राहुल कुमार को हमारे-आपके सहयोग की दरकार है भी या नहीं?

पंकज झा: हम राहुल कुमार के साथ हैं, लेकिन….! : यशवंत जी, भास्कर में राहुल से संबंधित खबर के बाद आपका आलेख पढ़ कर याद आया कि संबंधित साइट भड़ास4मीडिया ही है. वह प्रकरण भी याद आया. तो यहां यह कहना ज़रूरी है कि निश्चित ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र को पावन बनाता है.

दिग्विजय सिंह, इज्‍जत केवल डर और लोभ से नहीं मिलती

पंकजएक बुनियादी सवाल पर गौर करें. राजनीति या सामाजिक जीवन में सभ्यता एवं अहिंसक आचरण बनाए रखने की जिम्मेदारी पहले आखिर किसकी है? ज़ाहिर है समाज के जो ओपिनियन मेकर्स हैं,  जो नेता हैं उनपर ही तो यह दारोमदार है. कहा भी गया है कि ‘क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात.’ लेकिन हो उसका उलटा रहा है.

अब कौन मौत को ठेंगा दिखाते हुए कारपोरेट मीडिया को चेतावनी देगा?

कबसे भड़ास को रिफ्रेश पर रिफ्रेश किये जा रहा हूं. लगभग हर बार आलोक जी के बारे में एक नयी श्रद्धांजलि पढ़ने को मिल रहा है. मन है कि भर ही नहीं रहा. लगता है ऐसे ही उनका संस्मरण पढ़ता रहूं, हर बार उनके व्यक्तित्व के एक नए पक्ष से रु-ब-रू होता रहूं. भरोसे के संकट के इस दौर में आलोक जी का जाना एक भयंकर निर्वात छोड़कर गया है.

अर्जुन सिंह के लिए कुर्सी से बढ़कर कोई साध्‍य नहीं रहा

पंकज: सामाजिक सरोकार को सदा हाशिए पर रखा :  एक बड़े समाचार एजेंसी के प्रमुख रहे बुजुर्ग पत्रकार महोदय ने कुछ साल पहले एक अद्भुत संस्मरण सुनाया था. चूंकि संबंधित सभी व्यक्ति अब दिवंगत हैं अतः नाम लेना उचित नहीं है, लेकिन वाकया रोचक है. बात उस समय की है जब संजय गांधी का असामयिक निधन हो गया था. एक तो एक युवा एवं जुझारू, चर्चित व्यक्ति का असमय जाना और दूसरा उसका प्रधानमंत्री का पुत्र होना. उस राष्ट्रीय खबर को लोग राष्ट्रीय त्रासदी के रूप में देखना भी चाहते थे.

छत्‍तीसगढ़ मीडिया की पहचान रमेश नय्यर जी

पंकजसमाचार माध्यमों खास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आपको किसी शहर या संस्थान को स्थापित करने के लिए उसकी पहचान वाले किसी विजुअल को दिखाना होता है. जैसे अगर बात भारत की हो तो चैनलों में सामान्यतः इंडिया गेट को दिखाया जाता है. किसी शहर को दिखाना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन को दिखा कर आप उस शहर के बारे में बता सकते हैं. इसी तरह बात अगर छत्तीसगढ़ के मीडिया की की जाय तो निश्चित ही लगभग पांच दशक से प्रदेश के मीडिया में अपना सम्मानित जगह रखने वाले वरिष्टतम पत्रकार रमेश नय्यर को रखा जा सकता है. छोटे कद के बड़े आदमी नय्यर जी से मिलना ना केवल पत्रकारिता बल्कि सौजन्यता सीखना भी है. सन 1965 में शिक्षक की सरकारी एवं अपेक्षाकृत सुरक्षित नौकरी को छोड़ कर उस समय के पत्रकारिता के कंटकाकीर्ण मार्ग का अवलंबन करने वाले नय्यर जी आज तो इस विधा के चलते-फिरते पाठशाला के रूप में ही जाने जाते हैं.

ये पत्रकार अलग तरीकों से कीमत वसूलना जानते हैं

पंकजबात करीब तीन साल पुरानी है. अपने एक पत्रकार मित्र के माध्यम से एक लड़की से रायपुर में मिलना हुआ. परिचय के क्रम में पता चला कि किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में वो रायपुर में है और बस्तर अंचल में काम करना उसका ध्येय है. जल्द ही यह पता चला कि उसकी कम्पनी का नाम भले ही अलग हो, लेकिन मोटे तौर पर वह टाटा के लिए काम करती है. बकौल उस लड़की उसकी कम्पनी देश का सबसे बड़ा पीआर ऑर्गेनाइजेशन है.

ये अंगुली कटा कर शहीद कहाने वाले

: हेडलाइंस टुडे पर कथित हमला : भोपाल में एक थे (पता नहीं अब हैं या नहीं) राजा बुन्देला. उनकी एक कथित फिल्म थी ‘प्रथा’. फिल्म में तथाकथित तौर पर हिंदू भावनाओं को भड़काने का मसाला था, जैसा कि बुंदेला जी का स्वयम्भू मानना था. लेकिन सवाल है कि दर्शक का जुगाड कैसे हो? अच्छी-भली फिल्मों को तो दर्शकों का टोटा झेलना पड़ता है या क्या-क्या ना सहना और झेलना पड़ता है तो आखिर ‘बुंदेलों-हरबोलों’ के मुंह कही कहानी सुनने की फुर्सत आजकल किसे?