Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

उस डीआईजी ने मुझे नक्सली घोषित कर दिया

[caption id="attachment_18623" align="alignleft" width="80"]कुशल मोरकुशल मोर[/caption]मुझे हमेशा लगता रहा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित जाता है, इसलिए मैं खुद की आंखों से पूरी तरह सच देखना-समझना चाहता था. इसी तेजी में मैं वहां से हो आये पत्रकारों और अन्य लोगों की सलाह को दरकिनार करते हुए दो दिन पहले ही भारत के उस छोटे शहर दंतेवाड़ा पहुंच गया, जहां मैंने वो बड़े सच देखे जो आज भी मुझे आश्चर्यचकित करता है. मैं यह देखना चाहता था कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री दंतेवाड़ा और देश के दूसरे इलाके में फैले माओवादियों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हैं? वहीं इसके विपरीत बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय 10 ह़जार शब्दों का एक निबंध लिखती हैं और माओवादियों का यशगान करती हैं. जबकि वे सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवानों को मार चुके हैं. मैं यह देखने के लिए उत्सुक था कि यह अनजान सी जगह आखिर क्यों देश में पिछले कुछ महीनों से चर्चा के केंद्र में है.

कुशल मोर

कुशल मोर

मुझे हमेशा लगता रहा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित जाता है, इसलिए मैं खुद की आंखों से पूरी तरह सच देखना-समझना चाहता था. इसी तेजी में मैं वहां से हो आये पत्रकारों और अन्य लोगों की सलाह को दरकिनार करते हुए दो दिन पहले ही भारत के उस छोटे शहर दंतेवाड़ा पहुंच गया, जहां मैंने वो बड़े सच देखे जो आज भी मुझे आश्चर्यचकित करता है. मैं यह देखना चाहता था कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री दंतेवाड़ा और देश के दूसरे इलाके में फैले माओवादियों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हैं? वहीं इसके विपरीत बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय 10 ह़जार शब्दों का एक निबंध लिखती हैं और माओवादियों का यशगान करती हैं. जबकि वे सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवानों को मार चुके हैं. मैं यह देखने के लिए उत्सुक था कि यह अनजान सी जगह आखिर क्यों देश में पिछले कुछ महीनों से चर्चा के केंद्र में है.

दंतेवाड़ा नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर का एक इलाका है. यह भारतीय माओवादियों का येन्नान है. अगर येन्नान ने चीनी क्रांति के लिए माओ को सफलता का रास्ता दिखाया था, तो भारतीय माओवादी आदिवासियों में फैले असंतोष को क्रांतिकारी उत्साह में बदलने के लिए दंतेवाड़ा को आदर्श जगह मानते हैं. राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने के लिए सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत इसी गरीब और पिछले इलाके से हुई है. दंतेवाड़ा में रुकने के दौरान लगा कि केंद्र सरकार ने जल्दबाज़ी में अर्धसैनिक बलों को तैनात करने का फैसला लिया है. यहां कश्मीर और वियतमान की तरह सैन्य शिविर स्थापित करने की शुरुआत हो गयी है और सलवा जुडूम के लोगों को कंधे पर बंदूक लटकाए हमेशा घूमते हुए देखा जा सकता है. मगर यहां के लोगों के लिए यह एक बहुत सी सामान्य बात है. सामान्य बातों को कुछ दिन तक समझने-बूझने के बाद मैंने एक दूर-दराज के गांव में जाने का फ़ैसला किया.

