भड़ास4मीडिया पर अगर कभी गलती से भी अमर उजाला की जगह संक्षेप में उजाला शब्द छप जाता है तो आगरा के एक भाई साहब फोन पर समझाने लगते हैं. वो बताते हैं कि अगर आपने सिर्फ उजाला लिखा तो यह उनके अखबार का नाम है और उजाला लिखकर कही गई बात उनके संस्थान से संबंधित हो जाती हैं जिससे न सिर्फ उनके उजाला समूह का नाम खराब होता है बल्कि अमर उजाला में हुए का ठीकरा उजाला पर फूट जाता है.
मैं भी थोड़ा कनफ्यूज. लेकिन उनकी बात सच है. आगरा से अमर उजाला निकला, और वहीं पर उजाला भी है. दो अखबार हैं. दोनों एक ही समय शुरू हुए. इनकी कहानी मैं बहुत नहीं जानता, चाहूंगा कि आगरा का का कोई साथी अमर उजाला व उजाला समूह के बीच फर्क को जरूर बताए. पर इतना तो मालूम हो गया है कि अमर उजाला की जगह उजाला लिख देना खतरे से खाली नहीं है.
ताजा मामला ये हुआ है कि राजुल माहेश्वरी ने अशोक अग्रवाल के खिलाफ जो तहरीर नोएडा के सेक्टर 58 थाने में दी, उससे संबंधित खबर भड़ास4मीडिया पर छपने के कुछ दिनों बाद आगरा से एक चिट्ठी आई है. उसमें अमर उजाला व उजाला ग्रुप के बीच फर्क के बारे में समझाया गया है. उस चिट्ठी को पढ़िए. हम यहां कहना चाहेंगे कि दैनिक जागरण को जागरण लिखने में कोई दिक्कत नहीं, दैनिक भास्कर को भास्कर लिखने में कोई दिक्कत नहीं पर अमर उजाला को उजाला लिखने में दिक्कत है और आगे से हम लोग इसका ध्यान रखेंगे.
पर यह भी चाहेंगे कि उजाला वाले भाई साहब उजाला के पूरे इतिहास व अमर उजाला से रिश्ते के बारे में जरा विस्तार से इसी तरह लिख भेजेंगे तो देश भर के मीडिया वालों के ज्ञान में वृद्धि हो सकेगी. -यशवंत













डॉ. महाराज सिंह परिहार
April 24, 2011 at 8:13 am
आदरणीय यशवंत जी,
उजाला और अमर उजाला के बारे में कौन नहीं जानता। उजाला आज भी सायंकालीन अखबार के रूप में चल रहा है जबकि अमर उजाला विशालकाय हो गया है। यह सच है कि अमर उजाला के संस्थापक उजाला में ही नौकरी करते थे और बाद में उन्होंने अमर उजाला अखबार की नींव डाली। अमर उजाला आरंभिक काल में बेलनगंज पुल के नीचे से प्रकाशित होता था फिर इसका प्रकाशन महाराजा अग्रसने इंटर कालेज के सामने, धूलियागंज पर आ गया। वर्तमान में अखबार का कार्यालय और प्रेस सिकंदरा रोड पर गुरूद्वारा के निकट है।
aksh
April 24, 2011 at 11:12 am
उजाला आगरा का बहुत पुराना पेपर है. एसा कहा जाता है की अतुल और अशोक के पिता यानी मुरारीलाल माहेश्वरी और डोरीलाल अग्रवाल दोनों उजाला पेपर में बंडल बांधते थे. उसके बाद उजाला में कुछ गबन हुआ और बाद में अमर उजाला शुरू हुआ. अमर उजाला में दोनों संस्थापक थे. अमर उजाला की हालत अनिल अग्रवाल के जिन्दा रहते तक काफी ठीक रही लेकिन उनके निधन के बाद की बाकी बातें तो यशवंत भाई आपको पता ही है.