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दुख-दर्द

तिलस्मी लेखन का संसार सूना कर गये डॉ. नारद

सोमदत्‍तजी: स्मृति शेष : लगता है मानो अतीत के बियावान को चीरकर वे शोकाकुल मित्रों के बीच किसी तिलिस्म की तरह ‘और पार्टनर’ कहते हुए प्रकट हो जायेंगे या जादुई कथाओं के किसी पात्र की तरह हवा से उभरकर कंधे पर हाथ रखकर अपनी चिर परिचित शैली में वक्र मुस्कान भरते हुये कह उठेंगे ‘तुम क्या समझते हो मैं इतनी आसानी से चला जाऊंगा। ऊं हूं, मैं अभी नहीं जाने वाला।’

सोमदत्‍तजी: स्मृति शेष : लगता है मानो अतीत के बियावान को चीरकर वे शोकाकुल मित्रों के बीच किसी तिलिस्म की तरह ‘और पार्टनर’ कहते हुए प्रकट हो जायेंगे या जादुई कथाओं के किसी पात्र की तरह हवा से उभरकर कंधे पर हाथ रखकर अपनी चिर परिचित शैली में वक्र मुस्कान भरते हुये कह उठेंगे ‘तुम क्या समझते हो मैं इतनी आसानी से चला जाऊंगा। ऊं हूं, मैं अभी नहीं जाने वाला।’

डॉ. कैलाश नारद अब नहीं रहे यह यकीन करना मुश्किल हो रहा है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में उन्होंने आखिरी सांस ली। क्या अजब संयोग है कि तिलस्मी कथाओं के लेखक ने उसी भूमि में फानी दुनिया को अलविदा कहा, जिस पर बाबू देवकी नंदन खत्री ने अपना सर्वकालिक उपन्यास चंद्रकांता संतति का सृजन किया था। जिंदादिली की जीती जागती मूरत डॉ. कैलाश नारद की यश पताका संस्कारधानी जबलपुर की घूसर गलियों से उठकर उनकी सगर्व पूरे देश में फहरा रही थी। रहस्य कथाओं व अपनी रचनाओं को गढऩे के लिए वे भाषा का ऐसा लय बद्ध आल-जाल बुनते थे कि पाठक बस डूबकर रह जाता था। उनकी इस कला के कायलों में डॉ. धर्मवीर भारती जैसे धुरंधर भाषाविद् संपादक थे तो जबलपुर की सड़कों पर रिक्शा खींचने वाले अल्प शिक्षित मेहनतकश भी। दरअसल प्रकाशनों के काशी-काबा बनारस, प्रयागराज से लेकर बुद्धिजीवियों के मक्का कहलाने वाले दिल्ली-मुंबई (तब बम्बई) तक सभी तरह की पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेखन की तूती बोलती थी।

कैलाश भैया से सन् 75 के इर्द-गिर्द परिचित हुआ, जब इलाहाबाद से छपने वाली मनोहर कहानियां, माया और उसके सह-प्रकाशनों के लिए लिखना शुरू हुआ। माया प्रेस के मालिकों में से एक आलोक मित्रा इस परिचय के माध्यम बने। लेकिन 80 के दशक में सहसा बिलासपुर से जब आजीविका के लिए भोपाल आना हुआ और दैनिक जागरण के संपादन का दायित्व संभालने का सुअवसर बना, तब यहीं सहसा उनके अग्रज गुलाबचंद नारद से साहचार्य के अवसर ने पुराने परिचयों को ज्यादा घनिष्ठता दे दी। दैनिक जागरण के लिए मेरे द्वारा शुरू किये सप्लीमेंट ‘जागरण सत्यकथा’ ने इसे और नजदीकी में बदल दिया, क्योंकि वे इस सप्लीमेंट के नियमित रचनाकार थे। मेरे मनुहार पर ही वे हर हफ्ते इसके लिए कोई न कोई कथा भिजवाया करते थे।

