Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

आयोजन

जूनियर रहे किसी इगोइस्ट मित्र के अधीन काम न करें

[caption id="attachment_19064" align="alignleft" width="122"]अंचल सिन्हाअंचल सिन्हा[/caption]: नया साल – पुराना साल : अंचल सिन्हा की नजर में : जीवन का एक और साल कम हो गया। इस जाते हुए साल में मेरे सामने अनेक चित्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। मेरे लिए एक मायने में अपने जीवन के लिए यह खास साल भी रहा है क्योंकि इसी साल मैंने यह भी जाना कि कभी भी अपने से अनेक चीजों में जूनियर रहे किसी मित्र के अधीन काम नहीं करना चाहिए, वह भी तब तो और भी नही जब वह इगोइस्ट हो।

अंचल सिन्हा

अंचल सिन्हा

: नया साल – पुराना साल : अंचल सिन्हा की नजर में : जीवन का एक और साल कम हो गया। इस जाते हुए साल में मेरे सामने अनेक चित्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। मेरे लिए एक मायने में अपने जीवन के लिए यह खास साल भी रहा है क्योंकि इसी साल मैंने यह भी जाना कि कभी भी अपने से अनेक चीजों में जूनियर रहे किसी मित्र के अधीन काम नहीं करना चाहिए, वह भी तब तो और भी नही जब वह इगोइस्ट हो।

उसे आपके हर व्यवहार पर शक होता रहेगा और एक दिन वह इसी गलतफहमी का शिकार हो जाएगा कि आप ही उसके करियर में नुकसान पहुंचाने वाले हैं। वह बगैर आपसे पूरी बात किए भी इसी तरह का भ्रम अपने मन में पाल लेगा और आपसे बात करने में या आपसे मिलने में कतराएगा क्योंकि उसके मन में जो शक बैठा है, उसे वह पाले रहेगा। आजीवन। और बाद में वह किसी और मित्र से मुस्कराते हुए शिकायत करेगा कि वह किसी की थोड़ी सी भी गल्ती को जीवन भर पालता है, यह उसके लिए गर्व की बात है।

बीत रहे इस साल का यह अनुभव मुझे भी याद तो रहेगा ही, साथ ही यह भी मैं कैसे भूल सकता हूं कि इसी साल मैं महीनों महीनों के लिए अपने निजी परिवार से इतनी दूर आने को मजबूर हुआ हूं। अपने देश से दूर, वह भी भारत जैसे देश से, जहां विश्व के किसी भी दूसरे देश से ज्यादा सौन्दर्य है, प्राकृतिक संपदा है, अपनापन है, एक दूसरे के बारे में सोचने का मानस अब भी है। यह कोई कम पीड़ा की बात नहीं है। ठीक है कि लोग विदेश भ्रमण करने को लालायित रहते हैं, पर लंबे समय तक रहने की जब मजबूरी हो जाए तो कहीं न कहीं एक टीस सी उठती ही है। आपको लगता होगा कि जब मैं इतना ही पीड़ित महसूस कर रहा हूं तो क्यों देश से बाहर हूं, मुझे लौट आना चाहिए, कौन रोक रहा है। पर जब पेट और रोटी की बात आती है तब आपके सामने दूसरा रास्ता नहीं दिखता। जीवन के 56वें साल में अपनों से दूर, बिल्कुल नए लोगों के बीच। ऐसे लोगों के बीच जिनके लिए मस्ती, शराब और सेक्स ही प्रमुख बात हो। जिन्हें यह सोचने की जरूरत ही नहीं कि कल का दिन कैसे बीतेगा। जो भी है, आज है, उसे भोगो।

