
राजकुमार
शुरू-शुरू में ऐसा हुआ भी। भिलाई में लोहे की दलाली में जुटे एक व्यापारी ने एक प्रमुख चैनल में खबरों को भेजने के लिए कैमरा आदि को खरीद लिया। व्यापारी को इस बात से बिल्कुल भी मतलब नहीं था कि छत्तीसगढ़ किस ढंग से आकार ले रहा है। वह तो बस चैनल के सहारे भिलाई इस्पात संयंत्र से लोहे की अफरा-तफरी में लगा हुआ था। दिल्ली में चैनल के प्रमुखजनों को जब इस बात की भनक लगती तब तक देर हो चुकी थी। व्यापारी अपने मतलब के हिसाब से वारा-न्यारा कर चुका था।
राज्य निर्माण के शुरुआती दिनों में एक पत्रकार गोविंद साहू के पास एएनआई की एजेंसी थी। श्री साहू का जोर साफ्ट किस्म की स्टोरियों पर ही रहता था क्योंकि वे जिस एजेंसी के लिए काम करते थे, वह एजेंसी श्री साहू से स्टोरी लेकर ढेर सारे चैनलों को बेचने का काम करती थी। वैसे श्री साहू बेहद मेहनती पत्रकार थे ( हो सकता है कि वे कहीं और काम कर रहे हो) लेकिन उनके साथ ही यहां ईटीसी से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले उनके अपने एक रिश्तेदार की वह इमेज नहीं बन पाई जो बननी चाहिए थी। जब पूरे देश में एनडीटीवी की धमाकेदार शुरुआत हो रही थी तब श्री साहू के रिश्तेदार को छत्तीसगढ़ का ब्यूरो प्रमुख बनाया गया था, लेकिन खबर है कि बाद में लेनदेन संबंधी विवाद के चलते उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा।
बताया जाता है कि श्री साहू के रिश्तेदार ने अर्धशासकीय दफ्तर में कार्यरत एक महिला के कथित बयानों की सीडी हासिल कर ली थी। इस सीडी के आधार पर वे एक प्रमुख नेता के अत्यंत करीबी को ब्लैकमेल कर रहे थे। जब यह शिकायत नेताजी के पास पहुंची तो उन्होंने सीधे एनडीटीवी के दफ्तर में बात की। मामले में जांच-पड़ताल हुई और श्री साहू के रिश्तेदार को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। नौकरी गंवाने के बाद श्री साहू के रिश्तेदार ने भोपाल के एक साप्ताहिक का संवाददाता बन अफसरों के घर में अखबारों को फिंकवाया भी, लेकिन कहते हैं न जो जलवा एक बार अपनी ईहलीला समाप्त कर लेता है वह फिर दोबारा पैदा नहीं होता। यहां भी ऐसा ही हुआ। चैनल के पत्रकार को दुआ सलाम करने वाले अफसरों ने अखबार को पलटना भी जरूरी नहीं समझा।
वैसे राज्य निर्माण से कुछ पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा बोलबाला ओपन आइस का ही था। इस चैनल को यहां शिवसेना के छत्तीसगढ़ प्रमुख धनजंय परिहार संचालित किया करते थे। चैनल अच्छा-खासा चल रहा था कि इसमें काम करने वाले मीडियाकर्मियों ने एक धमाकेदार करतूत कर डाली। वैसे इसे करतूत कहना ही ठीक होगा क्योंकि जब कोई खबर प्रसारित होने के बजाए वर्जन के नाम पर किसी और तरह की सुविधा तलाशने लगती है तो फिर गड़बड़ी हो ही जाती है। चैनल के कर्ताधर्ताओं ने एक रेस्ट हाउस में प्रदेश के एक मंत्री और छत्तीसगढ़ी फिल्म की बेहद प्रतिभा संपन्न हिरोइन को कुछ ऐसे-वैसे अन्दाज में पकड़ लिया था।
बताते हैं कि मंत्री के नए तेवर को सार्वजनिक करने की धमकी-चमकी चल ही रही थी कि चैनल के दफ्तर में छापा पड़ गया और ओपन आइस अचानक आकाश चैनल में तब्दील हो गया। वैसे प्रदेश में आकाश चैनल की शुरुआत बहुत तामझाम के साथ हुई थी, लेकिन चैनल की ज्यादातर खबरें सरकार के पक्ष में ही प्रसारित होती थी। थोड़े ही समय में विपक्ष का यह आरोप भी सामने आ गया कि चैनल में कांग्रेस के प्रमुख नेता अजीत जोगी का पैसा लगा हुआ है। विपक्ष के इस आरोप के बाद भी चैनल चलता रहा। चैनल ने अपना काम तब समेटा जब अजीत जोगी का नाम विधायकों की खरीद-फरोख्त में सामने आया और भाजपा की सरकार काबिज हुई। हालांकि भाजपा की सरकार काबिज होने के बाद एक मंत्री के भाई ने भी ईरा फिल्म्स के संचालक संतोष जैन के साथ मिलकर सीसीएन अभीतक नाम से एक चैनल खोला। यह चैनल यहां रायपुर के रामसागरपारा में संचालित होता रहा। बाद में श्री जैन ने चैनल से नाता तोड़ लिया। उनके नाता तोड़ने के बाद एम चैनल की शुरूआत हुई। बताते हैं कि अब इस चैनल ने एक बड़े अखबार समूह के साथ पार्टनरशीप कर ली है।
