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खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह सचमुच गुनहगार थे?

वैसे तो यह मामला काफी समय से उठता रहा है पर हाल के दिनों में सुप्रसिद्ध पत्रकार, स्तंभकार ख़ुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह द्वारा सरदार भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने और उसके आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीर देशभक्तों को फांसी की सजा होने की बात काफी चर्चा के है. यह बात खास कर तब अधिक तेजी से उठी थी जब दिल्ली में कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिये जाने की बात चली.

वैसे तो यह मामला काफी समय से उठता रहा है पर हाल के दिनों में सुप्रसिद्ध पत्रकार, स्तंभकार ख़ुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह द्वारा सरदार भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने और उसके आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीर देशभक्तों को फांसी की सजा होने की बात काफी चर्चा के है. यह बात खास कर तब अधिक तेजी से उठी थी जब दिल्ली में कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिये जाने की बात चली.

इस पर सारे देश से इस तरह की आवाजें उठीं कि एक ऐसे आदमी को, जिसकी गवाही के कारण सरदार भगत सिंह जैसे महान देशभक्त को फांसी हुई, आज हमारा आजाद हिंदुस्तान सम्मानित कर रहा है, इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात क्या हो सकती है. वैसे इस पूरी बात में एक भारी तथ्यपरक त्रुटि भी है जिसे स्पष्ट करना जरूरी समझता हूँ. दरअसल सरदार भगत सिंह अंग्रेजों द्वारा जब बटुकेश्वर दत्त के साथ केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने के लिए 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार किये गए थे तो पहले उन पर बम फेंकने से सम्बंधित मुक़दमा चला था. इस अपराध के लिए उन्हें और दत्त को आजीवन कारावास की सजा 12 जून 1929 को सुनाई गयी. उनकी गिरफ़्तारी के बाद 15 अप्रैल 1929 को लाहौर में ‘लाहौर बम फैक्टरी’  पकड़ी गयी,  जिसमे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कुछ लोग भी पकडे गए.

इन लोगों को इस बम फैक्टरी के साथ पुलिस अधिकारी जे पी सौन्डर्स की हत्या से भी जोड़ दिया गया और भगत सिंह पर सौन्डर्स की हत्या से सम्बंधित मुक़दमा चला जिसे ‘दूसरा लाहौर कौंसपीरेसी केस’  कहते हैं. इस केस में ब्रिटिश सरकार ने अलग से एक ओरडीनेंस ला कर तीन हाई कोर्ट जजों की कमिटी नियुक्त कर दी,  जिसे भगत सिंह आदि ने अवैधानिक कहते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी पर इनके रिट को अमान्य कर दिया गया. जिस तरह से भगत सिंह और उनके दो जांबाज़ साथियों को दूसरा लाहौर कौंसपीरेसी केस में फांसी की सजा और तमाम अन्य लोगों को लंबे कारावास हुए उस को ले कर आज तक बहुत सारे कानूनविद संतुष्ट नहीं है और यह मानते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने किसी भी प्रकार से भगत सिंह को खत्म करने के लिए कानूनी प्रक्रिया से छेड़-छाड की. मैंने पूरा निर्णय और पूरी प्रक्रिया नहीं पढ़ी है इसीलिए इस विषय में अपनी राय नहीं दे सकता हूँ. लेकिन एक बात जो साफ़ है वह यह कि भगत सिंह और उनके दो साथियों को सौन्डर्स हत्याकांड में सजा-ए-मौत हुई थी, ना कि एसेम्बली बम कांड में. और शोभा सिंह ने अपनी गवाही एसेम्बली बम कांड में दी थी, सौन्डर्स हत्या कांड में नहीं.

