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आरटीआई को लेकर जागरूक नहीं हैं महिलाएं

काशी: काशी विद्यापीठ में ‘सूचना का अधिकार 2005 के सामाजिक प्रभाव’ विषय पर गोष्‍ठी : सूचना अधिकार कानून को लागू हुये 5 साल का वक्त गुजर चुका है। इसके बावजूद भारत में इस महत्वपूर्ण एवं क्रान्तिकारी कानून के बारे में जागरूकता बेहद कम है। एक सर्वे के मुताबिक आज भी ग्रामीण जनसंख्या के 13 प्रतिशत लोग इस ही इस कानून के बारे में जानते है। शहरों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। शहरी आबादी के 33 प्रतिशत लोग ही सूचना के अधिकार के बारे में जानकारी रखते हैं।

काशी: काशी विद्यापीठ में ‘सूचना का अधिकार 2005 के सामाजिक प्रभाव’ विषय पर गोष्‍ठी : सूचना अधिकार कानून को लागू हुये 5 साल का वक्त गुजर चुका है। इसके बावजूद भारत में इस महत्वपूर्ण एवं क्रान्तिकारी कानून के बारे में जागरूकता बेहद कम है। एक सर्वे के मुताबिक आज भी ग्रामीण जनसंख्या के 13 प्रतिशत लोग इस ही इस कानून के बारे में जानते है। शहरों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। शहरी आबादी के 33 प्रतिशत लोग ही सूचना के अधिकार के बारे में जानकारी रखते हैं।

कुल जनसंख्या को देखें तो 26 प्रतिशत पुरुष ही आरटीआई के बारे में जानते हैं। जबकि महिलाओं की स्थिति सबसे दयनीय है। सिर्फ 12 प्रतिशत महिलाएं ही इस कानून की जानकारी रखती है। ये बातें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान की ओर से आयोजित ‘‘सूचना का अधिकार 2005 के सामाजिक प्रभाव’’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राज्य सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना ने कही।

श्री सक्सेना ने बताया कि सूचना अधिकार कानून का एक सच ये भी है कि 75 प्रतिशत मामलों में आवेदनकर्ता को सूचना नहीं मिल पाती। यह भी माना कि सूचना का अधिकार कानून के प्रभावी होने में जनसूचना अधिकारियों की भूमिका अच्छी नहीं। इसके पीछे वजह यह है कि जनसूचना अधिकारियों को इस कानून और उनकी जिम्मेदारियों के बारे में प्रभावी प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। व्यवस्था में यह भी कमी है कि छोटे अधिकारियों को जनसूचना अधिकारी की महत्वपूर्ण सौंप दी जाती है।

श्री सक्सेना ने बड़े सहज ढ़ग से माना कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के स्तर पर गड़बडी कम नहीं। 90 प्रतिशत प्रथम अपीली अधिकारी काम नहीं करते। वे या तो शिकायतों पर सही निर्णय नहीं देते या फिर जनसूचना अधिकारी की दलीलों को सही मान लेते है। यही वजह है कि सूचना आयोग में शिकायतों की भरमार बढ़ती जा रही है। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से माना कि सूचना आयोग वास्तव में सिर्फ 25 प्रतिशत मामलों में न्याय कर पा रहा है। आयोग में 30 हजार से ज्यादा मामले लम्बित है। मगर जब इस कानून के प्रति जागरूकता बढ़ेगी तो इन लम्बित मामलों की संख्या और बढ़ जाएगी। उन्होंने स्वीकार किया कि सूचना अधिकार कानून दण्ड के प्रावधान प्रभावी नहीं, शायद यही वजह है कि बहुत सारे लोग जुर्माना भरने से डरते नहीं।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि इन्दरा गांधी केन्द्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के कुलपति प्रो. सीडी सिंह ने सूचना अधिकार कानून को देश का सबसे महत्वपूर्ण कानून माना। कहा सूचना का अधिकार कानून तब मजबूत कहा जायेगा जब भारत का प्रत्येक नागरिक इस अधिकार का प्रयोग करना प्रारंभ करेगा। उन्होंने कहा इस कानून में जहां भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करना शुरू किया है, वहीं कुछ स्वार्थी लोगों ने इसे व्यवसाय बना लिया है। आज आरटीआई कानून के डर के कारण ही अधिकारी बच-बच कर कर काम कर रहे हैं। इससे सरकारी कार्यालयों में कुछ सुधार दिखने लगा है। उन्होंने कानून की कुछ कमियों का भी उल्लेख किया और कहा कि थर्ड पार्टी प्रावधान का फायदा अब अफसरशाह उठा रहे है। सूचना मांगने वाले भी सुरक्षित नहीं रहे। उन्होंने पूणे में एक सूचना अधिकार कार्यकर्ता के हत्या व दूसरे पर प्राणघातक हमले का उल्लेख भी किया। ये भी कहा कि इन सब के बावजूद सूचना के अधिकार ने आज आम आदमी को उन लोगों से लड़ने की शक्ति दी है, जिनसे लड़ने के बारे में वो कभी सोच भी नहीं सकता था।

