भगवान श्रीराम का मंदिर बने या नहीं इसको लेकर पिछले कई सालों से मसाला बना कर उसे उड़ाया जाता है और फिर बंद बोतल में डाल दिया जाता है। लेकिन न तो श्रीराम का भला हुआ न ही इससे प्रभावित होने वाले आमजन का। विवाद दर विवाद होने से पिछले एक माह से जिस कदर अयोध्या और वहां के बाशिंदे गुजर रहे हैं, उसका दर्द सिर्फ और सिर्फ वही जान सकते हैं। इसके अलावा सुदूर गांव में बैठे लोग भी इससे अछूते नहीं हैं।
गांव-गांव में इस बात को लेकर आए दिन अफवाह फैलती है कि विवाद को लेकर कोई भी संजीदा नही है। कुछ लोग इस बारे में कहते हैं कि कोर्ट का फैसला तो मुस्लिम समुदाय के पक्ष में है, इसलिए सब नौटंकी की जा रही है, लेकिन सत्यता कहां तक है इसको फैसला देने वाले जजों का समूह जाने। परन्तु फैसला नहीं आने और उसकी आड़ में भय, भूख और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि अयोध्या और उसके आस पास रूकी फोर्स का खर्च आखिरकार जनता को ही भुगतना होगा।
जब आज देश पूरी तरह से परिपक्व हो चुका है कि अब फैसला आयेगा? तो फैसला टालने के लिए कुछ लोग सामने आ जाते हैं। ऐसे लोग यह नहीं सोचते हैं कि फैसले का दर्द तो कुछ दिन में भर जायेगा, लेकिन आए दिन अयोध्या सहित आसपास तमाम सुरक्षा बलो के ऊपर होने वाले खर्च को कब तक गरीब जनता सहेगी। इसमें सुरक्षा बलों का कोई दोष नहीं है, वे तो हुक्म के पाबंद हैं। उन्हे जहां आदेश हुआ वहां पहुंच गए, लेकिन आदेश देने वाले गरीब, भूख से परेशान होने वाली जनता का यह दर्द क्यों नहीं देख रहे हैं।
जन-जन में चर्चा है कि फैसला अन्तिम नहीं है तो फिर बवाल क्यो? पिछले 15 दिनों से लोग भय और दहशत में जी रहे हैं। 23 और 24 सितंबर को दहशत का यह आलम था कि पूरी सड़कें सूनी थीं, लोग डर के चलते घर से नही निकले। बाहर रहने वाले परिजनों को लोगों ने बुला लिया है। स्कूली बच्चे भी हॉस्टल छोड़ कर अपने घर पहुंच गए, लेकिन 24 को पता चला कि फैसला अब 28 के बाद होगा तो सारी हवा फिर निकल गई।
लोग तो अब यह कह रहे हैं कि फैसला होगा ही नही। देश के कर्णधारों और विद्वान न्यायाधीशों को अब सोचना होगा कि कब तक भगवान श्रीराम के साथ खिलवाड़ होता रहेगा और जनता पिसती रहेगी। समय आ गया है कि अब कुछ न कुछ हो जाए और बार-बार भेड़िया आया भेड़िया आया का अफवाह समाप्त हो जाए।
लेखक के के मिश्र फैजाबाद में पत्रकार हैं.











