मुझे आश्चर्य हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की जज ज्ञान सुधा मिश्र की टिप्पणी पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है। उन्होंने ठीक ही लिखा है कि बेटियां उनके लिए एक जिम्मेदारी हैं। जिस भारतीय मध्य वर्ग समाज में हम रहते हैं वहां यूं ही बेटियों की शादी नहीं हो जाती। आप बेटी की शादी के लिए किसी बेटे वाले के घर जाते हैं तो आपसे भारी दहेज की मांग की जाती है। जो लोग हाय तौबा मचा रहे हैं, वे शायद किसी दूसरी दुनिया में रहते हैं या उनके समाज में बेटी की शादी समस्या नहीं होगी।
एक अंग्रेजी अखबार ने तो यहां तक लिख दिया है कि जिस देश में लड़कियां बड़े- बड़े पदों पर हैं, वहां लड़कियों को जिम्मेदारी क्यों माना जाए। ऐसा लिखने वाले हमारे मित्रों को समाज की हकीकत नहीं मालूम। या तो वे बेटियों के पिता नहीं हैं या फिर वे राजा- महाराजा या बड़े औद्योगिक घराने के परिवार के हैं। मैं मध्यवर्गीय परिवार का व्यक्ति हूं। इसलिए कह सकता हूं कि हमारे समाज में दहेज न लेने वाले गिने- चुने लोग ही हैं। बेटी की शादी यानी पैसे का खेल। जी हां। तो सुप्रीम कोर्ट की जज ज्ञान सुधा मिश्र जी ने जो लिखा है, वह शत- प्रतिशत सच है।
मध्यवित्त समाज में निकलिए और बेटी की शादी तय करने की कोशिश कीजिए। असली मामला समझ में आएगा। सिद्धांत बघारना अलग चीज है और सच्चाई से रू-ब-रू होना दूसरी चीज। जो लोग दहेज के खिलाफ बड़ी- बड़ी बातें करते हैं उनके बेटे की शादी होती है तो दहेज के लिए लालायित हो जाते हैं। कथनी और करनी में भारी अंतर मैंने एक नहीं अनेक जगहों पर देखा है। आप देश के किसी कोने में चले जाइए, बेटी की शादी करनी है तो दहेज देना ही पड़ेगा। जब प्रेम विवाह होते हैं तो वहां बेटे वालों की मजबूरी हो जाती है। मैं पश्चिम बंगाल में रहता हूं। यहां मैंने कुछ जेनुइन लोगों को देखा है जो शादी को पवित्र रिश्ता मानते हैं। व्यापार नहीं।
मैंने ऐसे बेटे वालों को भी देखा है जो शादी में गाड़ी, बेटे की नौकरी, सोने के भारी गहने, लाखों रुपए कैश और कम से कम दस लाख रुपए के लक्जरी सामान की मांग की है। उनका बेटा एक स्कूल में लेक्चरर है। उसी की शादी के लिए इतनी मांग की गई थी। भाई साहब, हम ऐसे देश में रहते हैं कि फूल से प्यारी बेटियां, जिनमें करुणा, प्रेम और सेवा के साथ उच्च शिक्षा और इंटेलिजेंस है, की शादी करने में नाकों चने चबाने पड़ते हैं। जो लोग ज्ञान सुधा मिश्र के बयान की निंदा कर रहे हैं, उनसे मेरा निवेदन है कि वे सच्चाई जानें। सिद्धांत बघारना और सच्चाई से रू-ब- रू होना परस्पर विरोधी स्थितियां हैं। लड़की का पिता बेचारा बन कर शादी के लिए घूमता है भाई साहब। वह कभी अपनी जेब टटोलता है तो कभी मोल भाव करता है। अगर वह भाग्यवान हुआ तो शादी हो गई वरना वर खोजने का सिलसिला जारी रहता है।
लेखक विनय बिहारी सिंह कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदी ब्लाग दिव्य प्रकाश के माडरेटर भी। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] का सहारा ले सकते हैं।












सृष्टि शर्मा
January 1, 2011 at 11:54 am
आपने मध्यम वर्ग की जो बात कही हैं वो सोले-आने सच है| पर मैं आपसे पूछना चाहती हूँ कि “अँधेरा है-अँधेरा है” चिलाने से क्या एक दीया जलाना ज्यादा बेहतर नहीं है| आप क्या सोचते है कि अगर “राजा राम मोहन राय” ने अपने समय में सत्ती प्रथा को केवल हमारे समाज की एक रीति मान ली होती तो क्या यह संक्रमन कभी ख़त्म हो पाता? किसी समय में लड़कियों के पढने-लिखने पर भी पाबंदी लगाई जाती थी पर आज हमारे घरों की लडकियाँ पढ रही है?किसने उन्हें पढने के लिए भेजा,किसने उन्हें आज सत्ती होने से रोका,किसने उन्हें यह सिखाया की तुम आज़ाद हूँ ,तुम्हारा भी कोई अस्तिव है? आखिर किसने…..? इन सारे सवालों का एक ही जवाब हैं -हमारे बदलते समाज ने, उन्हीं लोगों ने जो कभी इसके खिलाफ थे|
माफ कीजियेगा छोटी मुँह बड़ी बात बोल रही हूँ – सवाल यह नहीं की दहेज़ प्रथा ख़त्म नहीं हो रही बल्कि यह है आखिर हम इसे हम ख़त्म क्यों नहीं करना चाहते है| बात छोटी सी है, लोग सोचते है कि हमने जब अपनी बेटी की शादी में दहेज़ दिया तो अपने बेटे की शादी में भी लेगे ताकि लोगों को पता चल सके कि मेरे बेटे की शादी है| हमें बस इस अहम को छोड़ना होगा| मेरे अनुसार इसकी पहल आज के पढ़े -लिखे लड़कों को ही करनी होगी| उन्हें ही दहेज़ ना लेने के लिए अपने माँ-बाप को मनाना होगा| तभी इसका उधार है|
कुमार मयंक
December 31, 2010 at 9:19 am
सच हमेशा कड़वा जो होता है…बेटा खोटा भी हो तो…वंश बढानेवाला जो समझा जाता है…वह भले हीं दारु पीकर घर आये…पत्नी को पीटे..लेकिन बेटियों से ज्यादा ईज़्ज़त पाता है….