। इसे दिल पर लेने की क्या जरूरत है?’

‘दिल पर क्यूं ना लिया जाये? इनकी संवेदनशीलता तो मानो खत्म ही हो गयी है।’

‘ठीक है। तुझे अपने विभाग का ही उदाहरण देता हूं। जब किसी दुर्घटना में 50 लोगों के मरने की खबर आती है, तो हम भी कहते हैं- वाह, लीड मिल गयी।’

‘हम खबर के महत्व पर प्रतिक्रिया करते हैं इस तरह। पर यह कभी नहीं चाहते कि ऐसी कोई दुर्घटना हो।’

‘तो वे भी नहीं चाहते कि कभी दंगे हों। पर उन्हें यह लालसा जरूर रहती है कि दंगे हो गये, तो अखबार का फायदा हो जायेगा।’

‘पर लालसा तो रहती है ना?’

‘बच्चू, अभी तू आदर्शवाद से ऊपर नहीं उठा है। आदर्शवाद ठीक है। पर और भी बहुत सी चीजें हैं। उनका भी महत्व है। सबके तालमेल से ही बात बनती है।’

‘पर मैं तो पत्रकारिता में यह सोचकर आया था कि यह जन-सरोकार का पेशा है। इसमें संवेदनशीलता तो होनी चाहिए।’

‘संवेदनशीलता पर धंधा नहीं चलता। धंधा नहीं चले, तो दुनिया नहीं चलती। अखबारों में स्पर्धा होगी, तो संवेदनशीलता पर ही आंच आयेगी। इसलिए इस पर भावुक होने की जरूरत नहीं है। अभी तो तूने कुछ नहीं देखा है। आगे-आगे हालात और बदलेंगे।’

‘फिर तो पत्रकारिता मिशन न रहकर पेशा बन जायेगी।’

‘बिल्कुल बनेगी। अब अखबार निकालने में बहुत पूंजी लगती है। उसे जुटाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। पूंजी जुटाने के बाद उस पर लाभ भी चाहिए। इसलिए बाजार की नब्ज पर हाथ रखना जरूरी है।’

‘आप तो पूंजिपतियों की भाषा में बात कर रहे हैं।’

‘मैं यथार्थवादी हूं। किसी भ्रम या झूठे आदर्शवाद में नहीं रहता। इसीलिए तुझे एकदम स्पष्टï तरीके से बता रहा हूं कि आदर्शवादी होने के बजाय व्यावहारिक बनना जरूरी है।’

‘यह पलायन नहीं है क्या?’

‘किससे पलायन और कैसा पलायन?’

‘सच्चाई से। अखबार पर आम पाठक बहुत यकीन करता है। क्या ऐसा करके हम उसके भरोसे को नहीं तोड़ेंगे?’

‘भरोसे को तोडऩे की भी बात नहीं है। मैं झूठी खबरें छापने की बात तो कर नहीं रहा। खबर की सच्चाई के लिए तो मैं आखिरी सांस तक लडऩे को तैयार हूं। पर कोरे आदर्श की आड़ में यथार्थ से भी तो आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।’

‘गुरू, आज पहली बार तुम्हारी बातें मेरे गले नहीं उतर रहीं। तुम्हारा अंदाज कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है।’

‘यह मुद्दा बेहद जटिल है। लंबी बहस मांगता है। फिर कभी इस पर लंबी चर्चा करेंगे।’

नौनिहाल 1980 के दशक में यह सब कह रहे थे। तब मैं उनसे सहमत नहीं था। आज मैं इस बात को सोलह आने सच मानता हूं, पर वे हमारे बीच नहीं हैं…

… और आज आलम ये है कि मीडिया में हर चीज सैलिब्रेट कर ली जाती है। गुजरात के दंगे, उड़ीसा में ईसाइयों पर हमले, सुनामी, मुम्बई में 26 जुलाई 2005 की बाढ़, 11 जुलाई 2006 के ट्रेन विस्फोट, 26 नवम्बर 2008 का आतंकवादी हमला, ऑनर किलिंग, आरुषि हत्याकांड और मॉडल विवेका बाबाजी की आत्महत्या… सूची अंतहीन है … और इन सबको मीडिया ने सैलिब्रेशन में तब्दील कर लिया।

नौनिहाल ने पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया था। उनका कोई गुरु भी नहीं था। फिर भी वे न केवल अच्छे पत्रकार बने, बल्कि दर्जनों युवा पत्रकारों को, सच कहा जाये तो, कलम पकड़कर लिखना भी सिखाया। पर इस सबसे बड़ी खूबी उनमें ये थी कि उनकी दृष्टि बहुत व्यापक और दूरगामी थी।

आज पेड न्यूज का जमाना है। मीडिया बाजार की धुन पर नाच रहा है। झूठे सपने दिखा रहा है। पाठक बेचारे परेशान। दर्शक भुवेंद्र त्यागीहैरान। अधर में लटकी है सबकी जान। और मीडिया कभी भी गा उठता है- मेरा भारत महान। नौनिहाल मीडिया के व्यावसायिक रुख के तो समर्थक थे, पर शायद वे मीडिया को बाजार की कीमत पर जनता के असली मुद्दों को छोडऩे से बहुत दुखी होते। उन्होंने यह कल्पना नहीं की होगी कि 21वीं सदी की दूसरी दहाई तक मीडिया इतना गिर जायेगा!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

जागरण, अमर उजाला और मेरठ के दंगे

naunihal sharma: भाग 26 : 1980 के दशक में मेरठ हमेशा बारूद के ढेर पर बैठा रहता था। हरदम दंगों की आशंका रहती थी। गुजरी बाजार, शाहघासा, इस्लामाबाद, शाहपीर गेट, मछलीवालान और भुमिया का पुल बहुत संवेदनशील स्थान थे। हिन्दू-मुस्लिम समुदाय यों तो शहर में एक-दूसरे के पूरक थे- एक के बिना दूसरे का काम नहीं चलता था- मगर सियासी चालबाजों को उनकी गलबहियां नहीं भाती थीं। ये दोनों समुदाय वोट बैंक थे।

तब मुकाबला दो ही पार्टियों में हुआ करता था। कांग्रेस और भाजपा में। सपा-बसपा जैसी पार्टियां नहीं थीं। इसलिए मतदाताओं के सामने सीमित विकल्प होते थे। और इसीलिए नेतागण दंगे का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया करते थे (अब भी करते हैं, लेकिन तब बाहुबलियों जैसे विकल्प नहीं थे। यही वजह है कि तब दंगे अक्सर होते रहते थे।)। दंगों का भी समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र होता है। वास्तव में साम्प्रदायिक तत्व से ज्यादा महत्वपूर्ण तत्व यही होते हैं। और इन दोनों तत्वों के लिए प्रचार बेहद जरूरी होता है। इसलिए यह संयोग नहीं है कि मेरठ में ‘जागरण’ (1984) और ‘अमर उजाला’ (1986) के आने के बाद दंगों की बाढ़ सी आ गयी थी।

वजह साफ थी।

इन दोनों अखबारों के आने से पहले मेरठ में अखबार तो काफी थे, पर उनका फलक इतना बड़ा नहीं था। इसलिए ‘जागरण’ और ‘अमर उजाला’ के आने से दंगों के ‘सूत्रधारों’ के मजे आ गये। किसी मामूली सी बात पर दंगा होता। जैसे- दो साइकिलों की टक्कर, छेड़छाड़, मंदिर या मस्जिद के पास अवांछित चीज का मिलना, सब्जीवाले से झगड़ा, पतंगबाजी में तकरार, रिक्शावाले से पैसे को लेकर कहासुनी, खेल-खेल में बच्चों की भिड़ंत…

वजह कुछ भी हो, हल्ला मचता। ईंट-पत्थर फेंके जाते। भगदड़ मच जाती। फिर होती छुरेबाजी। एक लाश गिरते ही शहर में पुलिस की जीपें दौडऩे लगतीं। पहले पुलिस हालात को काबू में करने की कोशिश करती। कई जगह पुलिस पर भी पथराव हो जाता। संकरी गलियों में छुरेबाजी जारी रहती। आखिर पुलिस जीपों के लाउडस्पीकरों से कर्फ्यू की घोषणा की जाती। कई दिन कर्फ्यू रहता। पूरा शहर सहमा रहता। कर्फ्यू में ढील दी जाती। लोग जरूरत की चीजें खरीदने के लिए बाजारों की ओर दौड़ पड़ते। फिर कहीं छुरा चल जाता। और फिर कर्फ्यू लग जाता। उसके बाद शुरू होता कर्फ्यू वाले इलाकों में राहत पहुंचाने का सिलसिला। यहीं से शुरू हो जाती राजनीति। जहां जिसका वोट बैंक होता, वह वहीं राहत लेकर जाना। उसके फोटो अखबारों में छपवाये जाते। उन फोटो और खबरों के आधार पर ऊपर तक सोढिय़ां लगायी जातीं।

यह सब चलता रहता। जनता हमेशा सिमटी-सहमी रहती कि पता नहीं कब कब चिंगारी भड़क उठे। ऐसे में पत्रकारों की खासी मुसीबत रहती। कर्फ्यू पास बनवाकर किसी तरह ड्यूटी पर पहुंचते। ऐसे में पड़ोसी घर आकर लिस्ट थमा जाते। सबको कुछ न कुछ मंगवाना रहता। तो पड़ोसी धर्म भी निभाना पड़ता। दफ्तर से मारुति जिप्सी लेने आती। सुबह को निकलती, तो नाइट शिफ्ट वालों को भी बटोर लाती। यानी डबल ड्यूटी। रात को सबको घर छोड़ती। जब तक सुबह के गये घर न लौट आते, तब तक घरवालों के मन में आशंकाओं के बादल उमड़ते-घुमड़ते रहते। इस तरह रोज 14-15 घंटे हम दफ्तर में बिताते। जागरण का दफ्तर साकेत में था। वहां कभी कर्फ्यू नहीं लगता था।

दंगे के दौरान न केवल काम बढ़ जाता, बल्कि आने-जाने का जोखिम भी रहता। लेकिन इसके बावजूद एक जोश रहता। महसूस होता कि कुछ बहुत जिम्मेदारी का काम कर रहे हैं। वो इसलिए कि उन दिनों खबरिया चैनल तो थे नहीं। तो सूचनाएं पाने के लिए सबकी नजरें रेडियो और अखबारों पर रहतीं। रेडियो था सरकारी। उस पर बहुत संक्षिप्त खबर आती मेरठ के दंगे की। वो भी सरकारी नजरिये से। ले-देकर रह जाते अखबार। दंगे के दिनों में मेरठ में अखबार ब्लैक में मिलते।

आज भी मुझे दुनिया के सबसे साहसी लोगों में मेरठ के वे हॉकर भी लगते हैं, जो कफ्र्यू और अपनी जान की परवाह किये बिना सुबह-सुबह साइकिलों पर अखबार लादकर निकल पड़ते शहर में बांटने। हर गली के नुक्कड़ पर लोगों की भीड़ जमा रहती। जिनके घर रोज के अखबार बंधे हुए थे, उन्हें अखबार पहले मिलता। बाकी लोग हॉकर के पीछे भागते। तीन-चार गुना पैसे देकर भी अखबार पा जाते , तो खुद को भाग्यशाली समझते। फिर उन अखबारों का सामूहिक वाचन होता। जोर-जोर से खबरें पढ़ी जातीं। दूसरे मोहल्लों में पिछले दिन हुई वारदातों का पता चलता। लोग चिल्ला-चिल्ला कर कहते-

‘देखो, मैं बोल रहा था ना, रात को मोरीपाड़ा पर हमला हुआ था।’

‘और गुजरी बाजार की ओर से भी तो हल्ले की खबर आयी है छपके।’

‘भुमिया के पुल पर तो चाकुओं से गुदी लाश मिली।’

‘सुभाष नगर पर भी हो ही जाता हमला… वक्त पे पुलिस के पहुंचने से बच गये।’

‘कोतवाली के सामने कचरे का ढेर जमा है चार दिन से। कफ्र्यू खुल नहीं रहा। जमादार लोग उठाने भी कैसे आयें?’

‘ये तो पुलिस की जिम्मेदारी है। जब कफ्र्यू लगाया है, तो सड़कों पर भी तो उसी का राज हुआ। फिर वो सफाई क्यों नहीं कराती?’

‘हां भई, बदबू के मारे सिर फटा जा रहा है। कफ्र्यू हटे, तो ये गंदगी ही पहले हटवाएं।’

इसी तरह की चर्चाएं कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में होती रहतीं। जब हमें लेने अखबारों की गाड़ी आती, तो लोग पहले अपने सामान की लिस्ट थमाते। फिर खबरें छापने को कहते। उनकी खबरें भी बहुत विविधता वाली होतीं-

‘आप ये जरूर छापना कि तीन दिन से हमारे महल्ले में दूध नहीं आया है। छोटे बच्चों ने रो-रो कर बुरा हाल कर रखा है।’

‘नुक्कड़ की दुकान वाले ने भी अंधकी मचा रखी है। दो रुपये का सामान आठ रुपये में दे रहा है। हम पूछें, उसकी खरीदी तो कर्फ्यू के पहले की है। फिर वो इतनी महंगाई क्यूं किये हुए है?’

‘साहब, औरत के दिन पूरे हो गये हैं। जचगी कैसे होगी? ये मरे खाकी वाले तो दूसरे महल्ले से दाई को भी ना लाने देंगे।’

‘लड़की को छूचक पहुंचाना है। बताओ कैसे पहुंचायें?’

‘खुद तो भूखे रह भी लें, पर बकरी को तो घास चाहिए। कईं ना मिल रई।’
‘चौराहे के पीछे वाली चाय की दुकान में मुझे तो कुछ गड़बड़ लगै है। कल वहां दो लड़के कुछ सामान रखकर भाग गये। आप जरा चैक करा लेना पुलिस से कि कुछ असलाह वगैरा तो नहीं है।’

एक दिन गाड़ी का ड्राइवर नहीं आया था। इसलिए विज्ञापन विभाग के मुनीश सक्सेना गाड़ी चला रहे थे। मैं और फोटोग्राफर गजेन्द्र सिंह ही थी गाड़ी में। हमें नौनिहाल ने अपने घर बुला लिया। हम अंदर गये। एक कमरे के घर में मधुरेश खेल रहा था। प्रतीक सो रहा था। गुडिय़ा तब तक नहीं हुई थी। उसी कमरे में नौनिहाल की पूरी गृहस्थी थी। कपड़े, बर्तन, दो खाट, एक फोल्डिंग पलंग… और इनसे जो जगह बची, उसमें अखबार, पत्रिकाएं, किताबें!

सुधा भाभी ने हमें नींबू की शिकंजी पिलायी। फिर पंखा झलते हुए हमारे पास बैठ गयीं। बोलीं, ‘भइया इनका ध्यान रखा करो। बोल-सुन तो सकते नहीं, पर जोश ऐसा दिखाते हैं जैसे ये ही कपिल देव हों। हमारा तो कोई आगे-पीछे है ना। बस तुम लोग ही हो।’

वे सुबकने लगी थीं। हम भी सीरियस हो गये। हमारे मुंह ही मानो सिल गये। क्या बोलें? नौनिहाल अपनी मस्ती में थे।

अचानक उन्हें लगा कि कुछ गंभीर बात हो गयी है। (उन्होंने सुधा भाभी को बोलते हुए नहीं देखा था। नहीं तो वे समझ जाते।)

वे ठहाका लगाकर बोले, ‘जरूर मेरी बामनी (वे भाभी को प्यार से यही कहते थे) ने मरने-खपने की कुछ बात कह दी है।’

bhuvendra tyagiफिर भाभी की ओर देखकर बोले, ‘तू क्यूं चिंता करती है? मैं ना रहया, तो मेरे ये दोस्त हैं ना तुम्हारा खयाल रखने को!’

इतना कहकर वे उठकर चल दिये। हम सबका मन भारी हो गया। हम धीरे-धीरे जिप्सी की ओर बढ़े। भाभी हमें ओझल होने तक देखती रहीं…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

खबर बनाते हुए सुनाने की आदत

: भाग 25 : पलाश दादा अपनी प्रखरता से जल्द ही पूरे संपादकीय विभाग पर छा गये। उनकी कई खूबियां थीं। पढ़ते बहुत थे। जन सरोकारों से उद्वेलित रहते थे। जुनूनी थे। सिस्टम से भिडऩे को हमेशा तैयार रहते। शोषितों-वंचितों की खबरों पर उनकी भरपूर नजर रहती। उनके अंग्रेजी ज्ञान से नये पत्रकार बहुत आतंकित रहते थे। बोऊदी (सविता भाभी) की शिकायत रहती कि उनकी तनखा का एक बड़ा हिस्सा अखबारों-पत्रिकाओं-किताबों पर ही खर्च हो जाता है। पलाश दा के संघर्ष के दिन थे वे। नया शहर, नया परिवेश, मामूली तनखा और ढेर सारा काम। पर उन्होंने कभी काम से जी नहीं चुराया। वे पहले पेज के इंचार्ज हुआ करते थे। उनके साथ नरनारायण गोयल, राकेश कुमार और सुनील पांडे काम करते थे। इनमें से कोई एक डे शिफ्ट में होता। वह अंदर का देश-विदेश का पेज देखता। उनके साथ होता कोई नया उपसंपादक।

कभी पहले पेज की टीम का कोई छुट्टी पर होता, तो किसी और डेस्क से किसी उपसंपादक को पेज एक पर भेजा जाता। आम तौर पर लोग उससे बचने की कोशिश करते, क्योंकि पलाशदा अनुवाद बहुत कराते थे। अगर कोई उनसे कहता कि भाषा या वार्ता का तार (टेलिप्रिंटर पर आने वाली खबर) आने का इंतजार कर लिया जाये, तो वे कहते, ‘जो खबर आ गयी है, उसे आगे बढ़ा दिया जाये। सबके हिन्दी टेक (तार का ही एक और नाम) का इंतजार करते रहे, तो सारी खबरें बनाने के लिए इकट्ठी होती रहेंगी।’

अनुवाद करने से रमेश गोयल और विवेक शुक्ला पीछे नहीं हटते थे। विवेक की अंग्रेजी अच्छी थी। गोयलजी का तो दावा था कि उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के अनिल माहेश्वरी को भी अंग्रेजी सिखायी है। पलाशदा पीटीआई, यूएनआई, भाषा और वार्ता एजेंसियों के टेलिप्रिंटरों के तार बहुत तेजी से छांटते थे। मैंने नौनिहाल को तार छांटते देखा था और जल्दी छंटाई की तरकीब भी उनसे सीखी थी। पर पलाशदा का कोई मुकाबला नहीं था। उनके सामने तारों का ढेर होता। बिजली की तेजी से उन पर आंखें घूमतीं और साथ-साथ चलते हाथ। सैकड़ों खबरों को मिनटों में छांट डालते।
सबको खबरें बांटकर लीड खुद बनाने बैठ जाते। लिखते भी बहुत तेज थे। उनकी लिखावट घसीट वाली थी। ऑपरेटरों को उसका आदी होने में जरा वक्त लगा। पर उसके बाद तो उनमें और उनकी खबर चला रहे ऑपरेटर में कई बार होड़ लग जाती। छपते-छपते कोई बड़ी खबर पीटीआई पर आ जाती, तो पलाशदा उसका अनुवाद करते जाते। रमेश या ओमप्रकाश चपरासी एक-एक पेज ऑपरेटर को दे आता। जब तक ऑपरेटर उसे कंपोज करता, तब तक उसके पास दूसरा पेज आ जाता।

सुनील पांडे बहुत मनोयोग से अनुवाद करते। पहले पूरी खबर पढ़ डालते। फिर महत्वपूर्ण अंशों को अंडरलाइन करते। उसके बाद अनुवाद करना शुरू करते। रमेश गौतम बहुत साफ कॉपी लिखते थे। छोटे-छोटे अक्षरों की अपनी सुंदर लिखावट में वे पहले बहुत नफासत से पेज नंबर और कैच वर्ड डालते। फिर अपना ओरिजिनल इंट्रो लिखते। खूब सोचकर। एकदम क्रिएटिव इंट्रो। इसमें उन्हें आधा घंटा लगता। फिर 600-700 शब्द की खबर लिखने में 20 मिनट से ज्यादा नहीं लगते थे।

2 सितंबर, 1985 को संत हरचंद सिंह लौंगोवाल की हत्या पर गौतमजी की लिखी खबर का इंट्रो मुझे अब तक याद है- ‘संत हरचंद सिंह लौंगोवाल ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी से शांति समझौता करके जो पहल की थी, आज उसका कत्ल कर दिया गया।  अपने गांव लौंगोवाल के पास शेरपुर गांव के गुरुद्वारे में खालिस्तानी उग्रवादियों की बंदूकों से निकली गोलियों ने केवल लौंगोवाल की ही  जान नहीं ली, बल्कि उग्रवाद से जूझ रहे इस राज्य की शांति की उम्मीद पर भी जानलेवा हमला किया। खुशियों के सूरज की आस लगा रहे पंजाब के सामने एक बार फिर लंबी अंधेरी सुरंग आ गयी है।’

यह खबर किसी एजेंसी की नहीं थी। गौतमजी ने एजेंसियों की तमाम खबरें पढ़कर इसे अपने मन से लिखा था। उन्होंने यह इंट्रो सबको पढ़कर सुनाया। नौनिहाल ने उनसे कॉपी लेकर देखी। और मुझसे बोले, ये देख, ये है इंट्रो। आज दिल खुश हो गया। सबको मेरी तरफ से चाय। उन दिनों जागरण में कैंटीन नहीं थी। चाय पीने हमें गोल मार्केट जाना पड़ता था। यह सामूहिक चाय होती। मतलब सब कंट्रीब्यूट करते। पर कभी-कभी किसी की तरफ से चाय की पार्टी होती, तो रमेश चपरासी गोल मार्केट से केटली में चाय ले आता। तो गौतमजी के उस इंट्रो ने सबको दफ्तर में ही चाय पिलवा दी।

रतीश झा खबर लिखते हुए बहुत गंभीर दिखते। वे इंट्रो और हैडिंग लिखने के बाद उन्हें अलग-अलग कोण से मुंह बनाकर पढ़ते। वह देखने लायक सीन होता। वे एक पैरा लिखते और फिर जांघ पर खुजाते। यह उनकी आदत थी। कभी-कभी खबर लिखने के दौरान ही उन्हें ख्याल आता कि सब्जियां महंगी हो गयी हैं। (वे तब मेरठ में अकेले ही रहते थे। खाना खुद बनाते। एक वक्त तो दही-चूड़ा तय ही था। पर एक वक्त पूरा खाना बनाते। इसलिए उन्हें सब्जियों के ताजा दाम हमेशा रटे रहते।) और फिर वे हर चीज की कीमत बताते। इसका मुझे यह फायदा होता कि जब मम्मी से महंगाई के बारे में बताता, तो वे चकित रह जातीं कि पत्रकार बनकर सब चीजों का पता कैसे चल जाता है!

विभाग में कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनकी अंग्रेजी कमजोर थी। वे मन ही मन मनाते रहते कि पलाशजी या नन्नू भाई की शिफ्ट में ना पड़ जायें। आखिर वे ही अंग्रेजी से सबसे ज्यादा अनुवाद कराते थे। अशोक त्रिपाठी और द्विवेदी जी भाषा और वार्ता की खबरें बहुत तेजी से बनाते थे। रमेश गोयल को खबर बनाते हुए सबको खबर सुनाने की आदत थी। एक नमूना देखिए – अरेत्तेरे की! चंडीगढ़ में एक औरत को चार बच्चे हुए। राम-राम! हे भगवान! कैसे पालेगी बेचारी। यहां हमारे दो ही नाक में दम किये रहते हैं।

लोकल डेस्क के इंचार्ज अभय गुप्त बहुत गंभीरता से खबर लिखते। उन्हें बीच में किसी की आवाज जरा भी पसंद नहीं थी। कोई बोलता, तो वे कहते, ‘बंधु, बातें बाद में। पहले काम। काम खत्म हो जाये, तो हम सब मिलकर बातें करेंगे।’

विश्वेश्वर कुमार अपनी मूंछों को सहलाते हुए खबरें बनाता। ओ. पी. सक्सेना गुनगुनाते हुए। उसे अचानक कोई गीत सूझ जाता और वह उसकी लाइनें भी साथ-साथ लिखता जाता।

मंगलजी हर पेज का काम देखते रहते। लेकिन उनकी नजर रहती लोकल पर ही। वे लोकल खबरों को पाठकों की नब्ज मानते थे। पर वे हर पेज की खबरों में रुचि रखते। हैडिंग देखते। उनमें बदलाव कराते। किसी का काम समझ में न आता, तो कहते, ‘तुमने कर ली पत्रकारी!’ लेकिन सबसे मजेदार होता नौनिहाल को खबर लिखते देखना। चूंकि वे सुन नहीं सकते थे, इसलिए बिना किसी बाधा के वे काम में लगे रहते। उनकी खूबी यह थी कि वे सबसे पहले हैडिंग लिखते। वैसे खबर का हैडिंग आखिर में लिखा जाता है।

लेकिन नौनिहाल का स्टाइल अलग था। हैडिंग वे बहुत कलात्मक ढंग से लिखते। मानो कोई पेंटिंग बना रहे हों। सभी शब्दों के ऊपर शिरोरेखा एक ही लाइन के रूप में होती। वक्राकार। कुछ पल हैडिंग को देखकर वे खबर लिखना शुरू करते। बहुत छोटे और खूबसूरत अक्षरों में। मैंने आज तक इतनी सुंदर लिखावट नहीं देखी। एक पेज पर बाकी लोग करीब 300 शब्द लिखते।

नौनिहाल के एक पेज पर कम से कम 800 शब्द होते। उनकी लिखी खबर पढ़कर ऐसा लगता, मानो किसी बहुत टेस्टी डिश का स्वाद लिया जा रहा हो, या कोई शानदार पेंटिंग देखी जा रही हो। और इस सबको वे खुद भी बहुत एंजॉय करते थे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

आरु तन्ग पदक्कम वेल्लुवदर्कु नन्द्री…

नौनिहाल शर्मा: भाग 24 : मेरठ में अखिल भारतीय ग्रामीण स्कूली खेल हुए, तो मेरे लिए वह मेरठ में सबसे बड़ा खेल आयोजन था। एक हफ्ते चले इन खेलों की मैंने जबरदस्त रिपोर्टिंग की। मैं सुबह आठ बजे स्टेडियम पहुंच जाता। चार बजे तक वहां रहकर रिपोर्टिंग करता। वहां से दफ्तर जाकर पहले दूसरे खेलों की खबरें बनाता। फिर मेरठ की खबरें। सात बजे तक यह काम पूरा करके फिर स्टेडियम जाता। लेटेस्ट रिपोर्ट लेकर आठ बजे दफ्तर लौटता। इन खेलों की खबरें अपडेट करता। पेज बनवाकर रात 11 बजे घर पहुंचता।

कई दिन तक नौनिहाल भी स्टेडियम में आये। उन्हें कौतूहल था कि पूरे भारत के ग्रामीण अंचलों के स्कूली बच्चे किस तरह मिल-जुलकर रहते हैं। हालांकि वे एक-दूसरे की भाषा नहीं जनाते थे। तो नौनिहाल ने मुझे उसी पर एक स्टोरी करने को कहा। वह स्टोरी काफी सराही गयी। लेकिन इन खेलों की सबसे खास और बेहतरीन खबर जो मैंने की, वह लगभग असंभव थी।

हुआ ये कि खेलों के समापन से एक दिन पहले तक तमिलनाडु की एक एथलीट जयश्री पांच स्वर्ण पदक जीत चुकी थी। आखिरी दिन 100 मीटर रेस में भी उसका जीतना तय था (और वह जीती भी)। मैंने दफ्तर आकर नौनिहाल से कहा कि बेस्ट एथलीट का खिताब तमिलनाडु की एक एथलीट को मिलेगा। उन्होंने तुरंत सुझाव दिया- तो उसका इंटरव्यू पहले पेज पर जाना चाहिए।

‘ये तो मैं भी सोच रहा था। पर उसे हिन्दी नहीं आती और मैं तमिल नहीं जानता।’

‘हां, फिर तो मुश्किल है। एक काम किया जा सकता है। उसके कोच को दुभाषिया बनाकर बात कर लेना।’

‘लगता है, ऐसा ही करना पड़ेगा।’

और हम काम में लग गये। रात को 11 बजे मैं और नौनिहाल एक साथ दफ्तर से निकले। स्टेडियम और मेरठ कॉलेज के सामने से होते हुए हम वेस्टर्न कचहरी रोड पर पहुंचे ही थे कि अचानक नौनिहाल ने साइकिल रोक दी। मैं भी रुक गया।

‘तूने एक बार बताया था कि मेरठ कॉलेज के एक प्रोफेसर तमिल जानते हैं।’

‘हां। मेरठ कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉक्टर रामेश्वर दयालु अग्रवाल तमिल जानते हैं।’

‘अच्छी जानते हैं?’