गांव जाने के लिए मैं पूरे दिन बस स्टैंड पर गाड़ी का इंतजार करता रहा, लेकिन जब तक वह आई तब तक शाम के पांच बज चुके थे. अंधेरा घिर आया था. कई लोगों ने मुझे सलाह दी बेहतर होगा कि मैं अपना समय होटल में ही रहकर बिताऊं. फिर मैंने दंतेवाड़ा के डीआईजी से मिलने का फैसला किया. मैं यह जानना चाहता था कि नक्सल समस्या पर उनके विचार क्या हैं. उनसे मिलने जाते हुए हथियारबंद गार्डों ने मुझे दो बार रोककर पूछताछ की. उसके बाद मुझे अंदर जाने दिया. ऐसा करते-करते मैं पुलिस थाने के दरवाजे तक पहुंच गया था, तभी डीआईजी कल्लुरी खुद बाहर आए. उन्हें नमस्कार कर मैंने अपना परिचय कुछ यूं दिया- “मैं एक वकील हूं और दंतेवाड़ा में नक्सल समस्या को समझने के लिए मुंबई से यहां आया हूं.” इस पर कल्लूरी ने मुझे यहां से (दंतेवाडा) चले जाने कहा और बोले -“दंतेवाड़ा कोई पर्यटन स्थल नहीं है.” उनके इस रुखे व्यवहार के लिए मैं मानसिक रूप से पहले से ही तैयार था. मैंने उनसे कहा कि मामले की गंभीरता को मैं समझ सकता हूं. मुझे लगता है कि यह बातचीत के लिए माकूल समय नहीं है, जब आपके पास समय होगा तो मैं फिर आ जाऊंगा.

इसके कुछ क्षण बाद ही डीआईजी कल्लुरी ने बड़बड़ाते हुए कहा, “संदेहास्पाद, बहुत संदेहास्पद.” मैं समझ नहीं पाया कि उनका मतलब क्या था. एक पल को लगा कि उनके मन में किसी पहेली का एक हिस्सा सुलझ गया है. उन्होंने कहा, “मुझे लग रहा है कि तुम एक नक्सली हो.’’ उनकी इन बातों पर मेरे कान बहुत मुश्किल से विश्वास कर पाए. उन्होंने अपने गार्डों को बुलाया और मुझे अंदर आने देने के लिए डांटते हुए कहा, “तुम लोगों ने नहीं देखा कि यह एक नक्सली मुखबिर है. मैं सौ फीसदी कहता हूं कि यह मुखबिर है. ऐसे लोगों को गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) और नक्सली इस बात का पैसा देते हैं कि वह थानों की खबर उन तक पहुचाएं. इसलिए इसे बंद कर अच्छी तरह देखभाल करो.”

कल्लूरी के इस आरोप के बाद मैंने अपनी पूरी क्षमता से यह बताने में लगा दी कि मैं मुंबई से आया एक वकील हूं, पर हमारी एक नहीं सुनी गयी और मुझे दो मिनट के भीतर ही नक्सली बता दिया गया. इससे भी बुरी बात यह कि उन्होंने मेरे साथ एक बड़े अपराधी जैसा व्यवहार करने की सजा सुना दी. शुक्र है कि गार्ड दयालु थे और उन्होंने मुझे गलियारे में इंतजार करने के लिए छोड़ दिया.

इस बीच मैंने अपनी रिहाई के लिए पागलों की तरह कुछ फोन किए. शाम करीब आठ बजे डीआईजी कल्लुरी ने पुलिस थाने से जाते हुए मुझे देखा. जाने से पहले सुरक्षा गार्ड के कान में उन्होंने कुछ फुसफुसा कर कहा. मेरे ऊपर कुछ देर तक ताने मारने के बाद गार्ड ने मुझे जाने देने का फैसला किया. मैंने शाम को जो टेलीफोन किए थे शायद उनका भी इससे कुछ लेना-देना था. लेकिन मुझे छोड़ने के मामले में बिल्ली के गले में घंटी कोई नहीं बांधना चाहता था. करीब हर पाँच मिनट बाद एक नया अधिकारी आता, कुछ पूछताछ करता और अपनी टिप्पणी करता. अंतत: गार्ड मुझे इस शर्त पर छोड़ने पर सहमत हो गए कि मेजर उनके फैसले का अनुमोदन कर दें.

शुक्र है कि मेजर उदासीन लग रहा था, उसने मुझे छोड़ने का निर्देश देते हुए कहा कि मैं फिर यहां आसपास कभी न दिखाई दूं. खासकर जंगल में. इस वाकये से मैं अंदर तक हिल गया था. पुलिस थाने से होटल तक चलकर आने में मुझे दो मिनट का समय लगा, लेकिन यह दूरी मुझे अनंतकाल से कम नहीं लगी. मेरे पास से जब भी कोई वाहन गुजरता तो मुझे लगता कि पुलिस मुझे फिर पकड़कर ले जाने के लिए आ रही है. हालांकि दंतेवाड़ा आने से पहले भी परिचितों ने मुझे इस बारे में चेतावनी भी दी थी और बता दिया गया था कि दंतेवाड़ा एक युद्धक्षेत्र है, लेकिन सच बताऊं, इसका अंदाजा अभी जो कुछ हुआ था उससे पहले बिलकुल नहीं था.

