
आलोक रंजन
मदारी का धंधा चल निकला था… रोज़ाना की कमाई करोड़ों में हो रही थी… मदारी अब अपने बिजनेस को और ज्यादा बढ़ाना चाहता था… लेकिन बिजनेस का कोई आइडिया नहीं मिल रहा था… उसने सोचा कि जमूरे से बात की जाए… जमूरा उसका बड़ा तेज़ है… सो उसने आवाज़ लगाई…
जमूरे
हां उस्ताद
जमूरे एक बिज़ेनस खोलना है
उस्ताद बिज़नेस खोलना है
बढ़िया वाला बिज़नेस
उस्ताद बढ़िया वाला बिज़नेस
हां जमूरे…
खुल जाएगा उस्ताद
जमूरे कोई आइडिया तो दे..
उस्ताद जमूरा आइडिया ज़रूर देगा
तो बता ना जमूरे क्या बिजनेस करें
उस्ताद न्यूज चैनल खोल लेते हैं
अबे क्या बता कर रहा है जमूरे
हां उस्ताद बड़ा चोखा धंधा है
क्या बात कर रहा है जमूरे
हां उस्ताद हिंदी न्यूज चैनल खोल लो
जमूरे लेकिन उसके लिए क्या करना होगा
कुछ नहीं उस्ताद बस इंटरनेट का कनेक्शन दुरूस्त करना होगा
वो क्यों जमूरे
उस्ताद डाउनलोडिंग स्पीड तेज़ चाहिए होगी
क्यों मज़ाक कर रहा है जमूरे
उस्ताद यू ट्यूब से डाउनलोडिंग तेज़ होगी तभी तो न्यूज़ ब्रेक करोगे ना उस्ताद
जमूरे मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है
उस्ताद यू ट्यूब से ही तो चैनल चलते हैं…
जमूरे वो तो ठीक है लेकिन ऐसा थोड़े ही होता है
उस्ताद अब तो ऐसा ही होता है
लेकिन जमूरे ये न्यूज चैनल चलाना अपने बस की बात नहीं है
क्या बात करते हो उस्ताद… चैनल तो कोई भी चला लेता है…
सच में जमूरे उसके लिए किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं है… पत्रकार ना भी हो तो चलेगा,…
क्या उस्ताद…किस दुनिया में हो… पत्रकारिता अब है क्या कहीं… उस्ताद… सिर्फ चार-पांच बंदर पालने हैं… और चैनल शुरू…
जमूरे लगता है तूने सुबह-सुबह भांग चढ़ा ली है…
नहीं उस्ताद… दो बंदर एक साइड.. दो बंदर दूसरी साइड… बस तुम चारों बंदरों से खेलते रहना… चैनल बिंदास चलता रहेगा…
फिर क्या था… अख़बार में विज्ञापन छपा..डांडिया न्यूज को चाहिए चपरासी से लेकर एडिटर इन चीफ… हज़ारों एप्लीकेशन आ गयीं… मदारी तो फूले नहीं समा रहा था… उसे तो यकीन भी नहीं हो रहा था कि इतने सारे लोग उनके चैनल में काम करना चाहते हैं… खैर चैनल ज़ोर शोर से शुरू कर दिया गया… मदारी के पास पैसे की कमी नहीं थी… जिस बंदर ने जो भी सलाह दी… जो भी लाने को कहा… उससे दो ज्यादा ही मंगवा लिया… मदारी को लगा कि साला कहीं भी कमी नहीं होनी चाहिए… लेकिन मदारी को ये नहीं पता था… कि ये बंदर उसके सामने तो जी सर जी सर करते हैं.. लेकिन पीठ पीछे अपना ही काम बना रहे हैं… एक दिन मदारी को गुस्सा आ गया… उसने जमूरे को बुलाया…
जमूरे… साले तूने क्या किया…तू तो कह रहा था कि चैनल चलाना आसान है…
उस्ताद और नहीं तो क्या… आपने बंदरों को खुला छोड़ रखा है… जब तक आप कमांड नहीं करेंगे… बंदर थोड़े ही ना काबू में आएंगे…
ठीक है जमूरे.. अब मैं कल से ही न्यूजरूम में बैठूंगा… और देखता हूं बंदर कैसे अपनी मनमानी करते हैं…
बंदरों के होश उड़ गए.. अब तो उन्हें लगा कि अपना काम नहीं चलेगा… फौरन एक बंदर.. जो अपने आप को तीसमारखां समझता था… मदारी से सेटिंग करने लगा… मदारी को भी अच्छा लगता था.. कि वो जो करने को कहता है… ये वाला बंदर फौरन काम करवाने को हाज़िर हो जाता है… भले ही मदारी बाद में आकर पूछता भी नहीं था कि काम हुआ कि नहीं…
मदारी ने फौरन जनरल बॉडी मीटिंग बुलायी… और घोषणा कर दी कि ये वाला बंदर उनका ख़ास है… आज से उसकी ज़िम्मेदारियां बढ़ायी जाती है…