‘बहुत अच्छी जानते होंगे। उन्होंने पीएचडी ही वाल्मीकि की संस्कृत और कंबन की तमिल रामायण की तुलना पर की है।’

‘तो फिर जयश्री का इंटरव्यू करने की तेरी समस्या हल हो गयी।’

‘कैसे?’

‘इंटरव्यू के लिए एक प्रश्नावली तैयार कर। उसे लेकर दयालुजी के पास जा। उनसे सारे प्रश्नों को तमिल में अनुवाद कराकर देवनागरी में लिख ले। फिर उन्हीं प्रश्नों को कल जाकर जयश्री से इंटरव्यू कर। इस तरह तमिल में इंटरव्यू हो जायेगा।’

डॉ. दयालुजी मेरे पापा के अच्छे मित्र थे। मैं अगली सुबह जल्दी उठकर 6.30 बजे विजयनगर में उनके घर पहुंच गया। उनकी दिनचर्या सुबह 4.30 बजे ही शुरू हो जाती थी। मुझे इतनी सुबह आया देखकर वे अचकचाये। मैंने उन्हें आने की वजह बतायी।

‘… तो दयालुजी मुझे एक खिलाड़ी का इंटरव्यू तमिल में करना है। ये रही प्रश्नावली। आप मुझे तमिल में लिखवा दो।’
‘यह महान तरकीब किसकी है?’

‘मेरे गुरू नौनिहाल की।’

‘विलक्षण व्यक्ति हैं तुम्हारे गुरू। चलो लिखो।’

वे बोलते गये। हिन्दी में लिखे प्रश्नों के नंबर डालकर मैं तमिल में लिखता गया। कई शब्दों का उच्चारण काफी कठिन था। उन्होंने मुझसे कई-कई बार बुलवाकर मुझे सहज कराया। आखिर में एक बार और मैंने देवनागरी में लिखी तमिल प्रश्नावली उन्हें पढ़कर सुनायी। वे संतुष्ट हो गये, तभी उनके घर से निकला। आठ बज गये थे। मैंने नौनिहाल के घर जाकर उन्हें भी दिखाया। पर तभी मुझे एक शंका हुई। जयश्री जवाब तमिल में देगी। पहले मुझे उन्हें हाथ के हाथ हिन्दी में लिखना आसान लग रहा था। पर जब दयालुजी ने सवाल लिखवाये, तो मुझे अहसास हुआ कि जवाब लिखना आसान नहीं होगा, क्योंकि तमिल का उच्चारण बहुत मुश्किल है। मैंने नौनिहाल के सामने अपनी शंका रखी। उनका समाधान भी तैयार था- ‘टेप कर लेना।’

मेरे पास टेप रिकार्डर नहीं था। अपने एक दोस्त से मांगकर लाया। घर जाकर नहाया। दस बजे स्टेडियम पहुंचा। कुछ देर बाद 100 मीटर रेस हुई। उसमें भी जयश्री ही जीती। पुरस्कार वितरण के बाद मैं जयश्री के पास गया। वह अपनी ट्रॉफियों के साथ स्टेडियम में घास पर बैठी थी। नौनिहाल की तरकीब काम कर गयी। मैं कई जगह सवाल पूछने में अटका भी, लेकिन करीब 10 मिनट का इंटरव्यू मेरे पास टेप में था। मेरठ कॉलेज जाकर डॉ. दयालुजी को टेप सुनाकर उनसे तमिल जवाब हिन्दी में लिखवाये। दफ्तर जाकर उन्हें फेयर किया। थोड़ी देर बाद नौनिहाल आ गये। उन्होंने पढ़ा, तो वे भी झूम गये।

नौनिहाल ने खबर का इंट्रो लिखा-

मेरठ में आयी तमिलनाडु की एक लड़की। नाम उसका जयश्री। अखिल भारतीय ग्रामीण स्कूली खेलों में छह स्वर्ण पदक जीतकर बनी बेस्ट एथलीट। पेश है उससे हमारे खेल संवाददाता भुवेन्द्र त्यागी की खास बातचीत:

इसके नीचे पूरा इंटरव्यू था-


तुम्हें हिन्दी आती है क्या?

नहीं आती।

ठीक है हम तमिल में बात करते हैं। यहां के सबसे बड़े हिन्दी अखबार दैनिक जागरण के लिए इंटरव्यू करना है।

अरे, आपको तो तमिल आती है! ठीक है, शुरू करें।

छह गोल्ड मैडल जीतने की बधाई।

थैंक्यू।

तुम्हारी रॉल मॉडल एथलीट कौन हैं?

पी.टी. उषा।

रोज कितने घंटे प्रेक्टिस करती हो?

छह घंटे। तीन घंटे सुबह को, तीन घंटे शाम को।

एथलेटिक्स में कौन सी इवेंट सबसे अच्छी लगती है?

100 मीटर स्प्रिंट।

क्यों?

ये रेस की रानी है। इसलिए। इसके विनर को ही सबसे तेज माना जाता है। इसलिए भी।

एथलेटिक्स के अलावा और कौन सा गेम पसंद है?

फुटबॉल।

फुटबॉल का फेवरेट प्लेयर कौन है?

माराडोना।

क्यों?

क्योंकि वो फुटबॉल का अब तक का सबसे महान खिलाड़ी है।

चैंपियन एथलीट होने का घर पर फायदा मिलता है?

नहीं। मेरे भाई-बहन तो चिढ़ाते हैं कि मैं खेलने की वजह से पढ़ाई से बच जाती हूं।

थैंक्यू।

आपको भी बहुत-बहुत थैंक्यू।


यह इंटरव्यू जागरण में पहले पेज पर छपा। उसके नीचे एक टिप्पणी और थी-

(भुवेन्द्र त्यागी ने यह इंटरव्यू तमिल में किया, क्योंकि जयश्री को हिन्दी को नहीं आती। पर हमारे रिपोर्टर को भी तमिल नहीं आती। फिर भी यह इंटरव्यू तमिल में ही हुआ। खेल पेज पर पढिय़े तमिल इंटरव्यू, जिसका हिन्दी अनुवाद ऊपर छपा है।)

खेल पेज पर छपा इंटरव्यू इस तरह था-


उनक्कू हिन्दी तेरियुमा?

एनक्कू तेरियादु।

सरि। नांगल तमिषिल पेसि गिरोम। इन्गु निगप्पेरिय हिन्दी नालीदव दैनिक जागरण इदएक्काण उन्गुलुडुन पेस विरुम्भुगिरोम।

सरि उन्गुलुक्कु तमील तेरिगरुदु। सरि पेच्सै आरम्भिग्रोम।

आरु तन्ग पदक्कम वेल्लुवदर्कु नन्द्री।

वन्दन्म।

उन्गलुडय मुक्य विरन्दांलि यारू?

पी. टी. उषा।

दिन्मुम एन्थनै मणिनेरम पयीवर्ची सेयगिरिरगड़?

आरु मणि नेरम। मुनु मणि काड़ैयील, मुनुमणि माड़ैयील।

एन्थ पथीय्र्यी मुक्यन्वम तरुगिसेगल?

नुरु मीटर स्परीन्ट।

यदर्कु?

इवर पन्दयन्तीन राणी, अदर्कक। इन्द वीरकु मुक्कयन्म तरुगिरतु, इदर्कक।

यन्थलिटीक तविर वेरु पोट्टी पिदिक्कुम?

फुटबॉल।

फुटबॉल विलैयाटिन प्रिय वीरर यारु?

मारदोणा।

एदक्कु?

अवर फुटबॉल विलैयाटिन पेरिय वीरर आदलाल।

चैम्पियन एथलीट आनदर्कु एदेणुम वीटटील एदुम वीरर पेच्चु मुदियुमा?

ईल्लै। एन्नुडैय सगोदर-सगोदरिगड़ कीन्डल सैगिरार्कल। आदलाल विलैयाटिनाल पडिप्पु पोयगिरदु।

नन्ड्री?

उन्गर्लुकुम नन्ड्री।


यह इंटरव्यू पढ़कर डॉ. दयालु सुबह-सुबह बुढ़ाना गेट से जलेबी लेकर हमारे घर आये। उन्हें बहुत खुशी हुई थी। बोले, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे तमिल ज्ञान का इतना रचनात्मक उपयोग होगा। कोई विश्वास नहीं करेगा कि यह इंटरव्यू तमिल में हुआ और इंटरव्यू करने वाले को तमिल आती ही नहीं थी।’

उन्होंने इस बात का खूब प्रचार किया। यहां तक कि कोतवाली के पास जिस कारपोरेशन बैंक में मेरा खाता था, उसका तमिल मैनेजर रामचंद्रन भी अक्सर मेरा अभिवादन तमिल में ही करने लगा। उसने स्टेडियम में मुझे जयश्री का इंटरव्यू करते देखा था।

यह असंभव काम कराने का आइडिया देने वाले नौनिहाल ने मुझसे दावत देने को कहा। मैं तो उन्हें कहीं भी दावत देने को भुवेंद्र त्यागीतैयार था। उन्होंने बेगम पुल पर मारवाड़ी भोजनालय चुना। उस दिन हमने वहां शानदार डिनर किया। कुछ दिन बाद वहीं हमारे साथ एक अजीब घटना भी हुई। उसकी चर्चा बाद में।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

तब ‘नकली खुशखबरें’ नहीं परोसी जाती थीं

नौनिहाल शर्माभाग 23 : जागरण मेरठ के प्रभारी मंगल जायसवाल ने एक दिन संपादकीय विभाग की बैठक में खोज-खबरें लाने पर जोर दिया। वे कई मिनट तक कहते रहे कि ऐसी खबरों से अखबार पाठकों के दिल से जुड़ता है। रिपोर्टर का भी नाम होता है।

बाद में उसके पास ऐसी खबरें खुद चलकर आती हैं। इतना कहकर मंगलजी ने मेज के चारों ओर बैठे सभी लोगों पर नजरें घुमाते हुए पूछा कि ऐसी खबरों का आइडिया है किसी के पास। नौनिहाल उनके ठीक सामने की कुर्सी पर बैठे हुए थे। होठ पढऩे में वे माहिर थे ही। इसलिए एकदम समझ गये कि क्या बात हो रही है। उन्होंने एक कागज पर जल्दी से दो विषय लिखे और मंगलजी की ओर बढ़ा दिये। उनके बराबर में बैठा होने के कारण मैंने वह कागज पढ़ लिया- खेल-सामान बनाने वालों की समस्याएं और पावरलूम मजदूरों की परेशानियां।

मंगलजी को ये विषय तुरंत भा गये। बोले, ‘अच्छे हैं। शहर के हजारों लोग इन कामों से जुड़े हैं। जब हम उनकी समस्याएं छापेंगे, तो उनसे सीधे जुड़ाव होगा। उनके परिवारों में अखबार पढ़ा जायेगा। इससे अखबार की लोकप्रियता बढ़ेगी।’

मंगलजी ने खेल-सामान वाली स्टोरी मुझे और पावरलूम वाली विश्वेश्वर को सौंप दी। मुझे तो मजा आ गया, पर विश्वेश्वर जरा परेशान हो गया। नौनिहाल से शिकायती लहजे में बोला, ‘मरवा दिया ना। अब मैं पावरलूम मजदूरों को कहां-कहां ढूंढू।’

‘इसमें परेशान होने का क्या बात है? मैं ही बता देता हूं।’

‘अरे भाई! बता तो दोगे, पर साइकिल तो मुझे ही ना घसीटनी पड़ेगी।’

‘अरे! अभी तो जवान पट्ठे हो। साइकिल घसीटने से क्यों घबराते हो?’

‘काहे नहीं घबरायेंगे? तुम तो घर से दफ्तर और दफ्तर से घर तक ही घसीटते हो। पूरा शहर तो नहीं ना घूमना पड़ता है हमरी तरह।’

‘बबुआ घूमते तो हम भी हैं। तुम काम के बोझ में घूमते हो। इसलिए थकते भी हो और बकते भी हो। हम अपनी खुशी से घूमते हैं। इसलिए ना तो थकते हैं, ना ही बकते हैं।’

‘अब आप बहस छोडिय़ेगा भी। तनिक उन मजदूर लोगन के ठिकाने भी तो बताइये।’

और फिर नौनिहाल ने विश्वेश्वर को इस्लामाबाद की लोकेशन बतायी, जहां उन दिनों 50 हजार से ज्यादा पावरलूम थीं। बजाजा, सुभाष बाजार, शाहघासा, लालकुर्ती और सदर बाजार जैसे कई बाजार भी बताये, जहां इन पावरलूमों पर बने खादी के थान बिकते थे।

विश्वेश्वर स्टोरी पर लग गया। उसके मुकाबले मेरा काम आसान था। एक तो मेरठ का ही होने के कारण मुझे खेल-सामान बनाने के तमाम ठिकाने मालूम थे, दूसरे मेरे कई दोस्तों के ऐसे कारखाने सूरजकुंड पर पास-पास ही थे। विश्वेश्वर को यह स्टोरी करने के लिए चार-पांच दिन खूब घूमना पड़ा। मेरा काम दो दिन में ही हो गया। एक दिन आगे-पीछे ये स्टोरी जागरण में पहले पेज पर छपीं। अंदर के पेज पर शेष भी गया। तब खबरों की आज जैसी 300-400 शब्द की सीमा नहीं होती थी। हमारी वे स्टोरी 3000 शब्दों की थीं। एक तरह से इन क्षेत्रों की रिसर्च ही थीं। इन दोनों क्षेत्रों में अगले कई साल तक मेरी और विश्वेश्वर की वे स्टोरी संदर्भ सामग्री की तरह इस्तेमाल की जाती रहीं।

इसके बाद तो मंगलजी ने ऐसी खबरों का अंबार लगवा दिया। भगवतजी ने जो ठोस शुरूआत की थी, उसे मंगलजी ने आगे बढ़ाया। उन्होंने पाठकों के मन की खबरों का सिलसिला शुरू किया। जन-समस्याओं की सीरीज ही शुरू कर दी। इससे हुआ ये कि खबरें खुद चलकर जागरण तक आने लगीं। पाठक अपने आसपास की समस्याएं लिखकर भेजने लगे, फोन करके बताने लगे। परतापुर की औद्योगिक इकाइयों में उन दिनों मजदूर यूनियनें काफी सक्रिय थीं। वहां उनका फैक्ट्री मालिकों से विवाद चलता रहता था। उस पर भी मंगलजी की नजर थी। वे कहते थे, ‘खबर ऐसी हो, जो पाठक को अपने साथ रोक ले।’

परतापुर की कई फैक्ट्रियों के मजदूर-मालिक विवाद तब जागरण ने प्रमुखता से छापे थे। कई उद्योगपति तो जागरण को दिये जाने वाले विज्ञापन की दुहाई देते हुए दफ्तर तक आ गये थे। पहले उन्होंने विज्ञापन विभाग वालों से संपर्क किया। तब विज्ञापन विभाग आज की तरह खबरों में सीधे तौर पर कोई हस्तक्षेप नहीं करता था। ऐस विज्ञापनदाताओं से वे कह देते थे कि खबर के सिलसिले में बात करनी है, तो मंगलजी से कर लो। कोई-कोई सीधे धीरेन्द्र मोहन तक पहुंच जाता था। वे मंगलजी को बुलाकर कुछ कहते, तो मंगलजी यह कहकर आ जाते, ‘आइये, एडिटोरियल डिपार्टमेंट में चलते हैं। आप अपना वर्जन दे दीजिये। न्यूज की तरह उसे भी छाप देंगे।’

उन्होंने कभी किसी भी सिफारिश में आकर कोई खबर नहीं दबायी। किसी भी शोषित-वंचित का विश्वास नहीं तोड़ा। खबरों के एंगल में कभी कोई तोड़-मोड़ नहीं की। इसीलिए जागरण बहुत तेजी से पाठकों का प्रिय अखबार बन गया।

जागरण के मेरठ आने के दो साल बाद, 1986 में मेरठ से ‘अमर उजाला’ शुरू हुआ। तब शुरू हुई जोरदार स्पर्धा। इस स्पर्धा में साम-दाम-दंड-भेद, सब कुछ आजमाया गया। उसके रोचक किस्से बाद में। लेकिन इस सबसे मेरठ में लोकल खबरों की कवरेज और बढ़ गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली के अखबार मेरठ से उखड़ गये। कभी दस हजार बिकने वाला ‘नवभारत टाइम्स’ तक दिखना बंद हो गया, तो बाकी की क्या बिसात? ‘हिन्दुस्तान’ को भी मेरठ के पाठकों ने तभी दोबारा अपनाया, जब उसने हाल में मेरठ से संस्करण शुरू किया।

वो जमाना पाठकों की जरूरतों का ख्याल रखने वाला और उन्हें जागरूक बनाने वाला था। तब पाठकों को ‘नकली खुशखबरें’ नहीं परोसी जाती थीं। ये तो आज का चलन है। ‘कारों’ से ज्यादा ध्यान ‘साइकिलों’ का रहता था। आज खबरों से साइकिल गायब हो गयी है। ठीक उसी तरह, जैसे हिन्दी फिल्मों से गांव गायब हो गये हैं। तो संघर्ष हर युग में ‘कार’ और ‘साइकिल’ का ही रहा है। अब साइकल वालों का तो मीडिया अस्तित्व ही नहीं मानता। आश्चर्य नहीं, एक दशक में यही हालत कारवालों की भी हो जाये। हो सकता है कि 2020 तक ‘कारों’ की जगह मीडिया में ‘प्लेन’ महत्वपूर्ण हो जायें।

बहरहाल, मंगलजी का हाथ हमेशा पाठकों की नब्ज पर रहता था। वे पाठकों के शिकायतों के पत्रों में से भी खबर सूंघ लेते थे। संपादकीय पेज पर छपने के लिए आने वाले पत्रों में अक्सर पाठक अपने आसपास की समस्याएं भी लिख भेजते थे। मंगलजी ऐसे पत्रों को अपने पास रख लेते थे। फिर किसी रिपोर्टर को उस पाठक के पास भेजते थे। इस तरह एक्सक्लूसिव खबरें मिल जाती थीं।

नौनिहाल जगरण में काम करने के अलावा अपने दोस्तों की मदद भी करते थे। उनके काम में सहयोग करके। उन्होंने कई प्रिंटिंग प्रेसों में कंपोजिंग और प्रूफ रीडिंग का काम किया था। वे भी जरूरत पडऩे पर जब-तब उन्हें बुला भेजते। जागरण में उपसंपादक होकर भी नौनिहाल को उन प्रेसों के लिए कंपोजिंग या प्रूफ रीडिंग करने में कोई गुरेज नहीं होता था। कोई संकोच नहीं होता था। इसी तरह वे अपने कई दोस्तों के साप्ताहिक अखबार निलवाने में भी मदद करते थे। ऐसा ही एक अखबार था लवीन्द्र भूषण का ‘लवीन्द्र टाइम्स’। लवीन्द्र लायंस क्लब में भी सक्रिय थे। उनका अखबार शुरू हुआ था लायंस क्लब और व्यापारियों की खबरों से। लेकिन नौनिहाल ने उसे एक अच्छा साप्ताहिक अखबार बनवा दिया। वे हफ्ते में एक बार थापर नगर में उनके दफ्तर जाते और उस हफ्ते का अंक फाइनल करते। अगले अंक की रूपरेखा बना आते। कई बार तो लवीन्द्र भूषण उन्हें उनके घर से अपने पर जबरदस्ती बैठाकर ले जाते। सुधा भाभी कहती रह जातीं कि अभी तो इन्होंने खाना भी नहीं खाया है।

इस तरह नौनिहाल को मैंने कभी वीकली आफ मनाते नहीं देखा। किसी दिन 13-14 घंटे से कम काम करते नहीं देखा। फिर भुवेंद्र त्यागीभी उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। मानो काम से उन्हें जीवनी शक्ति मिलती थी।

मुझे उनकी सबसे बड़ी सीख यही थी।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

नरममिजाजी से भी अनुशासन संभव

भुवेंद्र त्यागीभाग 22 : मेरठ में जागरण ने शुरू में औपचारिक फीचर छापकर पाठकों को लुभाया। मेरठ के तमाम दरवाजों और अलियों-गलियों का इतिहास, प्रमुख हस्तियां और दर्शनीय स्थल पढ़कर मेरठ वालों को पहली बार कई ऐसी चीजें पढऩे को मिलीं, जिनके बारे में उन्होंने अभी तक सुना ही था। यह सब सामग्री तैयार की थी वेद अग्रवाल ने। वे मेरठ के काफी वरिष्ठ पत्रकार थे। ‘स्वतंत्र भारत’, ‘अमृत प्रभात’ और ‘आज’ जैसे अखबारों से जुड़े हुए थे। ‘नवभारत टाइम्स’ में जाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की थी।

कुछ समय स्ट्रिंगर भी रहे। पर सतीश शर्मा ने उन्हें वहां जमने नहीं दिया और वे खुद कई दशक तक मेरठ में ‘नवभारत टाइम्स’ के संवाददाता रहे। पूर्णकालिक नहीं, सालाना करार के आधार पर। तो वेदजी को दूर के अखबारों के लिए ही काम करना पड़ा। लेकिन वे मेरठ में ‘जागरण’ की शुरूआती टीम में थे। यहां तक कि नियुक्तियों तक में उनकी सलाह ली गयी थी। मगर जब मेरठ में संस्करण शुरू हुआ, तो वेदजी टीम में नहीं थे। कानपुर से कुंतल वर्मा को बुलाकर चीफ रिपोर्टर बनाया गया। फिर अभय गुप्त इस पद पर आये। पर वेदजी को शुरूआती मैटर तैयार करने का पूरा श्रेय जाता है।

इस तरह के मैटर ने पाठकों को सचमुच अखबार की ओर आकर्षित किया। जब वह मैटर चुक गया, तो भगवतजी ने जनरुचि की लोकल खबरों की तलाश की। पर रिपोर्टर कम थे। कुंतलजी को मेरठ की कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए भगवतजी के संपादन में अखबार में लोकल खबरें कमजोर थीं। मंगलजी ने पूरा चार्ज हाथ में आते ही सबसे पहले इस ओर ध्यान दिया। भगवतजी में कई खूबियां थीं। पर वे अफसराना अंदाज के थे। उनमें फ्लेक्जिबिलिटी नहीं थी। मंगलजी खूब फ्लैक्जिबिल थे। सबको हर तरह का काम करने की छूट देते थे। उन्होंने सबसे पहले लोकल डेस्क को मजबूत किया। ‘

दैनिक प्रभात’ से ओमकार चौधरी, नीरज कांत राही और अनिल त्यागी को लाया गया। ये तीनों तेज-तर्रार रिपोर्टर थे। फिर नंबर आया प्रादेशिक डेस्क का। अशोक त्रिपाठी, द्विवेदीजी, रमेश गोयल और ओ. पी. सक्सेना इस डेस्क पर थे। ओ. पी. को बाद में लोकल पर भेजा गया। मवाना से संतोष वर्मा और मुजफ्फरनगर से श्रवण शर्मा प्रादेशिक डेस्क पर आये। तो मंगलजी ने इन दोनों डेस्कों को मजबूत किया। उनका मानना था कि दिल्ली के अखबारों से देश-विदेश की खबरों में ज्यादा से ज्यादा टक्कर ली जा सकती है, पर लोकल और प्रादेशिक खबरों में उन्हें मात दी जा सकती है। उन्होंने मेरठ के आसपास के शहरों और कस्बों में स्ट्रिंगर भी रखे। इससे खबरों के अंबार लगने लगे।

इन शहरों और कस्बों से खबरें आती भी बहुत मशक्कत के साथ थीं। ई-मेल और मोबाइल फोन तो छोडिय़े, फैक्स तक का जमाना नहीं था वो। फोन पर बात करना भी महंगा पड़ता था। वहां के स्ट्रिंगर रोडवेज की बसों के ड्राइवरों को अपनी खबरें लिफाफों में रखकर दे देते थे। मेरठ में रोडवेज बस अड्डे पर व्हीलर के स्टॉल के पास एक लैटर बॉक्स लगाया गया था। बस ड्राइवर उसमें खबरों के लिफाफे डाल देते। दो चपरासी ओमप्रकाश और रमेश अपनी-अपनी ड्यूटी के अनुसार हर दो घंटे बाद वहां जाते। बॉक्स में से लिफाफे निकाल लाते। वे लिफाफे प्रादेशिक डेस्क के इंचार्ज को दिये जाते। उनमें से खबरें निकालकर वह अपने सहयोगियों में बांट देता। वे सब उन खबरों को दुरुस्त करने में लग जाते। उन सबको वे स्ट्रिंगर बहुत भाते, जिनकी खबरों में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस करेक्शन करो और कंपोजिंग को भेज दो। लेकिन कुछ स्ट्रिंगरों की खबरों पर बहुत मेहनत करनी पड़ती। पूरा रीराइट करना पड़ता। उनकी खबरों से सब बचने की कोशिश करते।

… लेकिन नौनिहाल को ऐसी खबरों में ही मजा आता। एक तो इससे उन्हें रचनात्मकता का सुख मिलता, दूसरे स्ट्रिंगरों को सिखाने का मौका मिलता। कई बार वे स्ट्रिंगरों को अपनी खूबसूरत लिखावट में खत लिखते। उनका मार्गदर्शन करते। हालांकि ये उनका काम नहीं था। सच कहा जाये, तो ये उनका अधिकार क्षेत्र भी नहीं था। फिर भी, वे लगे रहते थे। उन दिनों पत्रकारिता के संस्थान तो थे नहीं। नौनिहाल जैसे लोग ही चलते-फिरते पत्रकारिता संस्थान होते थे। मेरठ का शायद ही कोई दूसरा पत्रकार हो, जिससे पत्रकारिता सीखकर इतने लोग आगे बढ़े हों। उन्हें एक अनौपचारिक पत्रकारिता संस्थान का अनौपचारिक हैड मास्टर माना जा सकता है।

जागरण तो खैर पत्रकारिता का प्रशिक्षण संस्थान था ही। अब भी है। लेकिन उस जमाने की बात ही और थी। वैसे बीता जमाना सबको अच्छा लगता है। मगर तब पत्रकारिता के अलग मूल्य थे… पत्रकारिता करना एक नशा था… हर पत्रकार के मन में एक रोमांटिक अहसास रहता था कि वह समाज के लिए कुछ कर रहा है। आपसी मतभेद और दंद-फंद होते रहते थे। इसके बावजूद काम में निष्ठा बनी रहती थी। काम से कोई भागता नहीं था। दफ्तर में आते-जाते समय कोई घड़ी नहीं देखता था। खबरों के चयन में लंबी बहसें होती थीं। जन-सरोकारों का पूरा ध्यान रखा जाता था। अपनी डेस्क के सहयोगियों की ही नहीं, दूसरे डेस्कों के लिए काम करने को भी सब तैयार रहते थे। बीट हथियाने की मारामारी नहीं होती थी। जिस रिपोर्टर को जो भी बीट मिल जाती, वह उस पर पूरी मेहनत करता।

रिपोर्टर डेस्क पर काम करने में आनाकानी नहीं करते थे। डेस्क के लोग फील्ड में जाने के लिए जान नहीं छोड़े रहते थे। लेकिन अगर किसी को कोई खबर मिल जाती, तो वह उसे लिखने में पीछे भी नहीं रहता था। इसीलिए वो एक अलग दौर था। ये वो दौर था, जब आर्थिक उदारीकरण के बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था, उत्तर आधुनिकता भारत में अभी मुखरता से नमूदार नहीं हुई थी, राजनीति में कुछ नीति बची थी, समाज में सामाजिकता मौजूद थी।

