बिलासपुर। देशद्रोह और नक्सलियों के साथ साठगांठ आरोप में आजीवन कारावास के सजायाफ्ता बिनायक सेन की जमानत अर्जी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गुरुवार को खारिज कर दी। सेन मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष हैं। न्यायमूर्ति टीपी शर्मा और न्यायमूर्ति आरएल झांवर की खंडपीठ ने बिनायक सेन के साथ-साथ कोलकाता के व्यवसाई पीयूष गुहा की जमानत याचिका भी खारिज कर दी। गुहा को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
हाई कोर्ट ने बुधवार को सेन और गुहा की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फैसला सुरक्षित कर लिया था। जमानत याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने कहा कि सेन एक डाक्टर हैं लेकिन इन्होंने राज्य के नक्सल प्रभावित इलाके में एक भी चिकित्सा शिविर नहीं लगाया। ये नक्सली गतिविधियों में अधिक रुचि रखते थे। सेन जेल में बंद सान्याल से कई बार मिले थे, लेकिन उनके इलाज के लिए नहीं, बल्कि नक्सली गतिविधियों के सिलसिले में। भादुड़ी ने कहा कि पिछले दिनों गिरफ्तार कट्टर नक्सली गोपान्ना ने भी कहा है कि वह सेन को जानता है। सेन की पत्नी एलिना ने कहा है कि हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीपी वर्मा ने 61 वर्षीय विनायक सेन, नक्सल विचारक नारायण सान्याल और कोलकाता के व्यवासाई पीयूष गुहा को 24 दिसंबर को दोषी करार दिया था। तीनों पर नक्सलियों के साथ मिलकर देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का अरोप था।












madan kumar tiwary
February 11, 2011 at 2:30 pm
हिंदुस्तान है भैया , यहां सबकुछ हो सकता है । जिस केस में गवाह होस्टाईल न हुआ हो यानी पुलिस के समक्ष दिये गये अपने बयान से कोर्ट में न पलटा हो उस मुकदमें का भी डी नोवो ट्रायल यानी पुन: नये सिरे से गवाही ली जा सकती है वह भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश से । अब तो यह न्यायधीश महोदय हीं बतायेंगे की आखिर डी नोवो ट्रायल का अर्थ क्या हुआ ? क्या न्यायालय चाहता है की गवाह मुकर जाये ? खैर यह एक जिक्र था दुसरे केस का । जमानत की जो प्रक्रिया है , उसमें सजा के बाद अपील की जाती है और साथ हीं आथ जमानत का अवेदन भी । उच्च न्यायालय को यह देखना है की क्या तुरंत अपील पर सुनवाई संभव है , अगर नही तो फ़िर जमानत से ईंकार क्यों किया जाय ? दुसरा यह भी देखना है की क्या जमानत पर रिहा होने के बाद अभियुक्त पुन: उस तरह के अपराध में संल्गन तो नही हो जायेगा ? मैने सजा वाला ९२ पेज का आदेश नेट से डाउन लोड करके पढा था सजा का आधार बहुत हीं कमजोर था । एक और बात अधिकांश वैसे केस में जहां फ़ैसला रिजर्व किया जाता है , रिजल्ट नकारात्मक हीं होता है , कारण क्या है यह तो न्यायपालिका के विद्वानजन हीं बतायेंगे ।