वैसे तो पत्रकारों के कई टाइप होते हैं। कोई लिखने में माहिर होता है। उसे लोग लिख्खाड़ पत्रकार की उपमा देने से नहीं चूकते। कोई बातों के बताशे देने में एक्सपर्ट होता है तो पत्रकार बिरादरी उसका नाम बतोलेबाज रख देती है। किसी को लाइजनिंग में महारथ हासिल होती है तो किसी को राजनीतिक पोस्टमार्टम करने में या फिर अपराध जगत की बखिया उधेडऩे में। मतलब जैसा काम, वैसा नाम।
अपराध जगत का अगर सीनियर रिपोर्टर हुआ तो उसे आईजी उसके साथी कहने लगते हैं पर इन दिनों ग्वालियर में पत्रकारों की एक नई पौध खड़ी हो गई है। यह पौध है डायरेक्टरी छाप पत्रकारों की। यह नाम भी उनके काम से पड़ा है। यदि इनसे पूछा जाए जाए तो यह बता नहीं पाते कि यह किस अखबार के लिए अपनी कलम घिसते हैं पर इनके कंधे पर लदा झोला और उसमें भरी किताबें इशारा कर देती हैं यह डायरेक्टरी छाप पत्रकार हैं।
वैसे भी ग्वालियर के बारे में कहा जाता है कि सौ में साठ, ग्वालियर के पत्रकार। खैर, यहां बात रही थी डायरेक्टरी छाप पत्रकारों की। इन्हें टेलीफोन डायरेक्टरी निकालने में महारथ हासिल है। इसके लिए इन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करना पड़ती। पूरे अंचल के सरकारी सेवकों के टेलीफोन नंबर इन्हें कमिश्नर या महानिरीक्षक पुलिस के दफ्तर से मिल जाते हैं। यह भी पता चल जाता है कि कौन सा अफसर कहां पर पदस्थ है और उसका मोबाइल नंबर क्या है। अंचल भर के पत्रकारों के नंबर यह जिलों में स्थित जनसंपर्क विभागों से जुटा लेते हैं। बस इसके बाद शुरू होती है इनकी जनसेवा।
इन सभी नंबरों को कंप्यूटर ऑपरेटर से गुटका नुमा डायरेक्टरी या पोस्टकार्ड साइज डायरेक्टरी साइज पर सेट करवा लिया जाता है। यह तो हुई इनकी प्रारंभिक तैयारी। मुश्किल काम इसके बाद शुरू होता है। फिर यह घूमने लगते हैं विज्ञापन दाताओं के निहोरे करने के लिए। टेलीफोन नंबर डायरेक्टरी छाप पत्रकारों की डायरेक्टरी में एक समान होते हैं। यानी किसी का टेलीफोन नंबर या मोबाइल नंबर एक टेलीफोन डायरेक्टरी में गलत छप गया है कि शेष सभी डायरेक्टरियों में भी गलत छपेगा यह गारंटी है। हंड्रेड परसेंट। हर डायरेक्टरी में विज्ञापन दाताओं के नाम-फोटो बदल जाते हैं। किसी में बड़े नेता का फोटो पहले होता है कि किसी में दूसरी पार्टी के बड़े नेता का स्तुतिगान होता है। यानी जैसा फाइनेंस, वैसा स्तुति गान।
कुछ जुगाड़ी डायरेक्टरी छाप पत्रकार सरकारी विज्ञापन भी हथियाने में कामयाब हो जाते हैं। इसके बाद एक बार फिर यह सभी डायरेक्टरी छाप पत्रकार एक बार माथा भिड़ाकर बैठते हैं कि तुम्हारी डायरेक्टरी का डिजायन कैसा होगा और मेरी डायरेक्टरी का कैसा। ताकि एक-रूपता कम से कम छपाई में तो नजर न आए। बस इसके बाद छप गई डायरेक्टरी और पहुंच गई उन लोगों के हाथों में विमोचन के लिए जो सबसे ज्यादा फाइनेंस करते हैं। इनमें से कोई डायरेक्टरी छाप पत्रकार कहता है कि हमारी डायरेक्टरी तो कलेक्टर जेब में रखते हैं तो दूसरा कहता है कि पुलिस वालों का काम तो उनकी डायरेक्टरी के बिना चलता ही नहीं है। यह सब खुद अपनी पीठ थपथपाते हुए एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में यह डायरेक्टरी अफसरों को भेंट और बाकी स्टॉफ को बेचते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं।












champu
July 7, 2011 at 1:22 pm
mujhe bhi chhapani hai ye dire3ctory .
ek do ke number de do.
achchha business hia.