… और इसीलिए पत्रकारिता में भी मूल्य बचे हुए थे। पाठक खबरों के लिए अखबार लेते थे, विज्ञापनों के लिए नहीं। खबरों में उन्हें अपनी दुनिया नजर आती थी। ये दुनिया बेशक चमक-दमक वाली नहीं थी, लेकिन सच्ची थी। दिखावटों से कोसों दूर थी। इसीलिए पत्रकारिता का वो दौर सुनहरा लगता है। मंगलजी ने खबरें लिखने के लिए सबको पूरी आजादी दे रखी थी। उन्होंने भगवतजी के समय की अफसराना शैली की जगह खांटी पेशेवर शैली को लागू कर दिया था। उनका बनारसी व्यक्तित्व जल्द ही मेरठ जागरण पर छा गया। शुरू में लगा कि इस तरह तो वे चल नहीं पायेंगे। आखिर प्रशासन में कुछ सख्ती भी तो होनी चाहिए। पर मंगलजी ने इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया। उन्होंने दिखा दिया कि नरममिजाजी से भी सबको साथ लेकर चला जा सकता है, सबको अनुशासन में रखा जा सकता है।

दरअसल, मंगलजी को अनुशासन बनाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। उन्हें शांत स्वभाव का समझकर अगर कोई उन पर हावी होने या उनका आदेश न मानने की कोशिश करता, तो वे उतने ही ‘प्यार’ से उसे ‘साध’ भी लेते। उन्हें दूसरों को मनाने और उनका गुस्सा शांत करने में महारत हासिल थी। चाहे कोई उनसे असहमत होता, पर वो उनके खिलाफ कभी नहीं होता। यह बात अब संभव नहीं है। अब तो असहमति होने पर मुखालफत भी लाजमी होती है। ये आज की पत्रकारिता है। और भुवेंद्र त्यागीपत्रकारिता को ही क्यों दोष दिया जाये? हर तरफ तो यही हालात हैं। इंसानियत ही सिकुड़ रही हो, तो मिशन वाली पत्रकारिता कहां से आयेगी? हालांकि नौनिहाल को इसका अहसास था। इसीलिए वे अक्सर कहते भी थे- आने वाला वक्त खराब होगा, लोगों के मंसूबे खराब होंगे और दुनिया भी खराब होगी…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

चीफ रिपोर्टर के पद पर कई जोड़ी नजरें थीं

नौनिहाल शर्माभाग 21 : मेरठ में जागरण के पहले छह महीने जमकर काम करने और अखबार को जमाने के रहे थे। लेकिन उसके बाद स्टाफ बढ़ा। अखबार का दायरा और रुतबा बढ़ा। इसके साथ ही बढ़े तनाव और मतभेद भी। काम का श्रेय लेने, दूसरों को डाउन करने और अपना पौवा फिट करने के दंद-फंद उभरे। भगवतजी सख्त प्रशासक थे। सबको काम में झोंके रखते थे। किसी को फालतू बात करने के लिए एंटरटेन नहीं करते थे। जो कह दिया, कह दिया। फिर उस पर कोई बहस नहीं। मंगलजी में सख्ती नहीं थी। उनका मिजाज अफसरी वाला भी नहीं था।

देखा जाये, तो वे भोले-भंडारी थे। इसलिए कभी-कभी एक कमजोरी का शिकार भी हो जाते थे। अगर कोई किसी की बुराई कर दे तथा फिर एक-दो और लोग उसी बात को दोहरा दें, तो मंगलजी उस बात पर सहज ही भरोसा कर लेते थे। अगर उनमें प्रशासनिक सख्ती होती और वे बिना सच्चाई जाने यों ही झूठी बातों पर भरोसा न करते। तो वे दिल के बादशाह आदमी थे।

मंगलजी का पूरा व्यक्तित्व ही एक सीधे-सादे से आदमी का था। अक्सर शर्ट-पैंट पहनते थे। कभी तो कुर्ता-पायजामा पहनकर ही दफ्तर आ जाते। चप्पल घसीटकर चलते थे। उनके पास एक पुराना स्कूटर था। हमेशा तिरछा करके ही स्टार्ट होता था। मंगलजी के मुंह में हमेशा पान होता। जेब में भी कई बीड़े रखे रहते। गाल पान से फूले रहते। जब कोई कुछ पूछता, तो एक-दो बार में उन्हें सुनाई ही नहीं पड़ता। या फिर वे ऐसा दिखावा करते। जब उन्हें किसी से कुछ कहना होता या किसी की बात का जवाब देना होता, तो वे ऊपर को मुंह करते। पान के पीक को मुंह में एडजस्ट करके बोलने की कोशिश करते। फिर भी नहीं बोला जाता, तो उठकर टॉयलेट में जाते। पीक थूककर आते। फिर बोलते, ‘मने क्या कहना चाहते हो? दोबारा बोलो तो जरा।’

उनका ‘मने’ बहुत महशूर था। बिना ‘मने’ के मंगलजी से किसी संवाद की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। वे चुपचाप न्यूज डेस्क पर आकर बैठ जाते। चीफ सब की जिम्मेदारी पलाश दादा, नन्नू भाई या राकेशजी की होती। वे ही न्यूज एजेंसियों की खबरें छांटते। हर डेस्क की खबरें उस डेस्क के नाम वाली ट्रे में रखते जाते। जब टेलीप्रिंटरों की खबरों का ढेर बढ़ जाता, तो मंगलजी भी छंटाई में लग जाते। वे हर काम करने को तैयार रहते। उन्हें संपादकीय प्रभारी होने का कोई घमंड नहीं था। जरा भी एटिट्यूड नहीं। बस कभी-कभी यह क्रम टूटता। ऐसा होता ‘आचमन’ के बाद। मंगलजी शुरू में मेरठ में अकेले ही थे। उनका परिवार बाद में आया। उन्होंने भी खाने का इंतजाम साकेत में एलआईसी के पास के एक ढाबे में कर लिया था। कई बार उन्हें वहीं ‘आचमन’ करते देखा गया था। खाना नहीं होता, तो वे ब्रेड के साथ भी ‘आचमन’ कर लेते थे। रासायनिक प्रभाव उन पर जल्दी नहीं होता था। कभी हो जाता, तो वे दफ्तर नहीं आते। लेकिन एक बार ‘परम अवस्था’ में दफ्तर आ गये। स्कूटर खड़ा किया। इधर-उधर देख ही रहे थे कि सामने विश्वेश्वर नजर आ गया।

‘मने यहां क्या कर रहे हो? खबरें सब बना दीं?’

‘वो जरा चाय पीकर आया हूं। दो खबरें अभी लिखनी हैं।’

‘आप काम बीच में छोड़कर चाय पीने क्यों गये?’

‘चाय का तलब लग रहा था।’

‘तलब लग रहा था, तो काम बीच में छोड़ देंगे?’

‘छोड़े नहीं ना हैं। आये तो हैं पूरा करने।’

‘नहीं यह अनुशासनहीनता है। बर्दाश्त नहीं की जायेगी।’

अब तक विश्वेश्वर का धीरज जवाब दे चुका था। वह मंगलजी को पकड़कर स्कूटर तक ले गया। उनके हाथ से चाबी ली। स्कूटर स्टार्ट किया। मंगलजी के हाथ में दिया। बोला, ‘आप अभी इस पर बैठ जाइये और घर जाइये। आपसे कल बात होगी।’

मंगलजी सचमुच चले गये। अगले दिन हम सबको लग रहा था कि आज विश्वेश्वर पर जमकर डांट पड़ेगी। लेकिन मंगलजी ने कुछ नहीं कहा। शायद उन्हें कुछ याद ही नहीं रहा।

यह किस्सा नौनिहाल को सुनाया गया, तो वे विश्वेश्वर से बोले, ‘तुम तो बड़े खिलाड़ी निकले। मंगलजी को दफ्तर से वापस भेज दिया और डांट से भी बच गये।’

ऐसी घटनाएं कभी-कभी होती थीं, लेकिन जब भी होतीं उनकी चर्चा महीनों तक रहती। बीच में लोग बोर होने लगते। फिर शुरू होती गॉसिप। असल में ज्यादातर तो ऐसा टाइम पास करने के लिए किया जाता। पर कभी-कभी मामला गंभीर हो जाता। जब तक गंभीरता का पता चलता, तब तक कई लोग उस गॉसिप में शामिल हो चुके होते। फिर धीरेन्द्र मोहन के डर से बात वहीं छोड़ दी जाती। दरअसल सबको सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि मंगलजी के आलावा धीरेन्द्र बाबू किसी को एंटरटरटेन नहीं करते थे। इस वजह से किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ती थी उनके सामने किसी की शिकायत लेकर जाने की। यह स्थिति मंगलजी के लिए बहुत सुविधाजनक थी। वे सीधे-सादे और भोले-भाले भी बने रहते, उनके लिए कोई चुनौती भी खड़ी नहीं होती।

लोग सबसे ज्यादा अभय गुप्ता के पीछे पड़े रहते। कुंतल वर्मा के जाने के बाद चीफ रिपोर्टर के पद पर कई जोड़ी नजरें थीं। गुप्ताजी की हालांकि संपादकीय विभाग में कोई लॉबी नहीं थी, पर वे थे मजबूत आदमी। इसलिए न्यूज डेस्क के कई लोग लोकल डेस्क के उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते। रतीश झा खुद चीफ रिपोर्टर बनना चाहते थे। उन्हें और कुछ खामी तो मिलती नहीं, वे महीने में तीन-चार बार दबी जुबान यह जरूर कहते कि उन्हें तो अमुक खबर में कोई रैकेट लग रहा है। अगर कोई ध्यान से उनकी बात सुन लेता, तो वे उसका भी नाम लेकर कहते, ‘देखिये, इन्हें भी यह बात पता है।’

वह बेचारा सफाई देते परेशान हो जाता कि मुझे तो दादा ने ही बताया था। दादा को भी पता था कि ऐसा करके कुछ होना-जाना नहीं है। फिर भी वे लगे रहते।

गुप्ताजी किसी की परवाह नहीं करते थे। बात उन तक भी पहुंचती। वे कोई गुस्सा या दिलचस्पी नहीं दिखाते। चेहरे पर हाथ फेरते हुए बस इतना कहते कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो जैसा करना चाहे, करता रहे।

नौनिहाल की राय में गुप्ताजी को कोई हिला नहीं सकता। हालांकि उनका संघ का बैकग्राउंड था, पर खबरें लिखते और लिखवाते समय वे सच्चे पत्रकार बन जाते थे। कभी किसी का पक्ष नहीं लेते थे। हर पार्टी में, हर समुदाय में उनके सोर्स थे। उन्हें हर तरह की और हर तरफ की खबरें मिलती थीं। जागरण की एक अच्छा अखबार निकालने की नीति कारगर थी। तब तक समाज और राजनीति में आज जैसा ध्रुवीकरण नहीं हुआ था। राजनीति में सांप्रदायिकता और अपराधीकरण इतने नहीं उभरे थे। नैतिकता बची थी। कम से कम नजर तो आती ही थी। ऐसे माहौल में पत्रकारिता काफी जवाबदेह थी। जन समस्याएं उठाने से गुरेज नहीं करती थी।

वो जागरण के उठान का दौर था। उसके नये-नये संस्करण आ रहे थे। प्रसार क्षेत्र बढ़ रहा था। अगर आज जागरण दुनिया भर में सबसे ज्यादा रीडरशिप वाला अखबार है, तो यह असल में उसी दौर की मेहनत का फल है। नरेन्द्र मोहन जानते थे कि हर वर्ग के पाठकों को साथ लिए बिना आगे बढऩा नामुमकिन है। इसलिए उन्होंने संपादकीय विभाग को जनता के मुद्दे उठाने की भुवेंद्र त्यागीपूरी छूट दी थी। यही वजह है कि मेरठ जागरण में मंगलजी जैसे कांग्रेसी, पलाश विश्वास जैसे मार्क्सवादी, अभय गुप्ता जैसे संघी और कुछ छद्म समाजवादी, नारीवादी व बहुजनवादी सहजता से एक साथ काम करते थे। उनमें वैचारिक भिन्नता थी, लेकिन खबरों के मामले में वे लगभग एकमत होते थे। जागरण ही नहीं, हिन्दी पत्रकारिता के परवान चढऩे का दौर था वो। सचमुच यादगार और दिल से लगाकर रखने वाला दौर।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

मंगलजी आए, भगवतजी लौट गए

 

नौनिहाल शर्माभाग 20 : लास एंजेलिस ओलंपिक खेलों की शानदार कवरेज के बाद मुझे भगवतजी के साथ ही धीरेन्द्र मोहनजी से भी काफी शाबाशी मिली थी। हालांकि इसके सही हकदार नौनिहाल थे। आखिर देर रात तक समाचार लेने का आइडिया उन्हीं का था। इससे अखबार को भी फायदा हुआ। अभी तक दिल्ली से मेरठ आने वाले अखबारों के एजेंट यही प्रचार कर रहे थे कि जागरण में लोकल खबरें जरूर भरपूर मिल रही हों, पर देश-विदेश की खबरों में यह दिल्ली के अखबारों का मुकाबला नहीं कर सकता। ओलंपिक कवरेज ने उनका यह दावा झठा साबित कर दिया।

इससे मेरठ में जागरण पूरी तरह जम गया। नरेन्द्र मोहन ने मेरठ आकर संपादकीय विभाग की पहली मीटिंग ली, तो उन्होंने इसकी काफी तारीफ की। वे महज चार महीने में ही मेरठ में जागरण के पैर जम जाने से बेहद खुश थे। हम इसलिए खुश थे कि एडिशन लांच करने की ओरिजिनल टीम के बगावत करके कानपुर लौटने के बाद हमने चंद दिनों की तैयारी में ही अखबार निकालकर दिखाया था।

अब काम करने में और ज्यादा मजा आने लगा था। सफलता से मिले आनंद की बात ही कुछ और होती है। इस बीच और लोग भी संपादकीय विभाग में आ गये थे। बनारस से मंगलजी (मंगल प्रसाद जायसवाल) आये। उनका पद समाचार संपादक का था। शुरू में उन्होंने न्यूज डेस्क को देखना शुरू किया। फिर एक दिन कमलेश अवस्थी ने सबको बताया कि भगवतजी जाने वाले हैं और उनकी जगह मंगलजी लेंगे। सबको बड़ा ताज्जुब हुआ। अवस्थीजी ने यह भी कहा कि ये तो जागरण की नीति है। जो एडिशन लांच करता है, उसकी जगह बाद में किसी और को भेजा जाता है। ऐसा करके नये संपादक को एक सैट टीम मिलती है और किसी से रैपो न होने के कारण वह सबसे अच्छा काम कराकर अखबार को और ऊंचाई पर ले जाता है।

तो धीरे-धीरे मंगलजी मेरठ में रमते गये। भगवतजी लौट गये। इस बीच, संपादकीय विभाग में कुछ और लोग भी आये।
प्रेमनाथ वाजपेयी कानपुर लौट गये। कुंतल वर्मा भी लौट गये। उनकी जगह अभय गुप्त चीफ रिपोर्टर बनकर आ गये। उन्होंने जागरण के साथ लंबी पारी खेली। हमेशा सीरियस रहते थे और संघ के अपने किस्से सुनाते रहते थे। अब रिटायर होने के बाद मेरठ में ही पत्रकारिता का कोर्स चला रहे हैं।

देहरादून से आये पलाश दा। पलाश चंद्र विश्वास। नाटे, सांवले, सिर से कम होते बालों वाले, लेकिन ऊर्जा से भरपूर। ज्ञान से भी भरपूर। नौनिहाल के बाद मैंने किसी भी विषय पर बात करने वाला उन्हें ही पाया। एक्टिविस्ट भी थे। अब कोलकाता में ‘जनसत्ता’ में समाचार संपादक हैं। साहित्य लेखन और एक्टिविज्म में व्यस्त हो गये। अन्यथा अगर अंग्रेजी पत्रकार होते, तो किसी बड़े अखबार के ग्रुप एडिटर होते। ये और बात है कि टिकते नहीं। उनके पूंजीवाद विरोधी और अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी बलॉगों को ग्लोबल ताकतों ने ब्लॉक कर दिया है। वे हर बार नया ब्लॉग शुरू कर देते हैं।

रमेश गौतम सागर विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस में एम. ए. किये हुए थे। पत्रकारिता में देर से आये, पर जल्दी जम गये। नफीस आदमी रहे। बाद में ‘नवभारत टाइम्स’ में चले गये। चंडीगढ़ से विशेष संवाददाता बनकर रिटायर हुए। आजकल पंजाब सरकार के मीडिया सलाहकार हैं।

विवेक शुक्ल दिल्ली से आया। घनी दाढ़ी और कसरती शरीर वाला विवेक पहली मुलाकात में ही सब पर छा जाता था। उसका बोलने का अंदाज भी बहुत प्रभावशाली था। कुछ बरस जागरण में काम करके ‘हिंदुस्तान’ में चला गया। वहां विशेष संवाददाता बना। अब एक पब्लिकेशन का संपादक है।

ओमकार चौधरी और नीरजकांत राही ‘दैनिक प्रभात’ से आये। ओमकार दबथुआ का ओमकार किसानी तेवर का, लेकिन सलीके से काम करके आगे बढऩे वाला था। अब रोहतक में ‘हरिभूमि’ का संपादक है। नीरज शुरू से ही स्टाइलिश था। आईपीएस अफसर बनना चाहता था। शायद इसीलिए क्राइम रिपोर्टिंग करता था। अब मुरादाबाद में ‘अमर उजाला’ का संपादक है।

संपादकीय विभाग की जान था फोटोग्राफर गजेन्द्र सिंह। वहां पर वही करीब मेरी उम्र का था। इसलिए उससे मेरी खूब जमती। हमने साथ-साथ बहुत एडवेंचर किये। नौनिहाल उसे अक्सर खबर के लिहाज से फोटो के बारे में बताते थे। वह कुछ ही महीने में बेहतरीन प्रेस फोटोग्राफर बन गया। उन दिनों उसकी एक गर्ल फ्रैंड थी। उसे लेकर नौनिहाल उसे खूब छेड़ते भी थे।
एक दिन मैंने नौनिहाल से कहा कि तुम हरेक से उसके स्तर पर जाकर बात कैसे कर लेते हो।

‘इसमें मुझे मजा आता है। समझ लो कि अपने सुन-बोल न पाने की कमी को मैं इस तरह दूर करने की कोशिश करता हूं।’

‘क्या तुम्हें ये नहीं लगता कि बाकी लोग (मतलब सीनियर्स) तुम्हें इस तरह देखकर सीरियसली नहीं लेते।’

‘ना लें। मेरी बला से।’

‘पर तुम्हें उन्हें यह कहने का मौका नहीं देना चाहिए कि काम में पूरा ध्यान नहीं देते।’

(यह कहते हुए अचानक मुझे अहसास हुआ कि अभी तक नौनिहाल ही मुझे सलाहें देते थे और अब मैं उन्हें सलाह दे रहा था। और यह सोचते ही मैं सकुचा गया। हालांकि मेरा यह मनोभाव नौनिहाल की नजर से छिपा नहीं रह सका।)

‘भई वाह! बच्चा जवान हो गया। अब तू दफ्तरी राजनीति की बारीकियां समझने लगा है। अच्छी बात है। अब तू इस समंदर में तैर सकता है।’

‘देखो गुरू, बात को बदलो मत। मैं जो कुछ हूं, तुम्हारी ही बदौलत हूं। और यहां इस तरह की बातें हो रही हैं। इसीलिए मैं तुमसे यह बात कह रहा हूं।’

‘कैसी बातें हो रही हैं?’

‘यही कि नौनिहाल नये लौंडों को किस्से सुनाता रहता है। इससे काम का हर्जा होता है।’

‘अगर कोई कुछ कहना ही चाहे, तो उसका मुंह बंद नहीं किया जा सकता। मैं काम पहले करता हूं। दोस्ती बाद में पालता हूं। और तुझे भी मेरी यही सलाह है।’

दरअसल जागरण में जैसे-जैसे लोग बढ़ रहे थे, एक अजीब तरह की राजनीति शुरू हो गयी थी। कुछ लोग दूसरों के काम का श्रेय खुद लेने के चक्कर में रहते, तो कुछ दूसरों को लंगड़ी मारने की फिराक में रहते। चूंकि नौनिहाल सुन और बोल नहीं सकते थे, इसलिए मुझे लगा कि उन्हें इन बातों का पता नहीं होगा। मेरा अनुमान सही था। उन्हें सचमुच पता नहीं था कि दफ्तर में क्या-क्या चलना शुरू हो गया है।

बहरहाल, नौनिहाल ने मुझे चिंता न करने को कहा।

हालांकि वे कुछ सजग जरूर हो गये। पर उनकी यारबाजी में कोई कमी नहीं आयी। एक चपरासी था रमेश। वहीं साकेत के पास रहता था। उससे भी नौनिहाल की बहुत जमती थी। इस पर भी भाई लोगों को ऐतराज था। संपादकीय विभाग का कोई आदमी भला चपरासी से दोस्ती कैसे गांठ सकता है? मगर इस मामले में नौनिहाल जैसा ही किरदार था ओ. पी. सक्सेना का। ओपी भी पूरा फक्कड़ था। उन दिनों प्रेम-गीत लिखता था। एक दिन दफ्तर आकर बोला, ‘मैं साला चूतिया हूं। आज तक मैं प्रेम के ही गीत लिखता रहा। अब मैं क्रांति के गीत लिखूंगा।’

ये और बात है कि क्रांति के कुछेक गीत लिखकर वह फिर प्रेम पर लौट आया। तो ओपी ही था, जो मेरे अलावा नौनिहाल की यारबाजी का पूरा समर्थक था।

हालांकि नौनिहाल को किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वे हमेशा अपनी धुन में रहते। जो भी उनके नजदीक आता, भुवेंद्र त्यागीवह भी उसी धुन में रम जाता। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि नौनिहाल दोस्ती खूब निभाते थे। उनके लिए जीवन में दोस्तों का बहुत महत्व था। उनके लिए वे कुछ भी करने को तत्पर रहते!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

तुम कल के छोकरे मुझे काम दोगे?

नौनिहाल शर्माभाग 19 : साल 1984 में लास एंजेलिस ओलंपिक खेल हुए। ये तब तक के सबसे बड़े और भव्य ओलंपिक खेल थे। मैं इनके कवरेज के लिए कई महीने से तैयारी कर रहा था। रेकॉड्र्स और खिलाडिय़ों व टीमों की खूब जानकारी जुटायी थी। भगवत जी ने ओलंपिक के दौरान खेल के लिए दो पेज दे दिये थे। जागरण के कानपुर संस्करण से प्रेमनाथ वाजपेयी मेरठ भेजे गये थे ओलंपिक कवरेज के लिए, क्योंकि मैं खेल डेस्क पर अकेला ही था।

उन दिनों जागरण में हर पत्रकार को अपना रोज किया गया काम एक रजिस्टर में भरना पड़ता था। सबको 12 इंच लम्बे और 4 इंच चौड़े रजिस्टर दिये गये थे। रोज दिन और तारीख लिखकर उसके नीचे क्रम संख्या, खबर का शीर्षक और स्टिक (खबर की लम्बाई की माप। एक स्टिक -एक कॉलम की चौड़ाई और दो इंच की लम्बाई) उस चार्ट में लिखने होते थे। तब जागरण, मेरठ में स्टाफ काफी कम था। हरेक को कम से कम चार कॉलम, यानी आधा पेज मैटर रोज तैयार करना पड़ता था। ओलंपिक के दौरान मैंने रोज 16 कॉलम मैटर किया था। सबके रजिस्टर देखकर भगवतजी साइन करते थे। मेरे पास वो रजिस्टर एक विरासत के रूप में आज भी है।

खैर!

तो हुआ ये कि ओलंपिक में मेरा काम काफी बढ़ गया। दिन के तीन बजे से रात के तीन बजे तक। वैसे भगवतजी ने मुझे साढ़े नौ बजे के बजाय 11 बजे तक पेज बनाने को कह दिया था। पर नौनिहाल ने मुझसे कहा- दिल्ली के अखबारों की डेडलाइन रात 9 बजे होती है। अमेरिका से टाइम के अंतर को देखते हुए वे मेरठ आने वाले संस्करण में कभी ओलंपिक के ताजे समाचार नहीं छाप सकेंगे। हमेशा पिछले दिन के समाचार ही छापेंगे। अगर तू रात को एक-दो बजे तक दफ्तर में रुक सके, तो ताजा समाचार ले सकेगा।

मुझे उनकी यह सलाह सोने पर सुहागे जैसी लगी। मैंने भगवतजी को नौनिहाल का यह सुझाव बताया, तो वे उछल पड़े।

‘तुम ऐसा कर सकते हो क्या?’

‘जी सर, इससे अखबार का बहुत नाम हो जायेगा।’

‘ठीक है। मैं मोहन बाबू (धीरेन्द्र मोहन) को भी बता देता हूं। इसका तुम्हें फायदा भी होगा।’

‘सर, मैं सच में किसी फायदे के लिए यह नहीं कर रहा हूं। यह करने में मुझे भी मजा आयेगा।’

‘ओके।’

तो पूरे ओलंपिक के दौरान मैं तीन बजे दफ्तर पहुंच जाता। मेरी मां जबरदस्ती टिफिन बॉक्स दे देतीं। दो दिन बाद ही उस टिफिन में चार-पांच लोगों का खाना आने लगा, क्योंकि वहां सब साथ-साथ खाना खाते थे। साढ़े नौ बजे मैं खेल पेज छोड़ देता। दस बजे तक पहला पेज लगभग तैयार हो जाता। फिर पहले पेज वाले सब लोग खाना खाने जाते। एलआईसी के सामने एक ढाबा था। वहां चारपाई पर बैठकर खाना खाया जाता। मैं तो टिफिन में कई लोगों के लायक खाना लाता था। पर कई लोग ढाबे से ही खाना लेते। उनका वहां महीने का हिसाब था। सलाद और रायता मैं भी लेता। खाना खाकर हम 11 बजे तक दफ्तर लौटते। पहले पेज वाले अपना पेज फाइनल करते। पेज एक 12 बजे तक तैयार हो जाता। उसके बाद सब चले जाते। मैं रात दो बजे तक की खबरें लेकर पेज बनाता। कई नये समाचार होते, जो अगले दिन किसी अखबार में नहीं होते। इससे काम करने का संतोष तो होता ही, ताजा खबरें केवल जागरण में देखकर हम सभी को गर्व होता।

15 दिन तक मैं डबल शिफ्ट काम करता रहा। रात तीन बजे दफ्तर से निकलता। साकेत से तोपचीवाड़ा तक साइकिल से आने में 20 मिनट लगते थे। पर उस वक्त कुत्ते बहुत तंग करते। कभी मैं स्टेडियम के सामने से मेरठ कॉलेज होते हुए जाता, तो कभी ईस्टर्न कचहरी रोड से एनएएस कॉलेज के सामने से निकलता। पर कुत्ते हर सड़क पर मिलते और दूर तक पीछा करते। कई दिन उनसे जूझने के बाद मैंने नौनिहाल को यह समस्या बतायी। वे बोले, कल से मैं भी रुक जाऊंगा। फिर हम दोनों साथ चलेंगे। रुक तो आज से ही जाता, पर बीवी को नहीं पता, बेचारी परेशान होगी।
अगले दिन नौनिहाल भी रुक गये। उनके रुकने का मुझे यह फायदा हुआ कि उनकी सलाह से पेज का लेआउट भी अच्छा हो गया। रात को तीन बजे हम दफ्तर से निकले, तो नौनिहाल को माल रोड पर सैर करने की सूझी।

‘इतनी रात को?’

‘अभी तो मजा आयेगा। जरा सोच, खाली माल रोड, चमचमाती हुई … और उस पर शहजादों की तरह घूमते हम।’

‘तो चलो।’

और हमने साइकिलें माल रोड की ओर बढ़ा दीं।

सचमुच, रात के साढ़े तीन बजे सुनसान माल रोड पर साइकिल चलाने में जो मजा उस समय आया, वैसा आज तक किसी ड्राइव में नहीं आया।

हमें माल रोड का चक्कर लगाते हुए आधा घंटा हुआ था, कि पीछे से सीटी बजने की आवाज आयी। हम पलटे। सामने मिलिट्री पुलिस का लंबा-चौड़ा जवान खड़ा था।

‘क्या कर रहे हो?’

‘घूम रहे हैं’, मैंने किसी तरह कहा।

‘ये कोई गार्डन है क्या?’