30 सालों की बैंक की नौकरी के बाद जब मैं वीआरएस ले रहा था तो मेरे कई शुभचिंतक मित्रों ने बार बार कहा कि मैं ऐसी गल्ती न करूं क्योंकि बाद में रोना पड़ेगा। बैंक में नौकरी करते हुए मैंने पिछले 30 सालों में जितना लिखा है और जितने अखबारों और पत्रिकाओं में लिखा है उसके बारे में यहां चर्चा करना बेमानी है, पर अगर उन्हें ही संकलित करूं तो अनेक पुस्तकें बन सकती हैं। यही कारण है कि मैं बैंक में नौकरी करते समय न तो पूरी तरह से बैंकर बन सका न ही पत्रकार। मेरे पत्रकार जगत के मित्र और संपादक आदि मुझे बैंकर मानते रहे और बैंक के सीनियर प्रबंधन मुझे पत्रकार कहता रहा। मैंने जाने कितनी बार बैंक में पदोन्नति को नमस्कार किया, सिर्फ इस लालसा में कि आज नहीं तो कल मैं बैंक छोड़कर अखबार में जाउंगा ही। अंततः मैंने 2008 में बैंक को नमस्ते कर ही दिया और एक बिजनेस अखबार में आ गया। वहां के संपादक का आश्वासन था कि वे जल्दी ही मुझे काम चलने के लायक पद और पैसे की व्यवस्था कराएंगे। महीनों बाद कुछ भी नहीं हुआ तो मेरे लिए परिवार चलाना कठिन हो गया। थककर मैंने उन्हें भी नमस्कार कर दिया।

इसी बीच मुंबई का एक अखबार दिल्ली आ रहा था तो मेरे एक मित्र के कहने पर मुझे वहा एक वरीय पद दिया गया। क्योंकि तबतक मैं इतना समझ चुका था कि अब अखबारों में नौकरी आपके ज्ञान और पत्रकारिता के लिए आपके कमिटमेंट से नहीं मिलती। केवल और केवल संपादक की मर्जी से मिलती है। उस समय मित्र ने मदद की जिसे मैं आजीवन याद रखूंगा। पर बाद के कुछ ही महीनों बाद वहां के प्रबंधन ने दिल्ली ब्यूरो बंद करने का फैसला ले लिया तो मैं फिर सड़क पर आ गया। इसी बीच एक पुराने मित्र ने मुझे अपने एक साप्ताहिक अखबार में डिपुटी एडिटर के पद पर बुला लिया। कुछ महीने वहां काम ठीक से चलता रहा पर किसी ने उनके दिमाग में भी मेरे बारे में गलतफहमी पैदा कर दी। एक दिन उनके एक जूनियर ने मुझे कहा कि मैं कल से आना बंद कर दूं क्योंकि संपादक महोदय ऐसा ही चाहते हैं। मैं समझ नहीं पाया कि आखिर यह बात संपादक महोदय ने खुद मुझे क्यों नहीं कही ! मैने उनसे बात करने का प्रयास भी किया पर मुझे मौका नहीं दिया गया। थक कर मैं वहां से भी चला आया।

उन्हीं दिनों मुझे आलोक मेहता जी की एक बात याद आई। एक बार मैंने उनसे नौकरी की बात की थी तो उन्होंने बेहद रुखे स्वर में कहा था कि आखिर मैं क्यों बैंक छोड़कर एक किसी और अच्छे पत्रकार की नौकरी छीनने को बेचैन रहता हूं। मैं जानता हूं कि इस समय मेरे अनेक मित्र – जो कहते हैं कि वे मेरे मित्र हैं- अनेक अखबारों में इस स्थिति में हैं कि यदि वे चाहें तो मुझे आराम से एडजस्ट करा सकते हैं, पर वे ऐसा नहीं करते। शायद उन्हें लगता हैं कि मैं बाद में उनके लिए मुसीबत न बन जाउं।