राज्य निर्माण के शुरुआती दिनों में यहां जैन टीवी और रोजाना के पत्रकार भी किराए का कमरा लेकर रहते थे। जैन टीवी बंद होने के साथ ही चैनल के साथ जुड़ाव रखने वाले पत्रकारों का आशिया भी उजड़ गया। दिल्ली के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने बीएलजी नाम की एक कंपनी खोल रखी थी। इस कंपनी के चैनल रोजाना के लिए दिल्ली के एक युवा पत्रकार समरेंद्र खबरें बनाया करते थे। व्यवस्था से हमेशा नाराज रहने वाले समरेंद्र ज्यादा दिनों तक छत्तीसगढ़ में नहीं रह पाए। जोगी के शासनकाल में ही स्टार न्यूज के दिनेश आकुला ने शानदार पारी खेली थी। बताते हैं कि एक रोज किसी नेता के पुत्र ने उनसे कह दिया यदि वे सरकार के पक्ष में खबर दिखाएंगे तो वे सरकार से उन्हें चंदूलाल चंद्राकर की स्मृति में गठित किया गया दो लाख रुपए का पुरस्कार दिलवा सकते हैं।
वर्ष 2003 के आसपास घटित इस वाकए को लेकर तब राजनीति के गलियारों में खूब चटखारें लगा करते थे। कुछ समय बाद उनका भी चैनल की नौकरी से मोहभंग हो गया। बीच में यह खबर आई थी कि वे अपना खुद का चैनल खोलने के बारे में सोच रहे हैं। इधर एक स्थानीय अखबार में उनकी खबरें हैदराबाद डेड लाइन से कभी-कभार देखने को मिल जाती है। ईटीवी के लिए प्रवीण सिंह ने काफी अच्छी पारी खेली। इन दिनों वे सहारा समय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जब उन्होंने ईटीवी को अलविदा कहा तो भोपाल के एक बड़बोले पत्रकार प्रफुल्ल पारे ने ईटीवी की जवाबदारी संभाली। वे भी लंबे समय तक ईटीवी में नहीं रहे। श्री पारे के बाद संजय शेखर ने यहां लंबी और अच्छी पारी खेली लेकिन जैसे ही उन्हें यह आभास हुआ कि अब टीवी की बागडोर राजस्थान के सेवानिवृत अफसर जगदीश कातिल संभालने वाले हैं, उन्होंने साधना का दामन थाम लिया। खबरों की विश्वसनीयता के मामले में साधना ने दो स्थानीय चैनल सहारा और ईटीवी को पीछे छोड़ दिया है।
भाजपा के दूसरी बार सत्ता में काबिज होने के कुछ दिन पहले यहां छत्तीसगढ़ में पुलिस अफसर रहे रूस्तम सिहं ने भी एक चैनल के जरिए दस्तक दी थी। इस चैनल की कमान हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध ने संभाली थी, लेकिन कुछ ही दिनों में चैनल ने दम तोड़ दिया। यहां काम करने वाले कर्मचारी कई दिनों तक तनख्वाह के लिए भटकते रहे। दिल्ली के मित्तल बंधुओं ने वाइस चैनल की शुरूआत की थी। त्रिवेणी ग्रुप का यह चैनल न तो देश में रंग जमा पाया और न ही छत्तीसगढ़ में।
प्रदेश में अब भी क्राइम न्यूज, रायपुर एक्सप्रेस, चैनल-वन, आईबीएन सेवन, टाइम्स नाउ, एचएम-वन, प्रखर टीवी, इंडिया टीवी, साधना चैनल, आजतक, एएनआई, न्यूज 24, ग्रांड चैनल, इनसाइट टीवी, एवी विजन सहित लगभ दो दर्जन चैनलों की दस्तक बनी हुई है, लेकिन अब भी कभार यह सुनने को मिल जाता है कि अमुक चैनल में उड़ीसा के सांसद का पैसा लगा हुआ है, तो किसी चैनल के रिपोर्टर के बारे में यह कहा जाता है कि वह सिमगा के पास आरटीओ के उड़नदस्ते की फिल्म बनाने में लगा हुआ था। एक चैनल के रिपोर्टर के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह मात्र होली के दिन ही भांग खाता है और कपड़े फाड़-फाड़कर नाचता है। भांग खाकर तमाशे मचाने वाला रिपोर्टर जिस चैनल से जुड़ा हुआ है उस चैनल को कई पत्रकार अंतिम प्रणाम कर चुके हैं।
लेखक राजकुमार सोनी छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा इस समय रायपुर में हरिभूमि अखबार से जुड़े हुए हैं.












manuj kumar shrma
January 21, 2011 at 7:14 pm
दूसरॊं पर अंगुली उठाने पहले खुद के गिरेबान में झांक लिजिए सॊनी जी कि क्या तुम वास्तव में पत्रकार हॊ। हिमांशु दिवेदी के घर का राशन लाना जितना अासान है उतना ही आसान इस तरह का लेख लिखना है। शायद यशवंत जी तुम्हे नहीं जानते है और लॊग तॊ जानते है कि तुम कितन बड़े पत्रकार हॊ। दॊ लाइन समाचार बनाना पहले सीखॊ तब किसी के बारे में लिखाना ।
reporter
January 21, 2011 at 7:11 am
lage raho munna bhai ek dusre ke pol kholne me. hamam ke andar sab ek dusre ka nap lo fir batana kiska bada hai.