‘हम जागरण में काम करते हैं। पेज छोड़कर निकले तो गुरू का माल रोड घूमने का मन हो आया। इसलिए आ गये…’

‘अच्छा, प्रेस वाले हो? पर ऑफिस से सीधे घर जाओ। ये रात को घूमने की जगह नहीं है।’

इस वार्तालाप को नौनिहाल कुछ समझ रहे थे। वे अडऩे को हुए, तो मैंने उन्हें इशारे से बरजते हुए वापस चलने को कहा। वहां से हम रोडवेज बस अड्डे आये। सुबह के साढ़े चार बज रहे थे। वहां हमें चाय मिल गयी। चाय पीकर हम पांच बजे घर पहुंचे। पहले मैंने नौनिहाल को उनके घर छोड़ा। फिर अपने घर गया। तब तक मेरी मां भी जाग गयी थीं। उन्होंने कुछ खाने को पूछा। मैंने चाय की फरमाइश की। एक और चाय पीकर मैं साढ़े पांच बजे सोया।

ओलंपिक के दौरान कानपुर से प्रेमनाथ वाजपेयी आये थे। लेकिन मुझे सारा काम करते देखकर वे अपनी मोटरसाइकिल पर मेरठ में घूमते रहते। शाम को थोड़ी देर के लिए दफ्तर आते। मेरी बनायी हुई कुछ खबरें देखते, उनमें से कुछ पर नये हैडिंग लगाते और चले जाते। एक दिन मैं पेज पर पांच फोटो लगा रहा था। काम बहुत था। मैंने उनसे फोटो के कैप्शन लिखने का अनुरोध किया। इस पर वे भड़क गये।

‘अपनी औकात में रहो। तुम कल के छोकरे मुझे काम दोगे?’

‘नहीं वाजपेयीजी, मैं भला ऐसी गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं? आप नहीं बनाना चाहते, तो कोई बात नहीं। मैं ही बना लूंगा।’

‘और फिर कल को मेरी शिकायत करोगे कि मैं काम नहीं करता?’

‘मैं कोई शिकायत नहीं करूंगा।’

यह वार्तालाप भगवतजी ने भी सुना और हमें अपनी टेबल पर बुला लिया। दोनों से पूरी बात सुनकर उन्होंने वाजपेयीजी को डांटते हुए कहा कि आप कानपुर लौट जाइये।

‘पर भगवरतजी, आप मेरी बात तो सुनिये….’

‘नहीं। मुझे कोई बात नहीं सुननी। प्लीज किसी दूसरे के काम का क्रेडिट मत लीजिये।’

मैं संकोच से गड़ा जा रहा था। मुझे लगा, कहीं वाजपेयीजी ये ना समझ लें कि मैंने उनकी शिकायत की है। ये तो मुझे बाद में पता चला कि भगवतजी को वह सब पहले ही नौनिहाल ने बता दिया था। इसलिए उन्हें मामले की पृष्ठभूमि पता थी।

खैर! लास एंजेलिस ओलंपिक मेरे लिए बहुत अच्छा रहा। खेल पेज पर की गयी मेहनत से खुश होकर भगवतजी ने मुझे पहले मौके पर ही प्रमोट करके प्रशिक्षु उपसंपादक से उपसंपादक बनाने का वादा किया। और जब कुछ महीने बाद प्रमोशन हुए, तो भुवेंद्र त्यागीउस लिस्ट में मेरा नाम भी था। मैं साढ़े अठारह साल की उम्र में उपसंपादक बन गया! ये मई, 1985 की बात है।

और कहने की जरूरत नहीं कि इसका जश्न मैंने अपने गुरू नौनिहाल के साथ बेगमपुल पर मारवाड़ी भोजनालय में डिनर करते हुए मनाया।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

‘मैं भाग्य को भी मानता हूं, कर्म को भी’

नौनिहाल शर्माभाग 18 : एक दिन नौनिहाल को एडवेंचर सूझा। उस दिन वे खासे अच्छे मूड में थे।

‘बोर हो रहा हूं यार। कहीं घूम आया जाये।’

‘चलो। कहां जाना है?’

‘भोले की झाल पर चलते हैं।’

‘ठीक है गुरू। कब चला जाये?’

‘कल ही।’

‘कितने बजे?’

‘सुबह निकलेंगे 5 बजे।’

‘5 बजे? इतनी जल्दी?’

हां, क्योंकि बस के चक्कर में नहीं पडऩा है। साइकिलों से चलेंगे।’

‘सोच लो गुरू। लौटकर दफ्तर भी आना होगा।’

‘तो क्या हुआ? ढाई घंटे जाने के, ढाई घंटे आने के। तीन घंटे भी वहां रुके, तो दोपहर एक बजे तक वापस आ जायेंगे। थोड़ा आराम करके दफ्तर भी सही समय पर पहुंच जायेंगे।’

मैं इसलिए तुरंत तैयार हो गया, क्योंकि अभी तक का मेरा अनुभव कहता था कि इस आउटिंग में कुछ जबरदस्त चर्चा हो सकती है। इसीलिए मैंने बिना कुछ सोचे हां कर दी। दफ्तर जाने से पहले की दिनचर्या को भी भुला दिया।

अगली सुबह पौने पांच बजे मैं बेगमपुल पहुंच गया। कुछ पल बाद नौनिहाल भी आये। पूरी तरह पिकनिक की तैयारी के साथ। बैठने के लिए चादर, पुराने अखबार, बिस्कुट, नमकीन… और थर्मस में चाय। मुझे तो ये सब ध्यान ही नहीं रहा था। हमने साइकिलों को दौड़ाना शुरू कर दिया। भोले की झाल गंग नहर पर एक सुरम्य स्थान है। उन दिनों भी वह एक पिकनिक स्पॉट जैसा हुआ करता था। लेकिन आज की तरह कारें-वारें नहीं आया करती थीं। हमारी तरह ज्यादातर लोग साइकिलों, या बहुत हुआ तो स्कूटर, बाइक, ट्रैक्टर से वहां पहुंचते। नहर में नहाते, खाते-पीते, मौज-मस्ती करते और लौट जाते।

मेरठ से करीब 20 किलोमीटर दूर है ये जगह। हम ढाई घंटे में वहां पहुंच गये। सबसे पहले स्नान किया गया। फिर एक पेड़ के नीचे अड्डा जमाया। तब शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला।

‘गुरू, आज एक सवाल पूछने का बहुत मन कर रहा है। इजाजत हो, तो पूछूं?’

‘मेरी जिंदगी तो खुली किताब है। मैं कभी कुछ नहीं छिपाता। जो तेरे मन में हो, पूछ ले।’

‘तुम्हें कभी इस बात का दर्द नहीं सालता…’

‘किस बात का?’

‘…कि तुम बोल और सुन नहीं सकते?’

‘इसमें दर्द की क्या बात?’

‘कभी लगता नहीं कि अगर तुम सुन सकते, बोल सकते…?’

‘तो क्या हो जाता?’

‘यह नहीं लगता कि अगर तुम्हारी बोलने और सुनने की शक्ति होती, तो तुम कुछ और ही होते।’

‘क्या होता?’

‘मेरा मतलब है कि ज्यादा बड़े पत्रकार होते।’

‘क्यों?’

‘तब तुम सब कुछ सुन और बोल सकते थे।’

‘इससे क्या हो जाता?’

‘मेरी बात को गंभीरता से तो लो। मैं सचमुच जानना चाहता हूं।’

‘तो क्या मैं कुछ छिपा रहा हूं?’

‘बता भी नहीं रहे।’

‘नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं तो मजाक कर रहा था।’

‘तो अब सीरियस हुआ जाये?’

‘दरअसल मैं जीवन में प्रारब्ध को मानता हूं। इसलिए कभी दुखी नहीं होता, क्योंकि मेरा मानना है कि जो हुआ वही होना था। इसे बदला नहीं जा सकता था।’

‘यह तो यथार्थ से मुंह मोडऩे वाली बात हुई।’

‘वो क्यों?’

‘जो भी हमारे सामने है, उस पर अगर हम लॉजिक के अनुसार बात ना करें तो इसी को यथार्थ से मुंह मोडऩा कहते हैं।’

‘पर मैं तो हकीकत को मानता हूं। फिर मुंह मोडऩे की बात कहां से आ गयी?’

‘जो कुछ भी हमारे जीवन में घटता है, उसे देखते भी हम हैं, भोगते भी हम हैं और उससे सुखी-दुखी भी हम ही होते हैं। इसलिए असली बात अपने हालात को जानने और हर हाल में खुश रहने की है। और मैं यही करता हूं।’

‘ये बात तो सही है। पर भाग्यवाद बीच में नहीं आना चाहिए। भाग्यवादी व्यक्ति कायर होता है।’

‘वो कैसे?’

‘क्योंकि वो सब कुछ भाग्य पर छोड़ देता है। उसकी कोशिश घट जाती है। कोशिश घटने पर जीवन में मनचाही सफलता नहीं मिल सकती। इसीलिए भाग्य के बजाय कर्म पर ध्यान देना चाहिए।’

‘मैं तो भाग्य को भी मानता हूं और कर्म को भी।’

‘लेकिन ये दोनों एक साथ नहीं माने जा सकते।’

‘मैं तो मानता हूं।’

‘क्या दिल से?’

‘बिना दिल के और आधे दिल के मैं कोई काम नहीं करता।’

‘चलो, ठीक है। फिर तो तुम्हारे मन में ये भी जरूर आता होगा कि तुम्हारी ये स्थिति पूर्व कर्मों का फल है।’

मैं जरा ज्यादा ही खुल गया था क्योंकि नौनिहाल से काफी नजदीकी होते हुए भी उनसे इतना खुलने का मौका मुझे पहली बार ही मिला था। हालांकि पूर्व कर्मों के फल की बात कहकर मैं कुछ सकपका जरूर गया था।

‘मुझे पता था कि ये बात तू मुझसे एक दिन जरूर पूछेगा। और तू ही पूछ भी सकता है, क्योंकि और किसी को मैंने अपने इतना नजदीक नहीं आने दिया।’

‘ऐसी बात पूछने का मैंने कसूर जरूर किया है, पर अब पूछ ही लिया तो जवाब भी दे दो।’

‘ये ठीक है कि मैं पुनर्जन्म को मानता हूं, भाग्यवाद और कर्मवाद को भी मानता हूं। मगर पूर्व कर्मों के फल को नहीं मानता।’

‘ये भी तो भाग्यवाद का ही विस्तार है…’

‘हां है। पर मेरा इतना मानना है कि आपके कर्म भी इसी जीवन में होते हैं और फल भी इसी जीवन में मिलता है।’

‘ये तो विरोधाभासी बात हुई। अगर सभी कर्मों के फल भी इसी जीवन में मिल जायें, तो फिर पुनर्जन्म हो ही क्यों।’

‘जो कर्म इस जीवन में करने रह गये, उन्हें करने के लिए।’

मैंने धर्म और दर्शन का अपनी समझ से गंभीर अध्ययन किया था। लेकिन नौनिहाल का यह सिद्धांत मैंने कहीं नहीं पढ़ा था। इसलिए मुझे लगा कि कहीं वे फिर मजाक पर तो नहीं उतर आये।

‘क्या गुरू, फिर मजाक करने लगे?’

‘बिल्कुल नहीं। मेरा तो यही मानना है कि एक जीवन में जो कर्म अधूरे रह जायें, उन्हें करने के लिए ही पुनर्जन्म होता है। और फिर उनका फल उसी दूसरे जन्म में मिल जाता है। और ये सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक कि अपने हिस्से के सारे कर्म पूरे न हो जायें।’

‘ठीक है। मैं एक धृष्टता भरा सवाल करता हूं। माफी पहले ही मांग लेता हूं। क्या तुमने इसी जन्म में कोई ऐसा कर्म किया, जो तुम्हारी बोलने और सुनने की शक्ति चली गयी?’

‘इसमें माफी की बात कहां से आयी? ये तो स्वाभाविक सवाल है।’

‘इसका जवाब?’

‘समझ से मैंने कभी किसी का बुरा ना तो किया, ना ही सोचा। इसलिए जहां तक मुझे पता है, अपनी इस हालत के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं।’

‘तो क्या कोई और भी जिम्मेदार हो सकता है?’

‘हो सकता है।’

‘और तुम्हें पता नहीं?’

‘हां। मुझे लगता है कि मेरे किसी परिजन ने कभी जरूर कोई ऐसा कर्म किया होगा, जिसके दंडस्वरूप मेरी ऐसी हालत हुई।’

‘और तुम्हें पता नहीं?’

‘हां। हो सकता है कि उसने ऐसा कुछ मेरे जन्म से पहले या मेरे अबोधपने में किया हो और अपराधबोध के कारण मुझे न बताया हो।’

‘तुम्हें लगता है कि ऐसा न हुआ होता तो अच्छा रहता।’

‘इसे कोई टाल ही नहीं सकता था। ये तो होना ही था।’

इतनी गंभीर बातें मैंने नौनिहाल से पहली बार की थीं। इस बारे में उनकी अपनी मौलिक सोच थी। और वे उस पर अडिग थे, अटल थे।

इस बातचीत के बीच हमने नाश्ता-पानी किया। फिर साइकिलों से मेरठ की ओर चल पड़े। रास्ते में एक खेत से गन्ने तोड़कर चूसे। नौनिहाल की गन्ने खाने की स्पीड बहुत तेज थी। उनका दावा था कि इसमें उन्हें कोई नहीं हरा सकता। उस दिन मैं भी शर्त हार गया। जितनी देर में मैंने तीन गन्ने चूसे, उतनी देर में नौनिहाल पांच गन्ने चूस चुके थे।

भुवेंद्र त्यागीहम दोपहर बाद ढाई बजे के करीब मेरठ पहुंचे। घर होकर जागरण के दफ्तर पहुंचने के लिए।

लेकिन उस दिन मैंने एक और ही नौनिहाल को देखा था…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

टाउनहाल घंटाघर सुबह हाकर चाय अखबार नौनिहाल

नौनिहाल शर्माभाग 17 : मेरठ में दैनिक जागरण के आने से शहर में एक जोश सा आ गया था। वह मेरठ के 13 सांध्य दैनिकों को पीछे छोड़ते हुए तेजी से आगे निकल गया। शहर में जगह-जगह इसके होर्डिंग दिखने लगे। सबसे मजेदार सीन होता भोर में टाउन हॉल में। वहां पूरे शहर के हॉकर इकट्ठा होकर अखबार लेते और अपने-अपने इलाके में बांटने निकल पड़ते। अभी तक केवल दिल्ली के अखबार ही आते थे। उनकी पूरी दादागीरी रहती। लेकिन जागरण उन सबसे ज्यादा बिकने लगा। कई बार धीरेन्द्र मोहन खुद खड़े होकर हॉकरों को अखबार देने का मुआयना करते। वहां मंडी-सी लगी रहती। एक दिन नौनिहाल ने मुझे सुबह-सुबह टाउन हॉल चलने को कहा।

‘कब?’

‘कल।’

‘कितने बजे?’

‘सुबह पांच बजे।’

‘लेकिन गुरू, वहां इतनी सुबह जाकर हम करेंगे क्या? कोई खबर तो वहां मिलने से रही।’

‘यार, तू तो हमेशा खबरों के पीछे ही पड़ा रहता है। वहां जाकर मजेदार सीन देखना। सुबह को कैसे हॉकर अखबार उठाते हैं और फिर साइकिलों पर लादकर अपने-अपने मोहल्लों की ओर रवाना होते हैं और किस तरह हमारी मेहनत से छपे अखबार पाठकों तक पहुंचाते हैं।’

मुझे नौनिहाल का यह प्रस्ताव आकर्षक तो लगा, लेकिन समस्या ये थी कि उन दिनों मेरी दिनचर्या का एक-एक लम्हा बिजी था। मैं सुबह पांच बजे उठता, स्टेडियम में खेलने जाता, सात बजे लौटकर नहाता, एन. ए. एस कॉलेज जाता (तब मैं बी. ए. सेकंड ईयर में पढ़ता था), वहां 11 बजे तक क्लास होती, फिर डिबेट या नाटक की प्रेक्टिस, दो बजे घर जाकर खाना खाता, शहर में कहीं कोई टूर्नामेंट चल रहा होता तो उसकी रिपोर्टिंग करता और तीन बजे जागरण के दफ्तर पहुंचता। वहां से रात नौ-साढ़े नौ बजे नौनिहाल के साथ निकलता। सूरजकुंड के पास स्थित उनके घर जाता। वे मुझे हर रोज लेखन या अनुवाद की कोई नयी बारीकी बताते, जिसके लिए दफ्तर में समय नहीं मिलता था। कभी हम एन. ए. एस. के नाले के पास भगत जी के खोखे में चाय पीते और वहीं से मैं सीधे कोतवाली के पास अपने घर की ओर चला जाता।

…तो दोपहर के आधे-पौने घंटे को छोड़कर मैं सुबह साढ़े पांच से रात दस बजे तक घर के बाहर रहता। जागरण में चार साल की नौकरी के दौरान मेरी कमोबेश यही दिनचर्या रही।

इसलिए मैं इतनी सुबह टाउन हॉल जाने के नौनिहाल के प्रस्ताव पर जरा झिझका। पर उन्होंने वहां का जो खाका खींचा, तो मैं हां किये बिना न रह सका। चलो एक दिन खेलने की ही छुट्टी सही।

अगले दिन पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार मैं बच्चा पार्क के चौराहे पर सुबह पौने पांच बजे पहुंच गया। कुछ ही देर में नौनिहाल आते दिखे। मुझे चाय की तलब लग रही थी। नौनिहाल को बताया, तो वे बोले- टाउन हॉल में एकदम कड़क चाय मिलेगी। वहीं चलकर पी जाये।

पांच मिनट में ही हम टाउन हॉल पहुंच गये। घंटाघर के सामने यह अंग्रजों के जमाने की इमारत थी। इसके एक कोने में टाउन हॉल लाइब्रेरी थी। वहां भी मेरा अड्डा रहता था। पुरानी किताबें पढऩे की मेरी भूख वहीं शांत होती थी। टैगोर, प्रसाद, प्रेमचंद, शरदचंद्र, बंकिम, गोर्की, टॉल्सटॉय, चेखव, दोस्तोयवस्की, ओ हेनरी और मोपांसा को मैंने इसी लायब्रेरी की बदौलत ही पढ़ा था। उसी के सामने की खाली जगह पर सुबह को सारे अखबारों के बंडल बंटते थे। हॉकर वहीं से अखबार लेते थे।

हमने अपनी साइकिलें दीवार के पास लगायीं। हॉकरों की ओर बढ़े। तभी मुझे वहां जागरण के डायरेक्टर धीरेन्द्र मोहन दिखे। दरअसल पहले मेरी नजर उनकी हरे रंग की एनई कार पर पड़ी। मेरठ में उस रंग की वैसी कारें गिनी-चुनी थीं। मुझे लगा कि धीरेन्द्र बाबू यहीं कहीं हैं। और तभी वे मुझे एक कोने नजर आये। सर्कुलेशन विभाग के लोगों के साथ। चूंकि जागरण को बाजार में जमाना था, इसलिए हॉकरों के साथ पूरी मेहनत की जाती थी।
मैंने नौनिहाल को इशारे से बताया कि धीरेन्द्र बाबू उधर खड़े हैं। नौनिहाल के चेहरे पर उभरा कि आना बेकार रहा। पर फिर उन्होंने मुझे दूसरी ओर खींचा। वहां दिल्ली के अखबारों के बंडल बांटे जा रहे थे। उधर धीरेन्द्र बाबू के आने का सवाल ही नहीं था। वहां नौनिहाल को कई परिचित हॉकर मिल गये। उनसे सभी अखबारों का सही-सही सर्कुलेशन पता चल गया। वहीं चाय पी गयी। इतनी कड़क चाय हमने पहले कभी नहीं पी थी। एक रुपये की चाय कांच के गिलास में। नौनिहाल अपनी जेब में चार बिस्कुट भी रखकर लाये थे। चाय के साथ उनके स्वाद के क्या कहने!

वहां खड़े-खड़े अखबार पढऩे का मजा भी कुछ और ही था। और भी कई मजेदार बातों पर नजर पड़ी। हॉकर सभी अखबारों के पहले पेज की खबरें एक नजर डालते ही समझ जाते थे। उन्हें यह भी पता चल जाता था कि कौन सी खबरें बिकाऊ हैं, कौन सी खबरें ठंडी हैं, किस अखबार की आज ज्यादा मांग रहेगी, कौन सा अखबार पिट जायेगा और सबसे बड़ी बात ये कि किस अखबार में किसकी बाईलाइन किसी धांसू खबर पर है। हमें ये जानकर आश्चर्य हुआ कि वे हॉकर ज्यादातर अखबारों में छपी बाईलाइनों के जरिये ही रिपोर्टरों की जानते थे। उनसे कभी रूबरू बेशक न मिले हों, मगर उनके फैन होते थे। अखबारों के सर्कुलेशन वॉर के तो खिलाड़ी ही होते थे।

हम कोई एक घंटा वहां रहे। नौनिहाल को मैंने एक पॉकेट डायरी में कुछ नोट्स लेते हुए देखा। हालांकि उनकी राइटिंग बहुत साफ थी- बिल्कुल छपाई जैसी, पर वे नोट्स इतने छोटे अक्षरों में लेते थे कि उन्हें पढ़ा नहीं जा सकता था।

मुझे कौतूहल हुआ। आखिर माजरा क्या है। मेरे चेहरे के भाव नौनिहाल ने पढ़ लिये।

‘यार, दरअसल एक कहानी लिखनी है अखबारों के सर्कुलेशन वॉर पर। उसके लिए रिसर्च करने ही यहां आया हूं। अकेले आता, तो बात बनती नहीं। इसीलिए तुझे साथ लाया हूं।’

मुझे भी थोड़ा रोमांच हो आया।

‘ये तो बहुत अच्छी बात है। और क्या करना है?’

‘तू कुछ हॉकरों से बात करके यह पता कर कि वे दिन में क्या करते हैं।’

मैंने कई हॉकरों से बात की। अपने काम में मशगूल होने के बावजूद उन्होंने काफी जानकारी दी। मसलन, कई लोग सुबह-सुबह अखबार बांटकर दिन में फुल टाइम जॉब भी करते थे। कुछ की चपरासी की नौकरी थी। कुछ रिक्शा चलाते थे। कुछ सदर बाजार में मजदूरी करते थे। कुछ स्कूली छात्र भी अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए ये काम करते थे।

ऐसा ही एक लड़का मिला अजीत। अनाथ लड़का। एस. डी. कॉलेज में 11वी क्लास में पढ़ता था। कॉलेज के एक चपरासी के साथ रहने का जुगाड़ उसने कर लिया था। बाद में नौनिहाल ने उसके कॉलेज जाकर उसकी फीस माफ करायी। उसे आगे पढऩे का जोश दिया। बरसों तक वह हमारे संपर्क में रहा। उसने बी. कॉम. किया, तो नौनिहाल के घर मिठाई लेकर आया। अगले साल उसका सलेक्शन पीडब्लूडी में हो गया। नौनिहाल ने ही अखबार में विज्ञापन देकर उसकी शादी करायी। बाद में उसका ट्रांसफर बुलंदशहर हो गया। नौनिहाल के असामयिक निधन के बाद उससे संपर्क टूट गया।

खैर!

तो नौनिहाल ने अखबारों के सर्कुलेशन वॉर पर जो कहानी लिखी, वह ‘कागज के योद्धा’ शीर्षक से कोलकाता (तब कलकत्ता) के ‘सन्मार्ग’ के पूजा दिवाली विशेषांक में छपी। नौनिहाल ने उस अंक के लिए मेरी एक कविता ‘बचपन के दिन’ भी भेज दी थी। वह भी छप गयी।

भुवेंद्र त्यागीमुझे अपनी कविता छपने से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि वह उसी अंक म़ें छपी थी, जिसमें मेरे गुरू की कहानी छपी थी!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

जो जिसे खास समझता, वही जासूस निकलता

नौनिहाल शर्माभाग 16 : दैनिक जागरण, मेरठ की शुरूआती टीम में अनुभव और युवापन का बेहतरीन मिश्रण था। भगतवशरण जी खुद खबरें बहुत अच्छी लिखते थे। लेकिन उन्हें अपने हाथ से लिखने की आदत नहीं थी। जब उन्हें कोई खबर लिखनी होती या री-राइट करनी होती, तो वे नरनारायण गोयल को आवाज देते…. ‘नरनारायणजी, जरा आइये’। गोयल जी कहते- ‘आता हूं भगवत जी। कहिए।’

भगवत जी का अनुरोध होता- ‘अरे! पेन तो ले आइये। एक न्यूज फाइनल करनी थी जरा।’

‘जी सर।’

और भगवत जी बोलते जाते, नरनारायण जी लिखते जाते। राकेश सिन्हा पहले पेज के प्रभारी थे। लोकल के प्रभारी कुंतल वर्मा थे। प्रादेशिक डेस्क पर अशोक त्रिपाठी, द्विवेदी जी (जिन्हें हम दाऊ कहते थे) और रमेश गोयल थे। बिजनेस पेज कुछ दिन अशोक त्रिपाठी ने देखा। फिर उस पर लोग बदलते रहे। ओ. पी. सक्सेना लोकल और प्रादेशिक, दोनों जगह फिट था। कुछ दिन बाद दो ऐसे सहयोगी आये, जिनके व्यक्तित्व तो अलग-अलग थे, पर वे हमेशा कुछ ऐसा नया कर देते थे कि उसकी कई दिन तक चर्चा रहती थी। ये थे डॉ. रतीश झा और विश्वेश्वर कुमार। झा साहब को सब दादा कहते थे। गोरा-चिट्टा रंग, हष्ट-पुष्ट बदन, तेज और जोर से बोलने के आदी और सबसे खास बात ये कि खाने के शौकीन। वे खाने को लेकर लगायी गयी शर्त कभी हारते नहीं थे। हमेशा कुछ न कुछ बोलते रहते। इससे सबका मनोरंजन होता। उन्हें बहुत जानकारियां थीं। पर कभी-कभी बेहद मासूमियत से ऐसा शो करते कि वे निपट अनाड़ी हैं। हालांकि वे ऐसा केवल शो ही करते थे। और फिर हमें हंसते-ठहाके लगाते देखने का पूरा मजा भी लेते।

उनके विपरीत, विश्वेश्वर बहुत अंतर्मुखी था। हमेशा शांत रहता। कमल हासन जैसी अपनी मूंछों पर इस तरह उंगलियां फेरता रहता, मानो उनमें से कुछ निकाल रहा हो। कई बार दादा बोलते- का हो बिसेसरा, मूंछों में से समाचार सब निकालता है का रे?

