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एक अनामंत्रित पत्रकार का उलाहना और छोटी सी गुज़ारिश

[caption id="attachment_20783" align="alignleft" width="94"]मुकेश कुमार मुकेश कुमार[/caption]आदरणीय, प्रधानमंत्री जी, मुझे बहुत खेद है कि संपादकों से मुलाकात में आपने मुझे आमंत्रित नहीं किया जबकि मैं उन तमाम कसौटियों पर खरा उतरता हूँ जिसके आधार पर आप पत्रकारों को बातचीत के लिए बुलाते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आपने ऐसा क्यों किया होगा पर लगता है किसी ने मेरे ख़िलाफ़ आपके कान भरे हैं।

मुकेश कुमार

मुकेश कुमार

आदरणीय, प्रधानमंत्री जी, मुझे बहुत खेद है कि संपादकों से मुलाकात में आपने मुझे आमंत्रित नहीं किया जबकि मैं उन तमाम कसौटियों पर खरा उतरता हूँ जिसके आधार पर आप पत्रकारों को बातचीत के लिए बुलाते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आपने ऐसा क्यों किया होगा पर लगता है किसी ने मेरे ख़िलाफ़ आपके कान भरे हैं।

किसी ने ज़रूर उल्टा-सीधा कहा होगा और आपको लगा होगा कि मुझे न बुलाना ही आपके राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। मगर मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अगर आपने मुझे बुलाया होता तो मैं कतई ऐसे सवाल नहीं करता जिनसे आपको असुविधा होती या आप धर्मसंकट में फँसा महसूस करते। इसके विपरीत मेरी उपस्थिति आपको राहत ही प्रदान करती।

मैं जानता हूँ कि मेरे इतना कह देने भर से आपको भरोसा नहीं होगा इसलिए मैं बताना चाहता हूँ कि यदि आपने मुझे बुलाया होता तो मैं ये नहीं पूछता कि इतने सारे घोटालेबाज़ों के परदाफ़ाश होने के बावजूद आप नैतिकता के आधार पर पद क्यों नहीं छोड़ देते। लोगों का क्या है उनको तो बस गाल बजाने से मतलब। उनका ये बोलने में क्या जाता है कि आपका मंत्रिमंडल अली बाबा और चालीस चोर की तरह है। असल में तो आप कीचड़ में कमल की तरह खिले हुए हैं, बिल्कुल पाक-साफ़। आप तो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति हैं, लोग आपकी ईमानदारी की मिसालें देते हैं। आपकी कसमें खाकर सटोरिए दाँव लगाते हैं। कुछ भ्रष्ट लोग आपको शिखंडी की तरह इस्तेमाल करते हैं तो इसमें आपका क्या दोष।

मैं एक अदना सा पत्रकार आपके दरबार में हाज़िरी लगाने का आकांक्षी ये भी नहीं पूछता कि हर रोज़ बढ़ती महँगाई क्या आपकी नींद नहीं उड़ा देती। क्या कोई भूखा-नंगा चेहरा आपको परेशान नहीं करता और क्या आप फिर भी चैन से सोते हैं। अगर इस तरह से कोई सोचने लगे तो उसका जीना ही हराम हो जाएगा। और आपने सबका ठेका लिया है क्या… आपसे जिनके लिए जितना बन पड़ता है करते हैं, बाक़ी सबका अपना-अपना भाग्य है। आपकी नीतियों की वजह से देश के पचासों लोग अरबपति बन गए, क्या दूसरे लोग ऐसा नहीं कर सकते थे।

मैं जानता हूँ कि ये पूछने का कोई तुक नहीं है कि आपके आर्थिक सुधारों ने असमानता की जो खाई पैदा की है और बहुसंख्यक आबादी विपन्नता के दलदल में जिस तरह से समाती जा रही है, क्या उसके लिए आपको कोई अपराधबोध होता है या फिर इन क्रांतिकारी सुधारों के लिए वाहवाही आपके कानों में ध्वनित होती रहती है। ये तो मैं जानता हूँ या वही जानता है जिसे देश-विदेश के सैकड़ों दबाव झेलते और शक्तिशाली लोगों को खुश रखते हुए सरकार चलानी पड़ती है।

