: सामाजिक सरोकार को सदा हाशिए पर रखा : एक बड़े समाचार एजेंसी के प्रमुख रहे बुजुर्ग पत्रकार महोदय ने कुछ साल पहले एक अद्भुत संस्मरण सुनाया था. चूंकि संबंधित सभी व्यक्ति अब दिवंगत हैं अतः नाम लेना उचित नहीं है, लेकिन वाकया रोचक है. बात उस समय की है जब संजय गांधी का असामयिक निधन हो गया था. एक तो एक युवा एवं जुझारू, चर्चित व्यक्ति का असमय जाना और दूसरा उसका प्रधानमंत्री का पुत्र होना. उस राष्ट्रीय खबर को लोग राष्ट्रीय त्रासदी के रूप में देखना भी चाहते थे.
समाचार एजेंसी में कार्यरत होने के नाते वे पत्रकार एक पूर्व प्रधानमंत्री का शोक सन्देश लेने पहुचे. लेकिन नेता ने शोक व्यक्त करने से बिलकुल इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मुझे मुझे संजय के जाने का कोई दुःख ही नहीं हुआ है तो व्यक्त क्यों करूं? अंततः काफी मनाने-समझाने पर शब्दों को तोड़-मरोड़ कर अंततः वे अपना दो शब्द संजय की श्रद्धांजलि के लिए देने को राजी हुए.
अब-जब नियति ने कांग्रेस और दुनिया दोनों जगह से एक साथ रुखसती का फैसला अर्जुन जी को सुनाया तो अनायास ही वह वाकया याद आ गया. परंपरा अनुसार पक्ष-विपक्ष के सभी नेताओं ने उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए खोज-खोज कर उनकी अच्छाइयों की चर्चा की है. लेकिन अगर सच्ची बात कही जाय तो समग्रता में अर्जुन सिंह जी की छवि एक ऐसे सामंत, एक ऐसे पदलोलुप राजनेता, एक (एक परिवार के प्रति) ऐसा चाटुकार और एक ऐसे शासक की उभरती है जिसके लिए ‘कुर्सी’ से बढ़ कर कभी कोई साध्य नहीं था. ‘देश’ जिनकी प्राथमिकताओं में इन प्राथमिकताओं के बाद आता था.
सार्वजनिक जीवन पर छाप छोड़ने वाले सभी व्यक्तित्व के जीवन में अक्सर यह अवसर उपस्थित होता है, जब आपको व्यक्तिगत या पारिवारिक हित और जनहित-राष्ट्रहित में से कोई एक चुनना होता है. अर्जुन जी का समग्र राजनीतिक जीवन उठा कर देख लें आपको सदा उनका निर्णय खुद के पक्ष में ही जाता दिखेगा. ऐसा ही निर्णय लेने का मौका उनके पास तब उपस्थित हुआ था जब पहली बार किसी शहर को गैस चैंबर में तब्दील कर दिया गया था. सदी की बड़ी त्रासदियों में से एक ‘भोपाल गैस कांड’ के समय मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के सामने यह विकल्प था कि वह कराहती मानवता को मरहम लगाने का प्रयास कर आततायी एन्डरसन को गिरफ्त में लें या फ़िर अपने ‘आका’ को खुश करने के लिए ससम्मान उस अपराधी को सुरक्षित निकाल दें. अगर ज़रूरत हो तो अपने मतदाताओं के हित की खातिर कुर्सी को दांव पर लगा दें या अपने राज धर्म का पालन करें. अपने स्वभाव के अनुरूप उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. जनता का नहीं लेकिन अपने ‘जनार्दन’ का वफादार बने रहने की यथासंभव-अधिकतम कीमत वे वसूलते भी रहे.
