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उग्र वामपंथ के मुद्दे पर वर्धा घोषणा पत्र जारी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने ‘भारत में उग्र वामपंथ के मुद्दे’ विषय़ पर एक घोषणा पत्र जारी कर समस्या के समाधान की प्रत्याशा में राष्ट्रीय पहल की है। विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय के निमंत्रण पर देशभर से आए चिंतकों ने  गत 30 व 31 मार्च 2011 को इस विषय पर गंभीर विमर्श करने के बाद यह घोषणा पत्र जारी किया।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने ‘भारत में उग्र वामपंथ के मुद्दे’ विषय़ पर एक घोषणा पत्र जारी कर समस्या के समाधान की प्रत्याशा में राष्ट्रीय पहल की है। विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय के निमंत्रण पर देशभर से आए चिंतकों ने  गत 30 व 31 मार्च 2011 को इस विषय पर गंभीर विमर्श करने के बाद यह घोषणा पत्र जारी किया।

न्यायमूर्ति पीवी सांवत, प्रो. राम दयाल मुंडा, असगर अली इंजीनियर, संदीप पांडेय, विभूतिनारायण राय, राधा भट्ट, वासंती रामन, शीतला सिंह, एचएस सक्सेना, रमेश दीक्षित, आलोक धन्वा, गिरीश मिश्र, प्रो. ए अरविंदाक्षन, शमसुल इस्लाम, प्रो. नदीम हसनैन, इलीना सेन, समेत शताधिक अध्येता दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन पर आम सहमति से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि-

१. देश के विभिन्न भागों विशेषकर जनजातिबहुल इलाकों में जनजातीय संस्कृति विकास की मौजूदा अवधारणाओं के कारण संकटग्रस्त है। विभिन्न जनजातीय समूह, भारतीय राज्य की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक नीतियों के कारण स्वयं को उपेक्षित और उत्पीड़ित महसूस करते हैं। राज्य के द्वारा जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन औद्योगिक कारपोरेट घरानों के हित में किए जाने के कारण भी इन क्षेत्रों की जनता, भारतीय राज्य से अपने को अलग-थलग मानने लगी है। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय आदिवासी समूहों के स्वामित्व को राज्य द्वारा औपचारिक स्वीकृति प्रदान करने और नीति निर्माण की प्रक्रियाओ में स्थानीय जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने से ही राज्य और जनसामान्य के बीच का अलगाव खत्म किया जा सकता है।

२. जनजातियों समेत समाज के विभिन्न तबके पूंजीवादी विकास की मुख्यधारा से निरंतर बाहर छूटते जा रहे हैं और समाज के पिछड़े और संपन्न तबकों के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य की नव उदारवादी नीतियों का लाभ केवल उच्चमध्य वर्ग तक ही सिमट कर रह गया है। हाशिये के समूहों के द्वारा न्याय और बराबरी के आधार पर राष्ट्रीय संसाधनों में अपनी भागीदारी की सर्वथा विवेक सम्मत मांगों के प्रति राज्य का रवैया असहिष्णु और लगभग दमनात्मक होता गया है, ऐसा विश्वास इन समूहों में हाल के दिनों में गहराई से पैठ बना रहा है।

३. वर्धा संवाद, राज्य और जनजातीय समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास और अलगाव को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती मानते हुए राज्य और जनजातीय समूहों के बीच विभिन्न नागरिक संगठनों के माध्यम से तत्काल संवाद शुरू किए जाने की जरूरत को रेखांकित करता है। इस संवाद का मानना है कि इस तरह का कोई भी संवाद शुरू करने की पहल राज्य की ओर से होनी चाहिए। राज्य द्वारा चलाए जा रहे आपरेशन ग्रीन हंट पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही हथियारबंद संगठनों को भी अपनी हिंसात्मक गतिविधियां तत्काल बंद कर देनी चाहिए।