यह तो एक ऐतिहासिक तथ्य मात्र है, उससे अधिक कुछ भी नहीं क्योंकि यदि शोभा सिंह ने एसेम्बली बम कांड में भी भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी, तो बात अपने आप में महत्वपूर्ण तो है ही. लेकिन साथ ही इसके दो पहलू हैं. पहली बात तो यह कि वह गवाही झूठी थी अथवा नहीं. जहां तक मैं जानता हूँ इस बारे में यह आरोप नहीं लगा है कि शोभा सिंह ने झूठी गवाही दी. खुशवंत सिंह ने भी अपने लेखों और अपने बयानों में यही कहा है कि मेरे पिता एसेम्बली के दर्शक दीर्घा में उस वक्त मौजूद थे और उन्होंने दो लोगों को बम फेंकते हुए देखा था,  जिन्हें वे उस समय तक नहीं पहचानते थे पर बाद में देखने पर पहचान लिया. मेरी जानकारी के अनुसार दूसरे लोगों ने भी इस बात को चुनौती नहीं दी है, जिससे आम तौर पर यह संभव दिखता है कि घटना के समय शोभा सिंह एसेम्बली में मौजूद थे.

यदि हम दो बातों पर सहमत होते है कि शोभा सिंह एसेम्बली में घटना के वक्त मौजूद थे और उनकी गवाही से सरदार भगत सिंह को मृत्युदंड की सजा नहीं मिली थी, तब भी एक सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण बना रहता है- क्या शोभा सिंह को यह गवाही देनी चाहिए थी? सनद रहे कि यह तीसरा सवाल तभी उठता है जब पहले दो सवाल को लेकर कोई मतभेद ना हों, खास कर सच्ची गवाही को ले कर. यदि शोभा सिंह वहाँ मौके पर मौजूद नहीं थे और उन्होंने फिर भी पुलिसिया गवाह की तरह शासन को खुश करने को यह गवाही दी होगी तब तो उससे जघन्य कुछ भी नहीं कहा जा सकता, पर यदि ऐसा नहीं था (जिसकी पर्याप्त सम्भावना दिखती है) तो बात अंत में गवाही की नैतिकता पर आ कर टिक जाती है.

इस जगह मेरी राय थोड़ी हट कर है. इस बातों में कोई मतभेद नहीं कि सरदार भगत सिंह कौन थे, उनका क्या ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है एवं अन्य क्रांतिकारियों की इस देश की स्वतंत्रता और इसकी वर्तमान दशा में कितना महान योगदान है. पर यदि एक तरफ ये लोग अपना-अपना काम अपनी-अपनी सोच के अनुसार कर रहे थे तो दूसरी तरफ शोभा सिंह वहाँ मौजूद थे, उन्होंने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को पहचान लिया और इसकी गवाही कोर्ट में दी तो क्या उनका यह कार्य पूरी तरह गलत कहा जाए. पहली बात तो यह कि वे कानूनन गलत नहीं थे क्योंकि वे तत्कालीन क़ानून की मदद कर रहे थे और वही कह रहे थे जो सत्य था. एक तरह से यह उनका कर्तव्य था जो उन्होंने निभाया.

दूसरी बात यह कि क्या यह आवश्यक था कि जब उन्होंने इन दोनों लोगों को बम फेंकते हुए देखा था तो वे झूठ बोलते. तीसरी बात यह कि जब स्वयं भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उस स्थान से नहीं भागे और स्वयं को गिरफ्तार कराया तो यदि शोभा सिंह ने उनकी गवाही दी तो इसमें गलत क्या माना जाए? चौथी बात यह कि यदि हम शोभा सिंह को एक सच बोलने के लिए गुनहगार मान रहे हैं तो क्या यह हम सबो के विरुद्ध नहीं जाता है. यदि शोभा सिंह भगत सिंह के मित्र या परिचित होते अथवा वादा-माफ़ी गवाह बन गए होते या उनसे पूर्व में कोई समझौता रहा होता,  जिसे उन्होंने तोड़ दिया होता तब तो अपनी बात से मुकरने का उन पर गहरा दोष लग सकता था पर एक अपिरिचित व्यक्ति पर तत्कालीन क़ानून के विरुद्ध कार्य करने की दशा में गवाही देना किस तरह से गलत माना जाए?

आज हमारे देश में कई सारे लोग, अलग-अलग उद्देश्यों से कई तरह के काम कर रहे है, जिन्हें हम विधि-विरुद्ध और गैर-कानूनी कहते हैं. क्या ऐसे में हम नहीं चाहते हैं कि हमें इन घटनाओं में ऐसे अभियुक्तों को सजा दिलाने के लिए सही गवाह मिलें? हो सकता है इनमे से कई लोग अपनी जगह भगत सिंह की तरह ही पूजे भी जाते हों पर एक देश का क़ानून तो वही माना जाएगा जो उस समय रहा हो. फिर यदि किसी व्यक्ति ने उस क़ानून की मदद की और सच्ची गवाही दी तो उस खास कार्य को सिरे से नकार देना, उसकी तीखी भर्त्सना करना और उसे देशद्रोह करार देना बाहरी तौर पर आकर्षक तो लगता है पर उचित हो यदि हम इसे अपनी पूर्णता में देखें.

