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देश, दीवाली और उल्लू

पंडित सुरेश नीरवअपनी लगन में मगन नोटाभिलाषी नर-नारियों का नगर निगम स्तर का निर्गुट सम्मेलन नाना प्रकार के नयनाभिराम दृश्यों से नगर की सुंदरता को संवार रहा है। हर दुकानदार नई जगरमगर झालरें लगाकर पुरानी उतार रहा है। एक सिपाही दिहाड़ी बसूली के लिए सब्जीवाले को मार रहा है और पीछे से पाकिटमार उस सिपाही की पाकेट मार रहा है। सारे नगर में उत्सव का वातावरण बना हुआ है। अपने से हारे और औरत के मारे खोई हुई जवानी का इश्तहार बने हुए दफ्तरी मर्द फेस्टीवल लोन का आक्सीजन सिलेंडर पीठ से बांधे हुए मंहगाई के हिमालय पर चढ़ने को तैयार हैं। गठियाए पांव जो अभी कब्र में लटकने-भटकने को थो सुपरफास्ट स्पीड से ब्यूटीपार्लरों की ओर बढ़ रहे हैं। जर्जर बिल्डिंगों और खटारा स्त्रियों का युद्ध स्तर पर रंग-रोगन का कार्यक्रम दिन-रात चल रहा है।

पंडित सुरेश नीरवअपनी लगन में मगन नोटाभिलाषी नर-नारियों का नगर निगम स्तर का निर्गुट सम्मेलन नाना प्रकार के नयनाभिराम दृश्यों से नगर की सुंदरता को संवार रहा है। हर दुकानदार नई जगरमगर झालरें लगाकर पुरानी उतार रहा है। एक सिपाही दिहाड़ी बसूली के लिए सब्जीवाले को मार रहा है और पीछे से पाकिटमार उस सिपाही की पाकेट मार रहा है। सारे नगर में उत्सव का वातावरण बना हुआ है। अपने से हारे और औरत के मारे खोई हुई जवानी का इश्तहार बने हुए दफ्तरी मर्द फेस्टीवल लोन का आक्सीजन सिलेंडर पीठ से बांधे हुए मंहगाई के हिमालय पर चढ़ने को तैयार हैं। गठियाए पांव जो अभी कब्र में लटकने-भटकने को थो सुपरफास्ट स्पीड से ब्यूटीपार्लरों की ओर बढ़ रहे हैं। जर्जर बिल्डिंगों और खटारा स्त्रियों का युद्ध स्तर पर रंग-रोगन का कार्यक्रम दिन-रात चल रहा है।

फेस्टिवल डिस्काउंट सेल की वसंत ऋतु से फुटपाथ से लेकर मालप्लाजाओं का वातावरण महक-महक कर चहक रहा है। त्योहार की खुमारी में होटल-तो-होटल ढाबा तक बहक रहा है। खर्चों के स्टेडियमों में ललित लालसाओं की टीमें उतरकर खेल खेलने को तैयार हैं। इन टीमों के प्रायोजक इन टमों की आन-बान और शान के खातिर जान पर खेलने के लिए तैयार हैं। अब खोखले दिखावे का कामनवेल्थ गेम आम आदमी के लिए आम आदमी के खर्चे पर आम आदमी द्वारा प्रायोजित किया जाएगा। वैसे तो जो सरकारी कामनवेल्थ गेम हुआ था हुआ वह भी आम आदमी के ही पैसे से ही हुआ था मगर सरकारी आतिशबाजी का शोर इतने जोर-शोर से हुआ कि उसमें आम आदमी की तो आवाज़ ही दब गई। और इसे इतिहास में बाकायदा सरकारी सर्कस समझ लिया गया। प्रजातंत्र में कभी सरकारें आम आदमी की भावनाओं का प्रतिबिंब हुआ करती थीं।हमारे देश में अब सरकारें आम आदमी की हिकारती भावना का प्रतिबिंब हो गई हैं। चाहे स्कूल हो या अस्पताल जिसके भी साथ सरकारी शब्द जुड़ गया आम आदमी उसे ही तिरस्कार की नज़र से देखने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई अमेरिकन किसी तालिबान को देखता है। आज भ्रष्टाचार, लासफीताशाही, अराजकता सभी सरकार द्वारा आम जनता को विनम्रतापूर्वक दिए गए गिफ्ट हैंपर हैं।

