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दक्षिण एशियाई प्रतिरोधी लेखन पर साझा हुए अनुभव

: हाशिएकरण का प्रतिरोध और वर्चस्‍व को चुनौती देने के लिए वर्धा में स्‍त्री अध्‍ययन महासम्‍मेलन के दूसरे दिन पाकिस्‍तान जाहिदा हिना, बांग्‍लादेश की शाहिन अख्‍तर व श्रीलंका की पेन्‍या ने किया रचनाओं का पाठ : वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्‍त्री अध्‍ययन संघ के संयुक्‍त तत्‍वावधान में आयोजित स्‍त्री अध्‍ययन के 13 वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के दूसरे दिन शनिवार को पाकिस्‍तान की लेखिका जाहिदा हिना, बांग्‍लादेश की शाहिन अख्‍तर, श्रीलंका से आयी पेन्‍या ने अपने अनुभ्‍ावों को साझा करते हुए स्‍त्री अध्‍ययन को गंभीर विमर्श से जोडा।

: हाशिएकरण का प्रतिरोध और वर्चस्‍व को चुनौती देने के लिए वर्धा में स्‍त्री अध्‍ययन महासम्‍मेलन के दूसरे दिन पाकिस्‍तान जाहिदा हिना, बांग्‍लादेश की शाहिन अख्‍तर व श्रीलंका की पेन्‍या ने किया रचनाओं का पाठ : वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्‍त्री अध्‍ययन संघ के संयुक्‍त तत्‍वावधान में आयोजित स्‍त्री अध्‍ययन के 13 वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के दूसरे दिन शनिवार को पाकिस्‍तान की लेखिका जाहिदा हिना, बांग्‍लादेश की शाहिन अख्‍तर, श्रीलंका से आयी पेन्‍या ने अपने अनुभ्‍ावों को साझा करते हुए स्‍त्री अध्‍ययन को गंभीर विमर्श से जोडा।

महिला लेखिकाओं, क‍वयित्रियों एवं दक्षिण एशिया  में प्रतिरोध लेखन पर केंद्रित आज का प्‍लेनरी सेशन कई बार श्रोताओं के लिए भवुकता से भरा रहा। बांग्‍लादेश की चचर्ति लघु-कहानीकार एवं उपन्‍यासकार व वर्ष 2004 में ‘तलाश’ श्रेष्‍ठ पुस्‍तक के पुरस्‍कार से सम्‍मानित  लेखिका शाहीन अख्‍तर ने चर्चा में हिस्‍सा लिया। ‘तलाश’ वर्ष 1971 में बांग्‍लादेश के स्‍वतंत्रता संग्राम में शामिल उन दो हजार महिलाओं की मौखिक दास्‍तान है, जिनपर बालात्‍कार हुए थे और नई सरकार द्वारा इन्‍हें ‘विरांगना’ कहा जा रहा था। बाद में बांग्‍लादेश स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास से इन्‍हें पूरी तरह मिटा दिया गया। शाहीन अपने उपन्‍यास ‘तलाश’ में कहती हैं कि -‘लोग खसकर राजनीतिज्ञों ने लडाई को बहुत जल्‍द भूला दिया।’ यह कहानी सभी लोगों और देशों की है जिन्‍होंने युद्ध देखा है।

पाकिस्‍तान से आयीं जाहिदा हिना विभाजन और महिलाओं पर लगातार लिखती रही हैं। उन्‍होंने परवेज मुशरफ से पुरस्‍कार लेने से इसलिए इन्‍कार कर दिया था क्‍योंकि वो सैनिक तानाशाह है। उन्‍होंने कहा कि उनकी तीन माएं हैं-एक जिस ब्रिटिश भारत में वह जन्‍मीं और भारत की मीठी यादें दी, दूसरी पाकिस्‍तान जिसने उसे पाला और स्‍वयं उनकी मां जिन्‍होंने उसे जन्‍म दिया। उन्‍होंने अपनी पहली कहानी 09 वर्ष की उम्र में लिखी थी। अपनी मां को याद करते हुए उन्‍होंने कहा कि अपनी मां को न कभी हंसते देखा न कभी रोते लेकिन एकबार जब वह भारत अपने लोगों से मिलने आयी तब वह खूब रोयी और खूब हंसी थी। उन्‍होंने विभाजन को समझने की कोशिश की और भारतीय साहित्‍यों में राहुल सांकृत्‍यायन, कर्तुएल हैदर, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर इत्‍यादि को पढा है।