संजीव तिवारी
January 20, 2011 at 3:12 pm
उपर एक टिप्पणी में कहा गया है कि ‘लेखन का अंदाज एसा है की जिसे सिर्फ एक पत्रकार ही समझ सकता है,,’ मैं पत्रकार नहीं हूँ, मुझे राजकुमार सोंनी जी का यह आलेख सिर्फ पत्रकारों के लिये लिखा गया प्रतीत भी नहीं हो रहा है बल्कि इसमें छत्तीसगढ़ के टीवी पत्रकारिता की हालात के दर्शन हो रहे हैं। टीवी पत्रकारिता के ऐसे पहलू जिसे गैर पत्रकार नहीं जानते इस आलेख से जान पा रहे हैं।
टिप्पणियों में मत भेद के स्थान पर मन भेद की बाते हो रही है और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं जिससे कुछ हासिल नहीं होने वाला। आलेख के विषय में विमर्श करें तो गैर पत्रकारों का भी ज्ञान बढ़ेगा। जहां तक राजकुमार सोनी जी की बात है तो उन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, उपर जो टिप्पणियों में उनके संबंध में बातें की गई हैं वे निराधार हैं, वे धुन व लगन के पक्के जुझारू पत्रकार हैं।
rajkumar soni
January 23, 2011 at 10:13 am
संजीव जी
आपको लग सकता है कि मैं एक बार फिर मौजूद हो गया हूं। सच तो यह है कि वाकई मैं बार-बार लौटना नहीं चाहता…. लेकिन फितरत ऐसी है कि कभी पीछे नहीं हटा सो जवाब देने चला आया। आपने मेरी अंतिम टिप्पणी पर मानसिक संतुलन बिगड़ जाने का अंदेशा जताया है। आपका ऐसा सोचना आपके हिसाब से ठीक हो सकता है क्योंकि आप इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े हुए हैं। मेरा तो यह अनुभव रहा है कि इस मीडिया की ज्यादातर खबरें अंदेशे पर ही आधारित होती है और सौ में से 95 फीसदी झूठ पर आधारित होती है। यदि इस पर कोई लंबी बहस चाहेंगे तो वह भी बता दूंगा। चैनल में बाइट और विजुअल बनाने के नाम पर क्या कुछ होता है वह अब बच्चा-बच्चा जानता है। हमारे यहां भी बहुत से चैनल वाले घटना स्थल पर तब पहुंचते हैं जब घटना खत्म हो गई होती है। दृश्यों को कैद करने के लिए धरना करने वाले लोगों से कहा जाता है कि भाइयों एक बार कैमरे के सामने फिर से नारा लगाइए। यदि नक्सली नहीं मिलता है तो कैमरामेन ही मुंह में पट्टी बांधकर दर्शकों को अपना संदेश दे देता है। तो ऐसा है बंधुवर अपना मानसिक संतुलन तो ठीक है और आगे भी रहने वाला है। इधर छत्तीसगढ़ मे मनोचिकित्सकों की कमी बनी हुई है अन्यथा आप से घर का पता लेकर अपने स्वस्थ व सकुशल होने का प्रमाण पत्र भी आपको भिजवा देता। बहरहाल मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि लेख का प्रकाशन होने के बाद वे लोग जो अब तक अपनी नहीं बल्कि रूपा की चडडी पहनकर घूम रहे थे उनकी चड़डी उतर चुकी है। विचित्र किन्तु सत्य बात बता रहा हूं कि खबर के प्रकाशन के बाद दो-चार मुफ्तखोर लोगों ने अपने गम को प्रफुल्लता में बदलने के लिए शराब को अपना सहारा बना लिया है। सहमति-असहमति हर जगह होती है संजीव जी लेकिन जब लोग नितांत निजी होने लगे तब मुझे अदम गोंडवी जी शेर याद आ गया- नंगे अल्फाज की तोहमत न लगाओ हमपे एक तल्ख सच्चाई है जो बेलिबास होती है। मैंने तो अंतिम टिप्पणी में खुली चुनौती दी है… मां के दूध का वास्ता दिया है। जो मां के दूध की कीमत और उसके महत्व को समझते होंगे वे अपना असली परिचय देते हुए सामने आ जाएंगे अन्यथा हिजड़ों से लड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
हां… निम्न विषय पर अभी टिप्पणी और अपेक्षित है
1- साला सोनी पागल हो गया है
2-रंडीबाजी करता है
3-दारू पीता है
5- राशन पहुंचाता है
6- लिखने-पढ़ने की तमीज नहीं आती
7- पैसा खाता है
8- दलाली करता है
9- बोझ बना हुआ है
10-हमाम में चड़डी पहनकर नहाने की कोशिश कर रहा है
11-जल्द ही नौकरी से निकाला जाने वाला है
12-अब तुम्हारी भी फाड़ने की तैयारी चल रही है
raghav
January 20, 2011 at 1:25 pm
किसी की बुराई तलाश करने वाले की मिसाल उस मक्खी सी है… जो पूरा खूबसूरत जिस्म छोड़कर सिर्फ जख्मों पर बैठती है…
anil
January 20, 2011 at 1:17 pm
rajkumar,
pappuon ki tarah baaten mat karon,lagta hai aaj tumne din me hi pee li hai ,mudde ki baat ye hai ki tum itne imaandaar patrakaar ho to apne akhbaar ki aad me chal rahe koyle ke kaale kaarobaar aur dalali ke khel ke baarey bhi logon ko batao, aur ye bhi batao ki tumhare akhbaar ke pravandh sampadak himanshu dwiwedi akhbaar ka kaam karte hai ki koyle ke kaam ke liye sarkar aur tumhare akhbaar ke maalikon ke beech dalali ka kaam karte hai …likho jaroor, mujhe tumse badee umeedee hain, ab plsss apni baniyaan mat faadna aur idhar udhar ki baaten mat karna , likhna aur sirf likhna haribhoomi , koyle ka kaarobaar aur apne prabandhj sampadak ki dalali ke kaam ke baarey me ,
manish gupta
January 20, 2011 at 11:04 am
cong/ great way futur plan ..