मैं नहीं कह रहा कि शोभा सिंह कभी झूठ नहीं बोलते होंगे, वे बहुत सच्चे आदमी रहे होंगे, उन्होंने बड़ी नेकनियति से यह गवाही दी होगी अथवा वे बड़े न्यायप्रिय व्यक्ति रहे होंगे. मैं तो मात्र यह कह रहा हूँ कि वे कैसे भी आदमी रहे हों पर यदि वे सच में एसेम्बली में घटना के समय मौजूद थे और उन्होंने इसकी गवाही कोर्ट में दी तो इस कार्य के लिए उनकी निंदा और भर्त्सना करना अपने आप बहुत उचित प्रतीत नहीं होता है. सच के प्रति विराग हम लोगों की एक बड़ी कमजोरी रही है और यह आये-दिन हमारे कोर्ट-कचहरी में दिख जाती है जब लोग अपने सगे तक का नाम गलत बता देते हैं और तमाम वाजिब मुकदमे छूटते रहते हैं. ऐसे में एक आदमी ने यदि सच कहा और दूसरे की सजा हुई, भले ही वह दूसरा हमारा आराध्य ही क्यों ना हो, तो हम उस पहले आदमी को वह सच बोलने का गुनहगार नहीं बता सकते.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं.

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23 Comments

23 Comments

  1. ऋतुपर्ण दवे

    August 14, 2011 at 3:33 pm

    यकीनन आपकी आखिरी पंक्तियां ही आपके पूरे लेख के वजन के लिए काफी है। फिर भी आपने जो कहां वह समझने के काबिल है। आपको इस सच के लिए बधाई। बधाई इसलिए भी कि आजादी के जश्न में डूबने के चंद घंटों या कहें मिनटों पहले आपने एक हकीकत को लाजवाब अंदाज में प्रस्तुत किया। आखीर में आपकी ही लाइनों के साथ आपको इस रचना के लिए साधुवाद ” सच के प्रति विराग हम लोगों की एक बड़ी कमजोरी रही है और यह आये-दिन हमारे कोर्ट-कचहरी में दिख जाती है जब लोग अपने सगे तक का नाम गलत बता देते हैं और तमाम वाजिब मुकदमे छूटते रहते हैं. ऐसे में एक आदमी ने यदि सच कहा और दूसरे की सजा हुई, भले ही वह दूसरा हमारा आराध्य ही क्यों ना हो, तो हम उस पहले आदमी को वह सच बोलने का गुनहगार नहीं बता सकते. “

  2. kranti

    August 14, 2011 at 4:44 pm

    Dear Amitabh ji,

    There were two witnesses which were called on by the then government Mr.shadi lal and Mr.shobha singh both were honoured by designation of SIR by british government after testimony and both were previleged by huge government contracts and land.at the same time shoba singh was outcasted from his village for this saboteurism .Even no vendor agreed to sell him cerement at the time of his death.his son had bought cerement from delhi after that he was cramatized.

  3. Dr Maharaj singh Parihar

    August 14, 2011 at 4:58 pm

    अभिताभजी ने बिल्‍कुल ठीक लिखा है, लोग अनर्गल बात और तथ्‍यों में अपना निठल्‍ला चिंतन कर रहे हैं। शोभा सिंह ने सच कहा था और सच हमेशा कडवा होता है।

  4. ami sharma

    August 14, 2011 at 5:34 pm

    हाय अमिताभ, आपका लेख पढकर निष्‍पक्ष राय बनाने का मार्ग दिखता है। मेरे जैसे बहुत से साथियों ने खुशवंत सिंह को इन चर्चाओं के बाद पसंद करने में हिचकिचाहट शुरु कर दी थी। पर सिक्‍के के दोनो पहलू दिखाने के लिए धन्‍यवाद। बैलेंस राइट अप है आपका।

  5. सुशील सौरभ

    August 14, 2011 at 5:34 pm

    आपको इतना शानदार लेख लिखने पर बधाई अमिताभ जी, लेकिन क्या आपको पता है कि आपने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर एक ऐसा बेसुरा राग छेड़ दिया है जो कब का बंद हो चुका है..?

