अब कहां मिलते हैं ऐसे सम्पादक। ठीक है, हो गयी गलती, लेकिन बड़प्पन तो इस बात का है कि गलती को फौरन महसूस भी कर लिया। और इतना ही नहीं, मौका तलाशा और वक्त आते ही सबके सामने अपनी गलती मानी और बाकायदा क्षमा-याचना कर ली। जाहिर है, ऐसी क्षमायाचना ने पत्रकारिता के इतिहास में आत्मशुद्धि की लगभग खो चुकी परम्परा को प्राणवायु तो दे ही दी है, जिसे आजकल के पत्रकार किसी हादसे की तरह देख सकते हैं।
मगर ऐसी ही इंसानियत भरी खुद्दारी का प्रतीक बन गये हैं अनिल भास्कर। हिन्दुस्तान अखबार के वाराणसी दफ्तर में एक हफ्ता पहले हुई एक घटना के बाद इस शख्स ने बुधवार को न केवल खुद को अपराधी मान लिया, बल्कि सार्वजनिक तौर पर इसके लिए क्षमायाचना तक कर ली।
इसके लिए उन्होंने वह मौका चुना जब अपने एक सम्पादकीय सहकर्मी संदीप त्रिपाठी की विदाई के लिए आयोजित समारोह में यूनिट मैनेजर समेत पूरा दफ्तर एकत्र था। दरसअल हुआ यह था कि एक दिन अवकाश स्वीकृत होने के बावजूद सुनील श्रीवास्तव नाम के एक पेजीनेटर को काम पर आने का आदेश अनिल भास्कर ने दिया था, जिस पर अवकाश मंजूर होने की बात कहते हुए अनिल भास्कर ने उसे अपशब्द कहते हुए नौकरी ले लेने की धमकी दे डाली थी। सरेआम हुए इस हादसे में पूरा दफ्तर स्तब्ध रह गया था। भड़ास ने इस घटना को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
लेकिन, बुद्धवार की शाम को डीएनई संदीप त्रिपाठी के इलाहाबाद स्थानांतरित हो जाने के मौके पर आयोजित एक विदाई समारोह में जब यूनिट मैनेजर समेत प्रसार, विज्ञापन, एचआर और संपादकीय समेत पूरा कार्यालय मौजूद था, अनिल भास्कर ने वहां मौजूद सभी लोगों को अचानक ही अपने शब्दों से भावुक कर दिया। अपनी बारी पर बोलने खड़े हुए अनिल भास्कर ने पूरी मजबूती के साथ सुनील श्रीवास्तव के साथ किये गये अपने व्यवहार को गलत और अपराध कुबूल करते हुए न केवल सुनील, बल्कि सभी लोगों से क्षमा याचना कर ली। बताते हैं कि उन्होंने कहा कि कभी कभी ऐसा हो जाता है, जब हम न चाहते हुए भी कुछ ऐसा कृत्य कर बैठते हैं, जिसपर बाद में हमें पश्चाताप होता है। ऐसा ही मैंने सुनील के साथ पिछले दिनों कर दिया। मैं शर्मिंदा हूं और इसके लिए क्षमाप्रार्थी भी।












rajkumar sahu, janjgir chhattisgarh
August 18, 2011 at 3:14 pm
anil ji ne bahut hi himmat ka kaam kiye hain. inhen meri se naman, kyonki apni galti swikarne vaale aaj kitne milte hain. vo bhi, jab koi unchi kursi par baitha ho.nishchay hi unhonne bade dileri aur anukarniya kary kiya hai. hamein isse sabak lena chahiye.
umesh
August 19, 2011 at 4:42 am
nazir….???? khuch sikh lo big boos type ke logo….? Varna marne ke baad bhe gali sunogoe
ramesh kumar
August 20, 2011 at 9:07 am
यशवंत जी वेज बोरड के करमचारी की नौकरी लेना आसान नहीं है यह पता था अिनल भाष्कर को इस िलए माफी मांग ली। आिखर रोज आमना-सामना भी तो करना है
kranti
August 21, 2011 at 9:51 am
भाई हर बात को नकारात्मक तरह से लेना ठीक नहीं। कितने संपादकों ने अब तक अपने सहयोगी से माफी मांगी है इस पर भी तो विचार करें। मैं अनिल जी को नहीं जानता, लेकिन जो काम उन्होंने किया उसके लिए हिम्मत चाहिए।