वैसे भूलने की संस्कृति हमारी पुरानी रही है। कल तक प्रभाष जोशी साथ थे, आलोक तोमर थे। लेकिन कब तक। हम हैं ही वैसे। भूल जाते हैं। जरा इन पंक्तियों पर नजर डालिए.. अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके, झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके, अपने प्रति सच्चा रहने का जीवन भर हमने यत्न किया, देखा देखी हम जी न सके.. देखा देखी हम मर न सके।
जब देश आजादी की आगोश में चंद सांसें ले चुका था। उस समय बंगाल फिल्म पत्रकार एसोसिएशन की ओर से इन पंक्तियों के लेखक को पुरस्कृत किया जा रहा था। वर्ष 1947 था। आजादी जवां थी। उस समय की पीढ़ी जवां थी। सपने हिलोरे ले रहे थे। एकमात्र पुरस्कार ने इस व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री में जमने को मजबूर किया और यह 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे।
जी हां.. हम बात कर रहे हैं अभावों, गरीबी व अपने सपनों को कुर्बान होते देखकर जीने वाले कवि गोपाल सिंह नेपाली की। कभी-कभार शर्म सी आती है जब उनकी बेटी डा. सविता सिंह नेपाली उनकी याद में कोई गोष्ठी करती हैं। मुझे याद है वर्ष 2008, जब मैं इटीवी में था कालिदास रंगालय में उनकी याद में एक कार्यक्रम हुआ था। नहीं पहुंच सके थे पटना के तथाकथित

गोपाल सिंह नेपाली
खैर.. जाने दीजिए। अफसोस तो तब हुआ जब बिहार की माटी से प्रसारित कई चैनल और एसी में बैठने वाले कुछ मीडिया हाउस उन्हें 17 अप्रैल को भूल गए। प्रभात खबर के दूसरे पेज पर उनकी बेटी की लिखी कुछ इबारतें पढ़ने को मिली। लेकिन मैं दाद देता हूं पटना के साहित्यकारों को जो इनकी पुण्यतिथि पर दो लाइन लिख न सके।
नेपाली जी मूलतः नेपाल के थे 11 अगस्त 1911 को जन्में इस कवि के पिता फौज में हवलदार थे। वे भारत में नौकरी करने आए और बिहार के बेतिया के होकर रह गए। नेपाली जी का जीवन शब्दों में बयां नहीं हो सकने वाले अभावों और विषमताओं में बीता। लेकिन कहते हैं न कि ठोकरें और आमजनों से जुड़ी समस्यायों के साथ जब अपनी मजबूरी मिल जाती है तो एक नए गीत का जन्म होता है। आम लोग और समाज के कटु अनुभव ने नेपाली को कवि सम्राट बना दिया। जब उनकी कविताई शुरू हुई उस समय चंपारण में गांधी जी का आंदोलन शुरू हुआ था।
आर्थिक संकट से जूझने वाले नेपाली जी का जीवन कवि सम्मेलनों से मिलने वाले चंद रुपयों से चलता था। हां…1944 में मुंबई में हुआ कवि सम्मेलन उनके जीवन का सबसे अच्छा मोड़ रहा। और वहां से वे रामानंद सागर, पीएल संतोषी से जुड़े और कवि के गीतों की गाड़ी चल निकली। कई यादगार और आजादी की रंग में रंगे गीतों के रचियता नेपाली को याद करने के लिए किसी अखबार में स्पेश नहीं था तो कहीं टीआरपी की दौड़ उन्हें भूल गई।
वैसे भी चैनलों और अखबारों में अब नेपाली टाइप के कवियों के लिए कोई जगह नहीं है। हां… यदि मुकेश कुमार जैसे कोई लेखक टाइप हेड हो तो बात बन सकती है। क्योंकि वे एक पीस आज भी हैं। मुझे तो यह कहते शर्म नहीं आती कि इन हाउसों और चैनलों को भड़ास वाले यशवंत जी से सीखना चाहिए। जिन्होंने अपने इस छोटे से साइट में भी साहित्य जगत को जगह दे दी है। खैर, इन्हें क्या बताना और सिखाना। इन्हें सिखाने का मतलब है भैंस के आगे बीन बजाना।
बिहार में तो अखबारों का एक मतलब। किसी का बांह मरोड़ के विज्ञापन लाओ। सरकारी की जी हजूरी में टाइट रहो। नहीं तो विज्ञापन नहीं मिलेगा। अपने एसी में बैठकर प्रखंड से आने वाली खबरों को जोड़कर एक बाटम लाइन की खबर मार दो। टीवी वालों का हाल है। जैसे भी हो साले को ब्रेकिंग सबसे पहले मेरे पर चले। चाहे वह झूठी क्यों न हो। फील्ड के रिपोर्टरों को सेंटिंग करने दो कैसे विज्ञापन आएगा। और खासकर बिहार से चलने वाले सभी चैनलों के मालिकों का सरोकार भी कभी पत्रकारिता से नहीं रहा। वे तो इसलिए चैनल चला रहे हैं कि उनके आगे पीछे की बाउंड्री बची रहे।
लेखक आशुतोष कुमार पांडेय टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.












Monika Jain
April 21, 2011 at 8:00 pm
Manniya Ashutosh ji
Yeh kehna kadapi galat nahi hoga ki AAPNE YAAD DILAYA TO MUJHE YAAD AAYA Gopal Singh Nepali ji ke vishay me pad kar mujhe bahut khushi hui. ab unke vishay me jaankari ekatra kar mai swam un par progrrame karne ka vichar bana rahi hu aur ummid hai ki mai kamyab zarur ho jaungi. Mere vishay me yadi jane ki kuchh abhilasha jagrit hui ho to aap mujhe facebook par dekh sakte hai aur yadi aap bhi hai facebook par to mujh se sampark avashya kare.
Sadhanyavad
Monika Jain
RAJEEV KUMAR TYAGI
April 22, 2011 at 5:41 pm
gopal singh nepali jinhone swadhinta sangram me apne kalam ki kalawaji se tamam karantikariyo ka hoshla afjai bakhub kiya jiska karjdar
samast bharatwarsh hai.khed hai loktantra ka chautha stambh bhi unhe bisarne ki jo lambadi ki hai usse sabhi khabarnabiso ko aatmgalani ki anubhuti bhi na hona apne aap me ek chintajanak khabar hai koi breaking news ki srinkhala nahi.
par ashutosh ji dhanyabad ek mahan sahityakar ki asmita ko akshunn banane ki taraf badhaya gaya aapka do kadam par ek sawal jiska jawab aap bakhoob jante honge ki aaj TRP ki bhagdaur ne patrakarita ki kya tasveer banai gayi hai.kya aaplogo ki aawaj ko tek denewala koi jariya hai jo is system se bahar ka marg prasast kare???????????? I ,myself is an independent journalist.NEED YOUR BRIEF REPLY PL……..
ashutosh kumar pandey
April 23, 2011 at 6:32 am
त्यागी जी आपको नमस्कार और आपके जज्बे को भी सलाम……….मैं आज भी टीआरपी पर विश्वास नहीं करता। यदि ऐसा होता तो एक शोध में यह नहीं क्लियर होता कि आज भी डिस्कवरी की व्यूअरशीप ज्यादा है। रहा सवाल सही और सच्ची आवाज उठाने का तो मैं अगले महीने से एक छोटी से पत्रिका निकालने जा रहा हूं जो मात्र आठ या सोलह पेज की होगी उसमें आपका स्वागत है…………उसका नाम भी है सिर्फ सच