विश्वेश्वर ने अपने मेरठ आने की भी अजब-गजब कहानी बतायी थी। वह अपने भाई की ससुराल गया था। वहां उसे ही उठा लिया गया। जबरन शादी कराने के लिए। उसे बंद कर दिया गया। लेकिन वह किसी तरह वहां से भाग निकला। अपने घर आया, तो उसे रिश्तेदारी में यूपी में लखनऊ भेज दिया गया। फिर मेरठ। भगवत जी उसके दूर के रिश्तेदार थे। उनके पास। उन्होंने उसे प्रशिक्षु संवाददाता बनवा दिया। कई दिन तक तो वह परेशान रहा। खबर कहां से लाये? कहीं कैसे जाये? अनजाना शहर, अनजाने लोग।

आखिर भगवत जी ने उसे कंपनी के लोन पर साइकिल दिलवा दी। वह मेरठ में घूमने लगा। धीरे-धीरे खबरें भी लाने लगा। कई बार की कोशिश के बाद इंट्रो लिखता। फिर हौले-हौले खबर। उसने संपर्क भी बना लिये। अच्छी खबरें लाने लगा। शुरू में वह भगवत जी के साथ रहता था। बाद में साकेत के पास ही एन. ए. एस. कॉलेज के एक प्रोफेसर की कोठी में छत पर बने कमरे में रहने लगा। खाना खुद बनाता था। स्टोव पर। एक बार खाना बनाते हुए उसकी दोनों आंखों की भौं जल गयीं। काफी दिन तक सब उसे इसके लिए परेशान करते रहे। वह मासूमियत से कहता, ‘अरे जल गया सो जल गया। इसमें इतना हल्ला करने का क्या जरूरत है। अपना बाल है, फिर आ जायेगा।’

और जब विश्वेश्वर की भौं पहले की तरह हो गयीं, तो उससे बाकायदा पार्टी ली गयी। उसके कमरे पर व्हिस्की की बोतल हमेशा रहती थी। और वो रोज पीता था। बोतल खोलता, एक ढक्कन भरकर मुंह में डालता। ऊपर से पानी पी लेता। पता नहीं उसकी इतनी ही खुराक थी या कड़की के मारे वो ऐसा करता था। आखिर 600 रुपये तनखा में से 100 रुपये साइकिल के कटते और 150 रुपये कमरे का किराया! पूरा महीना 350 रुपये में निकालना पड़ता।

यही हाल सबका था। मैं इसलिए खुद को राजकुमार समझता था, क्योंकि एक तो परिवार के साथ रहने के कारण मेरा कोई खर्चा नहीं था, दूसरे नौनिहाल ने मुझसे कुछ पत्रिकाओं में लिखवाना शुरू कर दिया था। उन दिनों जागरण में पत्रिकाओं में लिखने की छूट थी। मैं खेल भारती, खेल हलचल, स्पोर्टस वर्ल्ड, स्पोर्टस वीक, सन, परिवर्तन जैसी पत्रिकाओं में लिखता था। कुछ साहित्यिक लघु पत्रिकाओं में भी। इनके पारिश्रमिक से मेरा खर्च चल जाता था। दोस्तों के लिए भी बचा रहता। जागरण की तनखा मैं घर पर दे देता।

जागरण में तब मैटर की टाइपसैटिंग के बाद ब्रोमाइड निकाला जाता था और उसकी कटिंग-पेस्टिंग से पेज बनाया जाता था। संपादकीय विभाग के पीछे कंपोजिंग और प्रोसेसिंग रूम थे। सबसे पीछे प्रेस था। उसके एक कोने में पेस्टिंग का सेटअप था।

कई पेस्टर थे। उनका हैड था अखिलेश अवस्थी। पर्सनल इंचार्ज कमलेश अवस्थी का छोटा भाई। उतना ही शरारती। काम में भी काफी तेज। हममें से जो भी पेज बनवाने जाये, उससे खूब मजाक-शरारत करे और उसी छेड़-छाड़ में कमलेश जी की भी बहुत बुराई करे। लोग समझें कि दोनों भाइयों में झगड़ा है। और इस गफलत में सारी बातें इधर की उधर हो जातीं। कई महीने तो किसी को इसका अंदाज तक नहीं हुआ। बाद में धीरे-धीरे पता चला, तो सब दोनों भाइयों के सामने दूसरे की भरपूर तारीफ करने लगे। इससे वे दूसरी तरकीबें ढूंढने लगे। जागरण में यह बहुत चलता था। सबकी जासूसी होती थी। कोई जिसे अपना घनिष्ठ। समझता, वही उसकी जासूसी कर रहा होता।

तो अखिलेश ने एक दिन नौनिहाल के पेस्टिंग रूम में आने पर आपत्ति कर दी।

‘ये क्या काम करायेंगे? ना बोल सकते हैं, ना सुन सकते हैं। क्या होगा इस संस्थान का? पता नहीं कैसे गूंगे-बहरे लोग रख लिये जाते हैं?

‘नौनिहाल ने मेरी तरफ देखा। इशारे से पूछा कि यह क्या कह रहा है। मैंने उन्हें बता दिया। उन्हें गुस्सा तो बहुत आया, पर उसे पीकर बोले, ‘बच्चू, इस सवाल का जवाब तो कमलेश बाबू से लेना।’

उस रात तो बात वहीं खत्म हो गयी। लेकिन अगले दिन मैंने भगवत जी से इसकी शिकायत की। उन्होंने पूछा, ‘अरे भई, ये सब झगड़ा-टंटा तुम्हारे साथ ही क्यों होता है? और किसी को तो कोई शिकायत नहीं।’

‘सर, आई एम सॉरी। आपको परेशान करता रहता हूं। पर ये मानवीयता की बात है। क्या किसी को दूसरे का अपमान इस तरह करना चाहिए?’

‘बात मान-अपमान की नहीं है। तुम मामूली बातों को इश्यू बना लेते हो।’

‘सर, ये तो संवेदनशीलता की बात है…’

‘मैं ये नहीं कहता कि सेंसेटिव नहीं होना चाहिए। पर सेंसेटिविटी से ऊपर प्रेक्टिकलिटी को रखना चाहिए।’

‘ठीक है सर। आगे से ध्यान रखूंगा। पर इसमें मेरा कोई इश्यू नहीं था। ये तो नौनिहाल की बात थी।’

‘तो तुम क्यों परेशान हो रहे हो?’

‘परेशानी की बात नहीं है। सौमनस्य रहे तो काम में भी सहजता रहती है।’

‘ओके… ओके, अब जाकर काम करो।’

रात को एनएएस कॉलेज के सामने नाले पर भगत जी के खोखे में चाय पीते हुए मैंने यह किस्सा नौनिहाल को सुनाया, तो वे एकदम अविचलित रहे।

‘भगवत जी सही कहते हैं। हमें काम पर ही ध्यान देना चाहिए। जागरण नया अखबार है। यहां स्टाफ ज्यादा है। इसलिए टकराव की नौबत गाहे-बगाहे आयेगी ही। इस सबको नजरअंदाज करना होगा।’

नौनिहाल की इस सीख को मैंने गांठ बांध लिया। बाद में कई बार मतभेद के मौके आये, पर फिर हम कभी नहीं उलझे। बल्कि गुटबाजी में भी कभी शामिल नहीं हुए। हालांकि इस वजह से कई बार अपने ही दोस्तों से नाराजगी भी मोल ली। पर इसी सीख की भुवेंद्र त्यागीवजह से मैंने जागरण में चार साल बहुत सहजता से कटे। कभी कोई तनाव नहीं हुआ। हालांकि जागरण में इसके मौके बहुत आते थे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

गोल मार्केट में इमरती-समोसा-चाय के साथ जश्न

नौनिहाल शर्माभाग 15 : दैनिक जागरण, मेरठ में काम करते हुए मुझे एक सप्ताह ही हुआ था कि एक दिन बहुत बड़ी खबर आयी। तीन जून, 1984 को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ। एजेंसी से खबर मिली, तो संपादकीय विभाग में चहल-पहल मच गयी। तब आज की तरह खबरिया चैनलों का जमावड़ा तो था नहीं। ‘ब्रेकिंग न्यूज’ केवल रेडियो या न्यूज एजेंसी से मिलती थीं। इसलिए जब ये खबर आयी, तो जागरण में मौजूद पत्रकार खासे उत्तेजित हो गये।

बहस होने लगी। पेज की प्लानिंग होने लगी। भगवतशरण जी ने सबको काम पर लगा दिया। पहले पेज पर राकेश सिन्हा और नरनारायण गोयल थे। मेरा मन मचल रहा था वो ऐतिहासिक खबर या उससे जुड़ी सहायक खबरें बनाने को। लेकिन मुझे नौनिहाल की सबसे ताजा सीख याद थी- जो बॉस कहे, वही करो। अपनी ओर से कोई सुझाव तभी दो, जब बॉस चाहे या उसे उस सुझाव की जरूरत हो।

…तभी भगवत जी जोर से बोले, ‘अरे भई, भिंडरावाले का फोटो ढूंढो कोई…’

मेरठ से जागरण शुरू ही हुआ था। तब तक वहां लाइब्रेरी और आर्काइव नहीं बनी थी। इसलिए फोटो की बड़ी समस्या रहती थी। दिल्ली से पीआईबी के फोटो रात को आते थे। दिल्ली-मेरठ शटल रात आठ बजे मेरठ सिटी आती थी। उससे जागरण का एक क्लर्क विज्ञापन, फोटो और दिल्ली ब्यूरो की खबरें लाता था। उसे स्टेशन से साकेत में दफ्तर तक पहुंचने में पौने नौ बज जाते थे। भगवत जी तब तक इंतजार नहीं करना चाहते थे। इसलिए महत्वपूर्ण फोटो वे दिन में ही जुगाडऩे की कोशिश करते थे। जो फोटो नहीं मिलते थे, वे किसी मैगजीन या अखबार से काटकर उनका नेगेटिव बनाकर पेज के नेगेटिव पर लगाकर छापा जाता था। ऐसे फोटो की क्वालिटी तो अच्छी नहीं होती थी, पर काम चल जाता था।

भगवत जी खबरों में लग गये। मुझे ख्याल आया कि तीन हफ्ते पहले ही इंडिया टुडे ने पंजाब पर कवर स्टोरी की थी। उसमें भिंडरावाले का बड़ा सा फोटो छपा था। मेरे पास वह अंक था। पर घर पर रखा था।

ख्याल तो आया, पर भगवत जी से कहता कैसे? क्राइम की खबर बनाने की पेशकश करके उनसे डांट खा चुका था। आधा घंटा निकल गया। फोटो नहीं मिला। बहुत हिम्मत करके मैंने भगवत जी के पास जाकर कहा, ‘सर। प्लीज डांटियेगा मत। मैं फोटो ला सकता हूं।’

‘तो इतना हैसिटेट क्यों कर रहे हो? लाओ दो।’

‘सर, घर पर है।’

‘जल्दी जाओ। ले आओ।’

मैंने साइकिल उठायी। साकेत से कोतवाली के पास अपने घर की ओर लपका। चार किलोमीटर का रास्ता। जून की लू के थपेड़े। सामने की हवा। सुनसान सड़क। तेजी से साइकिल चलाते हुए घर पहुंचा। घर पर सब हैरान। मैं उनकी किसी बात का जवाब दिये बिना इंडिया टुडे लेकर फिर पलट गया। आधे घंटे में दफ्तर में हाजिर।

भगवत जी को भिंडरावाले का फोटो फाड़कर दिया। वे खुश हो गये। बोले, ‘वेल डन।’

‘थैंक्यू सर।’

बाद में मैंने नौनिहाल को यह घटना सुनायी, तो वे खूब हंसे।

‘अब तुझे जिंदगी के और भी रंग दिखेंगे। सब समय की बात है। लेकिन भगवत जी प्रैक्टिकल संपादक हैं। जब उन्हें तुम्हारी बात अवांछित लगी, तो डांट दिया। जब काम की लगी, तो शाबाशी दी।’

इसके बाद ऐसी किसी भी घटना पर मैंने पहले की तरह कभी रिएक्ट नहीं किया। उस दिन खेल का पेज निकालते हुए मेरा मन पहले पेज में ही लगा रहा। बार-बार मैं उधर जाकर झांकता रहा। नरनारायण गोयल और राकेश सिन्हा खबरें बनाते रहे। भगवत जी उन्हें देखकर आगे बढ़ाते रहे। खेल पेज नौ बजे हो गया। पर मैं साढ़े बारह बजे तक दफ्तर में रुका रहा। जब पहला पेज पास हो गया, तभी घर आया। इसके बाद भगवत जी के सामने मैं अपनी राय रखने लगा और वे मुझे पहले से ज्यादा गंभीरता से सुनने लगे। इससे मुझे पत्रकारिता का एक और सबक मिला – अगर सही समय पर सही काम कर दिया जाये, तो कद और पूछ बढ़ जाती है।

एक कहावत मुझे उन्हीं दिनों नौनिहाल ने बतायी थी-

सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता।

हालांकि अब ऐसा नहीं है। अब तो शॉर्ट कट पहले तलाशे जाते हैं, मंजिलें बाद में तय की जाती हैं। ये सब देखकर नौनिहाल को सचमुच बहुत दुख होता, क्योंकि वे पत्रकारिता के उस स्कूल के हैडमास्टर थे जो केवल बखूबी काम करने में यकीन करता है।

एक दिन अजीब घटना हो गयी। मैं एक खबर के सिलसिले में सूरजकुंड गया। एक खेल सामान निर्माता के पास। उन्हें अपना परिचय दिया।

‘मैं भुवेन्द्र त्यागी। जागरण से।’

‘कब है जागरण? कहां है? कितना चंदा दूं?’

मुझे जोर से हंसी आयी। उन्हें अखबार के बारे में बताया। गलती महसूस करके उन्होंने न केवल मुझे खबर दी, बल्कि वे मेरे अच्छे सोर्स भी बन गये। उन्होंने कई बार मुझे फोन करके बल्ले लेने के लिए इंटरनेशनल क्रिकेटरों के मेरठ आने के बारे में बताया। इस तरह मुझे कपिल देव, मोहिंदर अमरनाथ, मनोज प्रभाकर, चेतन शर्मा, यशपाल शर्मा, अशोक मल्होत्रा, किरण मोरे, अजहरुद्दीन और रवि शास्त्री के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने का मौका मिला।

मेरठ में जागरण जम रहा था। हम सब पूरे उत्साह से काम करते। एक दिन नौनिहाल को दफ्तर में देखकर सुखद आश्चर्य हुआ।

‘गुरू कैसे?’

‘इंटरव्यू है।’

‘तुम्हारा? तुम्हारे इंटरव्यू की क्या जरूरत? तुम तो सबसे बड़े आलराउंडर हो।’

‘नहीं यार। क्यों चढ़ा रहा है?’

‘पर तुम्हारे बारे में तो सब जानते हैं। तुम्हारे यहां आने से जागरण में जान आ जायेगी।’

‘वो तो बाद की बात है। पर नियम से तो सभी को चलना होता है।’

बहरहाल, आधे घंटे तक नौनिहाल का इंटरव्यू हुआ। उनका सलेक्शन न होने का सवाल ही नहीं था। उन्हें अगले दिन से आने को कह दिया गया। उपसंपादक का पद। मैं उनके साथ गोल मार्केट तक गया। वहां इमरती-समोसा-चाय के साथ जश्न मनाया गया। मुझसे ज्यादा खुश और कोई हो नहीं सकता था उस दिन। फिर गुरू के साथ ज्यादा समय रहने का मौका मिलने वाला था। और नया सीखने का मौका मेरे सामने फिर चला आया था।

अगले दिन नौनिहाल और मैं बच्चा पार्क पर मिले। यह हमने पहले ही तय कर लिया था। वहां शिकंजी पी गयी। फिर हम दफ्तर पहुंचे। हमें देखकर नरनारायण गोयल मुस्कुराये। मेरठ समाचार की हमारी तिकड़ी अब जागरण में भी पूरी हो गयी थी। यहां स्टाफ ज्यादा था। काम भी ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से होता था। छोटे अखबार के मालिक की हर खबर में दखलंदाजी नहीं थी। लेकिन जहां थी, वहां भरपूर थी। अलग-अलग स्वभाव और प्रतिभा के लोगों से रोज मिलने और नयी चीजें सीखने का पूरा मौका था। और मैंने इसका पूरा फायदा उठाया।

मेरठ में जागरण जम रहा था। इसी के साथ हमारे सामने नये आयाम खुल रहे थे। मेरठ के पाठकों को पहली बार नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान का विकल्प मिला था। जब जागरण मेरठ में आया, तो वहां नवभारत टाइम्स आठ हजार और हिंदुस्तान पांच हजार बिकता था। पंजाब केसरी का भी अच्छा सर्कुलेशन था। जनसत्ता भी उठ रहा था। बाकी स्थानीय अखबार थे। पर जागरण तो शुरू से ही 40 हजार से ज्यादा रहा। इसलिए हमारा उत्साह रोज भुवेंद्र त्यागीपहले दिन से ज्यादा बढ़ा हुआ होता था। ये शहर के सबसे बड़े अखबार में काम करने का कमाल था….

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है।

नौकरी में एडजस्टमेंट करना पड़ता है दोस्त!

नौनिहाल शर्माभाग 14 : 26 मई, 1984 से मैंने दैनिक जागरण, मेरठ में काम शुरू कर दिया। पहले दिन खेल की कोई बड़ी खबर नहीं थी। इसलिए इंगलिश काउंटी क्रिकेट की खबर को मैंने खेल पेज की लीड बनाया। भगवत जी ने मुझे लोकल खेलों की भी रिपोर्टिंग करने का काम सौंपा। अब मेहनत और बढ़ गयी। दिन में रिपोर्टिंग और शाम 3 बजे से रात 10 बजे तक दफ्तर में काम। मैंने पहले कभी खबरों के एजेंसी के तारों की छंटाई नहीं की थी। इसमें मुझे बहुत समय लगता था। इसके लिए भी मैं नौनिहाल की शरण में गया।

‘गुरू, तुम कैसे फटाफट छंटाई करते हो? मुझे तो खेल की खबरें न्यूज डेस्क से छंटकर मिलती हैं। फिर भी उनकी और छंटाई में मुश्किल आती है।’

‘यह याददाश्त का खेल है। एक ही खबर के कई टेक आते हैं। खास खबरों के टेक अलग-अलग उंगलियों में दबा कर आगे छांटते रहो। सिंगल कॉलम की खबरें एक तरफ रखते रहो। डबल कॉलम या उससे बड़ी खबरों के सभी टेक एक साथ कर लो। फिर उन्हें मिलाकर आलपिन लगा दो।’

अगले दिन मैंने ये तरकीब आजमायी। और खेलों की खबरों के 50 से ज्यादा तार छांटने में दो मिनट से भी कम समय लगा। फिर तो मुझे इसका ऐसा अभ्यास हो गया कि कभी न्यूज डेस्क पर लोग कम होते, तो तारों की छंटाई का काम मुझे सौंप दिया जाता। सैंकड़ों तार छांटने में मुझे 10 मिनट से ज्यादा नहीं लगते थे। आजकल तो सभी न्यूज एजेंसी आनलाइन हैं। मगर तब टेलीप्रिंटर पर खबरें आती रहती थीं। जागरण में तीन एजेंसी थीं। कुछ मिनट में ही सैंकड़ों तार इकट्ठा हो जाते थे।

चूंकि नौनिहाल ने एक साथ कई बीट करने की आदत ‘मेरठ समाचार’ में डाल दी थी, इसलिए ‘जागरण’ भी मैं इससे खुद को रोक नहीं पाता था। भगवतशरण जी हर काम बहुत अनुशासन से करते थे। तीसरे ही दिन मुझे अपने एक स्रोत से क्राइम की एक बड़ी खबर मिली। मैंने अपनी आदत के अनुसार भगवत जी को वह खबर बतायी। उनह् गुस्सा आ गया।

‘तुम्हें खेल के लिए रखा गया है। क्राइम की स्टोरी तुम क्यों करोगे?’

‘सर, मेरे पास है तो मैं बता रहा हूं। आप मुझसे ना लिखवाना चाहें, तो कोई बात नहीं।’

‘तुम्हें धीरेन्द्र बाबू के सामने इश्यू बनाकर रखवाया है मैंने। इस बात को कभी मत भूलना। उतना बोलना, जितना कहा जाये।’

‘ठीक है सर..’

मैं रुआंसा होकर अपनी टेबल पर आकर बैठ गया। कोई दस मिनट तक तो काम  में मन ही नहीं लगा। दिल में यही आया कि क्यों नौनिहाल ने मुझे ज्यादा काम करने की आदत डाल दी, बड़े अखबार में ज्यादा काम करने की छूट क्यों नहीं है, क्या पत्रकारिता में ब्यूरोक्रेसी होनी चाहिए …

थोड़ी देर बाद भगवत जी ने फिर बुलाया।

‘तुम काम क्यों नहीं कर रहे?’

‘सर, बस एक खबर का हैडिंग सोच रहा था।’, मैंने अपनी आंखों की नमी छिपाते हुए कहा।

उस दिन किसी तरह काम किया। रात को भी ठीक से नींद नहीं आयी। सुबह होते ही पहुंच गया नौनिहाल के घर। वे कच्छा-बनियान पहने मंजन कर रहे थे। इतनी सुबह मुझे घर आया देखकर उन्हें अचरज हुआ।

‘क्या बात है? खैरियत?’

‘गुरू, कल तो गजब हो गया…’

और मैंने उन्हें पूरी घटना बता दी।

मंजन करके कुल्ला करते हुए वे बोले, ‘इतनी सी बात है?’

‘तुम्हें ये इतनी सी बात लग रही है? मेरी तो नींद ही उड़ गयी इससे।’

‘यार तू तो भावुक हो गया। नौकरी ऐसे नहीं होती। नौकरी में थोड़ा-बहुत एडजस्टमेंट करना पड़ता है दोस्त। हर जगह के अपने नियम होते हैं। उनका पालन तो करना ही चाहिए।’

मैं चकित था। ये नौनिहाल का दूसरा रूप था। अभी तक वे हर काम में आगे बढ़कर मुझे उत्साहित करते आये थे। आज पहली बार वे कदम पीछे करने की सीख दे रहे थे। मैंने अपनी यह शंका उनके सामने रखी।

‘इसीलिए तो मैं कह रहा था कि तू भावुक हो गया। मेरठ समाचार का माहौल अलग है। वहां बॉस वाली अवधारणा ही नहीं है। जागरण का माहौल अलग है। वहां बॉस हैं। वे अपने नियमों से बंधे हैं। तू भी वहां के नियमों के अनुसार चलना सीख ले… एक बात और ध्यान रखना। नौकरी में धभी भावुक नहीं होना चाहिए। मेरठ समाचार में तेरी नौकरी नहीं थी। तू वहां बस काम सीख रहा था। जागरण में तेरी नौकरी है। तो उसे नौकरी की तरह ही कर।’

नौनिहाल की ये सारी सीख एकदम व्यावहारिक थीं। इनमें भी आखिरी सीख तो गजब की थी। यह आज तक मेरे काम आ रही है। इसने कभी मुझे टेंशन में पडऩे दिया। वरना पत्रकारिता में टेंशन के बहुत मौके आते हैं। नौनिहाल की सबसे बड़ी खूबी थी हर हालात में सामंजस्य बिठा लेना। वे पत्रकारिता को परंपरागत तरीके से हटकर करने के हिमायती थे। मगर व्यवहार में एकदम आधुनिक थे। उनकी कई टिप्स तो ऐसी थीं, जिन्हें समय से आगे की माना जा सकता है। कई बार लगता था कि उनमें मैनेजमेंट की भी जबरदस्त खूबी है।

इस तरह मैंने खुद को एक हफ्ते के अंदर जागरण के माहौल में ढाल लिया। खेल के पेज से ही मतलब रखता। कई बार दूसरे पेजों की खबरों पर टिप्पणी करने को मन मचलता, वे खबरें लिखने को मन करता, पर मैं जबान सिल लेता। हां, ये जबान खुलती गोल मार्केट में जाकर…

आज तो जागरण का दफ्तर दिल्ली रोड पर है। तब डी-144, साकेत में था। वह एक पॉश रिहायशी कॉलोनी थी। आसपास चाय-पानी की कोई दुकान नहीं थी। दफ्तर में बस घड़े में रखा पानी मिलता था। एक चपरासी था ओमप्रकाश। वह घड़े में पानी भरता रहता था और ठंडा पानी पिलाता रहता था। लेकिन काम के बीच में चाय की तलब लग जाती थी। हमने भगवत जी से पूछा कि सर चाय का क्या करें। उन्होंने कहा कि चपरासी को भेजकर मार्केट से मंगवा लो। हमने कहा कि इतनी देर में तो पीकर ही आ सकते हैं। और भगवत जी ने हमें इसकी मंजूरी दे दी। पर केवल एक बार के लिए। अगर दूसरी बार चाय की तलब हुई तो दफ्तर में ही मंगाकर पीने को कहा। हमने उसका भी रास्ता निकाल लिया। मिड शिफ्ट 3 बजे शुरू होती थी। हम 6 बजे चाय पीने के लिए निकलते। साढ़े छह बजे नाइट शिफ्ट शुरू होती। वे सब हमें गोल मार्केट में मिल जाते। चाय पीकर वहां से हम सब दफ्तर आ जाते। साढ़े नौ बजे हम घर जाने के लिए निकलते तो नाइट वाले अपनी ‘पहली’ चाय पीने वहीं मिल जाते। इस तरह हम सभी शिफ्टों वाले दिन में दो बार साथ चाय पीते थे। मैनेजमेंट को इसकी भनक तक नहीं थी। और हमारे ऐसा करने की भी वजह थी…

दरअसल, मेरठ में जागरण शुरू होते ही हड़ताल हो गयी थी। हड़ताल खत्म होने पर मेरठ से संस्करण शुरू हुआ, तो सब पर मैनेजमेंट की नजर रहती थी। दफ्तर के बाहर अगर दो-तीन लोग भी एक साथ दिख जाते तो मैनेजमेंट के माथे पर बल पड़ जाते। दो बार साथ चाय पीने की तरकीब निकाली थी रमेश गोयल ने। वे भी अलग ही कैरेक्टर थे। खूब मसखरी करते। मुझे नौनिहाल की तरह उनके साथ भी बड़ा अपनापन महसूस होता। वे यारों के यार थे। हमारे लिए गोल मार्केट का अड्डा उन्होंने ही जमाया था। वहां जाकर हम समोसे और इमरती के साथ चाय पीते। हमारे लिए समोसे और इमरती बाकायदा ताजा बनायी जाती। उस अड्डे पर अनेक अजब-गजब घटनाएं हुईं। बाद में नौनिहाल के भी जागरण में आ जाने के बाद तो गोल मार्केट के भुवेंद्र त्यागीहमारे इस अड्डे में और भी जान आ गयी।  

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

धीरेंद्र मोहन बोले- बांड भरो, रख लेंगे

नौनिहाल शर्माभाग 13 : अगले दिन मैं नौनिहाल से आशीर्वाद लेकर ‘दैनिक जागरण’ जॉयन करने पहुंचा। दिल बल्लियों उछल रहा था। जाकर भगवतशरण जी को नमस्कार किया। उन्होंने कमलेश अवस्थी से मिलने को कहा। वे प्रोडक्शन से लेकर पर्सनल तक बहुत कुछ देखते थे। उनकी नाक चढ़ी रहती थी। उन्होंने एप्लीकेशन मांगी। मैंने लिखकर दे दी। वे भड़क गये।

‘तुम ना तो 18 साल के हो और ना ही ग्रेजुएट हो। नौकरी पर कैसे रख लें?’