rajkumar soni
January 20, 2011 at 9:42 am
मिस्टर अनिल,
मुझे नहीं मालूम था कि मेरे एक लेख से आपकी बुरी तरह सुलग जाएगी। यदि मुझे यह पता होता कि मेरे लिखे हुए से आपकी महान आत्मा छलनी-छलनी हो जाएंगी तो यकीन मानिए मैं यह लेख कभी नहीं लिखता। मुझे यह जरा भी अच्छा नहीं लगता कोई आप जैसा तथाकथित उधार मांगकर जीने वाला शरीफ आदमी अपने कपड़े फाड़ ले और स्वयं को भिखारी साबित कर किसी लंगर में पगड़ी पहने हुए लोगों से रूह-आफजा मांगता फिरे। शरीफ मैं आपको इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आपकी टिप्पणियों से ही मुझे पता चला कि जहां एक राज्य का संवैधानिक प्रमुख रहता है वहां कुछ लोग रंडियों से सौदेबाजी करते हैं। उम्मीद है कि आपकी ताजा और पुष्ट जानकारियों से किसी अखबार नवीस को प्रेरणा मिलेगी और वह उस पर कोई नई खबर बनाएगा। आखिर आपने एक नई जगह का परिचय जो दिया है। अब रहा सवाल किसी अखबार में बोझ और किसी की दलाली का।….. तो श्रीमानजी इस बारे में मेरा कथन सिर्फ इतना है कि चड़डी और बनियान की तरह अखबार को बदल देने आपको यह लगता होगा कि आप बहुत प्रतिभाशाली है… मुझे ऐसा नहीं लगता। आप बड़े पत्रकार है श्रीमानजी… आपको देश और दुनिया के अखबार वालों ने बुला-बुलाकर नौकरी दी होगी। हमारे साथ तो ऐसा नहीं हुआ महोदय। हम तो अब भी मानते हैं कि हमें एक न एक दिन फिर अखबार के दफ्तर में नौकरी के लिए जाना पड़ सकता है। कहते हैं न अखबार के दफ्तर में पत्रकारों के ऊपर तलवार लटकी ही रहती है। खैर अब पांच सालों से तलवार मेरे ऊपर गिर ही नहीं रही तो मैं क्या करूं। हां मुझे आपके बारे में यह भी पता चला है कि आप छत्तीसगढ़ से बैठकर ही वाशिंगटन पोस्ट भी निकाला करते थे। कुछ दिनों तक आपने दक्षिण अफ्रीका के अखबारों को भी अपनी सेवाएं दी है। चलिए श्रीमानजी हम तो बोझ है… कम से आप तो ये बताओ कि आपको किस-किस संस्थान ने धक्का मार-मारकर निकाला है। अब यह मत कहने लगना कि मुझे किसी ने धक्का नहीं मारा बल्कि मैंने ही संस्थान को धक्का मारा है। क्या श्रीमानजी कि जब आदमी तर्क और बुद्धि के स्तर पर पंचर हो जाता है तो सबसे पहले वह लोगों को दलाल कहता है। फिर किसी रंडीबाज और फिर मुंह को गोल-गोल बनाकर आसमान की ओर थूंकने लगता है।
anil
January 20, 2011 at 8:38 am
manojji,
darasal rajkumarji gande aadmi nahin hai ghinone aadmi hai ye yahan chhattisgarh me sabhi jaante hai , isiliye inhe india TV hi nahin kisi doosre akhbaar ke kaabil bhi nahin samjha gaya , aur filhaal haribhoomi akhbaar inhe dho raha hai baaki aapke liye ek salah hai ki aap rajkumar soni jaise ghinone logon ke baarey me comment kar apni aap ko beijjat mat kijiye , wo jahan hai use wahi pade rahne dijiye .aur rajkumar tum bhi thoda dhyaan rakho bhai,
kuch haribhoomi ke baarey me bhi likho, unki koyla dalali ke baarey me bhi likho aur us dalali me tumhari khurchan paani ke baarey me bhi likho , halaki tum to shayad uske layak bhi nahin ho ,lekin bhala ho himanshiji ka jinhone tum par taras khaya ab tak dho rahe hain ..