टूटी सड़कों पर भागता, आँखों में आंकड़ों की धूल झोंकता हमारे देश की तरक्की का गवाह ट्रक हमें बताता है कि हम क्या थे और क्या हो गए हैं और कल क्या होनेवाले हैं। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की गोपनीयता से यदि मैं बंधा नहीं होता तो मैं भी वारदात शो की शैली में देश की तरक्की का खुलासा करके अपनी टीआरपी बढ़ा लेता मगर मैं देश का एक जिम्मेदार नागरिक हूं। खबरची चैनलिया नहीं। और वैसे भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रह जाना और फालती मुद्दों पर शोर मचाने की दुर्लभ कला मैंने मीडिया से ही सीखी है। हमारे पूज्य बापू गांधीजी भी किसी गंभीर समस्या को अंहिसात्मक ढ्ग से निर्जीव करने के लिए मौन उपवास रखकर ही उसका काम तमाम कर देते थे। मीडिया भी गंभीर समस्या पर मौन रख लेता है।  बड़ा सदभाव है मीडिया में और गांधीजी में। जिस देश को गांधी ने सुराज का राजपाट दिया उसी कृतज्ञ देश ने उन्हें राजघाट दिया। कैसा अनोखा सदभाव है। कहां मिलेगी इसकी मिसाल। अरे मैं भी कहां बहक गया। मैं लेखक हूं कोई नेता नहीं जो कुछ भी बकवास करदे और जनता उसमें भी सार ढ़ूंढ ले।

मुझे तो बात मुद्दे पर ही करनी चाहिए। बुद्धजीवी के लिए मुद्दे होते ही हैं बात करने के लिए। हां तो मेरा मुद्दा त्योहार का था। यह मेरा व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है। त्योहार सारे देश का मुद्दा है। मुद्दा था और मुद्दा रहेगा। क्योंकि हमारा देश कभी कृषि प्रधान देश हुआ करता था।भूमंडलीकरण के दौर में यह त्योहार प्रधान देश बन गया है। जन्म के त्योहार,मरण के त्योहार। हिंदुओं के त्योहार, मुसलमानों के त्योहार, ईसाइयों के त्योहार, सिखों के त्योहार। कुल मिलाकर देश एक और त्योहार अनेक। ये त्योहार ही है जो गरीबी के रेखा के नीचे रेंगते हुए इस देश को बचाए हुए है। वरना अपुन का इंडिया कब का ईथोपिया बन जाता। हमें त्योहारों का आभारी होना चाहिए। मैं तो आझ तक ये नहीं समझ पाया हूं कि हमारे देश में त्योहार हैं या त्योहारों में हमारा देश है। त्योहार और देश का ऐसा एकात्म संसार में और कहां। और हो भी क्यों नहीं। तेतीस हजार देवी-देवताओं ने अपनी दिव्य लीलाओं से इस देश की भूमि में त्योहारों की खेती की है। फसल से ज्यादा त्योहार हैं। हम महान हैं। किसी भी देश की कुल आबादी से दोगुमी-चौगुऩी तो हमारे देवी-देवताओं की आबादी है। और इतने तो केवल हिंदू धर्म के ही हैं। बाकी का तो नंबर ही नहीं आ पाता। और हमारे देवी-देवताओं में सभी शामिल हैं-सांप, मछली,  कौआ, गधा, उल्लू, शेर, सूअर, हाथी, चूहा, मोर, कछुआ गरुड़ सभी हमारे पूज्य हैं। सभी देवता हैं।