तब मेरी उम्र साढ़े सत्रह साल थी और मैंने बी. ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा दी थी। उसका भी रिजल्ट अभी नहीं आया था।

‘पर मेरा अपाइंटमेंट भगवतशरण जी ने किया है।’

‘भगवत जी भी पता नहीं कैसे अपाइंट कर लेते हैं। तुम तो नौकरी के लिए एलिजिबल ही नहीं हो।’

मैं एकदम नर्वस हो गया। किससे सलाह लूं? नरनारायण गोयल भी ‘मेरठ समाचार’ से जागरण आ गये थे। पर वे अभी दफ्तर नहीं पहुंचे थे। भगवत जी धीरेन्द्र मोहन के केबिन में थे। मैंने उनकी टेबल से ही ‘मेरठ समाचार’ के ïदफ्तर में फोन लगा दिया। मुझे पता था कि नौनिहाल अभी दफ्तर में ही होंगे। एक कंपोजिटर ने फोन उठाया। मैंने उसे समझाया कि नौनिहाल से बहुत जरूरी सलाह लेनी है। जो मैं बोलूं वह नौनिहाल के सामने कागज पर लिख देना और जो वे लिखें, वह मुझे बता देना।

कई मिनट तक मैं नौनिहाल से ‘सलाह’ लेता रहा। शायद ऐसी काउंसलिंग पहले किसी ने नहीं ली होगी। आखिर में नौनिहाल ने एक अजीब सी ‘टिप’ दी- अब तेरे सामने एक ही रास्ता है। भगवत जी के सामने जाकर सारी बात कह दे। उन्हें ये समझाने की कोशिश कर कि आपने तो मेरा इंटरव्यू लेकर मेरा अपाइंटमेंट किया था, पर अवस्थी जी मुझे अपाइंटमेंट लैटर नहीं दे रहे।

मैं कुछ देर यों ही भगवत जी की मेज के सामने बैठा रहा। इस बीच अवस्थी जी कई बार मुझे घूरकर चले गये। कोई आधे घंटे बाद भगवत जी आये। मैंने उनसे सब कुछ बता दिया। जैसा कि नौनिहाल ने सोचा था, भगवत जी ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। मुझसे बोले- चलो मेरे साथ… और मैं उनके पीछे हो लिया। वे सीधे धीरेन्द्र मोहन के ऑफिस में घुस गये। आग-बबूला होकर बोले, ‘धीरेन्द्र बाबू ऐसे कैसे चलेगा? मैं अपाइंटमेंट करता हूं और कमलेश बाबू अपाइंटमेंट लैटर नहीं देते।’

‘क्या हुआ भगवत जी? मामला क्या है?’ , धीरेन्द्र मोहन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

‘मैंने इन्हें (मेरी ओर इशारा करके) खेल पेज पर काम करने को अपाइंट किया है। कमलेश बाबू इन्हें लैटर नहीं दे रहे।’

इस बीच मैं असहाय सा खड़ा रहा। धीरेन्द्र मोहन ने आखिर मुझसे कहा, ‘देखो, भगवत जी को शायद पता नहीं था कि तुम इस नौकरी के लिए एलिजिबल नहीं हो। इसीलिए अवस्थी तुम्हें लैटर नहीं दे रहे। कुछ रास्ता तो निकालना पड़ेगा।’

मुझे उम्मीद नजर आयी। वे आगे बोले, ‘एक काम करो। शहर के दो जाने-माने लोगों से एक बांड भरवाकर लाओ कि तुम अपनी मर्जी से यह नौकरी कर रहे हो। तुम पर किसी का दबाव नहीं है। और तुम पांच साल यहां जरूर काम करोगे। अगर इससे पहले काम छोड़ा तो उन दोनों लोगों से दस-दस हजार रुपये वसूल किये जायेंगे।’

मैंने कहा कि अभी ले आता हूं बांड भरवाकर। आप पेपर दिलवाइये। उन्होंने अवस्थी जी को बुलाकर पूरी बात दोहरा दी। अवस्थी जी के चेहरे पर असहमति का भाव उभरा, पर धीरेन्द्र जी की मुख मुद्रा देखकर वे चुप लगा गये। बाहर आकर मुझसे पूछा, किससे सिफारिश करवाई है? मैंने कहा- किसी से भी नहीं। आप चाहो तो धीरेन्द्र बाबू से पूछ लो।

उन्होंने अनमने से होकर मुझे बांड पेपर दिये। मैंने नौनिहाल के घर की ओर साइकिल दौड़ायी। अब तक उनका घर पहुंचने का समय हो गया था। मैंने उन्हें बांड पेपर दिखाये। पेपर देखकर नौनिहाल बोले, ‘ये कोई बड़ी बात नहीं है। किसी से भी भरवाकर दे दे।’

मैंने मेरठ के मशहूर डॉक्टर अनिल प्रसाद (अब स्वर्गीय) और स्टेट बैंक के ब्रांच मैनेजर डी. डी. मिश्रा से बांड भरवा लिये। यह सब करके मैं पांच बजे फिर जागरण के दफ्तर में पहुंच गया। अब तक नन्नू भाई भी आ गये थे। उन्होंने इशारे से मुझसे पूछा कि क्या हुआ। जाहिर है कि इस बारे में इस बीच वहां काफी चर्चा हो चुकी थी। मैंने बांड अवस्थी जी को दे दिये। उन्होंने फिर हड़काने की कोशिश की।

‘देख लो, अगर पांच साल से पहले नौकरी छोड़ी, तो इन दोनों से दस-दस हजार रुपये वसूले जायेंगे।’

‘ठीक है। अब मैं काम शुरू करूं?’

‘नहीं। कल से करना। आपकी ड्यूटी तीन बजे से है। आज सवा पांच बज चुके हैं। अटेंडेंस रजिस्टर में में भी नाम जोडऩा होगा।’

मेरा उत्साह सातवें आसमान पर था। मेरी इच्छा उसी दिन से काम शुरू करने की थी। मैं भगवत जी के पास पहुंचा।

‘जॉयन कर लिया?’

‘सर मैंने औपाचारिकता तो पूरी कर ली है, पर अवस्थी जी ने कल से आने के लिए कहा है।’

‘वे कौन होते हैं टाइम बताने वाले? काम तुम्हें संपादकीय में करना है। मैं बताऊंगा टाइम।’

उन्होंने एक कागज पर मेरा नाम लिखकर गेट पर ‘टाइम अफिस में भिजवा दिया। मुझसे कहा, कल से गेट पर ही साइन करके आना।

मुझे यह जरा अजीब लगा। मैंने सोचा, ऐसा तो फैक्ट्री में होता है। अखबार के दफ्तर में तो हाजिरी का कुछ सम्मानजनक तरीका होना चाहिए। लेकिन चूंकि वहां ऐसा ही चलन था, एसलिए मैंने इसे मुद्दा नहीं बनाया… और अगले चार साल तक जागरण में नौकरी करने के दौरान बाकी सब की तरह मैं भी गेट पर ही हाजिरी लगाता रहा!

खैर!  

26 मई, 1984 को मैंने जागरण में काम शुरू किया। भगवत जी ने मुझे अशोक त्रिपाठी के बराबर वाली कुर्सी पर बैठाते हुए उनसे कहा, ‘ये भुवेन्द्र त्यागी हैं। ‘मेरठ समाचार’ से आये हैं। आज से ये खेल के पन्ने पर काम करेंगे।’

अशोक जी कानपुर से आये थे। विनम्र होने के साथ-साथ जरा अडिय़ल भी थे। पहले ही दिन मेरी उनसे भी ‘मुठभेड़’ हो गयी। काउंटी क्रिकेट की एक खबर थी- सरे ने डरबन को चार विकेट से हराया। अशोक जी ने ‘वार्ता’ की वह खबर मुझे बनाने को दी। मैंने खबर एडिट की। हैडिंग दिया- ‘सरे की डरबन पर जीत’

अशोक जी ने उसे संशोधित किया- ‘सरे की डरबन पर 4 विकेट और 2 रन से जीत’

मैंने प्रतिवाद किया।

‘आप हैडिंग में ‘चार विकेट से’ तो जोड़ सकते हैं, लेकिन ‘दो रन’ जोडऩा निरर्थक है।’

‘तुम मुझे हैडिंग लगाना सिखाओगे? पहले ही दिन ऐसा दुस्साहस?’

‘नहीं बात दुस्साहस की नहीं है। सार्थकता की है। विकेट से जीत मिलने पर रन लिखने की जरूरत ही नहीं।’

उन्होंने तुरंत दोनों टीमों की दोनों पारियों के रन जोड़े। सरे के रनों में से डरबन के रन घटाये। बचे दो रन।

‘देखो। दो रन इसलिए लिखने पड़ेंगे क्योंकि इतने रन सरे ने ज्यादा बनाये हैं। और चार विकेट इसलिए लिखने पड़ेंगे क्योंकि सरे के चार विकेट बचे थे।’

इस ‘तर्क’ का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन भगवत जी सारी बात सुन रहे थे। उन्होंने मुझे बुलाया।

‘क्या बात है? तुम बहस क्यों कर रहे हो?’

‘सर, मैं बहस नहीं कर रहा। तकनीकी बात कर रहा हूं।’

‘वो ठीक है, पर जरा डैकोरम का ध्यान रखो। किसी सीनियर से उलझो मत।’

मैं वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया। अशोक जी बोले, ‘मेरी शिकायत कर रहे थे?’

‘कैसी बात करते हैं अशोक जी? मेरी इतनी जुर्रत? मैं तो आपसे काम सीखकर ही आगे बढ़ूंगा।’

टकराव का रास्ता मैंने तुरंत छोड़ दिया। मगर, पहले ही दिन जिस तरह मैंने बिना किसी झिझक के बात की, वह संबल जिस शख्स का दिया हुआ था, वे नौनिहाल ही थे।

और सबसे रोचक बात ये कि तीसरे दिन भगवत जी ने मुझे स्वतंत्र रूप से खेल का पूरा पेज दे दिया। अशोक जी को प्रादेशिक डेस्क पर लगा दिया। वैसे भुवेंद्र त्यागीअशोक जी का भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार था और मैंने उनसे अगले चार साल में काफी कुछ सीखा।    

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com   के जरिए किया जा सकता है।

गुरु ने ओके किया तो गया जागरण

नौनिहाल शर्माभाग 12 : एक दिन मैं नौनिहाल के साथ बच्चा पार्क में बैठा था। अब तो इस पार्क को तोड़कर सड़क बना दी गयी है। इधर-उधर की गपशप के दौरान मैंने नौनिहाल से कहा, ‘गुरू, मेरठ समाचार में साहित्य नहीं छपता। इसके लिए भी जगह होनी चाहिए।’ वे बोले- ‘हां, मैंने इसके लिए योजना बनायी है। कुछ स्थानीय लेखकों से रचनाएं मंगायी हैं। तू भी अपने लेखक दोस्तों से कहानी-कविता भेजने को बोल दे।’ अगले हफ्ते से अखबार में साहित्य भी शुरू हो गया। खुद नौनिहाल की भी कई रचनाएं छपीं। इनमें उनके व्यंग्य लेख बहुत पसंद किये गये। तीन हफ्ते बाद नौनिहाल ने मुझे कुछ किताबें और पत्रिकाएं दीं। बोले, ‘इनकी समीक्षा लिख डाल।’

मैं अवाक। तब तक मैंने साहित्यिक लेखन बस शुरू ही किया था। पढ़ता भरपूर था। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में। रूसी साहित्य भी खूब पढ़ा था। अखबारों में किताबों की समीक्षाएं भी पढ़ता था। पर समीक्षा लिखने के योग्य मैं खुद को नहीं समझता था।

लेकिन नौनिहाल तो नौनिहाल ठहरे। वे अपने शिष्यों के सामने नयी चुनौतियां रखते थे। उन चुनौतियों को पूरा करने के योग्य भी बनाते थे। इसलिए जब मैंने समीक्षा लिखने के उनके निर्देश पर आश्चर्य किया, तो उन्होंने पूछा, ‘अच्छा, ये बता कि तुझे सबसे बेहतरीन उपन्यास कौन सा लगा आज तक?’

‘प्रेमचंद का गोदान और गोर्की का मां।’

‘ठीक है। कल मैं तुझे गोदान की समीक्षा लिखकर दिखाऊंगा।’

अगले दिन नौनिहाल ने मुझे दो पेज की समीक्षा पढऩे को दी। गोदान उन्होंने कई साल पहले एम. ए. की पढ़ाई के दौरान पढ़ा था… और वह उन्हें समीक्षा लिखने लायक याद था। मैंने वह समीक्षा पढ़ी।

‘बस ये ही है समीक्षा। कथ्य, भाव, बिम्ब, शैली, चरित्र चित्रण, संवाद, भाषा, सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-लोक चेतना, लेखक की अंतर-दृष्टिï, उद्देश्य और उद्देश्य में सफलता। इन सब के इर्द-गिर्द समीक्षा लिखी जाती है। अगर लेखक पर किसी दूसरे लेखक या रचना का प्रभाव पकड़ में आये, तो उसका उल्लेख भी करना चाहिए।’

मैं उनके इस गूढ़ सबक को समझता रहा। उन्होंने पहली समीक्षा लिखने के लिए मुझे चार दिन की मोहलत दी। वह किताब थी अरुणाभ। पटना से प्रकाशित। सतीशराज पुष्करणा के संपादन में उसमें 118 कवियों की छंदोबद्ध कविताएं संकलित थीं। उनमें 27 कवयित्रियां थीं। 18 दिसंबर, 1983 को इसकी समीक्षा छपी –

‘अरुणाभ: नयी पीढ़ी की पीड़ा, श्रंगार की भरमार’

इसके बाद बाल पताका, युग मर्यादा और संकेतिका जैसी पत्रिकाओं व कविता संकलनों की समीक्षा भी मुझसे लिखवायीं।

मूल्य युद्धों का (4 सितंबर, 1983), श्रीलंका में तमिल नरसंहार (26 सितंबर, 1983), गांधी संस्कृति का अर्थ व आवश्यकता (2 अक्टूबर, 1983), ऊर्जा संकट (6 नवंबर, 1983), सफर चौंतीसवें गणतंत्र दिवस पर (26 जनवरी, 1984), राष्ट्रीय एकता की समस्याएं (26 जनवरी, 1983), सामाजिक परिवर्तन औत आंदोलन (31 जनवरी, 1984), पंजाब समस्या: भानुमति का पिटारा (24 फरवरी, 1984) और क्रांतिदूत भगतसिंह का जीवन दर्शन (23 मार्च, 1984) जैसे विविध लेख मुझसे लिखवाकर नौनिहाल ने ‘मेरठ समाचार’ में छापे।

हर साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में न्यूज एजेंसियों पर साल का लेखा-जोखा आता है। तो उस साल नौनिहाल को वार्ता पर ऐसा लेखा-जोखा देखकर आइडिया आया कि मेरठ का भी जाना चाहिए। मैंने कहा कि यह तो एजेंसी पर आयेगा नहीं। नौनिहाल ने मुझे दुछत्ती पर पर चढ़ाकर ‘मेरठ समाचार’ के पूरे साल के अंक देखकर मैटर तैयार करने पर लगा दिया। मुझे फाइलों में से मैटर निकालने में पूरा दिन लग गया। हाथ और कपड़े पेपर की स्याही से काले हो गये। शाम को मैं मैटर फेयर करता गया और नौनिहाल उसे दुरुस्त करके कंपोजिंग में भेजते गये। दो जनवरी, 1984 को पूरे पेज पर वह मैटर छपा। मेरठ में इस तरह का वह पहला प्रयोग था।  

नौनिहाल की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे हर नये पत्रकार को संपूर्ण पत्रकार बनाना चाहते थे। इसके लिए वे उनसे नये-नये विषयों पर लिखवाते थे और लिखना भी सिखाते थे। साहित्य के अलावा उन्होंने मुझसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर भी लिखवाया। इसीलिए मेरे करियर के शुरू में ही उन्होंने मुझसे इतने विषयों पर लिखवाया, कि चीजों की समझने और उनके विश्लेषण की मेरी अच्छी समझ बन गयी। उन्होंने कभी इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। लेकिन वे किसी पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान से कम नहीं थे।

नौनिहाल की शागिर्दी में काम करके मेरे अंदर काफी आत्मविश्वास आ गया था। मैं ‘मेरठ समाचार’ में कई महीने से बिना तनखा के काम कर रहा था। नौनिहाल कई बार बाबूजी से मेरी तनखा शुरू करने को कह चुके थे, लेकिन वे टाल जाते थे। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं थी। पैसे से ज्यादा कीमती मुझे नौनिहाल से काम सीखना लगता था। तभी मेरठ से ‘दैनिक जागरण’ शुरू होने की सुगबुगाहट हुई। मैंने नौनिहाल से कहा, गुरू तुम चले जाओ जागरण में। वे इसे हंसकर टाल जाते।

जागरण की डमी निकलने लगी थी। ज्यादातर स्टाफ कानपुर से लाया गया था। अचानक स्टाफ में कुछ असंतोष हुआ और कुछ लोग कानपुर लौट गये। मैं वहां किसी को जानता नहीं था। नौनिहाल ने एक-दो बार वहां हो आने को कहा भी, पर मैं टाल गया।

एक दिन मैं स्टेडियम गया। मैं वहां खेलता भी था और खबरें भी ले आता था। साइकिल खड़ी कर ही रहा था कि स्टैंड वाले ने कहा, आरएसओ साहब तुम्हें याद कर रहे थे। मुझे लगा कि कोई खबर देनी होगी उन्हें। वे थे आर. एस. त्रिपाठी। मेरठ के क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी। मैं उनके ऑफिस में पहुंचा। वे किसी से फोन पर बात कर रहे थे। उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद फोन रखकर बोले, ‘जागरण के संपादक भगवतशरण आये थे। खेल के लिए किसी को ढूंढ रहे थे। जाकर उनसे मिल लो।’

मेरे चेहरे पर असमंजस देखकर उन्होंने तुरंत मिल लेने को कहा।    

स्टेडियम के पास ही साकेत कॉलोनी है। साकेत में डी-144 था जागरण का पता। कई बार मैंने उसके सामने से गुजरते हुए वहां अखबार का बोर्ड लगा देखा था। तो मैंने साइकिल उठायी और चल दिया डी-144 की ओर। वहां दरवाजे के बाहर साइकिल खड़ी की। अंदर जाने की जुगत कर ही रहा था कि सिक्यूरिटी वाले को खड़े होकर एक सज्जन को सेल्यूट करते देखा। वह बोला, ‘नमस्ते भगवत जी।’

मुझे लगा कि हो न हो, ये ही भगवत शरण जी हैं। मैंने लपककर उन्हें नमस्ते की और पूछा, ‘सर आप ही भगवतशरण जी हैं?’

उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और हां में सिर हिलाया। मुझे उनके साथ अंदर जाते देखकर गेट पर किसी ने रोका भी नहीं।

‘सर, मैं भुवेन्द्र त्यागी। स्टेडियम से त्रिपाठी जी ने आपसे मिलने भेजा है। मैं मेरठ समाचार में काम करता हूं।’

‘ओके। कम विद मी।’

संपादकीय विभाग में जाकर उन्होंने अपनी सीट पर बैठकर घंटी बजायी। चपरासी आया। वे बोले, ‘रमेश, बहुत गर्मी है। ठंडा पानी पिलाओ। इनके लिए भी लाना।’

यह रमेश बाद में मेरा और नौनिहाल का अच्छा दोस्त बना।

पानी पीकर भगवत जी ने मेरा इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया। कोई आवेदन नहीं। कोई टेस्ट नहीं। सीधे इंटरव्यू। सवाल इंग्लिश काउंटी क्रिकेट, सुनील गावस्कर, कपिलदेव और कुछ महीने बाद लास एंजेलिस में होने वाले ओलिंपिक खेलों के बारे में थे। मेरे सारे जवाब सही थे। दस मिनट बाद भगवत जी बोले, ‘कल से काम पर आ जाओ। ट्रेनी सब एडिटर का पद मिलेगा। खेल के पेज पर काम करना होगा। सैलरी 600 रुपये महीना। कल तीन बजे आ जाना।’

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। यकीन ही ना आये।

‘सर, सच्ची?’

‘हां भई, नौकरी पर रख लिया गया है तुम्हें।’

यह सुनकर मैं मानो नींद से जागा।

‘लेकिन सर, पहले मुझे अपने अपने गुरू से अनुमति लेनी पड़ेगी।’

‘वेरी सरप्राइजिंग। जॉब तुम्हें करना है या तुम्हारे गुरू को?’

‘सारी सर। पर उनसे पूछे बिना मैं हां नहीं कर सकता।’

‘ओके। गो एंड सीक हिज परमीशन।’

मैं साइकिल दौड़ाता हुआ ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर पहुंचा। नौनिहाल पेज का पूफ देख रहे थे। मुझमें जरा भी इंतजार करने का धीरज नहीं था। फटाफट सब कुछ बता दिया। नौनिहाल नें खड़े होकर मुझे गले लगाया। मेरी पीठ ठोंकी। एक कंपोजिटर को 10 रुपये देकर रसगुल्ले लाने को कहा। कुछ मिनट बाद वहां मुझे जागरण में नौकरी मिले का जश्न मनाया जा रहा था। आधे घंटे बाद नौनिहाल ने मुझे तुरंत जाकर भगवत जी को हां बोलने को कहा। मैंने साइकिल सुभाष नगर से फिर साकेत की ओर मोड़ दी। भगवत जी मुझे देखकर चौंके। ‘अरे कल आ जाते। कनफरमेशन देने के लिए आने की क्या जरूरत थी?’

‘सर, मैं इसलिए दौड़ा हुआ आया कि कहीं आप किसी और को ना रख लें।’

‘तुम्हारे गुरूजी ने यस बोल दिया?’  

‘यस सर।’

‘ओके। कल ठीक तीन बजे आ जाना। तभी काम भी समझा दिया जायेगा।’

मैं उन्हें नमस्ते करके अपने घर की ओर चला। अंधाधुंध साइकिल दौड़ाता हुआ। घर पर यह सुनकर होली-दीवाली जैसा माहौल हो गया। पड़ोस तक म़ें मिठाई बंट गयी।

वो 25 मई, 1984 का दिन था। अगले दिन जागरण में मेरी नौकरी शुरू होने वाली थी।

भुवेंद्र त्यागी… और इसका सारा श्रेय था नौनिहाल को!        

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है।

सबसे ज्यादा अखबार मेरठ से निकलते हैं!

नौनिहाल शर्मा
नौनिहाल शर्मा
भाग 11 : क्राइम व जनरल रिपोर्टिंग के बाद नौनिहाल ने मुझे खेल की रिपोर्टिंग करने को भी कहा था, क्योंकि उस समय मेरठ में प्रभात, मेरठ समाचार, हमारा युग और मयराष्ट्र जैसे दैनिक अखबार निकलते थे। जागरण और अमर उजाला तब तक वहां नहीं आए थे। नौनिहाल ने एक दिन बताया कि भारत में सबसे ज्यादा अखबार मेरठ से निकलते हैं।

मैं आश्चर्य से बोला- ‘क्यों फेंक रहे हो गुरु?’

‘तू डीआईओ (जिला सूचना कार्यालय) जाकर देख ले आंकड़े।’

हालांकि नौनिहाल की बात पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था, लेकिन मैं जिज्ञासावश डीआईओ गया। मेरठ से पंजीकृत अखबारों की सूची देखी। मैं चकित रह गया। तब मेरठ से 13 दैनिक और 866 साप्ताहिक अखबार पंजीकृत थे। इनमें से 60 से ज्यादा अखबार नौनिहाल के पास नियमित रूप से आते थे। मैंने आज तक उनसे ज्यादा अखबार पढऩे और खत लिखने वाला कोई दूसरा नहीं देखा। उतने अखबार पढऩे के बाद वे रोज 20 से ज्यादा खत भी लिखते थे। उनकी डाक में भी तकरीबन इतने ही खत आते थे।

.नौनिहाल ने मुझे भविष्य में अच्छे मौके के लिए खेल रिपोर्टिंग भी करने की सलाह दी थी। इसका मुझे आगे चलकर फायदा भी हुआ। इसलिए जब अरुण जैन ने मेरठ में इलेक्ट्रा अखिल भारतीय टेबल टेनिस टूर्नामेंट शुरू किया, तो मुझे उसकी रिपोर्टिंग से काफी कुछ सीखने को मिला। नौनिहाल ने मुझे कमलेश मेहता, मंजीत दुआ, इंदु पुरी और शैलजा पारीख जैसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाडिय़ों के इंटरव्यू करने को भी कहा। टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग के साथ ही मैंने इन सभी खिलाडिय़ों के इंटरव्यू भी किये। मैं नौनिहाल का खेल ज्ञान देखकर चकित हो जाता था। उन्होंने ही मुझे खेल पत्रकारिता का भी शुरूआती सबक दिया। इलेक्ट्रा टूर्नामेंट उस समय देश में राष्ट्रीय टेबल टेनिस टूर्नामेंट के बाद दूसरे नंबर का टूर्नामेंट था। इसे मैंने कई साल कवर किया। जब मैं नवभारत टाइम्स में खेल डेस्क पर काम करने 26 अप्रैल, 1988 को मुम्बई आया, तो इन सभी खिलाडिय़ों से पूर्व परिचय होने के कारण काफी खबरें मिलीं।

लेकिन इलेक्ट्रा टूर्नामेंट की कवरेज करते हुए एक दिन अजीब घटना हो गयी। मेरी सभी खास खबरों पर नौनिहाल बाईलाइन देते थे। मेरी 17 वीं सालगिरह से पहले ही वे मुझे 100 से ज्यादा बाईलाइन दे चुके थे। इलेक्ट्रा टूर्नामेंट के फाइनल की खबर भी उन्होंने पहले पेज पर बाईलाइन से लगायी। मेरठ समाचार के मालिक और संपादक राजेन्द्र अग्रवाल (बाबूजी) के दोनों बेटे दिनेश और अरविंद भी अखबार के काम में ही जुटे रहते थे। दिनेश खबरें भी लिखते थे। उन्होंने मुझे खबर लिखते समय किसी से भी न डरने की सीख दी थी। अरविंद खबरें कंपोज भी करते थे। हमारे जाने के बाद उन्होंने उस खबर पर अपनी बाईलाइन लगा दी। अगले दिन मैं दफ्तर पहुंचा, तो वहां अजब नजारा था।

नौनिहाल मुंह फुलाये बैठे थे। मेज पर उनकी कलम बंद रखी थी। सामने वार्ता की खबरों का ढेर था। बाबूजी उनसे कई बार शुरू काम करने को कह चुके थे। पर वे ऐसे ही बैठे थे। मैं अंदर कदम रखते ही भांप गया कि मामला कुछ गड़बड़ है। मुझे देखते ही नौनिहाल फुर्ती से उठे और मेरा हाथ पकड़कर बाबूजी के पास ले गये।

‘इसकी खबर पर अरविंद ने अपनी बाईलाइन दे दी। उसे इसका क्या हक है? माफी मांगगी पड़ेगी’, वे गुस्से से बोले। मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं गुरू, मुझे तो आप बहुत बाईलाइन देते रहते हो। अंबरीश भाई का नाम चला गया, तो मुझे इसकी कोई शिकायत नहीं।’    दरअसल, मैं ऐसे हालात में नौनिहाल के उग्र स्वभाव को जानता था। इसलिए नहीं चाहता था कि वे कोई पंगा लें।

पर नौनिहाल ने पंगा ले लिया। अंबरीश ने माफी नहीं मांगी। नौनिहाल उठे। साइकिल निकाली। अपने घर की ओर रवाना हो गये। उनके पीछे मैं भी अपनी साइकिल पर लपका। भाभीजी सारा माजरा समझ गयीं। मैंने उन्हें पूरी बात बतायी। उन्होंने स्टोव पर चाय बनाते हुए कहा, ‘तुम चिंता मत करो। अभी कोई आयेगा प्रेस से और इन्हें अपने साथ मनाकर ले जायेगा।’

थोड़ी देर में एक कंपोजिटर साइकिल पर आया। उसने नौनिहाल के पैर पकड़ लिये। बोला, ‘जल्दी चलो यार। तुम नहीं गये, तो अखबार बंद हो जायेगा और हम सबकी नौकरी चली जायेगी।’ नौनिहाल टस से मस नहीं हुए। वह भाई भी लगा रहा। चिरौरी करता रहा। करीब आधे घंटे बाद नौनिहाल पिघले। बोले, ‘चल, तेरी वजह से आता हूं। वरना मैंने तो नौकरी छोड़ ही दी थी।’

चाय का एक और दौर चला। अपनी-अपनी साइकिल पर हम तीनों निकले। दफ्तर पहुंचे। बाकी कंपोजिटर बाहर ही इंतजार कर रहे थे। हम बाबूजी के पास पहुंचे। वहां नौनिहाल ने कुछ सुनने से पहले ही अपनी शर्त रख दी- काम तब शुरू करूंगा, जब अरविंद दोबारा ऐसा कुछ न करने का वादा करे। बाबूजी ने कहा- मेरी गारंटी। तू काम बढ़ा।

इस सब में डेढ़ घंटा बीत गया था। लेकिन नौनिहाल ने एडिशन समय पर ही निकाल दिया। खुद खबरें लिखने के बजाय सीधे कंपोज करने लगे। मैं खबरें लिखकर दूसरे कंपो जिटरों को देता गया।

आज यह घटना अजीब जरूर लगे, पर मेरे लिए हमेशा प्रेरक रहेगी। भला आज कौन सीनियर किसी सहयोगी के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगायेगा? आखिर ये आर्थिक उदारीकरण का दूसरा दौर है, उत्तर आधुनिक काल के समापन की बेला है।

भुवेंद्र त्यागी
भुवेंद्र त्यागी
… लेकिन 27 साल पहले नौनिहाल ने यह किया था।  

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

माईसेल्फ नरनारायण स्वरूप गोयल…

नौनिहाल शर्माभाग 10 : जन समस्याओं वाले कॉलम ने मुझे जबरदस्त पहचान दी थी। अब मेरठ के हर क्षेत्र के लोगों से मेरी पहचान हो गयी थी। हर तरफ से सहयोग मिल रहा था। खबरों के लिए नये-नये स्रोत बन रहे थे। … और इस सब के लिए सबसे ज्यादा श्रेय जाता था नौनिहाल को। वे हमेशा मुझे स्रोत बनाने के लिए प्रेरित करते रहते थे। कई पत्रकारों से भी मुझे उन्होंने ही मिलवाया था। एक दिन मैं ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर में गया, तो वहां एक कुर्सी पर एक बहुत प्रभावशाली सज्जन बैठे थे। नौनिहाल ने उनकी तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा- ये बहुत नफीस किस्म के पत्रकार हैं। इनसे परिचय करके आओ। मैं उनके सामने पहुंचा। उन्होंने क्रीम कलर का सफारी सूट पहन रखा था। आंखों पर धूप का चश्मा। क्लीन शेव्ड। बड़ी तन्मयता से खबर लिख रहे थे। अभी तक मैंने इस हुलिये का एक ही पत्रकार मेरठ में देखा था- सतीश शर्मा। वे नवभारत टाइम्स और आकाशवाणी के लिए खबरें भेजते थे।