vaise patrakarita ke is hamaam me nange to sabhi hai..tum bhi paisa khatee hi hoge , bas tumhe kam milta hai ya nahin mil pata to tum tadap rahe ho hamaam me nange sabhi hai lekin ise aur jyada ganda mat banao …rajkumar…
rupesh
January 20, 2011 at 7:13 am
Wah kya patrakarita hoti hai…
36gadiya……
Sable badiya………
Sanjay Shekhar
January 20, 2011 at 5:54 am
अनिल जी,मैं आपकों नही जानता लेकिन आपकी प्रतिक्रिया से ऐसा जान पड़ता है कि आप मेरे बारे में खबर रखते है। अच्छी बात है। मैं सामान्यतह ऐसी टिप्पनियों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही करता,लेकिन आपने मेरी पत्रकारिता की निष्ठा और व्यक्तित्व पर सवाल उठाया है इसलिए सिर्फ इतना कहूंगा कि- आप जागरुक है। चीज़ो पर नज़र रखते है। कृपापूर्वक अपने कथन के बारे में पूरी जांच कर ले। पिछले एक साल में पुलिस ने भी जांच की होगी,उससे भी कुछ तथ्य मिल जायेंगे। कुछ वरिष्ठों ने भी मुझे मिटाने की कोई कसर नही छोड़ी थी उनकी भी मदद लीजिये और मेरी चुनौती स्वीकार कर कृपापूर्वक पूरी सच्चाई सामने ले आईये। चाहे तो दूनिया की किसी भी ऐजेंसी से पूरे मामले की जांच करा लीजियें। मैने खुद भी इस आशय का पत्र लिखकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच का आग्रह राज्य के मुख्यमंत्री,गृहमंत्री और डीजीपी से किया हुआ है। मैं सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा करता हूं कि जिस दिन आप अपने कथन को सही साबित कर देंगे,मैं पत्रकारिता छोड़ दूंगा। एक बात और मैने विकल्पहीन होकर पत्रकारिता को नही अपनाया है बल्कि अच्छा-खासा कैरियर छोड़कर पत्रकारिता का दामन थामा है,लिहाजा आस्तीन में छुपे हुए सांप सरीखे कुछ दोस्तों की वजह से मैं हार माननेवाला नही हूं। एक शेर अर्ज करता हूं कि-
दोस्तों का चेहरा पहचान लिया हमने,
अब दुश्मनो से डर नही लगता।
आश्तीन में छुपाकर खंजर वो आये थे मिलने गले,
मैने बांहे फैलाई ये मेरी मुहब्बत का तकाजा था।। एक बात और-
खामोश है उन्हें खामोश ही रहने दो,
खुद के नशे में मदहोश ही रहने दो।
शायद अंदर दबी हो कोई चिन्गारी,
हवा मत दो उसे राख ही रहने दो।
nikhlesh shukla bhilai
January 20, 2011 at 5:51 am
Rajkumar jikhara sona hai ,lage rahiye bhadas ek behatar jagah hai, badhai ho
rajkumar soni
January 20, 2011 at 5:38 am
जो लोग फर्जी नामों से फड़फड़ा रहे है उनका फड़फड़ाना स्वभाविक है। मुझे अन्दाजा था ऐसा होगा। एक महाश्य ने मुझे तुला राशि और तराजू का पलड़ा वगैरह जैसे शब्दों से भरमाने की कोशिश की है। सच तो यह है महोदय कि मुझे न तो आत्ममुग्धता की बीमारी है और न ही मेरा यकीन न्यायधीश किस्म का पत्रकार बने रहने में है। मैं ही क्या पूरी दुनिया को यह पता चल चुका है कि न्यायधीश किस्म के पत्रकारों के चलते ही पत्रकारिता की जबरदस्त ढंग से मां- बहन होती रही है। किसी सज्जन ने यह भी बताया है कि राज्य के संवैधानिक भवन के पास हवस मिटाने वाली लड़कियां मिलती है। अच्छा हुआ महोदय आपने बता दिया अन्यथा मुझे तो अब तक यही पता था कि शरीर और आत्मा को तृप्त करने वाली महिलाएं सिर्फ आपके मोहल्ले और आपके घर के आसपास ही पाई जाती है। नई जानकारी मुहैय्या कराने के लिए शुक्रिया। जहां तक चैनलों में काम करने की बात है तो यह बात मैं खुलकर बोल ही सकता हूं कि मैंने अपने कुछ निकम्मे और अलाल मित्रों के लिए उनके नाम से स्टोरी बनाई है। वह भी इसलिए किया क्योंकि मित्र चैनल में ठूंस तो लिए गए थे लेकिन उन्हें खबर बनाने की तमीज नहीं थी। हो सकता है पुराण में कुछ मित्रों का नाम छूट गया हो।
rajkumar soni
January 20, 2011 at 5:22 am
ऊपर जो लोग फर्जी नाम से फड़फड़ा रहे है उनका फड़फड़ाना स्वभाविक है.
मुझे इस बात का अन्दाजा था कि ऐसा होगा.
मुझे तुला राशि और तराजू का पलड़ा आदि का भ्रम पहले भी कभी अच्छा नहीं लगता था न अब अच्छा लगता है। मैं न तो आत्ममुग्ध रहता हूं और न्यायधीश बनने की मेरी इच्छा है। इस देश की पत्रकारिता का सबसे बड़ा बेड़ा गर्क तो न्यायधीश किस्म के पत्रकारों की वजह से ही हुआ है। हां एक सज्जन ने नई जानकारी दी कि मैं राजभवन के पास रंडियों को खोजता रहा हूं। अच्छा हुआ आपने बता दिया कि राजभवन के पास ऐसा होता है। अन्यथा मैं तो समझता था कि आप जिस मोहल्ले में रहते हैं सिर्फ वहां ही रंडिया मिलती है।
anil
January 19, 2011 at 3:33 pm
इस लेख में ४ मामलों की और कमी है.dear soni
नंबर एक :- पत्रकारिता के सबसे बड़े दलाल के रूप में कैसे जाने जाते है और कैसे पत्रकारिता का सत्यानाश कर रहे हैं आपके अखबार के प्रबध संपादक हिमांशु और कोयले की दलाली में उनका ध्यान ज्यादा रहता है बजे खबरों के .
नंबर २ :- साधना न्यूज़ के कर्ताधर्ता संजय शेखर कैसे एक एक सरकारी अफसर की उसके पत्नी के साथ अत्यंत निजी छड़ों की CD को कुछ ठेकेदारों से पैसा लेकर बिना कुछ सोचे चलाये थे और पत्रकारिता को शरमसार किया .
