केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, कांग्रेस या यह कहिए कि यूपीए की तरफ से डीएमके के नेता करुणानिधि के पास सजदा करने गए थे। सजदा करते-करते उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि वो अपने तीन रिश्तेदारों जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिमण्डल से बाहर होना पड़ा है, की जगह तीन नए लोग दे दें उन्हें मंत्रिमण्डल में ले लिया जाएगा।
करुणानिधि तने रहे हालांकि बाहर निकलकर प्रणब दादा ने फ़क्र से कहा- डीएमके के साथ गठबंधन जारी रहेगा। इस पूरी घटना में ऐसा लगा जैसे यूपीए या प्रणब दादा कटघरे में हों और कोई करुणानिधि फैसला कर रहा हो। अगर एहसान करते हुए दादा की पेशकश को करुणानिधि ने मान लिया तो डीएमके फिर किसी राजा, किसी मारन, किसी कनिमोझी को भेजेगी। फिर कोई टूजी स्पेक्ट्रम होगा और तब तक सरकार के पांच साल बीत चुके होंगे और फिर कोई यूपीए या एनडीए सत्ता में आएगा। या तो कोई भगवा ए.राजा होगा या फिर कोई सफेद कुर्ता पैजामा पहने कांग्रेसी कलमाड़ी होगा और तथाकथित बहुमत यानी 273 की संख्या जुटाकर एक और सरकार बनेगी। 273 पाने की शर्त है कलमाड़ियों राजाओं को सत्ता में रखना और इसी के लिए प्रणब मुखर्जी सजदा करने गए थे।
2 सितंबर 1953 को राज्यसभा में बोलते हुए डॉ अम्बेडकर ने कहा- ‘महोदय मेरे दोस्त मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया पर आज मैं यह कहने को तैयार हूं कि मैं एक कठपुतली था और जो कुछ भी हुआ मैंने अपनी इच्छा के खिलाफ किया। यह संविधान किसी के लिए उपयुक्त नहीं है…अगर मेरा बस चले तो…’
डॉ. अम्बेडकर का यह तर्क उस समय था जबकि भारत की लोकसभा में 155 सदस्यों पर आपराधिक मुकदमें नहीं थे, ना ही 145 एमपी ऐसे थे जिनको 20 प्रतिशत से कम मत मिले थे, ना ही देश में 50 रजिस्टर्ड पार्टियां थीं और ना ही सत्ता संतुलन का तराजू इतना कमजो़र था कि कोई करुणानिधि, कोई जयललिता, कोई लालू, कोई मुलायम, कोई मायावती या कोई रेड्डी बंधु सीबीआई से बचने के लिए पूरे संवैधानिक व्यवस्था को ताक पर रखता हुआ गुर्राता हो कि सीबीआई से बचाओ नहीं तो सरकार गयी। समर्थन लेना है तो टूजी में जो कुछ भी हो रहा है होने दो।
ज़रा गौर से देखें, संवैधानिक व्यवस्था का क्या हाल हुआ है और तर्क किस तरह से बदलता गया है-
‘देश की जनता सम्प्रभु है.. इसलिए संसद सम्प्रभु है.. इसलिए सांसदों का बहुमत सम्प्रभु है.. इसलिए जो इस बहुमत को नियंत्रित करता है, यानी प्रधानमंत्री, वह सम्प्रभु है.. इसलिए जिस सहयोगी दल या दलों की मदद से प्रधानमंत्री गद्दी पर है वह दल या दलों का नेता सम्प्रभु है..लिहाज़ा अगर सरकार किसी करुणानिधि के इशारे पर गिरती है तो वह सम्प्रभु है..और कोई मुलायम, लालू, पासवान, अजीत सिंह या जयललिता इसको बचा लेता है तो वह सम्प्रभु है। साथ ही जो व्यक्ति या संस्था या समाज प्रधानमंत्री या करुणानिधि या मुलायम- मायावती- लालू- पासवान- अजीत- जयललिता का विरोध करता है वह सम्प्रभुता के खिलाफ है अर्थात वह जनता के खिलाफ है और लिहाजा ऐसे व्यक्तियों पर कानून का चाबुक चलना ही चाहिए भले ही वह रात के 12 बजे रामलीला मैदान में हो चाहे गांधीवादी के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हजारे के खिलाफ।
यही कारण है कि प्रणब मुखर्जी को यह कहने में संकोच नहीं बल्कि फक्र महसूस हुआ कि द्रमुक से गठबंधन जारी रहेगा। द्रमुक को जरा भी संकोच नहीं हुआ कि उसके तीन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त होने का आरोप है और फिर भी उनको द्रमुक ने पश्चाताप के रूप में पार्टी से निकाला नहीं। इस मुलाकात के एक दिन पहले करुणानिधि ने कहा था कि यह सब मीडिया की गलती है।
नोनन ने अपनी पुस्तक ‘ब्राइब’ में कहा था- ‘भ्रष्टाचार की सीमाएं वहीं खत्म हो जाती हैं जहां समाज उसके प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस'(असहिष्णु) दिखाता है’। प्रकारान्तर से कह सकते हैं कि अगर समाज भ्रष्टाचार को सहता रहता है तो यह भ्रष्टाचार असीमित हो जाता है। यानी मारन किसी उद्योगपति को मजबूर कर सकता है कि वह अपने शेयर बेंच कर सड़क पर आ जाए और दूसरी ओर कोई अंबानी किसी मंत्री या सरकार के सहयोग से जनता की गाढ़ी कमाई का लाखों करोड़ रुपया लेकर निकल जाए।
आज जनता तो भ्रष्टाचार को लेकर असहिष्णु हो गयी है पर द्रमुक नहीं, प्रणब मुखर्जी नहीं, राजनीतिक वर्ग नहीं। और प्रयास यह है कि इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली जनता को प्रजातंत्र का दुश्मन करार दे दिया जाए। कोशिश यह भी है कि इन सब का ठीकरा कुछ अन्य संस्थाओं पर थोप दिया जाए, जैसे मीडिया पर, सीएजी पर, या फिर दबी ज़ुबान से न्यायपालिका पर। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मीडिया के चंद संपादकों से मुलाकात की और गुबार यह कह कर निकाला कि ‘मीडिया स्वयं ही आरोपी, अभियोजक तथा जज तीनों का काम करने लगा है, ऐसे में संसदीय लोकतंत्र काम नहीं कर सकता?’