  6. कुमार सौवीर, लखनऊ

    August 14, 2011 at 6:22 pm

    फिलहाल आपकी बात का समर्थन।
    लेकिन अभी नहीं, कल बताऊंगा कि आप कितने गलत हैं।

  7. मदन कुमार तिवारी

    August 14, 2011 at 6:24 pm

    चलिये आपके इस लेख के कारण मै अपने आपको एक बहुत बडे बंधन से आजाद पा रहा हूं । आपकी बहुत इज्जत करता था , आश्चर्य होता था एक आईपीएस ऐसा भी हो सकता है । आज लगा आईपीएस जैसा होना चाहिये आप वैसे हीं हैं। शोभा सिंह गांधी से बडे सत्यवादी हरिश्चन्द्र थें। झुठ बोलकर दधीची क्यों बनना । और फ़िर बेचारे शोभा सिंह को तो यह पता था नही कि भगत सिंह चोर है या गुंडा या फ़िर देश की आजादी के लिये पागल दिवाना इसलिये झुठ क्यों बोलें। ? बेहुदे तो वह लोग थें जो पुलिस की मार खा खा कर भी यह नही बताते थें कि कोई क्रांतिकारी कहां छुपा aै , किस भागा है । बडी गंदी थीं वह औरतें जो पुलिस से बचाने ले लिये अपने बेटे सम्मान क्रांतिकारियों को अपना पति बताकर अपने बिस्तर पर सुलाती थी जब पुलिस की रेड होती थी. सत्य क्या aै पaले aह जान जाय । की पर्‍थ्वी चौकोर थी यह सत्य था । आज aही है । सत्य के मर्म को समझें। लेकिन एक बेसिक इंस्टिंक्ट होता है आपके अंदर आज भी पुलिसवाला इंस्टिंक्ट है । बहुत कठिन डगर है पनघट की । शोभा सिंह को aहिमामंडित करने के iिये धन्यवाद ।

  8. Mohan

    August 14, 2011 at 7:36 pm

    आप गद्दार शोभा सिंह को महिमा मंडित करने का असफल प्रयास कर रहें हैं.

  9. Anjaan

    August 14, 2011 at 11:08 pm

    Amitabhji, bahut achcha likha hai.. main aapse sehmat hoon.. wo Sonders case ko clear karne ke liye bahut shukriya. Zyadatar log to iss bare mein jaante hi nahi hain..

  10. K P Malik

    August 15, 2011 at 4:19 am

    mera manna hai ki shobhasingh ne angrejo ko es liye khush kiya taki ve unhe bade theke de den..bas etni si bat hai………..

  11. DR Virendra Singh Godhara

    August 15, 2011 at 4:53 am

    Question is not that witness of Shobha Singh was true or false, question is, whether it was an act in interest of of India? Despite being close to Lord Ram and having a pivotal role in his victory, does anyone holds Vibhishan in high esteem? Does anyone like to name his son ‘Vibhishan’, while even insignificant characters of Ramayan are popular Hindu names?
    Mr Amitabh, IAS, is free to have his ideas, nevertheless, his analysis is narrow-minded and typically ‘police-like’.