दरअसल, पब्लिक मेमोरी बहुत छोटी होती है। वह भूल गई है कि जब अर्थव्यवस्था संकट में थी तो आपने ही मुद्रा कोष और विश्व बैंक के साथ मिलकर रुपए की कीमत गिरा दी थी और फिर उदारवाद के ज़रिए विकास की आँधी लाकर देश को संकट से उबारा था। आपने देश के लिए इतने त्याग किए हैं कि अगर कोई ये पूछे कि बीस सालों में दस लाख किसान और करीब इतने ही मज़दूरों ने आत्महत्याएं की हैं और उसके लिए आपके द्वारा लागू की गई आर्थिक नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं तो ये आपके साथ सरासर नाइंसाफ़ी होगी और प्रश्नकर्ता की अकल पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इसलिए ये सवाल तो मैं नहीं ही करता।

आपने देश को तरक्की की राह पर ला खड़ा किया है। जगह-जगह मॉल बन रहे हैं, फ्लाई ओवर बन रहे हैं, इतने सारे हवाई जहाज़ उड़ रहे हैं, दुनिया भर की कीमती गाड़ियाँ और दूसरे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की चीज़ें आसानी से उपलब्ध हैं। अगर लोग रुकावटें न खड़ी करते तो आज भारत अमेरिका को भी पीछे छोड़ देता। ऐसे में अगर कोई कहे कि आप केवल एक वर्ग की सोचते हैं तो वास्तव में उस आदमी को अर्थव्यवस्था की कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में इस तरह के सवाल पूछकर मैं तो अपना और देश का कीमती वक्त बरबाद करने से रहा।

दरअसल, लोगों को मालूम नहीं है कि आप चौबीसों घंटे किस तरह से देश सेवा में जुटे रहते हैं। आप तो ग़रीबों की सुध लेने के लिए रातों में वेश बदलकर निकल पड़ते हो। सर्द अँधेरी रातों में मैंने खुद आपको ठंड में ठिठुर रहे लोगों को कंबल बाँटते देखा है। इन्हीं के लिए आप कभी विश्व बैंक तो कभी मुद्रा कोष के दबाव में आ जाते हो। बड़े औद्योगिक घरानों को बड़ी-बड़ी रियायतें भी आप इसीलिए देते हो कि वे आम आदमी को सस्ती चीज़ें मुहैया करवाएं। अब इसमें भला आपका क्या दोष यदि वे ऐसा न करें तो।

मौन तो विद्वतजनों का आभूषण होता है। शास्त्रों के अनुसार अल्पभाष्य गुणों का राजा है। जो कम बोलते हैं वे कम ग़लत बोलते हैं। लगता है कि लोग शायद ये कहावत भी भूल गए हैं कि अधजल गगरी छलकत जाए, भरी गगरिया चुप्पै जाए। इसलिए कोई चाहे कुछ भी कहे, मगर बड़े से बड़े मुद्दों पर भी आपके मौन धारण करने की रणनीति का कायल हूँ और इस बारे में कोई प्रश्न करने की धृष्टता मैं नहीं करने वाला था।

अब लोगों का क्या है, वे तो कुछ भी कहते हैं। आपको कठपुतली कहने वाले भूल जाते हैं कि सबके सब किसी न किसी के हाथों की कठपुतली हैं और सब किसी न किसी रिमोट से संचालित होते हैं। किसी का रिमोट कंट्रोल दस जनपथ के हाथ में है तो किसी का नागपुर में। कइयों के रिमोट कंट्रोल टाटा, बिड़ला और अंबानियों के हाथ में होते हैं। वास्तव में जो लोग आप पर ये तोहमत लगाते हैं उन्हें न तो राजनीति का ज्ञान है और न ही लोकतंत्र का।

उपरोक्त स्पष्टीकरण के बाद मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस पत्र से आपकी समस्त शंकाएं दूर हो जाएंगी और पत्रकारों के साथ अगली मुलाकात में आप बेखटके मुझे आमंत्रित करेंगे।

आमंत्रण की प्रतीक्षा में

लोकतंत्र  का सजग प्रहरी

इस व्‍यंग्‍य के लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘न्यूज एक्सप्रेस’ के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.