बात चाहे चुरहट लाटरी कांड की हो, प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते समय जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने की या फ़िर बस्तर समेत तमाम छत्तीसगढ़ के इलाके को उपनिवेश बनाए रखने की, अर्जुन के लिए ‘सामूहिक सरोकार’ सदा हाशिए की चीज़ ही रही. हाशिए पर खड़े लोगों की चिंता करने की ज़रूरत महज़ इतनी जिससे वोट की ज़रूरत पूरी हो जाय. अन्यथा यह कैसे संभव है कि अपने मुख्यमंत्री रहते जो व्यक्ति केवल अपनी जाति को प्रश्रय देने के लिए बदनाम होता रहे, वही बाद में ज़रूरत पड़ने पर अवसरवादी बन जाति और धर्म आधारित तुष्टिकरण और आरक्षण की आग में देश को धकेलता रहे? मतलब यह कि जब भी जो भी बनना पड़े चाहे जातिवादी या समाजवादी, धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष, देशभक्त या एंडरसन भक्त, परिवार भक्त या विद्रोही, हर बात क़ुबूल अगर ‘अवसर’ उसकी इजाज़त देता हो तो.
आज भी तमाम तरह के तुष्टिकरण एवं वर्गों के बीच विद्वेष पैदा कर अपनी रोटी सेक रहे नेताओं के बारे में जनता को यह सोचना चाहिए कि ये लोग कभी किसी के सगे नहीं होते. जब ज़रूरत होगी तो किसी भी आग में आपको झोंक कर अपनी प्रतिबद्धता बदलने में कपडे़ बदलने जैसी देर भी नहीं लगाएंगे. अगर यह सही नहीं होता तो तिलक-तराजू-तलवार को जूते चार मारने वाली मायावती कभी पंडितों को प्रश्रय नहीं देती. भूराबाल साफ़ करने वाले लालू यादव कभी सवर्णों के हित की बात करते नज़र नहीं आते. हिंदू ह्रदय सम्राट कल्याण सिंह कभी कारसेवकों के रक्त से सरयू को लाल करने वाले मुलायम की गोदी में नहीं बैठ जाते और फ़िर वहाँ से भी दुत्कारे जाने पर फ़िर दर-दर भटकने को मजबूर नहीं होते. ऐसे उदाहरणों की असंख्य श्रृखला होते हुए भी आज़ादी के साठ साल के बाद भी जनता का इस मामले में परिपक्व नहीं होना लोकतंत्र का एक सोचनीय पहलू है.
अर्जुन सिंह जी को अभी याद करते हुए संप्रग की पहली पारी के दौरान मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बना कर सम्प्रदाय आधारित विद्वेष की आग को भड़काने को भी मद्देनज़र रखना उचित होगा. इन सभी कामों से भला, भले किसी का न हुआ हो लेकिन समूहों के बीच जिस तरह से खाई पैदा करने का लगातार प्रयास किया गया उसकी भरपाई मुश्किल है.
अभी भी अर्जुन सिंह जी के ‘उत्तराधिकारियों’ की लंबी फौज है. इस फौज के सेनापति दिग्विजय सिंह जैसे लोग हैं, जो जनता द्वारा बुरी तरह से खारिज किये जाने के बाद अब हर तरह से देश को कलंकित करके भी अपना पुनर्वास करना चाहते हैं. बाटला हाउस से लेकर मुंबई आतंकी हमले तक सभी जगह शहीदों तक का अपमान कर, जबरन समूचे बहुसंख्यक समुदाय को आतंकी बनाने का प्रयास कर, वे वास्तव में उसी कांग्रेसी परंपरा का पालन कर रहे हैं जिसके अनुयायी अर्जुन सिंह जी भी थे. और उससे पहले जिसकी परिणति कभी भारत के बंटवारे तक के रूप में सामने आयी थी.
कांग्रेस के नेतृत्व में देश आज त्रासदी से गुजर रहा है. कभी महज़ एक रेल दुर्घटना हो जाने पर कुर्सी छोड़ देने का नजीर जिस देश और पार्टी में हो वहां आज बार-बार शर्मिंदगी झेलने के बावजूद सीवीसी मामले से लेकर एस बैंड, टू जी, राष्ट्रकुल आदि घोटाले तक हर मामले में कोर्ट की फटकार सहते, बार-बार माफी मांगने को मजबूर होने के बाद भी पद से चिपके रहने के लिजलिजे लिप्से ने देश में ‘अर्जुन परंपरा’ को मज़बूत ही किया है. एक ऐसी परंपरा जहां राजनीति का मतलब केवल अर्जुन की तरह सत्ता के मछली की आँख पर केवल निशाना साधना होता है. जहां नेताओं के लिए जनता किसी एकलव्य से ज्यादे की हैसियत नहीं रखती, जिसका अंगूठा कोई द्रोण जब चाहे उसी की छुरी से कटवा ले.