उन्‍होंने कहा कि मेरा हृदय भारत के लोगों, इसके गरीब और पिछडे लोगों के लिए हमेशा धडकता रहता है और इसके लिए उन्‍होंने लिखना चुना। कलम के अलावे मैं हर हथियार को गलत मानती हूं। हमारे देश में लडकियों पर अत्‍याचार होते हैं, जिसकी चीख मेरे लेखन से आप सुनते रहे होंगे। रवीन्‍द्र नाथ टैगोर की ‘काबूलीवाला’ कहानी पर आधारित उनकी कहानी ‘मिनी’ की कहानी है जो अब अफगानिस्‍तान में रहती हैं और दादी बन चुकी हैं। कहानी का पाठ सुनकर लगभग सारे श्रोताओं का गला भर आया।

सोलह वर्ष से कविता रचने वाली श्रीलंकाई  क‍वयित्री पेन्‍या  अपने श‍हर से पहलीबार  बाहर निकलकर इस सम्‍मेलन में  हिस्‍सा लेने के लिए वर्धा  पहुंची हैं। उन्‍होंने ‘जीन्‍स ऑफ ए डीप रूट’ और ‘नाइट टाइम वर्कर  कविता का पाठ  किया। उन्‍होंने कहा कि हाल ही में एक जनगणना अधिकारी मेरे घर आया और उसने मुझे मेरे इस्‍तेमाल किए जाने वाले गर्भ निरोधक के बारे में पूछा और कई ऐसे सवाल किये जो पति पत्‍नी के निजी संबंधों के दायरे में आते हैं। हिंसा का नया स्‍वरूप कई छद्म चेहरे में सामने आया है। महिलाएं घर में, बाहर कार्य स्‍थल पर और संस्‍थानों में इससे पीडित रहती हैं।

यौन हिंसा सभी तरह के दंगों व द्वंदों का हिस्‍सा बन चुका है, जैसा कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों में भी देखने को मिला। उन्‍होंने कहा कि आज के शिक्षण से मनुष्‍यों का समग्र विकास नहीं हो रहा है।मेरी मां अनपढ थी किंतु घरों में बहुत से किताबें थी। मेरे शुरूआती लेखन ने समाज में क्षोभ पैदा किया। मैं इसतरह के बंद समाज को पसंद नहीं करती हूं लेकिन जब मैं कविता लिखती हूं तो मुझे अच्‍छा लगता है। शिक्षा के अभाव में महिलाएं कई समस्‍याओं का सामना करती हैं। जब मुस्लिम औरतें हिजाब ओढती हें तब यह उनकी पसंद-नापसंदगी का नहीं बल्कि अस्मिता का सवाल होता है। हिजाब ओढना एक अस्मिता है और हमारे बीच यह भिन्‍नता का मसला नहीं होना चाहिए। पेन्‍या ने अपनी बातों को सारगर्भित करते हुए अपनी कविता की पंक्‍ि‍त पढी-‘हमने देखे एक चेहरे के कई-कई आयाम’। इस अवसर पर देश-विदेश से आए स्‍त्री अध्‍ययन अध्‍येता, लेखिका, गैर सरकारी संगठनों के तकरीबन 650 प्रतिभागी व विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा वर्धा के गणमान्‍य नागरिक उपस्थित थे। प्रेस विज्ञप्ति

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