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0 Comments

  1. sandeep

    July 12, 2011 at 5:29 pm

    gajab hai bhai gajab hai , magar durbhagy ki is desh ki janta bahut jaldi sab kuch bhul jati hai

  2. चंदन कुमार मिश्र

    July 12, 2011 at 9:35 pm

    नहीं भाई! यह मन्नू अब भी नहीं बुलाएगा।

  3. कनिष्क

    July 13, 2011 at 4:58 am

    बहुत बढिया मुकेश जी ..इसे पढकर तो आप भूल जाइए कि कभी कोई प्रधानमंत्री आपको प्रेस कांफ्रेस में बुलाएगा …जवाब ना भी मिले सवाल उठाना तो पत्रकार का काम है सही में लोकतंत्र के सजग प्रहरी के इन सवालो को उन लोगों को तो कम से कम जरुर पढना चाहिए जिन्हें पीम अपने साथ बातचीत के लिए बुला रहे है ..
    कनिष्क

  4. Sunil Amar 09235728753

    July 13, 2011 at 4:59 am

    Badhiya likha Mukesh ji , bahut badhiya. Likhne ki yah Vidha kayi baar bade kam ki lagti hai aur behad prabhavshali bhi.
    Shukriya.

  5. devendra shukla

    July 13, 2011 at 5:00 am

    miya …aap ne billkul bja-k-frmaya…!

  6. CHANDAN SINGH

    July 13, 2011 at 6:50 am

    मुकेश सर नमस्ते

    आपने यह बिलकुल सही लिखा ….. ये बाबा का रूप धारण किये प्रधानमंत्री जी आपको कभी नहीं बुलाएगा… वो इसलिए कि आप किसी न किसी प्रकार से उनके अन्दर चल रहे राजमरा कि बातो को आप सारे आम करदेंगे…… लेकिन जो पत्रकार उनसे मिलने गए थे वो किया उनसे समझोता कर लिया …… बाबा ने बाबा ग्रुप को ही बुलाया …… उसमे आप कैसे जाते भला …….. कोई बात नहीं सर अगर बाबा को आपसे कोई आपति नहीं होगी तो आपको आगले वर जरुर मौका देंगे………

    CHANDAN SINGH
    मेजिक टीवी (पत्रकार )
    [email protected]
    SAHARSA(bihar)

  7. Anand kumar

    July 18, 2011 at 2:18 pm

    MUKESH JE
    SADAR PRANAM,
    DESH KE PM KO APNE JO APNE VYANG KE MADHYAM RAH DIKHAI HAI VASTAV ME YAH SACH HAI.
    MANMOHAN SINGH JE VASTAV ME MAZBOOT NAHI MAZBOOR PM HAIN YE UNKE KARYAPRADALI SE SIDH HOTA HAI.
    NEXT PRESS VARTA ME PM MAHODAYA APKO AMANTRIT KARENGE KI NAHI YE MAI NAHI JANTA,, PAR ETNA YAKIN SE KANHTA HOON KI AGAR YAH LEKH OBAMA PAR APNE LIKHA HOTA TO APKO OBAMA JARUR BULATE WO BHALE HI APSE AKLE MULAQAT KAR APNI KAMIA SUNTE.
    HAMAE DESH AUR DUSRE DESH KE AGUAO ME YAHI FARQ HAI.
    JAI HIND
    ANAND KUMAR
    PATRAKAR
    MAU

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