गुलाबचंद नारद, जो पब्लिक रिलेशन की सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद अखबार में आये थे, जानकारियों को जीते-जागते इनसाइक्लोपीडिया थे। वे जिंदा दिली के एक तरह से शंहशाह थे। दिल के रोगी होने के बावजूद उन्हें शायद ही कभी किसी ने तनाव में देखा हो। डॉक्टरों की बाइपास सर्जरी की सलाह उन्होंने ब्लंटली ठुकरा दिया था। पहाड़ी लहसुन का नियमित सेवन करके उन्होंने अपना दिल मजबूत बना रखा था और साठा सो पाठा कहावत को चरितार्थ करते हुए परिहास में कहते थे, ‘इतना तो समझ लो कि अब हार्ट अटैक को भी सोचना पड़ेगा कि किधर से हमला करूं क्योंकि मेरे दिल में कल्ले फूट चुके हैं।’ गुलाब भैया वाकई जब तक जिये ठहाके लगाते रहे। आप चाहे जितनी परेशानी में हों उनकी एक फुलझड़ी से वह काफूर हो जाती थी और आप भी हंसे बिना नहीं रह सकते थे। गुलाब भैया कई मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों और आला अफसरों के साथ काम कर चुके थे। उनकी मेमोरी भी गजब की थी, मध्य प्रदेश की राजनीति भूगोल और इतिहास पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी सो उसका फायदा जब चाहे तब उठा लिया जाता था।

नारद परिवार के बारे में कुछ लिखना पत्रकारिता के एकाधिक सूर्यों को दीपक दिखाने सरीखा कृत्य ही होगा। उनके पिता हुकुमचंद नारद जिनके नाम से जबलपुर में एक मार्ग भी है, राष्ट्रीय विचाराधारा से ओत-प्रोत दुर्घर्ष पत्रकार थे। जंगे आजादी की लड़ाई के लिए महात्मा गांधी को भेजा गया एक बैंक ड्राफ्ट जो भुन नहीं पाया था, अब भी इस परिवार के पास सुरक्षित है। डॉ. कैलाश नारद शिक्षाविद् थे, लेकिन लेखन उनके संस्कार, उनके रक्त में था। हाल के वर्षों में उन्होंने लिखने-पढऩे की गति को तीव्रता दे दी थी। इतिहास के धूल-गर्द से खंगालकर अद्भुत आख्यान रच लेने की जैसी क्षमता उनमें थी, उसका पासंग भी नहीं कोई दूसरा कर पायेगा इसमें संदेह है। डॉ. नारद के जाने से लगता है मानो रहस्यों के इस चितेरे ने सहसा लेखन की सर्वथा पेचीदा शैली का संसार सूना कर दिया है। उनको लेखक समाज की भावभीनी श्र्रद्धांजलि के साथ एक अंजूरी आदर की हमारी भी….

लेखक सोमदत्त शास्त्री कई वर्षों से मध्य प्रदेश – छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वे 25 वर्षों से भोपाल में दैनिक समाचार पत्रों में जिम्मेदार पदों पर रहने के अतिरिक्त दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में न्यूज कोआर्डिनेटर, सिटी एडीटर के रूप में काम कर चुके हैं. वे अब भी भास्कर समूह से जुडे़ हैं.

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0 Comments

  1. manoj dwivedi

    December 18, 2010 at 2:19 pm

    Shri Shastri ji ka ARTICLE padh kar achha laga. I also worked with Late Gulab Naradji. Dr Kailash Narad KO Shardanjali.

  2. Hemant shukla

    December 18, 2010 at 9:29 am

    Dr. Narad ke nidhan ki khabar paker dukh hua… unhe meri shradhanjali. Narad jee mere Agraj ” Nirmohi” jee ke khas mitron me the aur year 62-63 ke lagbhag mere ghar Azamgarh bhaiya se milne aaye the to ek rat wahin ruke bhi the. usase pahale unhone bhai sahab ke do upanyas- ” choti bahu ” aur ” sulgate Arman” ke Allahabad se prakashan me madad bhi ki thi. yahi parichay mere tab kam aaya jab mai mumbai me ” BIOSCOPE ” ka sub-editor hua aur unse lekhon ka adan-pradan shuru kiya. tab mere kayi lekh aur filmi photo unhone Bhairav jee ke jariye MANOHER KAHANIYAN men chapvaye. Aaj in sari yaadon ke sahare unhe meri Ashrupoorit shradhanjali. – Hemant shukla ” Mohi “

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