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किस्सा-ऐ न्यूज़ रूम (चार)

: गाँधी जी का जंतर…. :  ”मैं तुम्हे एकजंतर देता हूँ… जब भी तुम्हे ख़ुद पर गर्व होने लगे या फ़िर दिल में कोई संशय हो की जो कदम तुम उठाने जा रहे हो वो कितना सही है तो इस जंतर का इस्तेमाल करनातुम अपने दिमाग में सबसे गरीब आदमी (या औरत ) की तस्वीर बनाने की कोशिश करना… उस आदमी को याद करना जिसे तुमने अपनी जिंदगी में सबसे गरीब सबसे कमज़ोर के तौर पर देखा हो… फ़िर ख़ुद से पूछना की जो कदम तुम उठाने जा रहे हो वो उस आदमी को कितना फायदा पहुंचाएगा… क्या तुम्हारे उस काम से उस कमजोर आदमी के पेट की भूख शान्त हो पाएगी….तुम देखोगे कि तुम्हारा अंहकार और संशय खत्म होता जा रहा है…..”

: गाँधी जी का जंतर…. :  ”मैं तुम्हे एकजंतर देता हूँ… जब भी तुम्हे ख़ुद पर गर्व होने लगे या फ़िर दिल में कोई संशय हो की जो कदम तुम उठाने जा रहे हो वो कितना सही है तो इस जंतर का इस्तेमाल करनातुम अपने दिमाग में सबसे गरीब आदमी (या औरत ) की तस्वीर बनाने की कोशिश करना… उस आदमी को याद करना जिसे तुमने अपनी जिंदगी में सबसे गरीब सबसे कमज़ोर के तौर पर देखा हो… फ़िर ख़ुद से पूछना की जो कदम तुम उठाने जा रहे हो वो उस आदमी को कितना फायदा पहुंचाएगा… क्या तुम्हारे उस काम से उस कमजोर आदमी के पेट की भूख शान्त हो पाएगी….तुम देखोगे कि तुम्हारा अंहकार और संशय खत्म होता जा रहा है…..”

स्व-अभिमान तो शायद बहुत पीछे छूट गया लेकिन हां…. आज मैं कुछ संशय में जरूर हूं। और बचपन में कहीं पढीं ये इबारतें याद आ रहीं हैं….। क्या हम जो काम कर रहे हैं उसका फायदा सबसे गरीब सबसे कमजोर आदमी तक पहुंच पाता है क्या…। क्या इन दौड़ती भागती खबरों…. सनसनी और वारदातों (या चूतियापों) का कुछ असर उनकी भूख को कम कर सकता होगा… जवाब के आगे “शायद” लगाने की शायद जरूरत न पड़े..। खैर इन बातों को हम से मोड़ के मैं पर यानि खुद पर ले आता हूं…. बचपन की याद आ रही है… अक्सर सोचा करता था कि क्या बनूं…. घर में बारहा हुई लघु संगोÏस्ठयों…. वार्ताओं और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के बाद फैसला जब मुझपे छोड़ा गया तो मैने घोषणा कि मुझे बड़ा होकर आईसक्रीम बेचनी है…. चौंक गएं होगें आप ये पढकर बिलकुल वैसे ही जैसे घरवाले चौंके थे…

खैर आईसक्रीम का शौक कम हुआ फिर चढा आर्मी में जाने का बुखार… और खिलौनों में केवल और केवल बन्दूकें ही शामिल होने लगीं… शगल इतना बढा कि होते-होते मन में तय कर लिया अब चाहे फौजी बनूं या डाकू… बन्दूक नहीं छोड़नी है…। दिल कहता था कि मैं जब मरूं तो कुछ ऐसा मरूं कि कम से कम एक करोड़ लोग जाने कि वो मर गया..भले ही गाली देते हुए कि अच्छा हुआ साला मरा तो…लेकिन जानें कम से कम एक करोड़ लोग…। खैर कहानी गड्-मड्ड हो रही है…. सींग से पकड़ी थी पूंछ पर पहुंच गया शायद… तो होश संभाला तो घर वालों की लाखों रुपयों से खरीदी गई पढाई को ठेंगा दिखा कर पत्रकारिता की धुन सवार हो चुकी थी… मुझे गाइड (या शायद मिस गाइड) करने वाले गुरू जी ने भी कहा कि बेटा तुझे सिर्फ पत्रकार ही नहीं आईना बनना है…. और यकीन जानिए कि उस दिन के बाद जब भी कुछ लिखने की कोशिश की खुद के हाथ में कलम की जगह बन्दूक को ही पाया…।

मेरे लिखने और विवाद के बीच का रिश्ता इतना गहरा है जितना रोमियो और जूलियट के बीच भी न रहा हो…। ब्लाग शुरू किया तो पक्का कर लिया कि बस अब बन्दूक छोड़ और कलम पकड़नी है… नाम भी रख दिया नई कलम…. लेकिन गड़बड़ यहां भी हो गई… मजाक-मजाक में शुरू किए ब्लाग पर विवाद गहरा गए… और जो भड़ास निकली उसने मुझे चुप ही सा करा दिया..। जाहिर है कि क्राइम और कविता दोनो को साथ लेकर चलना खासा मुश्किल होता है… और मैं दोनो को साथ लेकर चलने को अभिशप्त…। खैर चुप्पी तोड़कर फिर से ब्लाग लिखने की शुरूआत कर रहा हूं… लेकिन किस्सा-ए-न्यूज रूम का डिब्बा कुछ दिनों के लिए बन्द… कुछ और ही सही… क्या विचार है आपका…।

जर्नलिस्ट जयंत चड्ढा के ब्लाग नई कलम से साभार

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