तो मैं संभ्रांत से दिखने वाले उन पत्रकार के पास गया। वे खबर लिखने में डूबे हुए थे। मैंने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया, ‘नमस्ते भाई साहब। मैं भुवेन्द्र त्यागी।’

उन्होंने हाथ आगे बढ़ाकर कहा, ‘माईसेल्फ नरनारायण स्वरूप गोयल। बागपत से। दिल्ली के कई अखबारों में खबरें भेजता हूं। यहां भी काम करता हूं।’

मैंने पहली बार किसी पत्रकार को अंग्रेजी में अपना परिचय देते हुए सुना था। वह भी मेरठ में, 1983 में, और बागपत के पत्रकार द्वारा। मैं उनकी शख्सियत से बहुत प्रभावित हुआ।

नौनिहाल की मेज पर आया, तो वे बोले, ‘मिला नन्नू भाई से? बहुत अच्छे पत्रकार हैं। बागपत में माया त्यागी कांड कवर करने जो दिल्ली के पत्रकार आते थे, उनकी मदद करते-करते पत्रकार बन गये। हैं गजब के। पूरी ठसक से रहते हैं। उनकी ठसक के आगे दिल्ली के पत्रकारों की ठसक भी पानी भरती है।’

उस दिन से नन्नू भाई भी मेरे मार्गदर्शक बन गये। मुझे पहले ‘मेरठ समाचार’ और फिर ‘दैनिक जागरण’ में नौनिहाल और नन्नू भाई, दोनों के साथ काम करने का मौका मिला। बाद में दोनों ‘अमर उजाला’ में चले गये। नन्नू भाई तो मुरादाबाद एडिशन के आरई भी बने। कई बार उन दोनों में मतभेद भी होते थे। लेकिन दोनों एक-दूसरे की प्रतिभा का बहुत सम्मान करते थे।

नौनिहाल ने ही नीरजकांत राही, पुष्पेन्द्र शर्मा और अनिल त्यागी से मुझे मिलवाया था। तब नीरज व पुष्पेन्द्र ‘दैनिक प्रभात’ में और अनिल ‘हमारा युग’ में काम करते थे। इनके बारे में नौनिहाल का विश्लेषण इस प्रकार था- ”नीरज और अनिल बेहतरीन क्राइम रिपोर्टर बन सकते हैं। पुष्पेन्द्र निहायत गंभीर और ज्ञानवान पत्रकार है, हालांकि लोग इसे दिलफेंक समझते हैं। ये तीनों पत्रकारिता में बहुत आगे जायेंगे। अनिल अपने अक्खड़पन के कारण ज्यादा तरक्की भले ही न करे, पर उसका काफी नाम होगा।”

उनकी कही सारी बातें सही निकलीं। नीरज और अनिल ‘जागरण’ के बाद ‘अमर उजाला’ में गये। पुष्पेन्द्र कुछ दिन के लिए गल्फ में रहा। आज ‘अमर उजाला’ में पुष्पेन्द्र गाजियाबाद और नीरज मुरादाबाद का आरई है। अनिल भी ‘अमर उजाला’ में ही है। ‘हमारा युग’ के ही सूर्यकांत द्विवेदी को भी नौनिहाल प्रतिभाशली युवा पत्रकार मानते थे। वे सूर्यकांत के कवि और व्यंग्य लेखक के रूप से भी प्रभावित थे। सूर्यकांत ‘अमर उजाला’ के मेरठ में आरई हैं।

1980 के दशक में हम सभी मेरठ की पत्रकारिता में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। सभी बेहतर भविष्य के लिए कितनी भी मेहनत करने को तैयार थे। करते भुवेंद्र त्यागीभी थे। हम सबकी पहचान बन रही थी। हमारे काम करने के तरीके और क्षेत्र अलग थे। अखबार अलग थे। कुछ हद तक परिवेश भी अलग थे। पुष्पेन्द्र एकदम शहरी। नीरज एक कस्बे से मेरठ आकर शहर के रंग में रंग चुका शहरी। सूर्यकांत कस्बाई। अनिल गांव का देहाती। और मैं जन्म से शहर में रहने के बावजूद संस्कार से देहाती। लेकिन हम सब में जमती बहुत थी। सब एक-दूसरे की मदद करने को हमेशा तैयार रहते थे। आखिर हम सब में एक बात कॉमन जो थी- नौनिहाल हम लोगों के हीरो थे। …जारी…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

तेरे कूचे में आये हैं पानी तो पिला दे जालिम

नौनिहाल शर्माभाग 9 : 1 दिसम्बर, 1983 को नौनिहाल ने बेगम पुल पर आबू लेन के नाले के पास मुझे सर्दी से ठिठुरते हुए मेरठ की जन समस्याओं पर कॉलम शुरू करने को कहा था। मजे की बात ये है कि ‘मेरठ समाचार’ में वे महज एक उप संपादक थे। फिर भी अखबार के संपादक और मालिक राजेन्द्र अग्रवाल ने उन्हें अखबार की सामग्री के बारे में हर फैसला करने की छूट दे रखी थी। तो मैं ठीक 48 घंटे बाद पहली किस्त लिखकर उनके पास पहुंच गया। यानी तीन दिसंबर, 1983 को। यह किस्त मेरठ की आवास समस्या पर थी। नौनिहाल ने पढ़ा। कई बार पढ़ा। उसमें काफी करेक्शन किये। हैडिंग दिया- ‘मेरठ में आवास समस्या का निदान संभव’

यह कॉलम 5 दिसंबर, 1983 को छपा। अंदर के पेज पर। लेकिन इस कॉलम का इंट्रो नौनिहाल ने पहले पेज पर बॉक्स में छापा- ”मेरठ महानगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख नगर है। राजधानी के निकट होने से भी यह नगर महत्वपूर्ण है। प्रत्येक महत्वपूर्ण नगर की समस्याएं भी अधिक होती हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ मेरठ महानगर की समस्याओं में भी वृद्धि हुई है। आज नगरवासी जो समस्याएं अनुभव करते हैं, उन्हें प्रस्तुत करने के लिए ‘मेरठ समाचार’ एक नया स्तम्भ ‘जन समस्या’ आरंभ कर रहा है। इस श्रंखला में नवोदित लेखक एवं पत्रकार श्री भुवेन्द्र त्यागी ‘मेरठ समाचार’ के पाठकों को नगर की प्रमुख समस्याओं से अवगत करायेंगे। आपकी समस्याएं भी आमंत्रित हैं।”

वैसे तो मैं कई महीने से फोकटिया रिपोर्टिंग कर रहा था, पर इस कॉलम की पहली किस्त छपते ही मैं मेरठ में स्टार बन गया। अगले ही दिन मुझे एन. ए. एस. कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. शर्मा ने क्लास में चपरासी भेजकर मुझे अपने ऑफिस में बुलाया। शाबासी दी। मैंने कहा, ‘सर, ये सब मेरे गुरु नौनिहाल की कृपा है। उन्होंने मुझे न सिर्फ यह कॉलम लिखने का मौका दिया, बल्कि इसके लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये।’

डॉ. शर्मा ने कहा, ‘मेरी ओर से नौनिहाल जी को बधाई देना।’

‘सर, आप लिखकर दे दें, तो आपकी प्रतिक्रिया छापने में नौनिहाल जी को बहुत खुशी होगी’, मैंने अनुरोध किया।

और उन्होंने तुरंत एक कागज पर प्रतिक्रिया लिखकर दे दी। मैंने जाकर वह नौनिहाल को दे दी। वे वाकई खुश हो गये।

‘अच्छा काम करने का यही संतोष होता है। अब ये कॉलम तुझे लिखने में और मुझे छापने में और भी मजा आयेगा’, उन्होंने कहा।

नौनिहाल ने इस कॉलम की प्रतिक्रियाओं का भी एक कॉलम ‘मेरी आवाज सुनो’ संपादकीय पेज पर शुरू किया। पहली प्रतिक्रिया डॉ. शर्मा की छपी। फिर तो हर कॉलम के बारे में दर्जनों पत्र आने लगे। कॉलम से ज्यादा मशहूर उस पर प्रतिक्रियाओं का कॉलम हो गया। उन पत्र लेखकों में से भी कई को नौनिहाल ने बाद में पत्रकार बना दिया। आज ब्रांडिंग और को-ब्रांडिंग का जमाना है। नौनिहाल ने आज से 27 साल पहले मेरठ के छोटे से अखबार में इसे कर दिखाया था। आज के एमबीए ब्रांड मैनेजर भी शायद इतना ओरिजनल कांसेप्ट ना दे पायें।

‘मेरठ समाचार’ में 5 दिसंबर 1983 से 31 मार्च 1984 तक छपे इस कॉलम ने मेरठ के सुस्त से पत्रकारिता-जगत में हलचल शुरू कर दी। कुछ महीने बाद दिल्ली के दो प्रमुख अखबारों  ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ ने इसी कांसेप्ट पर शहरों पर आधारित कॉलम शुरू किये। मुझे वे दिखाकर नौनिहाल ने कहा, ‘जो पहले मारे वो मीर।’

आवास के बाद अन्य समस्याओं पर छपे कॉलम इस प्रकार थे-

  1. जल समस्या – तेरे कूचे में आये हैं पानी तो पिला दे जालिम (12 दिसंबर, 1983)

  2. प्रदूषण समस्या – बना दे तू बढिय़ा यहां की फिजा (21 दिसंबर, 1983)

  3. सफाई समस्या – सफाई विभाग की सफाई की जरूरत (6 जनवरी, 1984) 

  4. बिजली समस्या – ये बिजली वाले क्यों लगाते हैं करंट (12 जनवरी, 1984)

  5. डाक समस्या – डाक विभाग खुद ही हो गया है बैरंग (3 फरवरी, 1984)

  6. बैंक समस्या – बैंक वालो फलो-फूलो, पर जनता को मत भूलो (21 फरवरी, 1984)

  7. राशन समस्या – मुंह लटकाये लोग वापस लौटते (28 फरवरी, 1984)

  8. टेलीफोन समस्या – टेलीफोन तारों का जाल बना जी का जंजाल (17 मार्च, 1984)

  9. ट्रैफिक समस्या – लाल-हरी बत्ती की परवाह नहीं किसी को रत्ती (31 मार्च, 1984) 

आखिरी किस्त के दो दिन बाद यानी 2 अप्रैल, 1984 को नौनिहाल ने कॉलम के बारे में पाठकों से मिले प्रतिसाद का धन्यवाद छापा। इस बीच एक बड़ी सफलता हमें मिली। ‘मेरठ समाचार’ का सर्कुलेशन 5 दिसंबर, 1983 को सात हजार था। यह 31 मार्च, 1984 को बढ़कर दस हजार हो गया। यानी चार महीने में सर्कुलेशन 50 फीसदी बढ़ गया था। नौनिहाल ने इससे खुश होकर मुझे एक बॉल पैन दिया। नौनिहाल को पैनों का बहुत शौक था। उनके पास 300 से ज्यादा पैन थे। अगर वे किसी से खुश हो जाते, तो उसे पैन भेंट कर देते। लेकिन अगर उन्हें किसी का पैन पसंद आ जाता, तो उसके पास वह पैन छोड़ते भी नहीं थे। इसमें छोटे से सैल वाली इलेक्ट्रॉनिक घड़ी भी थी। यह उनका सबसे प्यारा पैन था। इस तरह नौनिहाल से इनाम में मिले कुल दस पैन आज भी मेरे पास हैं। सभी मैंने संभाल कर रखे हैं।

भुवेंद्र त्यागी… लेकिन वो पहला इनामी पैन मेरे लिए सबसे खास है। मैं जीवन में कोई अंधविश्वास नहीं मानता। एक को छोड़कर… जब भी मुझे कोई महत्वपूर्ण लेखन करना होता है या किसी खास दस्तावेज पर दस्तखत करने होते हैं, तो मैं आज भी उसी पैन से करता हूं… पिछले 27 साल से मेरे लिए दुनिया में सबसे कीमती चीज यही पैन है!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है।

ज्यामितीय संतुलन, छिली कोहनियां और जन समस्याएं

नौनिहाल शर्माभाग 8 : अब मैं ‘मेरठ समाचार’ में क्राइम और खेल बीट कवर कर रहा था। बी.ए. की पढ़ाई भी साथ होने के कारण यह सब करने में समय और श्रम तो बहुत लगता, पर नौनिहाल हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाते रहते। मैं जो भी खबर लाता, वे कई बार तो उसे पूरी री-राइट करते। इस तरह उन्होंने मुझे इंट्रो, बॉडी मैटर, हैडिंग, क्रॉसर, शोल्डर और हाईलाइट्स का भरपूर अभ्यास करा दिया। फोटो कैप्शन लिखना भी उनसे ही सीखा। उनका कहना था कि हर फोटो में मुकम्मल खबर रहती है। कैप्शन में वो खबर बयान कर दी जानी चाहिए। पेज का ले-आउट नौनिहाल ने कागज पर डमी बनाकर सिखाया। मूल रूप से विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण मुझे इस काम में बहुत मजा आता। नौनिहाल ने बताया कि सबसे सुंदर ले-आउट वो होता है, जिसमें पेज का हर हिस्सा ज्यामितीय रूप से संतुलित हो। उनके इस गुरु-मंत्र का मैं आज तक पालन कर रहा हूं।

एक दिन हम दोनों मेरठ कॉलेज से बाउंड्री लाइन होते हुए लालकुर्ती जा रहे थे। सड़क इतनी टूटी-फूटी थी कि हमारी साइकिलें दो बार उछलकर गिरीं। कोहनियां छिल गयीं। मुझे लगा कि किसी डॉक्टर के पास जाकर पट्टी बंधवा लेनी चाहिए। मगर नौनिहाल ने सड़क किनारे साइकिल खड़ी की। मुझसे कहा, ‘पट्टी की बाद में सोचेंगे। मुझे एक आइडिया आया है। शहर में हर तरफ सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे हैं। जगह-जगह सड़कें खुदी पड़ी हैं। ऐसी ही और भी बहुत सी समस्याएं हैं शहर में। इन जन-समस्याओं पर एक कॉलम शुरू करना चाहिए। ये कॉलम तू लिख।’

‘लेकिन गुरु, मैं तो अब गले तक काम में डूबा हूं। टाइम कहां से मिलेगा इसके लिए?’

‘तू समझ नहीं रहा। ये बहुत महत्वपूर्ण कॉलम होगा। मेरठ में ऐसा काम शायद पहले कभी नहीं हुआ होगा। थोड़ी और मेहनत कर ले। मजा आयेगा इस काम में। बहुत संतोष मिलेगा।’

‘मैं मैटर कहां से लाऊंगा?’

‘शहर में घूमना होगा। लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में पूछना होगा। ऐसी समस्याओं की सूची बनाकर क्रमबद्ध ढंग से काम करना होगा। फिर खुद संबंधित विभाग के अधिकारी के पास जाकर उसका पक्ष भी लाना होगा। इसका काफी अच्छा प्रतिसाद मिलेगा। तुझे भी और अखबार को भी।’

नौनिहाल का ये आइडिया भी मुझे बहुत आकर्षक लगा। तभी मेरी छिली कोहनी में दर्द और जलन की लहर उठी। नौनिहाल ने पास के म्युनिसिपेलिटी के नल से पहले मेरा घाव धोया। फिर अपना। उसके बाद हम साइकिलों के साथ पैदल ही बेगम पुल के नाले तक आये। नाले के पुल के पास साइकिलें खड़ी करके हम भी खड़े हो गये। मैं सोच ही रहा था कि गुरु अब क्या करने वाले हैं, कि उन्होंने अपनी जेब से कुछ कागज निकाले (वे हमेशा जेब में काफी कागज रखते थे। जहां भी कुछ ध्यान में आता, वहीं जेब से कागज निकालकर उस पर लिख लेते।)।

तो उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। वो 1 दिसंबर, 1983 की बेहद सर्द दोपहर थी। सूरज की किरणों से आने वाली ऊष्मा को तेज और ठंडी हवा ने बेदम कर रखा था। नाले पर खड़े होने के कारण हम एक तरह से खुले में थे। मुझे चाय पीने की इच्छा हुई। पर गुरु उस जगह से हिलने को तैयार नहीं। उन्होंने कागज पर मेरठ की कुल 10 समस्याएं महज दो-तीन मिनट में लिख डालीं। इन समस्याओं पर मुझे उसी दिन से काम शुरू करना था-

आवास, जल, प्रदूषण, सफाई, बिजली, डाक, बैंक, राशन, टेलीफोन और ट्रैफिक।

नौनिहाल ने इन पर काम करने की पद्धति बता ही दी थी। अब क्रम भी निश्चित कर दिया। और पहली किस्त तैयार करने के लिए मुझे वक्त दिया तीन दिन का! तब तक हमारी छिली कोहनियों का दर्द कम हो चला था। हम बेगम पुल पेट्रोल पंप के पास कैफे पहुंचे। यहां नौनिहाल जरा अजब चाय बनवाते थे। भुवेंद्र त्यागीचाय में थोड़ा सा कॉफी पाउडर। इससे प्याले का टेस्ट चाय और कॉफी के बीच का होता था। इस चाय को नौनिहाल ‘अय्याशी की चाय’ कहते थे।

तो वो अजब चाय गले से नीचे उतरते ही हमारा कांपना कम हुआ। गुरू का आदेश हुआ- जाओ, इस कॉलम के लिए सामग्री तैया करने में जुट जाओ। मैंने साइकिल आवास विकास परिषद के दफ्तर की ओर मोड़ दी। कॉलम की पहली किस्त आवास पर जो थी!      

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

क्राइम रिपोर्टिंग को कोई गंभीर पत्रकारिता नहीं मानता

नौनिहाल शर्माभाग 7 : धीरे-धीरे मेरठ में क्राइम रिपोर्टर के रूप में मेरी पहचान बनने लगी। मेरी वो स्टोरी, जिसे नौनिहाल ने ‘ब्रेकिंग’ और ‘इम्पैक्ट’ खबर बना दिया था, काफी चर्चित हुई। इसके बाद हर थाने से मुझे ऐसी खबरें मिलने लगीं। अब नौनिहाल ने मुझे मेरठ के दो दिग्गज क्राइम रिपोर्टरों के टच में रहने को कहा। वे तब अनिल-सुधीर के नाम से सत्यकथाएं लिखा करते थे। अनिल बंसल बाद में ‘जनसत्ता’ में चले गये। पहले मेरठ में ही। फिर दिल्ली में। जबरदस्त लिक्खाड़। जितनी देर में हम दो समोसे और चाय की प्याली खत्म करते, उतनी देर में उनकी दो खबरें तैयार हो जातीं। हमेशा एक छोटा ब्रीफकेस साथ रखते। उसी पर कागज रखकर वे चौराहे पर खड़े-खड़े ही खबर लिख डालते थे। सुधीर पंडित के पुलिस में गहरे कांटेक्ट थे। वे अंदर की खबरें निकालने में माहिर थे। बाद में वे पत्रकारिता छोड़कर  ऐड एजेंसी चलाने लगे। मेरठ का यह धांसू पत्रकार अगर आज किसी चैनल में होता, तो उस चैनल की टीआरपी को सबसे ऊपर रखने की गारंटी होती।  

सुधीर पंडित से मेरा पहले से परिचय था। मुझे एक दिन वे दोनों कोतवाली के बाहर मिल गये। मैंने उनसे क्राइम रिपोर्टिंग के गुर पूछे। उन्होंने कहा, ‘तुम पढ़ने-लिखने वाले लड़के हो। क्राइम रिपोर्टिंग के चक्कर में क्यों पड़ते हो? कुछ नया करो।’

मैंने ये बात शाम को दफ्तर के बाद एनएएस कॉलेज के पास भगतजी की चाय की दुकान पर नौनिहाल को बतायी।

वे बोले, ‘बात में दम है। क्राइम रिपोर्टिंग से शुरूआत में जल्दी नाम कमाया जा सकता है। पुलिस अफसरों के साथ उठने-बैठने से जरा रौब-दाब भी बनता है। लेकिन कोई भी इसे गंभीर पत्रकारिता नहीं मानता।’

ये 1983 की बात है। तब क्राइम रिपोर्टिंग में सबसे नये पत्रकार को लगाया जाता था। जिन्हें इसका शौक लग जाता था, वे ही इसमें बने रहना चाहते थे। जो इससे ऊब जाते, वे किसी और बीट की जुगाड़ में रहते थे। आज तो सरकुलेशन और टीआरपी के तारणहार 3 सी – क्राइम, सिनेमा और क्रिकेट को ही खेवनहार मानते हैं जिसमें क्राइम अव्वल नंबर पर है। लेकिन तब सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और विकास पत्रकारिता पर बहुत जोर रहता था।

मेरी तो पत्रकारिता में शुरुआत ही थी, इसलिए मैं हर बीट पर काम करके ज्यादा से ज्यादा सीखना चाहता था। चूंकि ‘मेरठ समाचार’ तनख्वाह देता नहीं था, इसलिए वहां कोई रिपोर्टर रुकता नहीं था। मुझे वहां काम करते तीन महीने हो गये थे। इसलिए भगतजी की दुकान पर चाय पीते हुए नौनिहाल ने मुझसे क्राइम के साथ ही कोई और बीट भी कवर करने को कहा, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

‘कौन सी बीट?’

‘कोई भी, जो तुझे अच्छी लगे।’

‘मैं तो कोई भी बीट करने को तैयार हूं।’

‘तो कल से शहर में घूमना शुरू कर दे। जो भी खबर, जहां से भी मिले, ले आ। मैं छाप दूंगा।’

‘लेकिन सुबह तो मेरा कॉलेज होता है।’

(मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर एनएएस कॉलेज से हिन्दी, इतिहास और राजनीति शास्त्र में बी. ए. कर रहा था।)

‘फिर क्राइम ही कर।’

‘नहीं गुरु, मैं ज्यादा मेहनत कर लूंगा। कुछ खबरों के लिए मेरा मार्गदर्शन तो करो।’

‘ऐसा कर, अगर किसी खबर का पता चले और वहां पहुंच सके, तो जाकर खबर ले आ।’

‘पर ये तो बताओ कि मैं विशेषज्ञता किसमें हासिल करूं?’

नौनिहाल ने कुछ दिन पहले ही मुझे एक शानदार गुरुमंत्र दिया था- ‘एक कहावत है। जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ नन।

इसे संपादित करके यों कहना चाहिए- जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स मास्टर ऑफ वन।’

(मैं अब इसे और एडिट करके पत्रकारिता के विद्यार्थियों को यों बताता हूं- जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ सम)  

अचानक नौनिहाल ने मुझे वो बीट बतायी, जिसने बाद में मेरा जीवन बदल दिया।

‘खेल। तू खेल कवर कर। मेरठ में एक भी खेल रिपोर्टर नहीं है।’

भुवेंद्र त्यागीमैं क्राइम के साथ खेल भी कवर करने लगा। खेल की कवरेज करते-करते ही ‘मेरठ समाचार’ से ‘दैनिक जागरण’ और वहां चार साल बैटिंग करके ‘नवभारत टाइम्स’ (मुम्बई) में आया। इस तरह नौनिहाल ने पहले मेरा करियर बदला। फिर नया करियर बना दिया।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

ये हमारा नया क्राइम रिपोर्टर है

नौनिहाल शर्मापार्ट 6 : मैं ‘मेरठ समाचार’ में क्राइम रिपोर्टिंग करने लगा। पहला सवाल था- ‘समाचार कैसे लाया जाये?’ इस शंका का समाधान किया खुद नौनिहाल ने- ‘एसपी शहर और एसपी देहात के दफ्तर में रोज सुबह 11  बजे पिछले 24 घंटों में पूरे जिले के थानों में दर्ज हुए अपराधों की प्रेस विज्ञप्तियां बनती हैं। वे विज्ञप्ति वहां जाकर रोज लो। उनमें से समाचार बनेंगे। लेकिन विज्ञप्ति में धाराओं के अनुसार घटनाएं होती हैं। गंभीर धाराओं वाली घटनाओं को ही इनमें शामिल किया जाता है।’

‘मतलब?’

‘हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, डकैती, लूट, फसाद, मारपीट और धोखाधड़ी जैसी खबरें ही इस विज्ञप्ति में होती हैं। लेकिन कई बार आईपीसी की धारा के अनुसार मामूली दिखने वाली घटना भी बड़ी खबर बन सकती है।’

इतना समझाने के बाद नौनिहाल पहले दिन खुद मेरे साथ एसपी के दफ्तर गये। उनकी एक खास बात थी। वे रिपोर्टिंग नहीं कर सकते थे। डेस्क पर बैठकर खबरें बनाते थे। मगर उनकी जान-पहचान हर विभाग में थी। वे समय-समय पर वहां जाते रहते थे। किसी रिपोर्टर के साथ। उनसे पहली मुलाकात में ही हर कोई उनका मुरीद हो जाता था।

तो मैं पहली बार क्राइम रिपोर्टिंग करने नौनिहाल के साथ एसपी के दफ्तर गया। एसपी देहात के रीडर ने खड़े होकर उनसे हाथ मिलाया। नौनिहाल ने उनसे मेरा परिचय कराया।

‘ये हमारा नया क्राइम रिपोर्टर है। इसे रोज कम से कम दो अच्छी खबरें मिलनी चाहिए।’

‘खबरें तो जैसी आयेंगी, वैसी ही मिलेंगी गुरू।’

‘मेरा मतलब है, अपनी धाराओं वाली विज्ञप्ति देने के बाद इसे रोजनामचा भी दिखा देना।’

‘ठीक है गुरू। और कोई सेवा?’

‘यार, चाय नहीं पिलाओगे?’