नंबर ३ :- आज तक के सुनील जी ने कैसे सरकारी सर्किट हाऊस पर ५ साल तक कब्ज़ा जमाये रखा और उसे अयाशी का अड्डा बना दिया ,
नंबर ४.:- अपनी मुफलिसी के दिनों में कैसे आप खुद शराब के लिए लोगों से ५०० – १००० रुपये लेकर खबरे छाप दिया करते थे और अपने चंद दोस्तों के साथ राजभवन के नजदीक रिक्शे में घूम रही वेश्याओं को रेट कम कराकर अपनी हवास मिटाया करते थे
वैसे सभी चेनलों के साथ सभी अखबारों का भी लम्बा चौड़ा पुराण है उस पर भी कुछ लिखिए जनाब जैसे हरिभूमि , छत्तीसगढ़ , दैनिक भास्कर और दुसरे अखबार
rahul
January 19, 2011 at 2:51 pm
वाह भाई सोनी जी क्या खूब लिखा …….एक कहावत है बुरा जो देखन मै चला ……………! शायद आप के लेखनी में वन साइड स्टोरी ……की खुसबू आ रही है ….आप के इंसाफ रूपी लेखनी में तराजू के एक पडले में ही सब कुछ रख दिया …….पुराने खेलारीयो पर भी प्रकाश डालिए…… ?… क्यों …? आप प्रिंट से जायदा लगाओ रखते है …….डर तो नहीं न रहे की बिरादरी से बाहर होने का …….बुरा लगे तो छमा………आप का अनुज …….. राहुल सिंह मऊ……..9415220003
Manoj Raj Singh
January 19, 2011 at 1:01 pm
राजकुमार जी आपकी बातें अक्षरश: सही हैं, लेकिन आप ने यहां उन पत्रकारों का जिक्र किया है जो या तो आपके करीब रहे हैं या फिर हैं…आपने गोविंद साहू का नाम लिया लेकिन रितेश साहू को सिर्फ रिश्तेदार लिखा, ये समझ से परे है…आपका ये लेख सार्वजनिक पोर्टल पर है, लेकिन लेखन का अंदाज एसा है की जिसे सिर्फ एक पत्रकार ही समझ सकता है,,,,एसी पहेलियां बुझाकर क्या हासिल करना चाहते हैं आप।
दूसरी बात ये की आपने प्रफुल्ल पारे की बात की, संजय शेखर की बात की लेकिन राजेश सिंह की बात करना भूल गये…ये वही राजेश है जिसकी मौत के पहले तक आप उसे अपना सबसे करीबी दोस्त कहा करते थे…ईटीवी में क्या हुआ वो सब जानते हैं, लेकिन राजेश की मौत के बाद अब तक किसी छत्तीसगढ़ के पत्रकार में इतना दम नहीं हुआ की वो इंडिया टीवी ज्वाइन कर सके….और ये आप ही हैं जो राजेश की मौत के बाद ये कहते फिर रहे थे की वहां का आफर आप के पास आया था, लेकिन आप ने ज्वाइन नहीं किया…तो भाईसाहब आप बड़े हैं, सीनियर हैं, आरदणीय हैं, लेकिन यहां अपने हितों के लिए सार्वजनिक स्थान का चयन करना मेरे लिहाज से सही नहीं है।
girish kesharwani raipur
January 19, 2011 at 12:25 pm
bahut badhiya sir ji
rajkumar soni
January 22, 2011 at 8:29 am
देश के भावी सलाहकार संपादकों अनिल और मनुजी
अव्वल तो उक्त दोनों नाम तुम्हारे असली बाप ने दिए होंगे ऐसा मुझे लगता नहीं है। यदि असली है तो अपनी पहचान तो बताओ कि महानुभावों आप लोग किस अखबार या चैनल से जुड़े हो… कहां के स्वयंभू हो भाई यह तो पता चले। किस बैरियर के पास खड़े होकर पुलिस की वर्दी में ट्रक वालों को लूट रहे हो यह तो पता चले। वैसे भी मैं नहीं बल्कि बड़े बुर्जुग यह कह गए हैं कि लड़ाई हमेशा औकात वालों से करनी चाहिए। सो मैं तुम्हे तुम्हारी मां की शपथ देकर कहता हूं कि अपनी पहचान बताओ और फिर टिप्पणी करो….यदि तुम दोनों ने अपनी मां का दूध पीया है तो पूरा परिचय दो और फिर देखो उलझना किसे कहते है। जिस स्तर पर चाहोगे उस स्तर पर जवाब दिया जाएगा। यदि यशवंतजी अपने पोर्टल पर इस लड़ाई को जारी न रखना चाहे तो मेरे ब्लाग बिगुल पर आप सबका स्वागत है। मैं टिप्पणियों का दरवाजा हमेशा खुला रखूंगा, लेकिन आना एक मर्द की तरह। बुर्का ओढ़कर टिप्पणी करने वालों को पूरी दुनिया क्या बोलती है सबको पता है। जब लड़ने के लिए खुजला ही रहो तो ठीक से खुजला लो। इसी बहाने पता चल जाएगा तुम्हारी औकात क्या है। मामुओं…. और एक नई जानकारी देता हूं….. अभी इस खबर की मैं दूसरी और तीसरी किस्त भी लिखूंगा… जो उखाड़ लेना है उखाड़ लेना….। हां देश के दो साप्ताहिक अखबारों ने इस लेख का प्रकाशन भी कर दिया है। जिसमें एक नवप्रदेश है। …. तो सलाहकार संपादकों आप लोगों में से एक ने मुझे अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दी है तो दूसरे का कहना है कि मुझे प्रिंट मीडिया के ऊपर भी लिखना चाहिए। तो… श्रीमानजी… ऐसा