विश्लेषण
क्या रामकृपाल वीओआई को बाय-बाय बोलेंगे?
वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह को जिस तरह ग्रुप एडीटर पद से हटाकर ग्रुप डायरेक्टर न्यूज बनाया गया और उनके अधीन काम करने वाले रविशंकर को ग्रुप एडीटर का ताज पहना दिया गया है, उसके बाद से ये कयास लगाए जाने लगे हैं कि रामकृपाल वायस आफ इंडिया को बाय बाय बोल सकते हैं। त्रिवेणी के मीडिया प्रोजेक्ट में एक-एक ईंट जोड़ने वाले और वायस आफ इंडिया को लांच कराने वाले रामकृपाल सिंह इससे पहले लंबे समय तक प्रोफेशनल मीडिया हाउसों के साथ काम कर चुके हैं।
टाइम्स ग्रुप और टीवी टुडे समूह के साथ लंबी पारी खेलने वाले रामकृपाल पहली बार किसी गैर मीडिया समूह से जुड़े जो मीडिया हाउस बनने का सपना पाले है। त्रिवेणी समूह के पास मीडिया का इससे पहले कोई अनुभव नहीं रहा है। और इस अनुभवहीनता के चलते मीडिया के प्रति नजरिया पेशेवर नहीं है। इसी गैर-पेशेवर नजरिए के चलते हाल के दिनों में जितने भी नए चैनल लांच हुए हैं, वो चाहे इंडिया न्यूज हो या वायस आफ इंडिया, वहां उथल-पुथल मची हुई है। चैनल लांच होने के तुरंत बाद लांच करने वाली टीम और उसके हेड को कठघरे में खड़ा करने का अभियान शुरू कर दिया जाता है। इन चैनलों के मालिकों की पृष्ठभूमि मीडिया की न होने का लाभ कई लोग उठाने लगते हैं। तुरत-फुरत सुपरहिट मीडिया हाउस बनने का सपना इन मालिकों में अधैर्य पैदा कर देता है।
नतीजन ये हर तरह की लाबिंग व गुटबाजी को प्रश्रय देने लगते हैं और एक तरह से पुरानी टीम को साइडलाइन करने की कवायद शुरू कर देते हैं। इसी के नतीजे में इंडिया न्यूज में कभी चालीस लोग निकाल दिए जाते हैं तो कभी पहले निकाले गए वरिष्ठों को बड़े बड़े पदों पर वापसी करा दी जाती है। कुछ ऐसा ही वायस आफ इंडिया में होने जा रहा है। यहां जो माहौल बन गया है, मालिक और नए समूह संपादक न्यूज रूम में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं, उसमें यह पूरी तरह तय हो चुका है कि अब यहां जितने भी पेशेवर पत्रकार हैं, वे देर सबेर अपना नया बसेरा बसायेंगे। जिनके अंदर पत्रकारिता को लेकर थोड़ी बहुत भी आग होगी, वे इस माहौल में कतई न टिक सकेंगे।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि त्रिवेणी के मीडिया प्रोजेक्ट को मीडिया जगत में इसलिए भी गंभीरता से लिया गया क्योंकि इसे रामकृपाल सिंह जैसा पत्रकार हेड कर रहा था। रामकृपाल के नाम के चलते इस मीडिया प्रोजेक्ट से कई अच्छे और पेशेवर वरिष्ठ पत्रकार जुड़े़। अब जबकि रामकृपाल के यहां से जाने की चर्चा है, ये सारे वरिष्ठ व पेशेवर पत्रकार भी एक एक कर निकल जाएंगे। फिर बचेंगे तलछट जो मालिक की मुख मुद्रा के अनुरुप चैनल को दिशा देंगे और यह दिशा कैसी होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है।
जब मालिक ‘ठोक दूंगा’ और समूह संपादक ‘मैं बेहद बदतमीज हूं’ जैसी भाषा का इस्तेमाल अपने पत्रकारों के सामने करेगा तो ‘बाकी सब भ्रम, मैं खबर हूं’ जैसे खर्चीले ब्रांडिंग कंपेन का हश्र क्या होगा, इसका सिर्फ अंदाजा भर लगाया जा सकता है। और इससे यह भी पता चलता है कि खुद को गंभीर चैनल बनाने की खातिर प्रयास कर रहा यह त्रिवेणी समूह अंदर से उसी सतही सोच व समझ का शिकार है जो अन्य नए चैनलों व उसके कर्ताधर्ताओं के दिल-ओ-दिमाग में है।
आखिर चैनल के पर्दे पर जिस सच व लोकतंत्र के लिए इतना हाय-हाय किया जाता है, उसी चैनल के पीछे इन मानदंडों की कुछ तो कद्र की जानी चाहिए वरना मीडिया हाउस बनने का सपना लेकर आए सभी नवधनाढ्य अपने-अपने चैनलों को सिर्फ अपने मन-बहलाव और दिल को खुश रखने का साधन मात्र बनाकर रह जाएंगे।
मुद्दा यहां रामकृपाल नहीं हैं, मुद्दा है नए चैनलों में वर्क कल्चर और चौथे स्तंभ के रूप में इनकी दशा-दिशा का। रामकृपाल जैसे तो किसी बड़े व प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में फिर से वापस लौट जाएंगे लेकिन ये जो नए नए मीडिया हाउस तैयार हो रहे हैं, वे उसी खोखली नींव पर खड़े नजर आएंगे जिसमें सत्ता की तरफ से इशारा होगा झुकने के लिए तो ये रेंकते और रेंगते नजर आने लगेंगे। और ये इसलिए भी संभव है क्योंकि जब मीडिया हाउस बनने का सपना ही सत्ता से नजदीकी बढ़ाने व लाभ पाने की नीयत से देखा गया हो तो फिर इन मीडिया हाउसों में तेवरदारों की बजाय मीडियाकरों को ही तवज्जो दी जाएगी।
जो भी हो, हिंदी मीडिया बाजार में आने वाले दिन उथल-पुथल भरे होंगे और कई नाटकीय उलटफेर देखने को मिलेंगे। तमाशाइयों के लिए अच्छा समय है।