प्रश्न यह है कि क्या संसदीय लोकतंत्र काम कर रहा है? जब न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश (एक नही दो पर) भ्रष्टाचार के आरोप हों, जब कैबिनेट के तीन मंत्री जेल में हों, जब अन्य कइयों पर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का आरोप हो, जब चुने हुए सांसदों को पैसे मांगने के आरोप में रातों-रात इस्तीफा देना पड़े, जब अफसरशाह अनैतिक मंत्रियों के साथ गठजोड़ करके ज़मीन और प्लॉट हड़प रहे हों तो क्या कहा जा सकता है कि संसदीय लोकतंत्र पटरी पर है? प्रधानमंत्री ने मीडिया पर आरोप लगाते हुए सलाह दिया कि जब कोई केस सबजूडिस (अदालत के ज़ेरे नज़र) हो तब मीडिया को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब तक फैसला ना हो आरोपी को निर्दोष समझा जाए। इसका मतलब यह हुआ कि प्रणब मुखर्जी करुणानिधि के यहां जाकर याचना कर सकते हैं कि ऐसे ही तीन निर्दोष और भेज दो ताकि संसदीय लोकतंत्र बचा रहे।
मीडिया को आरोपी, अभियोजक व जज बताने के 72 घंटे के अंदर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने सरकार का यह मूल हक छीनते हुए यह आदेश दिया कि कालेधन के खिलाफ एक एसआईटी बनेगी जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के दो रिटायर्ड जज होंगे, यानी सुप्रीम कोर्ट ने ये तीनों भूमिकाएं इस बार अपने हाथों में ले ली हैं। अवमानना का डर ना होता तो शायद मीडिया की तरह सुप्रीम कोर्ट भी प्रधानमंत्री की आलोचना का शिकार बनता।
लेखक एनके सिंह साधना न्यूज के समूह संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.












Rajesh sharma
July 11, 2011 at 9:16 am
sarthak lekh.
aabhar
Rajesh
Rajendra Kumar Singh
July 11, 2011 at 11:42 am
सही कहा है आपने, हमारे प्रधानमंत्री (सोनिया गाँधी और उनके चाकर) को अवमानना का डर ना होता तो शायद मीडिया की तरह सुप्रीम कोर्ट भी दोष देते| वैसे तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनका हमदर्द है ही उसका प्रमाणं है कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में राहुल बबुआ का एक्स्क्लुसिव कवरेज| वैसे मेरा भी यही मानना है कि हमारा संविधान सही नहीं है| उसमे बहुत से छेद हैं| और रही बात कांग्रेस की तो इसे अभी तीन साल और देश को लूट कर स्विस बैंक में भरना है|
neeraj jha
July 11, 2011 at 12:07 pm
wah kya kahne. kaqmal sin gh sahab wakai achha laga
pankaj
July 11, 2011 at 12:57 pm
satta rajniti ke charitra ko benakab kar diya hai Nk singh ne, sajada shabd ke satik upeyog ke liye badhai, par pranab da jaise emandar naukar ke sath aapne kuchh jyadati kar di hai, pranab ji apni marji se to nahin hi gaye honge, sonia gandhi ka to hukm bajana hi padega, wahi unhone kiya.
रिंकू सिंह
July 11, 2011 at 6:08 pm
प्रधानमंत्री का ऐसा कहना गलत नहीं होता।न्यायपालिका कोई दूध की धुली नहीं है।
कुमार सौवीर, लखनऊ
July 12, 2011 at 3:44 am
सबजूडिस —-अदालत के ज़ेरे नज़र या जेरे बहस
कुमार सौवीर, लखनऊ
Sanjay Sharma. Weekand Times
July 12, 2011 at 9:33 am
बहुत सही लिखा आपने. दुःख की बात यह है कि इन परिस्थितियो में कोई बदलाब होता नजर नहीं आ रहा. अफसरों और नेताओ का नापाक रिश्ता लगातार इस देश को कमजोर कर रहा है.
Tarkeshwar Mishra
July 12, 2011 at 1:43 pm
ऐन के सर के अंग्रेजी में आने वाले विश्लेषण का पूरा लाभ नहीं उठा पाने की कसक आज दूर हो गयी. आशा है आगे भी हिंदी में आपके आलेख आते रहेंगे.
RAJKUMAR JAIN DAINIK SADAY TIKAMGARH
July 12, 2011 at 3:56 pm
सही लिखा आपने. दुःख की बात यह है कि इन परिस्थितियो में कोई बदलाब होता नजर नहीं आ रहा. अफसरों और नेताओ का नापाक रिश्ता लगातार इस देश को कमजोर कर रहा है.