है कि मैं अपने जीवन में जो कुछ करता आया हूं उसके पीछे दिल की बड़ी भूमिका रहती है। मेरा जो दिल कहता है मैं वही करता हूं। यदि मैं घटिया लोगों की सलाह पर चल रहा होता तो अब तक आप लोगों के समान ही हर गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले यही पता लगा रहा होता कि आज कहां भंडारा होगा। कहां आलू चने की सब्जी मिलेगी। लंगर में शरबत पाने के लिए कपड़े फाड़कर अपनी छोटी बहनों को बेसहारा बताने वाले पत्रकारों कम से कम यह तो बताते जाओ कि आपको किन-किन संस्थाओं से लात मार-मारकर निकाला गया है। मजे की बात यह है कि छिलटों कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में तुम्हारे नामों से कोई परिचित ही नहीं है। सबको इसी बात का आश्चर्य हो रहा है कि अच्छी-भली वैचारिक बहस में ये कौन लोग है जो जबरिया अपना महत्व प्रदर्शित करने के लिए टपक पड़े है। मैं तो इसी बात से खुश हो रहा हूं कि मेरा एक लिखे हुए से तुम्हारे पिछवाड़े में आग लग गई है। हां लेख में जरूर तुम दोनों का जिक्र नहीं है। सच तो यह है कि कोई तुम दोनों को जानता ही नहीं। अब यदि बताओंगे कि हमने यहां-यहां उखाड़ा है तो फिर पता चलेगा कि तुमने छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को कितना अमूल्य योगदान दिया है। अब यदि इसके बाद अपने परिचय के बगैर टिप्पणी की तो मैं यही मानूंगा ( हां फर्जी परिचय मत देना ) तुमने अपनी मां की इज्जत भी नहीं रखी। तुम्हे तुम्हारी मां की इज्जत का वास्ता…. आना तो ढंग से ढंग से आओ मैदान में और फिर देखो………
sanjeev
January 22, 2011 at 3:11 pm
यशवंत जी, आपसे सीधा परिचय नहीं है। मैं सहारा समय के एक रीजनल चैनल में काम करता हूं। अकसर आपके ब्लॉग के ज़रिए देश के मीडिया की हलचलें जानने समझने के लिए आता हूं। कई बार टिप्पणियां भी छोड़ता हूं, जहां मुझे लगता है कि मेरी समझ इजाज़त देती है। लेकिन इस लेख के बाद की टिप्पणियों और उन पर लेखक के बार बार और आखरी जवाब को पढ़ कर लगता है कि आपको अब इस पर लगाम लगानी चाहिए। सोनी जी का मानसिक संतुलन खराब हो जाए गुस्से में इन लोगों की तीखी टिप्पणियां पढ़ पढ़ कर, उसके पहले ही मुझे लगता है कि आपको सभी टिप्पणीकारों को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। मैं भड़ास को एक बहुत बड़ा प्लैटफॉर्म मानता हूं, और मेरा निवेदन है आपसे कि ऐसे टुच्चे निजी झगड़े वाले लोगों को इतने बड़े मंच को गंदा करने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए। ये लोग अपने गली मुहल्ले नुक्कड़ पर भी खडे हो कर भड़ास निकाल सकते हैं। उम्मीद है प समझेंगे।
shubham verma
January 24, 2011 at 12:11 pm
Sir,
Apne Aj Mere Purane din Yad Dila Diye Apke Lekhan Se Main Bahut Khush Hua.
Main chhattisgarh Ke Media Mein 1999 Se Juda Hu Jab Dhanjay Ji Ka Open Ice Aur Ajay Sharma Ji Ka Abhitak News Chalta Tha. Maine Apna Shurwad Ek Camera man se kiya. phir Akash Channel Mein NLE Editor Raha Jo Sarkar Bdalne Par Band Ho Gaya, Phir Abhi Tak (Era Film) Cabelwar Mein Eksal Bad Band Ho Gaya, Usi Bich G Today, N Channel Aur Abhi Wahi M Channel Ke Nam Se chal Raha Hai. Sath Mein Grand Jo 60% Chal Raha Hai Ye Sab Cable Ke hi News Channel Hai Jo Sirfa [u]Nam Ka Hi News Channel Hai Inka Kam Sirf Cable Network Chalana Hai.[/u]
Isi Bich Prakhar News Shuru Huwa Tha Jo Ab Band Pada HAi Par Phir Se Chalu Hone Ke Liye PhadPhada Raha Hai.
Hindustan News Chalu Chal Rah HAi Jiska Chhattisgarh Mein Karib 36 School Chala Raha Hai Sath Mein National look News Paper. Abhi Tak Ye Samajh Nahi Aya Ki Inke Malik Ke Pas Itna Paisa Aya Kaha Se Lekin Abhi Sharma Ji Ko Film Banane Ki Chaska Hai.
Bhai Sahab Main Apke Bato Se Ekdam Sahamat Hu Main Hamesh Apne Ap Ko Koshta Rahta Hu Ki MAin Galat Fild Mein A Gaya Ya mujh Chhattisgarh Mein Nahi Bahar Jakar Naukri Karna Tha.