  12. Deepak Kumar Tiwari

    August 15, 2011 at 8:30 am

    सर जी, वैसे तो मैं भी सही बोलता हूँ हमेशा …मगर मेरा भाई किसी समस्या को खीचने के लिए मेरे सामने कोई विस्फोट करता है और उसमे कोई मरता भी है तो भी मैं उसके विरुद्ध गवाही नहीं दूंगा! इसलिए नहीं की मुझसे सही बोलना नहीं आता, बल्किन इसलिए की मुझे पता है सच और गलत क्या है, और जिस शोभा सिंग की आप बडाई कर रहे उसे गवाही के बाद क्या मिला ये भी लिख देते तो अच्छा रहता…. हम अंग्रेजो के गुलाम कभी नहीं थे हम अपने लोगो के गुलाम थे अंग्रेजी कुत्ते के …. आप चापलूस बहुत अच्छे हो सकते …नेतागिरी कर सकते है रिटायर होने के बाद … मैं तो पेशे से इंजिनियर हूँ जाहिर है मुझे बहुत सी गन्दी गालिया आती है, कालेज के फर्स्ट इयर में आप जैसे सोचने वालो को गालिया देना सिखाया जाता है, मगर आपको गाली दूंगा तो बेचारी गली बुरा मान जाएगी! और जितने लोग सच का भजन गा रहे उन लोगो से मैं पूछना चाहता हूँ की अपनी जिन्दगी में अपने किस दिन कोई झूठ नहीं बोला, शायद एसा वाही दिन होगा जब आपको बोलते नहीं बनता होगा! और वैसे भी अमिताभ जी आपका बेटा आपके आँखों के सामने किसी को गोली मरेगा तो आप अपने बेटे के खिलाफ गवाही कभी देंगे … ये सत्य है और कड़वा भी है …. आप के दो लेख पढ़े इत्तिफाक से दोनों ही चापलूसी से भरे थे … शायद यह आपका स्वभाव होगा .. या मेरी नादानी !!”

    Deepak Tiwari
    +249922407401

  13. sanjay awasthi

    August 15, 2011 at 9:41 am

    Mr. Amitabh,

    How can you justify the act of a person which lead to a big damage to our freedom struggle? Shobha singh was not an innocent child. He was aware that his act will please the Britishers and they will give him some reward also that’s why he acted in favor of Britishers. Title ‘Sir’ proves it.

  14. pramodkumar.muz.bihar

    August 15, 2011 at 3:30 pm

    amitabh ji vindsar place ka nam badalkar sir sobha singh ke nam par kiye jane ke sawal par vivad utha tha .mirjafar,man singh aur jaichand ko mahimamandit kiya jayega to des bhakt bhadur sah jaffar,maharana pratap aur prithvi raj chauhan ke vansajo ko yah nagwar lagega hi.isliye saheede ajam bhagat singh ke vansajon ko sobha singh swikarya nahi hain.is sawal par punjab ke hi logon ka mat le liya jaye?

  15. कविता

    August 15, 2011 at 4:15 pm

    ये तो ऐन स्वतंत्रता दिवस पर आपने खुद को कोसने का जरिया बना डाला अमिताभ जी.. क्या आप भी आजकल खुशवंत सिंह की सिफारिश से केंद्र में किसी मलाईदार पोस्टिंग की जुगाड़ में हैं?

  16. रहगुज़र

    August 16, 2011 at 2:43 pm

    चमचागिरी की भी हद होती है. आपके अनुसार तो जिन देशभक्तों ने अपनी क़ुरबानी देकर आज़ादी की लड़ाई को परवान चढ़ाया वोह गलत थे और उन्हें पकड़वाने वाले सही. हाँ आप पुलिस में जो हैं और आपको बाकायदा ऐसी ही ट्रेनिंग दी गयी है. सो, आप चिंतन भी ऐसा ही तो करेंगे. आपकी मानसिकता का सारा निचोड़ समाहित है, कविता जी के कमेन्ट में. मैं इंतजार कर रहा हूँ कुमार सौवीर के जवाब का.

  17. Aham

    August 16, 2011 at 3:41 pm

    Great. Now, would you name just one name who betrayed this nation during British rule? By your thinking pattern no body can be termed as ‘gaddar’ because each of them can claim to be on the rights side of the law as they were supporting government of the day. Mr. stop your non-sense arguments because arguments have the capacity to portray the good side of a person. By the way, you could be a good PR guy for terrorist organizations as they too have some similar arguments! Go ahead.

