हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश पुलिस ऐसोसिएशन के नाम से गठित किये गये संगठन ने राज्य के आला पुलिस अफसरों की नाम मे दम कर दिया था। पुलिस के आला अफसरों ने इस संगठन के गठन से पहले ही इस संगठन से जुड़ने जा रहे पुलिस अफसरों पर अनुशासनहीनता के नाम से कार्रवाई करनी शुरू कर दी थी और जैसे ही चंद पुलिसजन संगठन के पदाधिकारी बने तो फिर बड़ी कार्रवाईयों की शुरुआत कर दी गई।
इसी संगठन के प्रवक्ता और प्रदेश उपाध्यक्ष सुबोध यादव को निलंबित तो पहले ही कर दिया गया था, अब बर्खास्त करने की पूरी तैयारी कर ली गई है। सुबोध यादव को बर्खास्त करने से पहले नोटिस दे दिया गया, जिस में सुबोध से नोटिस का जबाब मांगा गया है और जैसे ही नोटिस का जबाब दिया जायेगा, वैसे ही सुबोध यादव को बर्खास्त कर दिया जायेगा।
सुबोध को दिये गये बर्खास्तगी नोटिस के अनुसार आरोपी आरक्षी 1545 सुबोध कुमार जो अनुभाग आगरा मे नियुक्त था, का स्थानान्तरण अपर पुलिस महानिदेशक रेलवे उप्र लखनऊ के आदेश संख्या पीआर-13-36/11(789) दिनांक 20-01-11 के आदेश के तहत गोरखपुर कर दिया गया, लेकिन सुबोध ने वहां जाने की बजाय पुलिस संगठन के हितों में काम करना ज्यादा मुनासिब समझा और इसी परिप्रेक्ष्य में सुबोध के खिलाफ बर्खास्तगी की कारवाई तय मानी जा रही है।
इटावा में सुबोध यादव ने बर्खास्तगी नोटिस की प्रति को दिखलाते हुये कहा कि यह तो होना ही था। अधिकारी पहले से ही उसके खिलाफ बड़ी कार्रवाई का मन बनाये हुये थे और बर्खास्तगी से बड़ी कोई कार्रवाई क्या हो सकती है? सुबोध का कहना है कि मेरे पास सारे विकल्प खुले हुये हैं, जैसे ही बर्खास्तगी की कार्यवाही की जायेगी सीधे अदालत के जरिये बहाली होकर सामने आऊंगा क्यों कि मेरे खिलाफ की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है, इस कार्रवाई को पुलिस अमले का महाभ्रष्ट स्पेशल डीजीपी बृजलाल और रेलवे में एडीजे एके जैन के इशारे पर कार्रवाई को अमल में लाया जा रहा है।
इससे पहले सुबोध को तब निलंबित कर दिया गया था जब यूपी पुलिस ऐसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र यादव का इटावा में उनका सर्मथकों की ओर से आगमन के दौरान जोशीला स्वागत कराया गया था। खुफिया रिर्पोटों के आधार पर सुबोध यादव को निलंबित कर दिया था। सुबोध यादव ने बताया कि साल 2011 के 15 जनवरी को यूपी पुलिस वेलफेयर ऐसोसिएशन के गठन की खबरें विभिन्न अखबारों में आना शुरू हो गई थी, मुझे संगठन में प्रदेश उपाध्यक्ष का पद दिया गया। इसी बीच 20 जनवरी को अपर पुलिस महानिदेशक रेलवे एके जैन ने मेरा ईएल अवकाश, जो 30 दिनी स्वीकृत था, को भी बिना किसी पूर्व सूचना दिये बीच में निरस्त कर जीआरपी गोरखपुर के लिये कार्यमुक्त कर दिया, लेकिन बाद में मिले सरकारी दस्तावेजों के आधार पर पता चला कि गोरखपुर के लिये तबादला कर दिया गया है, जब कि इस समय बीमारी के कारण मैंने ईएल अवकाश लेने के बाद घर पर रह कर उपचार करा रहा था।
सुबोध को मात्र 24 घंटे के भीतर ही गोरखपुर जा कर आमद कराने का आदेश दिया गया जब कि शासनादेश है कि एक सप्ताह का वक्त आमद के लिये मिलता है, ऐसे में सुबोध के खिलाफ आईपीएस अफसरों का उत्पीड़नात्मक रवैया यहीं से परीलक्षित हो गया था। 3 फरवरी को राजकीय रेलवे पुलिस, गोरखपुर के एसपी अमिताभ यश की ओर से निलंबित कर दिया गया है। राजकीय रेलवे पुलिस गोरखपुर अनुभाग के एसपी अमिताभ यश की ओर से 22 मार्च को पत्र सख्यां एस-29/2011 सुबोध को गुण दोष पर विचार किये बिना तत्काल प्रभाव से बहाल कर दिया गया। 2 मार्च को एक बार फिर से सुबोध को निलंबित कर दिया गया है।
सुबोध को पुलिस सेवा मे 16 साल काम करते हुये हो गये हैं और अपने हक की बात कहना क्या बुरा है? सुबोध का आरोप है कि आईपीएस अफसरों की घोटालेबाजी को लेकर आरटीआई का इस्तेमाल करना और पुलिस संगठन में काम करना आईपीएस अफसरों को रास नहीं आ रहा है, इसी लिये निलंबन जैसी कार्रवाई करके उत्पीड़न करने में लग गये है और गैर कानूनी ढंग से मेरे खिलाफ अब बर्खास्तगी का दस्तावेजी कार्रवाई तैयार करने में लग गये हैं। सुबोध का कहना है कि अपने खिलाफ की जा रही बर्खास्तगी की कार्रवाई को लेकर उच्च न्यायालय की शरण लेंगे ताकि आईपीएस अफसरों को बेनकाब किया जा सके।