वर्धा

४. वर्धा संवाद में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि जनजातीय संस्कृतियां देश के लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर भी स्वयं को आहत और उपेक्षित महसूस करती हैं क्योंकि उन्हें उनके अपने भौतिक परिवेश और पर्यावरण से विस्थापित करने की नीतियों ने उन्हें विकास के वैकल्पिक रूपों के बारे में सोचने और संगठित होकर राज्य की मौजूदा नीतियों का विरोध करने के लिए बाध्य कर दिया है। अत: जनजातीय क्षेत्रों की विशिष्टता को बरकरार रखते हुए उनके पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी ली जाए।

५. वर्धा संवाद की आम सहमति है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और प्रतिरोध के लिए पर्याप्त जगह बनी रहनी चाहिए और राज्य को असहमति के स्वरों के प्रति असहिष्णुता का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। इसके साथ ही विभिन्न जनसमूहों को राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों से अपनी असहमति और विरोध, शांतिपूर्ण तरीकों से ही व्यक्त करने चाहिए। किसी भी तरह की हिंसा सही और न्यायोचित जनआंदोलन को भटकाव के रास्ते पर डाल देती है। समूहों की हिंसा, राज्य की दमनात्मक संस्थाओं द्वारा की जा रही हिंसा को प्राय: वैध ठहराने का बहाना बन जाती है और कई बार राज्य की एजेंसी द्वारा की गई हिंसा समूहों को प्रतिहिंसा करने का अवसर प्रदान कर देती है।

६. देश के सभी हिस्सों विशेषकर जनजातीय इलाकों में वन अधिकार कानूनों तथा भूमि कानूनों में समुचित संशोधन कर स्थानीय लोगों को जंगलों तथा अन्य खनिज पदार्थों पर पूर्ण स्वामित्व प्रदान किया जाए और स्थानीय जनता की सहमति से ही उन इलाकों में विकास के किसी भी योजना को लागू किया जाए। यदि वहां स्थानीय जनता की सहमति से कभी विकास की वैकल्पिक मॉडल के अनुरूप कोई परियोजना लगाई जाती है तो उसमें स्थानीय आबादी को बराबरी के आधार पर परियोजना के स्वामित्व में भागीदारी प्रदान की जाए। आवश्यकता इस बात की है कि इन इलाकों में विकास के संभावित मॉडलों पर स्थानीय आबादी के प्रतिनिधियों से नए सिरे से बातचीत की जाए और स्थाई और टिकाऊ विकास की परियोजनाएं प्रारंभ की जाएं। इस प्रक्रिया में नीति-निर्माण की प्रक्रिया का पूरी तरह विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए ताकि निर्णय के हर स्तर पर जनता की भागीदारी बनी रहे।

७. वर्धा संवाद में चर्चा हुई कि विकास की प्रक्रिया में जनजातीय इलाकों में उनके जीवन-यापन के संसाधनों का गंभीर क्षरण हुआ है। इन इलाकों के आदिवासी समुदाय विकास की प्रक्रिया के शिकार हुए हैं। अत: उनके जीवन-संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

८. देश के विभिन्न हिस्सों में स्वाधीनता आंदोलन और भारतीय संविधान में उल्लिखित मूल्यों के खिलाफ बनाए गए और लागू किए जाने वाले कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाए और संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किए गए लक्ष्यों को तत्काल अमल में लाया जाए और संविधान की प्रस्तावना तथा संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए।

९. जनजातीय क्षेत्रों में जनजातीय कलाओं और उनकी देशज सांस्कृतिक धरोहर, कृषि संबंधी जानकारी, औषधि संबंधी ज्ञान तथा देशज हुनर को सकारात्मक बढ़ावा दिया जाए और उनकी बौद्धिक संपदा का समुचित दस्तावेजीकरण किया जाए। उक्त निष्कर्षों को ही वर्धा घोषणा पत्र का नाम दिया गया है। प्रेस विज्ञप्ति

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0 Comments

  1. om prakash gaur

    April 3, 2011 at 12:03 pm

    हम हिंसा और नक्सलवाद को ठुकराते हैं. सारी भाषा मात्र मुखोटा है. गाँधी का देश किसी भी उद्देश्य लक्ष्य विचारधारा के समर्थन के लिए हिंसा को स्वीकार नहीं कर सकता है..

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