  18. an indian

    August 18, 2011 at 9:16 pm

    अपने तथ्‍यों को ठीक कीजिए। कानून की मदद करना और कानून को निभाना (एक तरह से, आपके शब्‍दों में) कोई कर्तव्‍य नहीं होता, महानुभाव। कभी-कभी कानून की चाटुकारिता अपराध भी बन जाती है। आपने पढ़ा होगा कानून की सबसे बुनियादी किताब में मोरल, जस्‍ट और लीगल का फर्क। लीगल का दर्जा मोरल और जस्‍ट के बहुत बाद आता है। गांधी तो कानून नीम के दातून की तरह तोड़ते थे। पर, इस देश का कोई नागरिक, या फिर दुनिया के लोग भी, उन्‍हें अपराधी नहीं ठहराते। आप जैसे कानूनपसंद तो उनका रिकॉर्ड पढ़कर जरूर उन्‍हें शातिर अपराधी ठहरा देंगे। कानून इंसान बनाते हैं और यह इंसानी चीज है। पर, आप नहीं समझेंगे। पता नहीं यशवंत जी आपको यहां लिखने क्‍यों देते हैं। आप जैसे लिखनेवालों की वजह से ही अब इस पोर्टल में पहले- सा मजा नहीं रहा।

  19. Syed Mohammad

    June 8, 2018 at 5:58 pm

    अंग्रेज़ो के मुखबिरों के लिए अच्छी लीपापोती की, सही में चमचागिरी की भी हद होती है. आपके अनुसार तो जिन देशभक्तों ने अपनी क़ुरबानी देकर आज़ादी की लड़ाई को परवान चढ़ाया वोह गलत थे और उन्हें पकड़वाने वाले सही

  20. कुलदीप श्योराण

    March 24, 2019 at 11:26 am

    अमिताभ जी कृपया यह भी बता दीजिए की शोभा सिंह को अंग्रेजों ने सर की उपाधि कौन से वर्ष में और किस उपलब्धि के लिए दी थी। शोभा सिंह को यह खिताब सिर्फ भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए दिया गया था और यही सच्चाई है।
    यह भी दुनिया को बता दीजिए कि इस गवाही के बाद शोभा सिंह को कितने बड़े बड़े इनाम अंग्रेजो की तरफ से दिए गए थे। अगर कानून के हिसाब से सब चलते तो आज भी देश गुलाम होता ।अंग्रेजों के कानूनों के खिलाफ संघर्ष करने पर ही देश को आजादी नसीब हुई थी। लगता है कि आप लोग कानून अंग्रेजो के कानून के चक्कर में गुलाम रहना ही पसंद करते हैं।

  21. Devil S

    March 25, 2019 at 7:46 pm

    गुनाहगारो का बचाव करने में असफल रहे आप। शोभा सिंह को “सरदार बहादुर और सर” की उपाधि दी थी अंग्रेजो ने। और दिल्ली में कीमती जमीन और काफी धन उपहार में दिया गया था।
    आज दिल्ली का शोभा सिंह के नाम से दिल्ली का सबसे महंगा बाराखंभा रोड पर जो मॉडर्न स्कूल है वो जमीन अंग्रेजो ने ही उसे उपहार में दी थी।

    गद्दारो का महिमामंडन मत करो। ये काम RSS के लिए छोड़ दो।

    शादी लाल को मरने के बाद कफ़न भी नसीब नहीं हुआ था। थूक दिया था उसके गांव के लोगो ने उसके ऊपर…

  22. M S Alam

    September 24, 2019 at 3:00 pm

    Shadi Lal aur Shobha Singh dono desh ke gaddar the kyunki assembly me bum fenka gaya tha to wahan koi nahi tha khali assembly me bum fenka gaya tha taki freedom ke liye bahru ko sunaya jay kisi ko marne ke liye bum nahi fenka gaya tha revolutionaries ko dabane ke liye bill pass karne ko rokne ke liye kiya gaya tha aur iske baad dono ne shan se surrender bhi kiya tha par in gaddaron ne jhuthi gawahi di taki khub sara dhan angrejon se le sake. Isitarah ke aur bhi log the jo angrejon ka dalal juti chatne wala log tha. Aaj desh ke liye durbhagya hai ki aise logon ki himayat kiya ja raha hai.
    Note:- “Jahan Jhut bolne se kisi ki jaan bach jaye wahan jhut jayaj hai, wahan jahan sach bolne se kisi jaan chali jaye wahan sach najayaj hai.”

  23. BC Gaur

    November 4, 2019 at 5:01 am

    Dark Law could not hang Bhullar in free India but Godsay and before 1947 a lot Patriots under supervision of Almighty God or Allaha before Islamic Qayamat. Why? International Law declared Subhash POW, Why? Positivity?

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