विशिष्ट अतिथि के रूप में इंडिया टुडे के सह सम्पादक एवं सूचना अधिकार पर यूरोपियन के लोरेंजो नटाली पुरस्कार प्राप्तकर्ता सूचना अधिकार कार्यकर्ता श्यामलाल यादव ने विस्तारपूर्वक बताया कि आज सूचना अधिकार से मीडिया को कितनी शक्ति मिल गयी है। उन्होंने मीडिया के लोगों से इसका अधिक से अधिक उपयोग करने तथा भ्रष्ट नेताओं एवं नौकरशाहों को बेनकाब करने की अपील की। श्यामलाल ने ये भी बताया कि अब तक वो अकेले 2000 से ज्यादा आवेदन विभिन्न मंत्रालयों एवं कार्यालयों में दे चुके हैं। उन्हीं के आवेदन पर मिली सूचना का परिणाम था कि मंत्रियों और अफसरों के विदेश दौरों में हो रही फिजूलखर्ची का खुलासा हुआ। एलआईसी को भी बंद हो चुकी पॉलसियों पर अपनी नीति बदलनी पड़ी। श्यामलाल ने ये कहते हुए चुटकी ली कि कम से कम उन्हें सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर विश्वास नहीं है। ये भी कहा कि सूचना आयोग के लोग ही आज सूचना अधिकार के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

अन्य विशिष्ट अतिथि के रूप में पांचजन्य के सम्पादक बलदेव भाई शर्मा ने भी सूचना अधिकार पर अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए सूचना अधिकार कानून 2005 को भारत के सबसे बड़े क्रान्तिकारी कानून की संज्ञा दी। ये भी कहा कि देश में सिर्फ यही एक कानून है जो सरकारी मशीनरी को सामाजिक सरोकार पर मजबूर कर सकता है। डीडी न्यूज के प्रस्त्रोता अनिल दुबे ने कहा कि नागरिक सूचना अधिकार कानून को अपना दायित्व मानकर इसका उपयोग करें। उन्होंने ये भी माना कि भ्रष्ट नेता और नौकरशाह इस कानून की धार कमजोर करने के प्रयास में लगातार लगे हैं मगर यदि जनता जागरूक रही तो उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पायेंगे।

अध्यक्षता करते हुए महात्मा काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. अवध राम ने कहा कि आरटीआई कानून के फायदे तो हैं मगर ये भ्रष्टाचार समाप्त करने का प्रभावी हथियार नहीं बन सका है। ये भी ध्यान देने की जरूरत है कि कानून का उपयोग दूसरों को परेशान करने में न हो। जैसाकि अक्सर देखने में आता है। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर आरटीआई के जरिये परेशान करने के मामलों की चर्चा भी की।

प्रारंभ में संस्थान के निदेशक एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी के चेयरमैंन प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने विषय स्थापना करते हुए बताया कि वाराणसी में सूचना के अधिकार पर ये अब तक का सबसे बड़ा सेमिनार है, जिसमें 8 राज्यों के 25 विश्वविद्यालयों के अध्यापक, शोध छात्रों छात्रों के अलावा स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया से जुड़े 250 से ज्यादा लोग प्रतिभाग कर रहे हैं। इस सेमिनार में 100 से ज्यादा रिसर्च पेपर भी पढ़े जाएंगे। संचालन प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के डीन प्रो. राम मोहन पाठक ने किया। समारोह में भड़ास डाट काम के यशवंत सिंह, चित्रकूट विश्वविद्यालय के प्रो. वीरेन्द्र व्यास, रोहतक वि.वि. के प्रो. हरीश कुमार, पूर्वांचल वि.वि. अध्यापक संघ के अध्यक्ष डा. देवेन्द्र नाथ सिंह, बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान के वशिष्ठ नारायण सिंह भी मौजूद रहे।

संगोष्ठी के दूसरे चरण में दो समानांतर सत्रों का आयोजन भी हुआ। इसमें प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. बीआर गुप्ता ने की। मुख्य वक्ता डा. आनंद प्रधान व संयोजक डा. गोविन्दजी पाण्डेय रहे। इस सत्र में सूचना का अधिकार एवं भ्रष्टाचार विषय पर डा. अमित सिंह, योगेन्द्र पाण्डेय, शाश्वत मिश्रा, संदीप कुमार राय, निशांत कुमार राय, जागृति प्रशांत कुमार अजय कुमार आदि ने शोध पत्र पढ़े। रिपोटिंग डा. कौशल कुमार पाण्डेय ने की।

द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. एके आजमी ने की, जबकि मुख्य वक्ता विभव कुमार एवं संयोजक डा. दुर्गेश त्रिपाठी रहे। यहां सूचना का अधिकार एवं सामाजिक परिवर्तन विषय पर डा. विवेक कुमार सिंह, डा. अरविन्द, डा. राजेन्द्र सिंह, डा. धर्मेन्द्र पटेल, आशीमा सिंह गुरेजा, साधना श्रीवास्तव, शशांक शेखर चतुर्वेदी, जिनेश कुमार, दिग्विजय सिंह राठौर, आशीष त्रिपाठी ने शोध पत्र पढ़े। रिपोर्टिंग डा. प्रतिभा शर्मा ने की। प्रेस विज्ञप्ति

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