खासकर इस बात की परवाह किए बिना कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरी इस यात्रा का मकसद क्या था, मेरी बात सुने बिना उन्होंने मुझे नक्सली घोषित कर दिया था. अगर मैं यह कहूं कि पुलिस गांव जला देती है, महिलाओं के साथ बलात्कार करती है और बिना किसी कानून के वह लोगों की संपत्ति को लूटपाट करती है तो मेरे पास इस पर विश्वास करने के कारण हैं. मैं यह सोचकर कांप जाता हूं कि क्या होगा जब वे मुझे किसी जंगल में पकड़ लेंगे. मुझे लगता है कि वे मेरे बैग में कुछ डेटोनेटर और हथगोले रखेंगे. मुझे भागने का मौका देंगे और गोली मार देंगे. उसके बाद नक्सली को पकड़ने का पुरस्कार ले लेंगे. जंगल के अंदर जाने से मना करते हुए बिल्कुल यही बात सुबह मुझे एक आदमी ने बताई थी जिससे मैं मिला था.

देश के विभिन्न कोनों में लोकंतत्र के पर्यवेक्षकों ने पहले ही निष्कर्ष निकाल रखा है कि बस्तर जैसी जगहों पर पुलिस बलों को आदिवासियों के विरोध को कुचलने और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए ही तैनात किया गया है. यह जरूरी है कि मुद्दे की संवेदनशीलता को समझा जाए और समस्याओं का समाधान किया जाए. कानूनी प्रक्रिया का वहां होना जरुरी है और इसका पालन किया जाए. भले ही कभी-कभी ये असरदार साबित न हो और बेमेल दिखे. यही वजह है कि अरुंधती राय जैसी कार्यकर्ता और कई मानवाधिकार संगठन मौजूद हैं ताकि स्थिति काबू में रहे.

हालांकि मुझे शहर छोड़कर तुंरत चले जाने की सलाह दी गई, लेकिन इसके बाद भी मैंने दंतेवाडा में रात बिताने का निश्चय किया. यह रात शायद मेरी जिंदगी की सबसे कठिन रातों में से एक थी. मैं रात के दस बजे से पहले ही होटल पहुंच गया था. कई घंटों तक मुझे नींद नहीं आई और मैं ताज़ी हवा के लिए होटल की बालकनी में गया. वहां खड़े रहकर मैंने तीन दिनों में पहली बार दंतेवाड़ा में रात को ढलते देखा. शहर बंद हो चुका था, गलियाँ सूनी थीं. कोई भी शख़्स दिखाई नहीं दे रहा था. ऐसा लग रहा था कुत्तों ने भी न भौकने का निश्चय कर रखा है. दंतेवाड़ा शांत था. एक अजीब भयावह शांति चारों तरफ फैली थी. दूर से दंतेवाड़ा के घने जंगल दिखाई दे रहे थे. मैं यह सोचकर ही डर गया था कि इन जंगलों में क्या चल रहा होगा. रात की घटनाओं ने मुझे हिलाकर रख दिया था. अगली सुबह गांव जाने की योजना के बारे में मैं उधेड़बुन में था. थोड़ी देर सोचने के बाद मैंने वहां जाने का निश्चय किया. मैं खुद को अरुंधती राय नहीं समझ रहा था, लेकिन बिना इस गांव गए मेरी यह यात्रा निरर्थक होती.

लेखक कुशल मोर मुंबई हाईकोर्ट में वकील हैं. उनकी विशेज्ञता अपराध और उपभोक्ता मामलों में हैं. कुशल मोर ने यह लेख दंतेवाड़ा यात्रा के अनुभव पर लिखा है. अंग्रेजी में लिखे गए इस लेख का अनुवाद पत्रकार कुमार राजेश ने किया है. इस आलेख को जनज्वार से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. shiv shankar sarthi

    April 7, 2011 at 6:09 pm

    MOR SAHAB KASH HAMARE MUKHYMANTRI AAPKA LEKH PAD PATE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...