अब अगर आपकी रगों में देवताओं का पवित्र रक्त बह रहा है तो आपको मेरे द्वारा उल्लू,गधा या सूअर कहने पर कितनी सात्विक प्रसन्नता होगी यह मुझसे अधिक कौन जान सकता है। खग जाने खग ही की भाषा। हमारे भाईचारे और आपसदारी की तो बुनियाद ही इस सदभाव पर टिकी हुई है। तो अब हे आर्यपुत्र.. यदि पशु पक्षियों की इतनी भरपूर वेरायटी में भी आपको अपनी मनपसंद केई टाइटिल नहीं मिलती है तो आप यकीनन देवता वंश के नहीं हैं। आप पक्के असुर हैं। और यदि असुर हैं तो भी हमारे पास बकासुर, महिषासुर-जैसी पशु वैरायटी मौजूद हैं। इसमें से कोई चुन लीजिए। मगर आदमी की मजबूरी तो देखिए उसे आदमी होकर भी चुनना किसी जानवर को ही पड़ेगा। आदमी की कीमत इन जानवरों के सामने दो कौड़ी की भी नहीं है भले ही आदमी अपने को कुछ भी समझे।  अब दिवाली के मुबारक मौके पर कोई मुझसे किसी पशु-पक्षी के संबोधन को चुनने को कहे तो में फटाक से उल्लू को चुन लूंगा। इसके दो तकनीकी कारण हैं।

एक तो उल्लू से मेरा व्यक्तित्व काफी मिलता है दूसरा आजकल लक्ष्मी उल्लुओं पर ही मेहरबान हैं। उल्लू बनते ही अपना भी फ्यूचर ब्राइट हो जाएगा। और वैसे भी शास्त्र कहते हैं कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए उल्लू बनने में ही समझदारी है। मेरे जिन पट्टों को ये बात समझ में आ गी वे बड़ी इज्जत के साथ महत्वपूर्ण शाखों पर बैठकर गुलिस्तां को जी –जान से आबाद करने में जुटे हुए हैं। देश की वर्तमान प्रगति इनकी ही कड़ी मेहनत का नतीजा है। अब काठ के उल्लुओं को कौन समझाए जो उल्लू होकर भी उल्लू होने की पात्रता नहीं रखते। इनके लिए अलग से कोई वर्ग भी नहीं बनाया जा सकता। आदमी होतो तो अलग बात थी। खैर जो उल्लू मुख्य धारा में हैं उनकी कुशल प्रतिभा की बदौलत ही इनकी तो रोज दीवाली है और विद्वान का घर खाली है। जो उल्लू नहीं उसी के घर अंधेरा है और जो इनकी फेमली के हैं उनके तो रात में ही सवेरा है। वो सभी आगे हैं जो इनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हैं और जो इनके विरोधी हैं वो देहरी पर ही औंधे पड़े हैं। इसलिए इस दीपावली पर हम पूरी मेहनत से अपने भीतर छुपे हुए उल्लुत्व को जगाएं और जिंदगी में हासिल करें बड़ी-से-बड़ी सफलताएं..एक चक्रवर्ती उल्लू सम्राट की आपको ढेरों शुभ कामनाएं… अब सम्राट हुआ तो क्या हुआ। है तो उल्लू ही। वरना सम्राट शुभकामनाएं नहीं हमेशा फरमान देते हैं। मगर इंसान उल्लुओं की इस समझदारी पर भी कहां ध्यान देते हैं।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Rupesh

    November 3, 2010 at 12:27 am

    Wah guru, aapne to kalam todkar rakh di.

  2. jaatak

    November 3, 2010 at 8:18 pm

    अच्छा प्रयास है. लिखते रहिये. आप एक बढ़िया व्यंगकार बनने के गुण रखते हैं.

    शुभकामनाएं

  3. Ravi Jain & Anamika

    November 3, 2010 at 9:04 pm

    Sabhi Ullooooaon ko iss ullooo ke taraf se Diwali ki badhai..I am very very thankful to dis article which made me recognise a ullooo in me… Thanks a lot, ha ha ha ha ha….

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