छत्तीसगढ़ के प्रथम राज्योत्सव में अतिथि बनकर आये अविभाजित मध्यप्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य निर्माण का विरोध करने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग कर अपना इहलोक और परलोक भी सुधार लिया था. उस समारोह से जाने के कुछ ही दिनों बाद वे दिवंगत भी हो गए थे. लेकिन ऐसी परंपरा शायद अर्जुन सिंह जी की मृत्यु से काफी पहले ही समाप्त हो गयी थी. अपने समय पर छाप छोड़ने वाले अर्जुन सिंह जी को अशेष श्रद्धांजलि.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.












अविनाश वाचस्पति
March 6, 2011 at 7:26 am
फिर भी पीएम बन न सके। पीएम बनने की पंक्ति में जुटे लोगों को सबक लेना चाहिए। फिर भी मेरी विनम्र श्रद्धांजलि क्योंकि अर्जुन की तरह अर्जुन सिंह के निशाने पर भी एक ही थी।
gopaljha
March 6, 2011 at 7:36 am
कांग्रेस के चाणक्य का निधन हो गया आइये हम सब मिलके भगवान् से प्रार्थना करते है की इस चाणक्य की आत्मा को शान्ति मिले !अर्जुन सिंह के जाने से एक बात का दुख् है कि अब मूर्ख् को विद्वान कोन बनायेगा, और आरक्षण जैसी समाज को तोडने कि कोशिश कोन् करेगा
sonu
March 6, 2011 at 7:39 am
you seems to be more “jha” than “punkaj” while writing this article. you cannot write such an awkward write up on just an instance of a late journalist. By doing this you have hurt two departed souls. As far as your tilt is concerned, it is evident that you born through the illicit womb of right wing, so that is quiet visible through this article. You seems to be disturbed by Arjun singh’s decision to give reservation for obc’s in higher studies. well he had done justice to the obc who had been deprived for generations. As far as Arjun’s work is concerned he had given befitting reply to rightist by replacing the ncert books who were tainted during nda government. He took the RSS and Sangh parivar by it’s horn. it is a pity that congress did not recognised his contribution to the public life at right time. I reject all your argument and term it not more that a garbage.
gopaljha
March 6, 2011 at 7:44 am
पंकज जी काफी अच्छी लिखा है आप नै मेरा और से आप को बधाइयाँ और शुभकामनायें
anam
March 6, 2011 at 8:59 am
acchha huaa dharti ka ek bojh kam huaa. mai arjun singh ko vinamr shradhanjali arpit karta hun shraddhanjali isliye ki 53 salon tak janta ko bewkuf banaya aur nar-sanharak endarsan ko sakushal swadesh bhejkar apna swarth siddh kiya. aise netaji ko bhopal gaiskand ke pahle swarg sidhar jana tha kam se kam desh ki janta ka jo bura ho raha hai vah kam to hota .
Dr. Maher uddin Khan
March 6, 2011 at 9:45 am
mere bhai aap ne lagta hai arjun singh ko jana nahi.n hai tabhi to aisa bakwas bol rahe hai.n .meri bat mano to pahle tolo phir bolo
Thanks
Neelabh Kumar Singh
March 6, 2011 at 9:59 am
Its very evident the writer does not have knowleadge of any working style or personality of Arjun Singh. His knowleadge is more or less based on various stories he have heard. People must take into account the facts before commenting.
Jeet
March 6, 2011 at 10:26 am
Very Impressive!! Bitter But True.
