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आगरा में पत्रकार उत्‍पीड़न मामला : कार्रवाई के लिए प्रशासन को चार दिन का अल्‍टीमेटम

: शोर शराबे के बीच बनाई गई रणनीति : आगरा में पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसी क्रम में तीन अगस्त को प्रमुख समाचार पत्रों के फोटोग्राफरों के साथ एक समुदाय के लोगों ने जमकर मारपीट और अभद्रता की। उनके कैमरे तोड़ दिए। आरोपियों की गिरफ्तारी न होने पर पत्रकारों ने डीआईजी आवास पर धरना दिया और चार दिन में कार्रवाई करने के लिए अल्टीमेटम दिया। आरोपियों में एक पार्षद सुहेल कुरैशी भी शामिल है। हाल के एक वर्ष में ताजनगरी में पत्रकारों के साथ यह 19वीं घटना है।

: शोर शराबे के बीच बनाई गई रणनीति : आगरा में पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसी क्रम में तीन अगस्त को प्रमुख समाचार पत्रों के फोटोग्राफरों के साथ एक समुदाय के लोगों ने जमकर मारपीट और अभद्रता की। उनके कैमरे तोड़ दिए। आरोपियों की गिरफ्तारी न होने पर पत्रकारों ने डीआईजी आवास पर धरना दिया और चार दिन में कार्रवाई करने के लिए अल्टीमेटम दिया। आरोपियों में एक पार्षद सुहेल कुरैशी भी शामिल है। हाल के एक वर्ष में ताजनगरी में पत्रकारों के साथ यह 19वीं घटना है।

शहर के दिल की धड़कन एमजी रोड पर बुधवार शाम जाम के नाम पर कुछ अराजक तत्वों ने जमकर नंगा नाच किया। वहां फंसी युवतियों और महिलाओं के साथ छेड़खानी की गई। एंबुलेंस और वाहनों में तोड़फोड़ की कोशिश हुई। मीडियाकर्मियों ने इसे कैमरे में कैद कर लिया तो उपद्रवियों ने हमलावर रुख अपना लिया। उनके कैमरे चकनाचूर कर डाले। मोबाइल लूट लिए। जागरण के फोटोग्राफर को तो पकड़कर नाले में फेंकने की कोशिश की गयी। घटनाक्रम के दौरान वहां पुलिस मौजूद थी, लेकिन मूक दर्शक बनी रही। फोटोग्राफरों और कुछ पत्रकारों ने तत्काल डीआईजी असीम अरुण के आवास पर पहुंचकर जानकारी दी और तत्काल कार्रवाई की मांग को लेकर धरना शुरू कर दिया। घटना इतनी बड़ी थी लेकिन खुद को पत्रकारों का एकमात्र नुमाइंदा मानने वाले ताज प्रेस क्लब की नींद तीन दिन बाद खुली। घटिया आजम खां स्थित क्लब भवन में हुई आपात बैठक में संघर्ष की रणनीति तय कर ली गई। इसके तहत आठ अगस्त को क्लब भवन से पत्रकार मौन जुलूस निकालेंगे और कलक्ट्रेट पर डीएम को जापन देंगे। डीएम न आए तो अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया जाएगा।

संगठन की यह बैठक खासी हंगामेदार रही। पूर्व वाइस प्रेसीडेंट अधर शर्मा ने एक साल में पत्रकारों के साथ हुई 19 घटनाओं पर क्लब की निष्क्रियता पर रोष जताया, जिस में एक पत्रकार मोहन शर्मा की हत्या भी शामिल है। मोहन के हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए आंदोलन क्लब ने गुपचुप समाप्त कर दिया था, दलील थी कि हत्यारे पुलिस ने जेल भेज दिए हैं। जबकि तय यह हुआ था कि आंदोलन तब तक चलेगा जब तक आश्रितों को आर्थिक मदद न मिल जाए। बृजेंद्र पटेल ने तत्काल बदला लेने की बात कहकर माहौल गर्मा दिया। डा. एमसी शर्मा ने उनका समर्थन किया। पवन सिंह ने अब तक के घटनाक्रम पर प्रकाश डाला। इसी तरह एक सप्ताह पूर्व हरीपर्वत पुलिस ने एक पत्रकार को सींखचों के पीछे धकेल दिया था। मार्कशीटों में गड़बड़ी करने वाले एक रैकेट ने एक पत्रकार को ब्लैकमेल किया था लेकिन क्लब ने दखल नहीं दिया। हाल यह था कि बैठक में प्रेसीडेंट और जनरल सेकेट्री के अतिरिक्त मात्र दो निर्वाचित पदाधिकारी मौजूद थे।

पीड़ित फोटोग्राफर ने अपने समाचार पत्र के संपादकों के खिलाफ आक्रोष जताया। निंदा इस बात की भी हुई कि पीड़ित तीनों फोटोग्राफर दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्तान के हैं लेकिन संपादक तो दूर, सिटी चीफ तक बैठक में नहीं आए जबकि जागरण के सिटी चीफ तो क्लब के वाइस प्रेसीडेंट हैं। चर्चित महिला पत्रकार ने संपादकों को आड़े हाथों लेने का विरोध किया तो होहल्ला शुरू हो गया। बैठक में जिस कदम पर सहमति बताई गई, उस पर न प्रेसीडेंट सहमत थे और न जनरल सेकेटरी बल्कि युवा पत्रकारों के हंगामे के बीच पूर्व उपाध्यक्ष अनिल दीक्षित ने इसकी घोषणा की। बैठक में उपस्थित युवाओं से हाथ उठाकर इसका समर्थन करा लिया गया। करीब तीन घंटे चली बैठक में बड़ी संख्या में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक मीडिया और स्वतंत्र लेखन करने वाले पत्रकार उपस्थित थे।

गाल पकड़कर आया पत्रकार : बैठक में एक पत्रकार पिटाई से लाल हुए अपने गाल पकड़कर पहुंचा तो सन्नाटा खिंच गया। दैनिक अमर भारती के इस पत्रकार के साथ पुलिस भर्ती के फार्म खरीद रही भीड़ का कवरेज करते वक्त गर्मागर्मी पर पुलिस ने पीट दिया था। उसे घटनाक्रम लिखकर देने की कहकर टरका दिया गया।

क्यों नहीं होता क्लब सक्रिय : क्लब के हाल बेहाल हैं। पदाधिकारियों के साथ कुछ बाहरी लोग शाम होते ही मदिरा की महफिल सजा लेते हैं। स्वतंत्र लेखन करने वाले पत्रकार देवेंद्र शर्मा ने कहा कि क्लब पदाधिकारियों में से दो अंबेडकर विवि में पत्रकारिता पढ़ाते हैं, हालांकि वह हिंदी और कामर्स में पीएचडी हैं। वह सिर्फ अपनी नौकरी बचाने की जुगत में रहते हैं। छात्र संख्या कम होने पर विवि कोर्स बंद कर रहा था इसीलिये पत्रकारिता दिवस के कार्यक्रम में कुलपति और कुलसचिव को बुलाया गया। प्रेसीडेंट खुद वकालत करते हैं और उनके पास टाइम नहीं है।

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