इसी बीच मुझे इंदौर के एक अखबार के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ने अपने यहां के लिए बुलाया। उनका ऑफर पैसे के लिहाज से अच्छा था पर काम के हिसाब से बुरा। वे चाहते थे कि मैं किसी भी तरह उसे प्राफिट मेकिंग अखबार बना दूं और उसी हिसाब से अपना प्रोजेक्ट तैयार कर लूं। कुछ पुराने लोगों को कैसे हटाया जाय यह भी मैं ही तय करुं। मैं इतना कठोर प्रबंधक, वह भी सहायक संपादक जैसा पद लेकर, बनूं मुझे नागवार गुजरा। मैं वापस हो गया। इसी दौरान मेरे एक पुराने मित्र ने मुझे रांची बुलाया। पर वहां भी ऐसी ही बात कही गई। मुझे लगा कि अखबारी प्रोडक्ट बेचने और बैंक के प्रोडक्ट बेचने में कोई बड़ा अंतर नहीं है।

मैं मानता हूं कि जो कोई भी अखबार निकालता है वह व्यापार कर रहा है, उसे लाभ तो मिलना ही चाहिए। लेकिन इस लाभ के लिए संवेदना को बेचना पड़े तो यह गलत है। लाभ कमाने के लिए दूसरे व्यापारिक रास्ते भी होते हैं, उनका उपयोग किया जा सकता है पर समाचार बेचकर या किसी अपराधी को बचाकर या केवल सेक्स बेचकर लाभ कमाया जाय, इसे स्वीकार करना मेरे लिए उतना आसान नहीं था। आप खबरों को इतना तीखा बना दें, सचाई को चोट करते हुए लिखें तो पाठक अब भी आपको हाथोंहाथ लेने को तैयार है। और जब आप पाठकों के प्रिय हो जाएंगे तो विज्ञापन देने वाले खुद चाहेंगे कि उनके प्रोडक्ट की चर्चा आपके अखबार में हो। इसके लिए आपको महीनों महीनों तक लगाने को तैयार रहना चाहिए। यह भी व्यापार और कुशल प्रबंधन का ही एक रास्ता है। पर आज कोई भी मालिक पहले ही दिन से लाभ पाने के लिए बेचैन रहता है।

थक हारकर मैंने यही महसूस किया कि मेरे लिए अखबारी जीवन है ही नहीं। इसके अलावा अखबारों में जिस तरह संपादकों को प्रबंधक बनाने और केवल लाभ कमाने और धन जुटाने का काम सौंप दिया गया है, वहां आदर्श पत्रकारिता के लिए स्पेस कहां बचा है। अब रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना या धर्मवीर भारती का जमाना नहीं है। न हीं राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी हैं। मुझे याद है- जब इंडियन एक्सप्रेस की ओर से मुंबई से हिंदी एक्सप्रेस का प्रकाशन आरंभ हो रहा था तब शरद जोशी ने मुझे मुंबई आने को कहा। पर वहां रहने की कोई व्यवस्था कराने में वे कामयाब नहीं हो सके थे और बात वहीं समाप्त हो गई थी। वहीं से जब श्रीवर्पा के लिए सुदीप ने मुझे पटना से लगातार लिखवाया तब भी मेरा मन बैंक छोड़ने को हुआ था पर मेरा इस्तीफा बैंक ने स्वीकार ही नहीं किया। बहरहाल जीवन में ऐसे इतने अनुभव हैं कि लिखने बैठूं तो पेज दर पेज भरते जाएंगे।