चाय पीकर हम बाहर आये। नौनिहाल ने मुझसे कहा, ‘अदरक की इससे अच्छी चाय मेरठ में और कहीं नहीं मिलेगी। लेकिन तू कैंटीन में जाकर पियेगा, तो सादी चाय देकर पैसा वसूल कर लेंगे। रीडर के पास बैठकर पियेगा, तो अदरक की असली चाय मिलेगी। वह भी मुफ्त।’

‘पुलिस की चाय पीकर उसके खिलाफ कैसे लिखा जा सकेगा?’, मैंने सवाल किया।

वे मुस्कराकर बोले, ‘बच्चू, यही तो पत्रकारिता का दूसरा सबक है (पहला सबक विज्ञप्तियों में से धांसू खबरें निकालने का वे मुझे दे ही चुके थे)। चाय पीते समय ये मत सोचो कि खबर लिखनी है। खबर लिखते समय ये मत सोचो कि चाय पी है।’

बाद में यही गुर मुझे अनिल माहेश्वरी ने भी बताया था। वे ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में थे। वहीं स्पेशल कॉरेस्पांडेंट बने। नॉर्थ ईस्ट में कई साल रहे। वहां की बेहतरीन कवरेज की। कई किताबें भी लिखीं। मेरठ के ही अनिल माहेश्वरी आजकल एक वेब मैगजीन के एडिटर हैं।

एसपी के दफ्तर से बाहर आकर हम साइकिल स्टैंड की ओर बढ़े। अपनी-अपनी साइकिल लेने। साइकिल स्टैंड वाले ने हमसे एक रुपया मांगा। नौनिहाल ने जेब से निकालकर दो अठन्नी उसे दे दीं। फिर उससे कहा, ‘ये हमारा नया रिपोर्टर है। अभी इसे तनखा नहीं मिलती। इससे पैसे मत लेना। चाहे यह कितनी बार भी साइकिल खड़ी करे।’

स्टैंड वाला बोला, ‘ठीक है। जब तनखा मिलनी शुरू हो जाये तो ईमानदारी से एक बार की अठन्नी या महीने के दस रुपये दे देना।’

मैंने हामी में सिर हिलाया। ये और बात है कि ‘मेरठ समाचार’ में करीब एक साल काम करने के बावजूद मुझे कभी तनखा नहीं मिली। ना ही मुझसे कभी एसपी के दफ्तर के बाहर साइकिल स्टैंड वाले पैसे लिये। यह भी नौनिहाल का प्रताप था। वरना मुझे जेब से पैसे खर्च करके क्राइम रिपोर्टिंग करनी पड़ती।

अगले हफ्ते मैं एसपी देहात के रीडर के दफ्तर में रोजनामचे से खबरें नोट कर रहा था। एक खबर पर मेरी नजर पड़ी। उसका प्रेस विज्ञप्ति में जिक्र तक नहीं था। दौराला के एक किसान ने अपने बेटे से जान के खतरे की रिपोर्ट लिखवायी थी। मैंने रीडर से पूछा, तो उसने ये कहकर टाल दिया कि मामूली घरेलू झगड़ा है। इसकी तो तफ्तीश तक नहीं की जायेगी। मामला यों ही बंद हो जायेगा।

मैंने दफ्तर पहुंचकर नौनिहाल को वो खबर बतायी। वे उछल गये।

‘तू एक काम कर। दौराला चला जा। वहां थाने से उस किसान का पता लेकर उसके घर जा। उससे बात कर। बढिय़ा खबर बनेगी।’

मैंने बेगम पुल पर एक दोस्त की दुकान पर साइकल खड़ी की। बस से दौराला गया। थाने से बड़ी मुश्किल से उस किसान का पता मिला। उसके घर गया। ठीक-ठाक घर था। पहले वो झिझका। मैंने उसे भरोसा दिलाया। फिर वो जरा खुला। उसने अपनी दास्तान सुनायी।

अपनी चारों लड़कियों की वो शादी कर चुका था। एक ही बेटा था। शादीशुदा। लेकिन उसे शराब और जुए की लत थी। अब वो खेत बेचने की रट लगाये था। बाप इसके लिए तैयार नहीं था। अपने जीते-जी तो बिल्कुल नहीं। बस, बेटे ने उसे धमकी दे दी।

‘ठीक है। तेरे मरने के बाद तो खेत मेरे ही होंगे। तो वही सही।’

इस पर बाप ने पहले पंचायत बुलायी। बेटे के स्वभाव को देखते हुए पंचों ने हाथ खड़े कर दिये। तब उसने पुलिस में रिपोर्ट कर दी। उसने रोते-रोते मुझे ये सब बताया। इस बीच बूढ़ी माई भी पल्लू से आंसू पोंछती रही। गनीमत है कि उनका बेटा वहां नहीं था।

मैंने लौटकर नौनिहाल को खबर बतायी। वे इतने खुश हुए कि मुझे ‘हीरो’ फिल्म दिखाने का इनाम देने की घोषणा कर दी।

खबर पहले पेज पर पांच कॉलम में छपी।

‘अपने ही खून से जान का खतरा’

अगले दिन मेरठ के सारे क्राइम रिपोर्टर मुझसे पूछते रहे कि ये खबर कहां से मिली। मैंने भी छाती फुलाकर कहा, ‘इसके लिए बहुत खोजबीन करनी पड़ी।’

मेरठ में नवभारत टाइम्स और आकाशवाणी की स्ट्रिंगर थे सतीश शर्मा। उन्होंने दोनों जगह ये खबर दी। एसपी देहात खुद दौराला गये। उस किसान को सुरक्षा का पूरा भरोसा दिया। उसका बेटा तो कान पकड़कर कस्में खाता रहा कि बापू सिर पै लाख जूत्ते मार लै, तौ बी मैं कुछ नीं कैने का।

वो खबर भी नौनिहाल ने पहले पेज पर छापी।

‘अपने खून से अब जान का डर नहीं’

भुवेंद्र त्यागीहैडिंग के नीचे की लाइन थी- ‘मेरठ समाचार की खबर का असर’

आजकल तो ऐसी खबरों को अखबार या चैनल ‘इंपैक्ट’ के नाम से चलाते हैं। मगर नौनिहाल ने 1983 में मुझसे ऐसी खबर लिखवायी थी। आज से 27 साल पहले…

ऐसी और भी कई चीजें उन्होंने चलन में आने से बहुत पहले कर दिखायी थीं..

…जारी…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

मेरी जिज्ञासाएं, मूंगफली का झब्बा और नौनिहाल का गाना

नौनिहाल शर्मापार्ट 5 : अब नौनिहाल के साथ ‘मेरठ समाचार’ में काम करते हुए मुझे कई महीने हो गये थे। उनके साथ रोज नये अनुभव मिलते थे। लेकिन मुझे कभी उनके निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ था। एक दिन हम काम खत्म होने के बाद जिमखाना मैदान में एक क्रिकेट मैच देखने गये। वह रमेश सोमाल मैमोरियल टूर्नामेंट का फाइनल था। मुझे मनोज प्रभाकर की गेंदबाजी देखने का आकर्षण था। मैदान की दीवार पर बैठकर हम मूंगफली टूंगते हुए मैच देख रहे थे। अचानक नौनिहाल कुछ गुनगुनाने लगे। मैंने जरा ध्यान से सुनने की कोशिश की।

आवाज कुछ पकड़ में आयी…

प्यार हुआ, इकरार हुआ…

‘आपको ये गाना कैसे आता है?’

‘बरखुरदार हम भी कभी सुना करते थे। और उस जमाने में गाने खूब सुनते थे। वही गाने अब भी याद हैं।’

मेरा कौतूहल बढ़ा।

‘तो फिर आपकी आवाज कब खराब हुई? बोलने में परेशानी कब शुरू हुई?’

मैंने अपनी जिज्ञासाएं सामने रखीं। मूंगफली का दूसरा झब्बा लिया गया। …और नौनिहाल ने मुझे पहली बार अपनी जीवन-कथा सुनायी।

नौनिहाल का जन्म 13 दिसम्बर, 1955 को हुआ था। गाजियाबाद के धौलाना कस्बे में। उनके पिता खचेड़ूमल वहां के जाने-माने हलवाई थे। (शायद नौनिहाल के स्वाद-राग का यही राज था)। उनकी मां थीं भगवतीदेवी। सुशीला और राजरानी दो बड़ी बहनें थीं। तीनों की उम्र में दस-दस साल का फर्क था। दीगर है कि नौनिहाल अपनी बहनों के दुलारे थे। वे जितने शरारती थे, पढ़ाई में भी उतने ही तेज थे। हर साल अव्वल आते। खेल-कूद में भी आगे रहते। पूरे धौलाना में उनकी चर्चा रहती थी।

इस तरह वे सातवीं क्लास में आ गये। एग्जाम देने गये। वहां बहुत तेज बुखार चढ़ा। जूड़ी बुखार। उन्हें चारपाई पर लादकर घर लाया गया। फिर इलाज के लिए पिलखुआ ले जाया गया। वहां तीन दिन इलाज चला। बुखार उतर गया। घर आकर भी कई दिन कमजोरी रही। अचानक एक दिन उनकी मां को लगा कि वह ठीक से सुन नहीं पा रहे… बोलते भी अजीब सी आवाज में हैं। पहले लगा कि कमजोरी के कारण ऐसा है।

नौनिहाल को भी ऐसा ही महसूस होता…कि आवाज नहीं निकल रही है मुंह से… कुछ भी बोलते हैं तो कोई भी सुनता नहीं।

तब लगा कि बोलने-सुनने में गड़बड़ है।

डॉक्टर कमल सिंह सिसौदिया को दिखाया। उन्होंने चैक-अप किया। समस्या गंभीर लगी, तो उन्होंने मेरठ में प्यारेलाल अस्पताल ले जाने को कहा। संयोग से वहां उन दिनों अमेरिका से कोई डॉक्टर आया हुआ था। उसने 40 दिन की दवाई दी।

पर कोई फायदा नहीं हुआ।

और उसके बाद नौनिहाल को स्वाध्याय से ही अपनी पढ़ाई आगे चलानी पड़ी।

1971 में उनके पिता की मृत्यु हो गयी। अगले साल मां चल बसीं। तब नौनिहाल अपनी बड़ी बहन सुशीला के घर मेरठ आ गये। देवबंद से उन्होंने इंटर किया। बी.ए. मेरठ से किया। एम.ए. कर रहे थे। दो पेपर भी दे दिये थे। तीसरे पेपर में इनविजिलेटर ने उन पर नकल करने का आरोप लगा दिया। यह बात उनके दिल को छू गयी। उसके बाद उन्होंने आगे पेपर नहीं दिये। घर पर भी नहीं बताया। रिजल्ट आने पर ही पता चला। वे अपने बहनोई का काफी सम्मान करते थे। उन्हें लगा कि अब बहनोई उनसे नाराज हो जायेंगे। इसलिए इसके बाद नौनिहाल जीवन की राहों पर अपने बूते निकल गये।

उन्होंने देवबंद, मुजफ्फरनगर और मेरठ के कई प्रिंटिंग प्रेसों में काम किया। शुरुआत हैंड कंपोजिंग से की। मशीनों पर भी हाथ आजमाया। फिर प्रूफ रीडर बने। और आखिरकार मैटर एडिट करने लगे। इन शहरों में उनके दर्जनों दोस्त हैंड कंपोजिटर थे। इसी दौरान बलराम और धीरेन्द्र अस्थाना जैसे कहानीकारों से भी नौनिहाल की गहरी छनी।

18 नवंबर, 1980 को नौनिहाल की शादी मेरठ में सुधा भाभी से हुई। उनका परिवार दिल्ली का था। पर मेरठ में बस गया था। उनके तीन संतान हुईं- मधुरेश (1981), प्रतीक (1988) और गुडिय़ा (1990)।

मेरठ में स्वामीपाड़ा, जेल चुंगी, सुभाषनगर और हनुमानपुरी में किराये के मकानों में कई बरस गुजारने के बाद नौनिहाल ने जागृति विहार में आवास विकास परिषद का मकान ले लिया।

मैं मंत्रमुग्ध होकर नौनिहाल की कहानी सुन रहा था कि मैच खत्म हो गया। मूंगफली का हमारा चौथा झब्बा भी।

‘चल उठ। ज्यादा इमोशनल मत बन।’

‘लेकिन गुरू, आप मेरठ समाचार में कैसे आये?’

भुवेंद्र त्यागी‘वो किस्सा फिर कभी। अभी एनएएस चलकर भगतजी की चाय पियेंगे। फिर घर जायेंगे।’

मुझे इंतजार रह गया उस दिन था, जब नौनिहाल इस किस्से को आगे बढ़ते…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है।

पुराने चटोरे लगते हैं, आते रहिए

स्व. नौनिहाल शर्मापार्ट 4 : मेरी दिनचर्या में नौनिहाल के साथ के लम्हे बेहद जरूरी और शिक्षाप्रद होते जा रहे थे। यहां तक कि अपने दोस्तों को भी अब मैं ज्यादा वक्त नहीं दे पाता था। ये 1983 की बात है। मैं उनसे रोज नयी चीजें सीखता। वे मुझे एकदम दोस्ताना अंदाज में सिखाते थे। मेरी हर जिज्ञासा और शंका का समाधान करते। उन्हें मैंने कभी झुंझलाते नहीं देखा। चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती। आंखों में चमक। हर नयी चीज खुद भी जानने को उतावले रहते और दूसरों को बताने को भी। लेकिन जब उन्हें गुस्सा आता था, तब वे किसी की नहीं सुनते थे। आपे से बाहर हो जाते थे। गुस्सा आता किसी वाजिब वजह से ही। फिर उनका रौद्र रूप रामलीला के परशुराम की याद दिला देता। जब उन्हें गुस्से आता, तो उनकी बात आंख बंद करके माननी ही पड़ती थी। नहीं तो वे रूठ जाते। कटे-कटे से रहते। फिर सामने वाले को अपनी गलती समझ में आती। वह गलती कबूल करता। और नौनिहाल का चेहरा फिर खिलखिला उठता। ‘कट्टी’ खत्म होने का यह जश्न खास चाय के साथ मनाया जाता।

इस खास चाय के भी उनके अड्डे थे। कचहरी और मेरठ कॉलेज के पास चाय की दुकान। एन. ए. एस. कॉलेज के बाहर नाले के पास भगत जी की दुकान। बच्चा पार्क के कोने पर रोडवेज बस अड्डे के बाहर और आर. जी. कॉलेज के सामने चाय की दुकान। एक दिन वे कोतवाली के पास हमारे पुराने घर में बैठे थे। हमारे घर के सामने, सड़क किनारे शेरसिंह चाटवाला शाम को ठेला लगाता था। नौनिहाल ने पूछा, ‘अच्छी चाट बनाता है?’

‘हां’।

‘तो आज चाट का ही मजा लिया जाए।’

उन्होंने मुझे इतनी हिदायतें दीं कि मैंने हाथ जोड़कर कहा, ‘आप साथ चलो। जैसी चाट चाहिए, वहीं बता देना।’

उन्होंने शेरसिंह को निर्देश देने शुरू किये (मुझे ‘दुभाषिये’ का काम करना पड़ा)- टिक्की को और तलो… दबाकर नहीं… घुमा-घुमा कर… अब पलटकर तलो… एकदम करारी होनी चाहिए… दही, खट्टी-मीठी चटनी और मसाले इतने डालो… इस पर छोले डालो.. लाल मिर्च भी… दो पपड़ी रखो ऊपर… उन पर उबले आलू… फिर दही, खट्टी-मीठी चटनी और मसाले डालो… हां अब ठीक है… ऐसी चाट बनाकर खिलाओगे, तो धंधा दुगना हो जाएगा।     

शेरसिंह ने चाट का पत्ता नौनिहाल की ओर बढ़ाया, तो ठेले के पास खड़े बाकी लोग उचक-उचक कर देखने लगे। अचरज से। शेरसिंह ने मुस्कराकर कहा, ‘पुराने चटोरे लगते हैं। आते रहिए।’

इस घटना की मैं अक्सर चर्चा करता। एक दिन नौनिहाल ने कहा, ‘मेरठ के खानपान के ठिकानों पर सीरीज लिखो।’

बात मुझे जंच गयी।

नियमित क्राइम रिपोर्टिंग के अलावा मैंने मेरठ के खानपान के ठिकानों पर सीरीज शुरू कर दी। मेरठ के किसी अखबार में इस तरह का प्रयोग पहली बार किया गया। नौनिहाल के निर्देशानुसार मैंने अलग-अलग तरह के व्यंजनों वाले प्रमुख होटलों की सूची बनायी। होम वर्क किया। फिर निकला इंटरव्यू करने। कई बार नौनिहाल भी साथ जाते थे। कई व्यंजन हम चखते भी थे। लेकिन एक समस्या आ गयी। हम दोनों ही ठहरे शाकाहारी। मांसाहारी व्यंजनों के बारे में कैसे लिखा जाये? मुझे एक तरकीब सूझी।

‘गुरू, क्यों ना मांसाहारी व्यंजनों को छोड़ ही दिया जाये?’

‘नहीं। सीरीज शुरू की है, तो सब पर लिखना पड़ेगा।’

‘तो, क्या किया जाये?’

‘निकलेगा उसका भी रास्ता।’

दो दिन बाद नौनिहाल मुझे दफ्तर से एक गैराज में ले गये। केसरगंज के पास। वहां जाकर साइकिल से उतरे। साइकिल स्टैंड पर लगायी। इतने में एक मैकेनिकनुमा लड़का शर्ट की आस्तीन से नाक पोंछते आया। उसने सलाम ठोंका। नौनिहाल ने उसका कंधा थपथपाया। कहा, ‘चल। आज तेरी दावत।’

उसने दस मिनट रुकने को कहा। अपना काम निपटाकर आया। नौनिहाल ने उसे मेरी साइकिल के कैरियर पर बैठने का इशारा किया। मुझे असमंजस में देखकर बोले, ‘नॉन वैज खाने के बारे में यही बतायेगा। हम तो दाल-रोटी खाने वाले हैं।’

उसका नाम था असलम। हम आबू लेन के एक होटल में पहुंचे। जमकर खाना खाया। पूरा मेनू नोट किया। असलम ने स्टोरी के लिए नॉन वैज खाने का इनपुट दिया। दफ्तर आकर मैंने स्टोरी लिखी। नौनिहाल ने उसे एडिट किया। एडिट क्या किया, रीराइट किया। हैडिंग लगाया। मेरी बाईलाइन देकर अंदर कंपोज होने को भेज दिया।

मैंने प्रतिवाद किया, ‘गुरू, पूरी स्टोरी आपकी देखरेख में हुई। आप साथ रहे। स्टोरी रीराइट की। अपना नाम दो।’

वे बोले, ‘ये तेरा कॉलम है। तेरा ही नाम जायेगा। मेरा तो छपता ही रहता है।’

… वो दिन कभी लौटेंगे नहीं। ऐसा गुरू किसी को अब मिलेगा नहीं। आज तो सीनियर अपने जूनियर की स्टोरी पर अपना नाम डाल देते हैं। पुरस्कार तक ले लेते हैं। काश! ऐसे लोग कभी नौनिहाल से मिले होते!

असलम ही नहीं, नौनिहाल ने उस कॉलम के लिए स्टोरी कराते हुए और भी कई गरीब लोगों को अपने साथ खाना खिलवाया।

सच! कितनों की दुआएं रही होंगी उनके साथ!

भुवेंद्र त्यागीपर ये दुआएं काम क्यों नहीं आयीं? वे असमय मौत के मुंह में क्यों चले गये? उनका परिवार आज भी मुश्किल में क्यों है?

ये सवाल मेरे मन में जब-तब उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं… और मुझे इनका कोई जवाब नहीं मिलता…     

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

नौनिहाल ने एक घंटे में पत्रकार बना दिया

नौनिहाल शर्माये नौनिहाल ही थे, जिन्होंने मुझे इंजीनियर के बजाय पत्रकार बना दिया। मैं मेरठ के स्थानीय अखबारों को खबरें दिया करता था। तब वहां ‘दैनिक प्रभात’, ‘मेरठ समाचार’ और ‘हमारा महानगर’ जैसे इवनिंगर थे। सुबह के अखबार दिल्ली से आते थे। खबरें देने के सिलसिले में ही नौनिहाल से मेरी मुलाकात हुई थी। वे मेरी कुछ खबरें अंदर के पेज पर लगा देते थे। फिर एक दिन उन्होंने मुझे एक एसाइनमेंट दिया। मेरठ के विक्टोरिया पार्क में वी. पी. सिंह की रैली कवर करने का। मैं घबराया। अभी तक मैंने केवल क्रिकेट मैचों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समाचार लिखे थे। नौनिहाल बोले – जो वीपी बोलें, कागज पर नोट कर लेना। माहौल के बारे में भी नोट्स लेना। नौनिहाल ने मुझे एक छोटी सी डायरी भी दी। मैं साइकिल से पहुंच गया विक्टोरिया पार्क। वीपी का हैलीकॉप्टर दो घंटे लेट आया। 15 मिनट के माला-तमाशे और आधे घंटे के दूसरों के भाषणों के बाद वीपी ने एक घंटे का भाषण दिया।

चार घंटे बाद मैं ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर पहुंचा। डायरी के आठ पन्ने भर गए थे। वे सब नौनिहाल ने पढ़े। फिर उन्होंने उसके आधार पर खुद खबर लिखी। साथ-साथ मुझे बताते गए- ये इंट्रो है। ये न्यूज का बाकी मैटर है। ये हैडिंग है। और ये सब -हैडिंग है। हैडिंग और सब-हैडिंग में इतने अक्षर होने चाहिए। वो हैंड कंपोजिंग का जमाना था। इसलिए हैडिंग के अक्षर गिनना बेहद जरूरी होता था। आज की तरह कंडैंस या एक्सपैंड नहीं किया जा सकता था। तो ये था पत्रकारिता का मेरा पहला सबक। मुझे लगा, ये तो लॉटरी लग गई। शुरू में ही ऐसे उस्ताद से पाला पड़ा, जो अपने फन का माहिर था। आज पत्रकारिता संस्थानों में जितना सीखने में तीन महीने लगते हैं, उतना नौनिहाल ने मुझे एक घंटे में सिखा दिया था।

ये तो शुरुआत थी। यह सिलसिला अगले पांच साल चलने वाला था। मैं हर रोज एक उत्तेजना के साथ उनके पास पहुंचता था। तीन-चार घंटे की इस मुलाकात का मैं अगले 24 घंटे इंतजार करता था। वे मुझे असाइनमेंट देने के अलावा दफ्तर में बैठाकर प्रेस रिलीज से खबरें भी बनवाने लगे। ‘मेरठ समाचार’ के मालिक-संपादक राजेन्द्र गोयल ने एक दिन मुझे बुलाया, कहा, ‘यहां काम करोगे?’

‘मतलब नौकरी?’, मैंने पूछा।

‘हां। रोज यहां तीन घंटे काम करो। क्राइम की रिपोर्टिंग करो। तुम्हें सीखने को मिलेगा। तनखा कुछ नहीं’, वे बोले।

पलक झपकने से पहले मैंने कहा- ‘जी।’

भला नौनिहाल के साथ काम करने का मौका मैं क्यों छोड़ता?

अगले दिन से मैं ऑफिशियली नौनिहाल की शागिर्दी में आ गया। उनसे रोज नयी बातें सीखने को मिलतीं। उनके व्यक्तित्व की नयी परतें खुलतीं। उनकी प्रतिभा का कायल तो मैं पहले दिन ही हो गया था। अब उनकी इंसानियत के रोज नये रंग दिखते। रोज एक नयी कहानी लेकर मैं अपने घर जाता।

दो महीने बाद मैंने अपने कुछ दोस्तों को नौनिहाल के बारे में बताया। उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा कोई शख्स हो सकता है। उन्हें नौनिहाल से भुवेन्द्र त्यागीमिलवाया। एक घंटे की गपशप के बाद वहां से चले, तो सबकी जबान पर एक ही बात थी – भई वाह! क्या आदमी है!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

उन-सा संपूर्ण पत्रकार दूसरा न देखा

वर्गाकार घेरे में नीली शर्ट वाले नौनिहाल शर्मा.

नौनिहाल होते तो देश के पहले मूक-बधिर संपादक होते : उनके बच्चों के प्रति जीवन दूसरी बार इतना क्रूर नहीं हो सकता  : सुधा भाभी के ब्रेन हैमरेज की खबर भड़ास4मीडिया पर पढ़कर बहुत दुख हुआ। उन्होंने पिछले 16 साल में परिवार चलाने की जिम्मेदारी अकेले ही निभाई है। जब 1993 में भाई नौनिहाल की दुखद मृत्यु हुई थी, तो मधुरेश, प्रतीक और गुड़िया काफी छोटे थे। मधुरेश ने जरूर अपनी उम्र के मानो कई साल लांघकर छोटे भाई-बहन को पढ़ाई के लिए प्यार से डांटने-डपटने की जिम्मेदारी ले ली थी। पर था तो वो भी बच्चा ही। ऐसे में सुधा भाभी ने जिस साहस के साथ तीनों बच्चों को पाला और अच्छी तरह पढ़ाया, वह सचमुच किसी साहस-कथा से कम नहीं है। उन्होंने एक दुर्लभ उदाहरण पेश किया है। बच्चे भी योग्य निकले। कल ही प्रतीक से बात हुई। उसने बताया, मम्मी की हालत में कुछ सुधार है। राहत मिली। उसे ढांढस बंधाया। कहा, हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा। फोन बंद करते ही मेरी यादों में नौनिहाल का अक्स उभर आया।

स्वर्गीय नौनिहाल मेरी तरह शायद दर्जनों नए पत्रकारों के गुरु थे। मैंने उनके जैसा सम्पूर्ण पत्रकार आज तक दूसरा नहीं देखा। अगर 1993 की उस रात ऑफिस से लौटते हुए वे कार दुर्घटना से असमय काल के गाल में नहीं समाये होते, तो आज उन्हें संपादक होना चाहिए था। बड़ी बात ना मानी जाए, पर ऐसा होता तो वे शायद हरिवंश जी के बाद आज हिन्दी संसार के दूसरे सच्चे संपादक होते। और शायद पहले मूक-बधिर संपादक भी!  

जी हां, नौनिहाल बोल नहीं सकते थे। सुन भी नहीं सकते थे। उनके मुंह से एक अस्पष्ट-सी ध्वनि निकलती जरूर थी, पर उनके नजदीकी हम जैसे लोग ही उसे समझ सकते थे। उनसे बातचीत करनी पड़ती थी कागज पर लिखकर। हम हथेली पर अंगुली से लिखने की कोशिश करके भी काम चला लेते थे। बाद में तो संकेत भाषा भी हमने उनसे सीख ली थी।

सबसे पिछली कतार में खड़े लोगों में दाएं से दूसरे नंबर वाले गोल घेरे में नौनिहाल शर्मा

नौनिहाल से मेरी पहली मुलाकात ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर में हुई थी। मैं एक समाचार देने गया था। संपादक राजेन्द्र गोयल जी ने वह समाचार नौनिहाल को देने का इशारा किया। मैं उनके पास गया। उनका बोला मेरे समझ में नहीं आया। उन्होंने कागज पर लिखा- जरा बैठो। अभी बात करता हूं।

मैं सकते में। ये सुन नहीं सकते। बोल नहीं सकते। अखबार में काम कैसे करते हैं?

इस बीच वे कई काम निपटाते रहे। मेरा अचरज बढ़ता गया। इस दिन उन्होंने मेरे समाचार में गल्तियां निकालकर बताया कि समाचार कैसे लिखा जाता है। … और मैं उनका फैन हो गया।

ये नौनिहाल ही थे, जो मुझसे इंजीनियरिंग की राह छुड़ाकर मुझे पत्रकार बना गए। उनके साथ कुछ दिन ‘मेरठ समाचार’ में काम करके मैं ‘दैनिक जागरण’ में आ गया। वे भी वहीं आ गए। वहां उनके साथ मैंने चार साल काम किया। इस दौरान उनसे जितना सीखा, वह एक जीवन में सीखना कठिन है। वे ऑलराउंडर थे। कुछ भी लिखना हो, चुटकियों में लिख देते। लिखावट ऐसी कि छपे का भ्रम हो। एक दिन कंप्यूटर खराब हो गए। पेज घटाकर भी दो पेजों का मैटर टाइपसेट होने से रह गया। नौनिहाल ने पेज के ग्रिड पर हाथ से लिखकर तीन घंटे में दो पेज तैयार कर दिए। अखबार छपा। अगले दिन कई लोगों ने पूछा, आज दो पेजों पर कौन सा फोंट इस्तेमाल किया है?     

नौनिहाल को सतीशचंद्र शर्मा, मंगल जायसवाल, अनिल माहेश्वरी, महावीर जैन, अभय गुप्त, वेद अग्रवाल डी. एस. कंवर, नरनारायण स्वरूप गोयल और अनिल बंसल जैसे वरिष्ठ पत्रकार प्रशंसा की नजरों से देखते थे। वहीं ओमकार चौधरी, नीरजकांत राही, पुष्पेंद्र शर्मा, सूर्यकांत द्विवेदी, अनिल त्यागी, विवेक शुक्ला, ओ. पी. सक्सेना, विश्वेश्वर कुमार, कौशल और संजय श्रीवास्तव सहित हम नये पत्रकार उनकी प्रतिभा पर हरदम मोहित रहते थे।

जब मैं नवभारत टाइम्स में काम करने मुम्बई आ रहा था, तो नौनिहाल ने मुझसे गुरुदक्षिणा मांगी थी।

मैंने कहा था – नौनिहालजी, आपको गुरुदक्षिणा देने की मेरी ना तो कभी हैसियत हो सकती है और ना ही औकात।

उन्होंने कहा था – मैंने तुझे जो कुछ सिखाया, वह सब तू नये पत्रकारों को सिखाना।

मैं पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ाकर उनकी गुरुदक्षिणा की पहली किस्त देने की कोशिश कर रहा हूं। जानता हूं, पूरे जीवन में हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाकर भी शायद उतना ना सिखा पाऊं, जितना नौनिहाल ने मुझे पांच साल में सिखाया था।

वे बेहद हाजिरजवाब थे। शरारती की हद तक विनोदी भी।  इस विलक्षण पत्रकार के हजारों किस्से हैं मेरे पास। वे फिर कभी…

भुवेंद्र त्यागीआज तो मैंने प्रतीक से बात की। उसे ढांढस बंधाया कि उसके पिता को हम नहीं बचा सके थे। लेकिन उसकी मां को कुछ नहीं होने देंगे। मेरा विश्वास है, इन बच्चों के प्रति जीवन दूसरी बार इतना क्रूर नहीं हो सकता!   


लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।