anjule
March 6, 2011 at 12:56 pm
इस पोस्ट में जिस तरह से पिछड़े और दलित नेतावों को निशाना बनाया गया है उससे साफ तौर पर लेखक की दिमागी हालत का पता चल रहा है…किस वीमारी से ग्रसित हैं..अरे भाई राजनितिक अवसरवादिता किसके पास नहीं है …लेकिन नहीं निशाने पर लेंगे केवल उन नेतावों को जिनकी वजह से किसी ना किसी तरह से ब्रम्हाणवादी मानसिकता को चोट पहुची….वैसे तो इस पोस्ट पर कमेंट्स करना ही नहीं चाहता थे लेकिन चलिए पढ़ लिया तो बता देते हैं भिया थोडा अपनी जातिवादी मानसिकता वाली बीमारी का इलाज करा लीजिये ..वैसे भी आप पत्रकार हैं उम्मीद आप से ये की जाती है की आप एक स्वस्थ माहोल और समाज का निर्माण करने वाला माहोल तैयार करेंगे लेकिन यहाँ तो आप गंध फैलाने में लगे हैं….भिया अर्जुन ,मायावती ,लालू या मुलायम को हम उनकी गलतियों या घोटाले के लिए बचाव नहीं कर रहे ..कोसिये खूब निशाना साधिये लेकिन साथ साथ जनरल कैटगरी वाले नेतावों का बही खाता कैसे भूल जाते हैं…अब आप कहेंगे हमने तो एक स्वर्ण अर्जुन सिंह की भी खिचाई की है…जी नहीं आपने किसी जनरल कत्गरी वाले की खिचाई नहीं की है आपने खिचाई की है या पनी खीज मिटने के लिए अर्जुन के नाम का इस्तेमाल किया है….. बेहतर है अपनी खीज मत मिटाइए अपने दिमाग का इलाज करा लीजिये..बेहतर होगा….
anjule
March 6, 2011 at 12:57 pm
इस पोस्ट में जिस तरह से पिछड़े और दलित नेतावों को निशाना बनाया गया है उससे साफ तौर पर लेखक की दिमागी हालत का पता चल रहा है…किस वीमारी से ग्रसित हैं..अरे भाई राजनितिक अवसरवादिता किसके पास नहीं है …लेकिन नहीं निशाने पर लेंगे केवल उन नेतावों को जिनकी वजह से किसी ना किसी तरह से ब्रम्हाणवादी मानसिकता को चोट पहुची….वैसे तो इस पोस्ट पर कमेंट्स करना ही नहीं चाहता थे लेकिन चलिए पढ़ लिया तो बता देते हैं भिया थोडा अपनी जातिवादी मानसिकता वाली बीमारी का इलाज करा लीजिये ..वैसे भी आप पत्रकार हैं उम्मीद आप से ये की जाती है की आप एक स्वस्थ माहोल और समाज का निर्माण करने वाला माहोल तैयार करेंगे लेकिन यहाँ तो आप गंध फैलाने में लगे हैं….भिया अर्जुन ,मायावती ,लालू या मुलायम को हम उनकी गलतियों या घोटाले के लिए बचाव नहीं कर रहे ..कोसिये खूब निशाना साधिये लेकिन साथ साथ जनरल कैटगरी वाले नेतावों का बही खाता कैसे भूल जाते हैं…अब आप कहेंगे हमने तो एक स्वर्ण अर्जुन सिंह की भी खिचाई की है…जी नहीं आपने किसी जनरल कत्गरी वाले की खिचाई नहीं की है आपने खिचाई की है या पनी खीज मिटने के लिए अर्जुन के नाम का इस्तेमाल किया है….. बेहतर है अपनी खीज मत मिटाइए अपने दिमाग का इलाज करा लीजिये..बेहतर होगा….
Mrityunjay
March 6, 2011 at 2:07 pm
jab kuch pata na ho to likhne se bachana chahiye..
waise sanghiyon ko afwah failane ke alawa ata hi kya hai..
bhaskar bikram chetia
March 6, 2011 at 6:12 pm
Pankaj ji –
unke nidhan par mujhe ek hi baat kahni hain .. ki bhagwan unki aatma ko shanti de …. par dubara is dharti par naa bheje !!!
ishu
March 6, 2011 at 8:28 pm
Bandhu,
Halaki BJP samarthak aksar congress virod bade betuke tarike se karne ke liye kukhyaat hain. Parantu aap ki likhi hui baaten sabit karti hain ki aapko Madhya Pradesh ki rajneeti ki aur in rajnetaon ki mansikta ki kaafi gahri parakh hai.