सुबोध यादव ने आरटीई डालकर ली जानकारी : पुलिस विभाग में हर साल करोड़ों की धांधली का खुलासा हुआ है। यह रकम है लावारिस मुर्दों की, इसे भी विभाग के अफसर नहीं छोड़ रहे हैं। वे हर साल इस मद की रकम हड़प जाते हैं और खमियाजा भुगतते हैं दरोगा और सिपाही, जो इन लावारिस शवों का पोस्टमार्टम व अंतिम संस्कार कराने जाते हैं। बरसों से हो रही ज्यादती के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुबोध यादव ने आवाज उठाई है और उन्होंने प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह से उत्तर प्रदेश पुलिस के चार लाख अराजपत्रित पुलिस कर्मियों के लिए न्याय की मांग की है।
उत्तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता सुबोध यादव ने जनसूचना अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया से जानकारी मांगी थी कि लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए शासन द्वारा क्या व्यवस्था मुकर्रर की गई है और इस मद में कितना धन दिये जाने का प्रावधान है. लम्बी टालमटोल के बाद पुलिस विभाग ने 5 जुलाई 2010 में एक पत्र और शासनादेश की छाया प्रति, जो प्रदेश के महामहिम राज्यपाल द्वारा जारी है, के द्वारा न सिर्फ उनकी शंकाओं का निवारण हुआ, बल्कि बेहद चौंकाने वाली जानकारी भी मिली. पुलिस मुख्यालय के जनसूचना अधिकारी अशोक कुमार अपर पुलिस अधीक्षक ने जानकारी दी कि शासनादेश संख्या स०- 1753/26-2-99-500(13)/99 दिनांक 16 जुलाई के तहत यह राशि 500 रुपये थी, यह व्यवस्था 17 नवम्बर 2008 से लागू की गयी थी, जिसे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के साथ प्रदेश के वित्त विभाग ने भी मंजूरी दी थी।
महंगाई दर में लगातार वृद्धि के कारण 17 नवम्बर 2008 के शासनादेश संख्या. डब्लू- 1733/ 6-पु-08-1500 (11) 98 टीसी -11 दिनांक 17 नवम्बर 2008 द्वारा 1500 रुपया कर दी गयी थी. आदेश में प्रदेश के महामहिम राज्यपाल ने खर्च का वर्गीकरण भी किया था, जिसके तहत 1500 रुपये में 200 रुपये कफन के 6 मीटर कपडे पर, 900 रुपये शव दहन की लकड़ी या कब्र की खुदाई पर और बाकी 400 रुपये शव को कब्रिस्तान या श्मशान ले जाने के किराये पर खर्च के लिए निर्धारित किये गये थे।
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद सुबोध यादव ने बताया कि उन्होंने आज प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को एक शिकायती प्रार्थना पत्र भेजा है, जिस में प्रदेश के 4 लाख पुलिसकर्मियों के साथ हो रही ज्यादती पर न्याय करने की मांग की है। इसी प्रार्थना पत्र में सुबोध यादव ने कहा है कि प्रदेश के पुलिस कर्मियों को नहीं पता है कि लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए शासन द्वारा 1500 रुपये प्रदत्त किये जाते हैं। थोड़े पुलिस कर्मियों को रुपये मिलने का तो पता है मगर यह पता नहीं है कि इस मद में कितना भुगतान निर्धारित है। इस रकम के लिए मोटी लिखा-पढ़ी और लम्बे इन्तजार आईपीएस अफसरों से स्थानान्तरण विभागीय कार्रवाई के डर से पुलिसकर्मीं शासन के रुपयों का लालच छोड़ देते हैं और अपनी जेब से रुपया खर्च कर लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराते हैं। बर्खास्तगी के मुहाने पर खडे़ सुबोध यादव का कहना है कि चाहे कोई भी कार्रवाई की जाये वो अपने मिशन से पीछे हटने वाले किसी भी सूरत में नहीं है।
इटावा से दिनेश शाक्य की रिपोर्ट.












Ravi Kumar Singh
August 20, 2011 at 5:07 pm
police ko anshashit hona jaruri ha. is liya unionbaj karamchariyo ki bharkhastgi swagat yogya kadam ha.
devendra
August 24, 2011 at 8:30 pm
bahut accha kam kiya hai subodh bhai ne yuhi ek din jarur safalta milegi. or in ips afsaro ko bhi saja milna tay hai.