फिर क्या था… बंदर तो सांतवें आसमान पर था… अब तो पूरे न्यूजरूम पर उसका कब्ज़ा था… जो पुराने बंदर थे.. वो भी सब सटक लिए… करें भी तो क्या करें.. जब मदारी ने ही कमान दे दी तो भला वो क्या करते…
खैर बंदर अपने मनमुताबिक चैनल को चलाने लगा… जिन बंदरों से उसे खुन्नस थी… सबको उसने शंट कर दिया… बेचारे कामकाज़ी बंदर करते भी क्या… उन्हें तो बस काम करना आता था… सो चुपचाप काम करते रहे… लेकिन ये भी तो पाप का घड़ा कभी ना कभी तो भरना ही था… जिस मदारी के दम पर बंदर कूद रहा था… उस बंदर को ये मालूम ही नहीं था… कि मदारी किसी का सगा नहीं है… फिर वही हुआ जिसका डर था… मदारी खबरों से तो नहीं लेकिन बंदरों से खेलना तो जानता ही था… मदारी को इस खेल में मज़ा आने लगा… उसने सोचा चैनल जाए भाड़ में… ये नया खेल तो बहुते मज़ेदार है… दूसरे जो कामकाज़ी बंदर थे वो समझ चुके थे.. कि उन्हें अब फौरन नयी जगह ढूंढ लेनी चाहिए.. वो समझ चुके थे.. कि मदारी के वश में सिर्फ बंदरों के साथ खेलना है… चैनल चलाना नहीं.. बेचारा पुराना बंदर तो कहीं का ना रहा… ना तो उसे मदारी ही भाव दे रहा था… और ना ही उससे प्रताड़ित दूसरे बंदर ही उसे अपना मान रहे थे… खैर भगवान तो हर किसी की सुनते हैं… हो सकता है इतनी गलतियां करने के बाद बंदर को सदबुद्धि आ जाए… वैसे डांडिया न्यूज अभी भी डंडे के दम पर चल रहा है… मदारी सिर्फ अपने घर में ही चैनल को देखकर खुश हो रहा है… मदारी के दिमाग में एक नया ख्याल आया है… उसने फौरन जमूरे को आवाज़ लगायी…
जमूरे…
हां उस्ताद
अरे इ चैनल चैनल खेलना तो बड़ा मज़ेदार है रे
हां उस्ताद.. मैंने पहले ही तो कहा था…
सुन जमूरे.. क्यों ना एक दो चैनल और खोल लें…
वाह उस्ताद..दिमाग हो तो आप जैसा… क्या दूर की कौड़ी सोची है आपने..
ठीक है जमूरे…
अख़बार में छपवा दे.. डांडिया न्यूज एक नया चैनल खोल रहा है… उसके लिए चपरासी से लेकर एडिटर इन चीफ चाहिए…
हो जाएगा उस्ताद…
लेखक आलोक रंजन हैं. उनके ब्लाग ‘मैं तो जी चुप ही रहता हूं‘ से यह आलेख साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.












pawan
September 23, 2010 at 3:00 pm
alok ji aap bilkul sach kah rahe hai
amitabh
September 24, 2010 at 12:03 am
bakwas????
akash rai
September 24, 2010 at 3:44 am
alok ji , aaj media me ese hi bandaro ke hantho me ustra thama diya gaya hai ,
jo har sahar ki galiyo me chenal reporter bankar ghum rahe hai
rajeev
September 24, 2010 at 12:20 pm
Alok ji yadi aap likh bhi dete iska sambandh phalane se hai to bhi wo aapka kuch anhi bigad sakta, kyonki use bhi pata hai ki wo kya kar raha hai.[b][/b]
Imran Zaheer
September 24, 2010 at 1:41 pm
[b][i]Sach hai bhai bandaron ka atank sar chad kar bol raha hai…[/i][/b]
प्रमोद
September 25, 2010 at 2:52 am
आलोक जी..सच कहा..मीडिया,,यानी पत्रकारिता अब कुछ और नहीं सिर्फ मदारी का तमाशा है…जिसमें पत्रकार रुपी बंदर मदारी के इशारों पर नाचते हैं…फिर जन सरोकार की उम्मीद तो बेमानी ही है..
Alam Khan Editor
September 27, 2010 at 7:52 pm
हमारे आलोक जी,
आप ने सही कहा है कि आज कल पैसा वाले हम जैसे लोगोँ को बंदर की तरह पाल कर इ्तेमाल करते है जिस का हमेँ पता भी नहीँ चलता और हम उन के डमरु पर नाच कर अपना सीना चौङा करते फिरते है।
आलम खान एडिटर
Email([email protected])
Arora Saab
October 1, 2010 at 6:28 am
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