Congress ka satyanash isi tarah ke jugadoo, janadhar vihin rajnetaon ki adoordarshita poorn soch ne kiya hai. Yeh log kyonki janadhaar vihin ho chuke hote hain to back door (Indira Family) ke dwara apni dukan chalate rahne ke chakkar main samaj ka naash karne wale hath kande apnate rahe hain, jaise musalmanon ka saga hone ka swang, sampradayik shaktiyon par nakli hamle wagairah karte rahne ka kaam karte rahe hain. Inke in karmon se congress ke prati logon (samajhdaar logon chahe woh hindu hon ya muslim) ka gussa badha hai. In janadhar vihin netaon ke bargalane se Rajiv, Sonia, Rahul aur yahan tak ki Sardaar ji jaise (mature) logon ne bhi galat decision liye hain ya lete rahenge. Agar yeh log galat decision na bhi len to hamare janadhar vihin congressi neta khud hi apni dukan chalate rahte hain.
Ek baat BJP samarthakon ko bhi yaad dila doon ki BJP sa styanash bhi isi tarah ke janadhar vihin netaon ki wajah se hi hua hai jo chunaw to nahin jeet sakte par BJP ko chuanw jitwane ke liye feel good and India shining karyakram chala baithe. In adoordarshi, hawai netaon ke karan BJP ka bhi bada beda gark hua hai. In logon ne kyonki yeh adhar heen log the, Khurana ji ko bahar karwa diya, Uma ji ko bahar karwa diya wagairah wagairah uar kaiyon ko isde line kiya is umed main ki budhdha to marne hi wala hai phir agar koi janadhaar wala raha to competition tough hogi. Isi yadavi sangharsh main BJP lahu luhaan hui aur Budhdha aaj tak na mara ( mar woh gaye jo jugad lagaye baithe the back door se politics karte huye ki ek din billi ke bhaag se chheeka tootega). Bandhu, thodi der ke liye maan leta hoon ki Sudhma ji, Uma ji, Khurana ji ke hashiye main jane ka karan islogon ka badbola pan aur immaturity rahi hogi parantu bechare Govindacharaya jee ko kyon nirvasit hona pada. Yeh janadhaar vihin tikdi (ek mar chuke, ek chashme wale wakeel sahab aur jinke baare main ishara karne main bhi bura lag raha hai) ne to BJP ka poora antim sanskaar hi kar diya tha aur BJP aaj tak uth ke khadi nahin ho payee. Rahi sahi kasar, Advani ji ke jinna prem, kotari aur ati atmvishas ne nikaal li. Matti kasher laakh apne ko lauh purush kahe parantu chunavi barish main usko bheeg kar galna hi hai.
Kahne ka tatparya yeh ki neta ek hi type ke dono taraf hain. Main kai saalon se umed kiye baitha hoon ki ya to koi ek side in gandagi ke keedon se saaf ho jaye ya koi teesra aa jaye par ho kuchh nahin raha isliye maine matdaan karna hi band kardiya hai kai saalon se. Pahile kabhi Congress ko Kabhi BJP ko de diya karta tha. Ek baar riksha aur botal ko bhi de chuka apna mat par mere mat ki wahan koi keemat nahin najar aati so yahan vyakt kar raha hoon. Ummeed hai aap bhi khud ke daman main jhaankne ka sahas kar payenge (likhiye bhale hi ek tarfa congress ke khilaf, mujhe koi dukh nahin, kam se kam ek side ki gandagi ko to koi ughad raha hai isi ka mujhe santosh hai).