2010 में एक बार फिर मुझे लगा कि जीवन यापन के लिए मुझे अंततः फिर बैंक की ही दुनिया में लौटना होगा। लेकिन मैं करियरिस्ट बैंकर अपने 30 सालों की नौकरी में भी बन नहीं सका था इसलिए भारत में मुझे पूछने के लिए कोई निजी बैंक भी तैयार नहीं हुआ। वे नए जमाने के लिए अनुभवों के बावजूद एमबीए की तलाश में रहते हैं। इसलिए जब अफ्रीका की दो कंपनियों से बात चली तो लगा कि देश से बाहर अभी मेरी थोड़ी बहुत पूछ है। मैंने उन्हीं में से एक को हां कह दी और एक अनुभव लेने के नाम पर आ गया। यह अफ्रीकी वित्तीय कंपनी कहती है कि उसे मेरे जैसा ही अनुभवी बैंकर चाहिए तो मैं कैसे मना कर देता। इस लिहाज से साल 2010 को मैं कैसे भूल सकूंगा। इसने मुझे पहले दो महीनों के लिए बुलाया, पर अब वे कहते हैं कि कम से कम दो साल तो रहना ही होगा और जरुरत लगी तो और आगे भी।

पर क्या उगांडा जैसे देश की राजधानी कंपाला में मेरे जैसा संवेदनशील आदमी लगातार रह पाएगा? अब बहुत कुछ आने वाले नए साल पर ही निर्भर होगा। पर ऐसा लगता है कि इस नए साल यानी 2011 में मुझे यहीं रहना होगा और पूर्वी अफ्रीका के अनेक देशों- कीनिया, सूडान, कांगो और नाइजीरिया में बार बार जाना होगा और इस पूरे क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ और माइक्रोफाइनैंस को नजदीक से देखना ही होगा। एक तरह से मैं इस क्षेत्र में नौकरी के साथ शोध भी कर रहा हूं। जीवन का यह भी एक अनुभव है, परिवार से दूर रहकर।

मुझे याद है, 1974-75 के बिहार आंदोलन के जमाने में जब मैं केवल छात्र था और फुलवारीशरीफ जेल में बंद था तो मैंने एक छोटा सा उपन्यास लिखा था। उसमें अपने युवा दिनों की अनेक यादें थीं। उस जमाने की अपनी एक प्रेमकथा भी थी। फुलवारी के जिस वार्ड में मैं बंद था उसीमें नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी जैसे अनेक लोग थे। शिवानंद भाई अब भी उन दिनों की बहुत याद करते हैं। वे सारी यादें अब मैं यहां, कंपाला में बैठकर सहेज रहा हूं और धीरे-धीरे उन्हें एक उपन्यास की शक्ल दे रहा हू। अगर भारत का कोई अच्छा प्रकाशक मिला तो भारत लौटने के बाद उसे दूंगा। पर कब, पता नहीं। क्या 2011 में ऐसा हो पाएगा?

लेखक अंचल सिन्हा से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. madan kumar tiwary

    January 2, 2011 at 12:51 pm

    अंचल जी आपने सही कहा , अहंम बहूत बुरी चीज है। खासकर अगर जिसके अंदर काम करना हो , वह न सिर्फ़ आपसे जुनियर हो बल्कि बुद्धि में भी पैदल हो। वैसे आप अपना उपन्यास प्रकाशित कराये । आपकी प्रेमकथा पढने का मुड है।

  2. संजय कुमार सिंह

    December 31, 2010 at 7:50 am

    अंचल जी ने लिखा है, “जूनियर रहे किसी इगोइस्ट मित्र के अधीन ….”। इसे मेरे हिसाब से किसी मित्र के अधीन (या उसके ऊपर भी) होना चाहिए। स्पष्ट है मित्र के अधीन, ऊपर या साझेदारी में भी काम नहीं करना चाहिए। अगर करें तो मित्रता खत्म मान कर करें तो कुछ दिन काम चल पाएगा। मित्रता और मातहती, साझेदारी या बॉसगिरी साथ-साथ नहीं हो सकती। इसमें कोई शक नहीं है। कई बार साबित हो चुका है। हम लोगों को मान लेना चाहिए कि बॉसगिरी एक कला है और गाने-नाचने, बजाने की तरह सब के बूते की बात नहीं है। अगर मान लें कि जो बॉस बन गया वह हमसे अलग (या बेहतर) है और उसे उसका लाभ मिलेगा तो कोई समस्या नहीं होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...