SHubham Verma, Raipur
manuj kumar sharma
January 24, 2011 at 6:45 pm
श्रीमान सॊनी जी आप भड़क क्यॊं रहे हैं जॊ सही है वॊ लिखा हूं। रही बात परिचय बताने की तॊ मेरा नाम तॊ आप जानते ही है मेरे पिता जी श्री रामेश्वर शर्मा ग्रामपॊस्ट विक्रमपुर तहसील सिकंदरपुर जिला बलिया उत्तरप्रदेश
पिताजी कालेज टीचर है और मै रायपुर एनआईटी से २००६ में बीटेक करके हैदराबद में कार्यरत हूं यहां का पता डी ६६९ रामजीपुरम नार्थ ब्लाक अहमदाबाद । अगर बहस की इतनी ही ईच्छा है तॊ मै मई में आउंगा रायपुर कर लेना चाहे विषय जॊ भी हॊ उसके इतर भी कुछ करना हॊ तॊ स्वागत है सॊनी जी हां घर का पता भी दे दिया हूं अगर घर वालॊं पर कुछ करना है तॊ वॊ भी कर सकते हॊ हां रायपुर से ही वहां जाने की हिमाकत मत करना नहीं तॊ
मै तॊ तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता था रायपुर प्रवास के दौरान ही मै सबकुछ देखा था वॊ लिखा हूं रॊज सबेरे राशन पहुंचाना लान की घांस कटवाने के लिए माली बुलाना नहीं मिलने कर्म का हवाल देकर पर खुद ही काटना यह सब तुम्हारी दिनचर्या में शामिल था। और तुम चेहरे से पहचानते भी हॊ मुझे ।
rajkumar soni
January 25, 2011 at 12:30 pm
नाम है मनुज कुमार
कौन भड़क रहा है महाश्य
तुम्हारा पीपलपेड़ के पास, पराठेवाली गली और यहां से बीटेक करने के बाद कहां अहमदाबाद, हैदराबाद वाला पता मिल गया है, लेकिन दुर्भाग्य से जो पता तुमने दिया है वहां मेरे कुछ मित्र रहते हैं मैंने पता लगवा लिया है वह पता भी तुम्हारे नाम की तरह ही फर्जी निकला है। सच तो यह है कि तुम्हारे नाम को छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में कोई नहीं जानता । अब तुम कथित तौर पर बीटेक-फीटेक करके कहीं अपनी ऐसी-तैसी करवा रहे हो तो उससे मुझे क्या करना। मैं अपने और दूसरे पेशे में जिन्हें अच्छा मानता हूं उनके साथ ही उठता-बैठता भी हूं। मैं तुमसे कभी मिला भी होऊंगा यह मुझे याद नहीं। तुम याद रखो… जब रायपुर आओगे तो मिलकर बता देना..। अच्छी बात यह है कि तुमने लिखा है मैं तुम्हें चेहरे से पहचानता हूं। यह तुमने ठीक लिखा है क्योंकि अच्छे व समझदार लोगों को तो एक बार की मुलाकात के बाद नाम से भी याद रखा जा सकता है लेकिन अपराधियों को तो चेहरे से पहचानना होता है। थोड़ा अपनी कद-काठी व हुलिए के बारे में बता दोगे तो अपने दो संवाददाताओं को थाने-थाने भेजकर यह भी पता लगा लूंगा कि तुम्हारी फोटो कहां लगी हुई है। उम्मीद है मेरी यह टिप्पणी तुमको पंसद आएगी। इसके बाद तुम कुछ छिलटों के साथ बैठकर चार पैग ज्यादा पीओगे और मुझे गाली दोगे इसका भरोसा भी है मुझे। हा…. हा…. हा….
जय हो…. जय हो…….
anil
January 26, 2011 at 9:57 am
baaten itni badee badee aur kaam aise ki achche khaase patrakaaron ko sharam aa jaye ,jo aadmi apne sampadak ke ghar ka rashan lata hai , shashan aur prashanshan ki khabron ki bajay unki je hujuri karta hai , wo patrakar to nahin ho sakta ..maaf kijiyega , papoo ( rajkumar) ko maine galti se aadmi likh diya hai ..
rajkumar soni
January 27, 2011 at 5:41 am
एक ने अपना और अपने बाप का नाम भी गलत बताया
दूसरा कुछ दिनों तक बुर्का ओढ़कर लहंगे में घुसे रहने के बाद फिर से मौजूद हो गया है।
मैं पहले भी लिख चुका हूं। एक बार फिर लिख रहा हूं-
मैं कमजोर, बेसहारा, विधवाओं और बच्चों से सहानुभूति रखता हूं सो इनके बारे में बुरा नहीं सोचता।
और हां…. हिजड़ो से लड़ने को भी मैं बहादुरी नहीं मानता सो……
zareen siddiqui
January 28, 2011 at 12:07 pm
rak kumarji namaskar aap ka lekh padha saath hi un logo ko aag babula hote huae bhi dekh raha hon darsal aapne unhe aaina dekha diya aur ye satya hai ki aaj bhi raipur me kai log paise ke jor par patrkar bane hai yaha ke jurnalist sirf naam ke liye hi juralist bane hai baat itne par hi khatam nahi hoti ayad raipur desh ka pahla rajya hoga jaha press club ka chunav saalo se nahi ho raha hai ….zareen siddiqui
zareen siddiqui
February 8, 2011 at 11:39 am
rajkumarji namaskar aapka lekh kafi pasand aaya kyonki aapne pure stste ka puran ko bade hi jordaar tareeke se pesh kiya meri aur se badhai lekin mai haraan sirf is baat se hu ki aapke lekh me jitni prtikrya hue meri samajh se aur kisi artical me itni prtikrya nahi hui hogi dusri baat ye ki galat naamo ke daura aapke saamne logo ne apni rai jatai aur raha sawal anil ka to anil kaun hai mai aur aap aur saare patrkar bhi jante hai lekin anil itna bewakoof haga ki pahchan chupane ke baad bhi samne aa jayga , anil se aysi bewakufi ki ummeed ki ja sakti thi. mai samajhta hu ki sir aaapko gadho se parmaan patr lene ki koi jarurat nahi hai .mai to itna kahna chahunga ki kuch to baat hai hum yu hi har kisi ko salaam nahi karte ….zareen siddiqui