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जुगनू शारदेयआज अंतरराष्टीय वृद्ध जन दिवस है। रेल में हम 60 साल की उम्र में बुजुर्ग हो जाते हैं। कहते हैं कि साठा तो पाठा। न जाने कितनी लाठियों के सहारे हम साठा तो पाठा लोग चल रहे हैं। एक लाठी अदालत की भी चली साठ साल में। साठ साल लगे अदालत को यह समझने में कि आस्था से लड़ना कितना मुश्किल है। कुछ-कुछ वैसा ही फैसला अदालत ने दिया कि ले भाई तू भी ले ले हमारा फैसला कि तूझे फिर जाना ही है सुप्रीम कोर्ट। हो आ।

जुगनू शारदेयआज अंतरराष्टीय वृद्ध जन दिवस है। रेल में हम 60 साल की उम्र में बुजुर्ग हो जाते हैं। कहते हैं कि साठा तो पाठा। न जाने कितनी लाठियों के सहारे हम साठा तो पाठा लोग चल रहे हैं। एक लाठी अदालत की भी चली साठ साल में। साठ साल लगे अदालत को यह समझने में कि आस्था से लड़ना कितना मुश्किल है। कुछ-कुछ वैसा ही फैसला अदालत ने दिया कि ले भाई तू भी ले ले हमारा फैसला कि तूझे फिर जाना ही है सुप्रीम कोर्ट। हो आ।

एक और उम्मीद की लाठी के बल पर चल ले। वैसे भी तू बहुत ही बड़ा बुजुर्ग है। 1855 से जी रहा है। अपने जीवन के लिए न जाने कितने लोगों को तूने मारा। अभी भी तेरा मन नहीं मान रहा है। अरे बुढ़ापा छाया है –कब तक लड़ेगा वकीलों की लाठी के सहारे। अब तो छोड़ ऐसी लाठी का सहारा। सुना नहीं तूने। बहरा भी होना ही था तूझे। उम्र का तकाजा जो ठहरा। अब वक्त नौजवानों का है। कोई तुझसे मांग रहा है तेरा वोट। चुनिंदा अखबारों में पढ़ा नहीं कि हम युवा हैं/वोट दें/ सुरक्षित करें अपना और अपने राज्य का भविष्य!

अरे हां, अपने राज्य में तो चुनाव चल रहा है। तू बूढ़ा है। तेरे बेटे को टिकट मिल गया है तो तेरा जीवन सफल समझ। चुनाव का सच वोट नहीं होता है। चुनाव का सच तो टिकट होता है। क्या चीज है यह टिकट। अपनों को पराया और परायों को अपना बना देता है। कल जो अपना दल होता था, आज वह दलदल हो जाता है। दलदल पार करने के लिए भी लाठी की जरूरत होती है। यह लाठी टिकट की होती है। चुनाव की कितनी लाठियां होती हैं। सब लाठी के ऊपर आचार संहिता की लाठी होती है। यह बड़ी भारी दिखाऊ लाठी होती है। इस लाठी के पास एक टार्च होता है। इसे पर्यवेक्षक कहा जाता है। जरूरी नहीं कि यह भी साठा तो पाठा हो। यह कुछ भी हो सकता है। इसके पास हर तरह की सुविधा होती है। इतनी ज्यादा सुविधा होती है कि यह सोचता रहता है कि उसके अपने राज्य में काम करने के लिए इतनी सुविधा क्यों नहीं मिलती। अभी तो वह बुजुर्ग भी नहीं हुआ है – फिर क्यों अनजाने राज्य की गलियों में निष्पक्षता के लिए भटका जाए।

यह निष्पक्षता क्या होता है। किसी को पता नहीं होता है। यह माना जाता है कि अदालत का फैसला ही निष्पक्ष होता है। चुनाव में तो जाति होती है। जाति अकेले नहीं होती उसके पास एक पूरा समीकरण होता है। चुनाव में पैसा होता है। पैसा खर्च होता रहता है। खर्च की निगरानी भी होती है। फिर भी पैसा खर्च हो जाता है। यह भी एक कला है कि वोट के लिए पैसा खर्च कर दिखा दो और किसी को पता भी नहीं चलता कि पैसा खर्च हुआ। लोकतंत्र में वोटर की सबसे बड़ी लाठी वोट है। यही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। अगर वह अपनी पूंजी का करोबार कर लेता है तो क्या बुरा। हमारे देश में एक लाठी वाला आदमी भी होता था। बुजुर्ग भी था। कहते हैं कि उसका नाम महात्मा गांधी भी था। अब उसकी लाठी नहीं चलती। सभी बुजुर्गों को लाठी धारण करने के लिए शुभकामनाएं!

लेखक जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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