keshav acharya
March 7, 2011 at 1:39 am
अपने उर्जावान व्यक्तित्व तथा जन से जुड़ी राजनीति के बल पर विंध्य की माटी को राष्ट्र के माथे का चंदन बना देने वाले करिष्माई नेता अर्जुन सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने जिस शान और गौरव के साथ जिंदगी का सफर तय किया, वह अपने आप में एक मिसाल है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में आकाश जैसी बुलंद उपलब्धियां भी हासिल की तो कभी पराभव के कड़वे घूंट भी उन्हें पीने पड़े, लेकिन उन्होंने अपने कर्म क्षेत्र से न तो पलायन किया और न ही दीनता दिखाई। मानो वे साक्षात अर्जुन की तरह गीता के इस श्लोक को चरितार्थ कर रहे हों। अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं न पलायनम। यह उनके व्यक्तित्व का ही तिलिस्म था कि संघर्ष के दौर में उनकी आभा अपने चरम पर होती थी। उनकी समूची राजनीति ही इस हकीकत की साक्षी है। मध्यप्रदेश इस बात का गवाह है कि जब देश में आपातकाल की ज्यादतियों के कारण कांगे्रस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी, इंदिरा गांधी तथा संजय गांधी की चुनावी पराजय और केन्द्र में बेदखली से पार्टी चमकहीन हो चली थी, कई स्थापित नेता कांगे्रस से किनाराकशी कर चुके थे तभी राजनीतिक क्षेत्र की अचर्चित सी मानी जाने वाली हस्ती अर्जुन सिंह ने राज्य में कांगे्रस की ओर से तत्कालीन जनता सरकार के खिलाफ जन संघर्ष का मोर्चा संभाला। उनके इस जुझारू नेत्त्व का ही नतीजा था कि पार्टी ने पुनः जनता का भरोसा अर्जित किया और राज्य के सत्ता शिखर पर कांगे्रस की पुर्नप्रतिष्ठा हुई। राज्य में पार्टी के इस राजनीतिक उत्कर्श से प्रभावित होकर इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्य का नेतृत्व सौंप दिया। भोपाल में मिक गैस त्रासदी अवश्य ही उनके इस पहले मुख्यमंत्रित्वकाल की सबसे त्रासद घटना थी। आज इतने वर्षों के बाद भले ही राजनीतिक कारणों से इन मामले में उन पर निशाना साधने वालों की कमी न हो लेकिन उस दौर के लोग जानते हैं कि जब गैस त्रासदी के आंसू और गुस्से के शोले भोपाल को बेजार कर रहे थे तब उन्होंने किस तरह प्रशासनिक मदद के जरिये लोगों के घावों पर मरहम लगाया था। हालांकि इसके अगले चुनाव में भी उनके नेतृत्व में कांगे्रस को उल्लेखनीय सफलता मिली और कांगे्रस विधायक दल का नेता चुना गया, लेकिन जब उन्हें आतंकवाद से जूझते पंजाब में राज्यपाल बनाकर भेजने का फैसला किया गया तो उन्होंने राष्ट्रपति को सर्वोपरि मानते हुये मुख्यमंत्री का पद त्यागकर इस नए पद की चुनौती को स्वीकार कर लिया।
keshav acharya
March 7, 2011 at 2:00 am
वे कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के एक वफादार सिपाही रहे हैं और उन्हें जो भी जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसका उन्होंने हमेशा ही पूरी ईमानदारी से निर्वाह किया है। पर सही बात तो यह है कि यह सवाल भी हायपोथेटिकल है और बदली हुई परिस्थितियों में उनके द्वारा दिए जा सकने वाले जवाब को भी कल्पना की उड़ान करार देते हुए निरस्त किया जा सकता है। हकीकत यह है कि वर्ष 1960 में कांग्रेस का एक सक्रिय सदस्य बनने के बाद के पांच दशकों में जिस तरह की राजनीति अर्जुन सिंह ने पार्टी में देखी और उनके स्वयं के द्वारा की गई, उसके ढेर सारे रहस्य और कही-अनकही कथाएं वे बगैर अपनी उपस्थिति में उजागर किए विदा हो गए हैं
rakesh
March 7, 2011 at 3:19 am
You are person with Sick mentality. As you have only tried to level basless and bakwas it is fit you need to be taken to a lesson. What is the contribution of yours towards society is not known but making baseless and concoted charges against a leader is just a mental illness of yours.
Rajendra Prasad
March 7, 2011 at 5:57 am
Good. At least you have courage to say something negative for our “Divangat Mahan Neta”. Please also show this courage again for some other party leaders also because almost all the Netas are “1 he thali ke chatte batte”.
romiopapa
March 7, 2011 at 5:17 pm
Apni lekhani ko kalankit karane wale logon me aap akele shayad na ho. Lekin sach yeh hai ki vindhya dhara ke gaurav kahe jane wale SHREE ARJUN SINGH ji ne sadaiv desh hit ko upper rakha hai. Who ek kushal prashashak aur har dard per marhum lagane walon me ek aise rajneta they. jo hamesha parde ke peeche se kam karate rahe .Jinake bad koi aur nazar nahi aata. Gandhi- Neharu pariwar ke wafadar na hote to shayad who PM jaroor hote. unake jaisa koi nahi. [b][/b][b][/b][u][/u]