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नंगी होती खबरों में भटकता न्‍यूज वैल्‍यू

अंकुरघड़ी रात के ग्यारह बजा रही थी। अनमने ढंग से देश और विदेश का हाल जानने के लिए टीवी खोला। रिमोट का बटन दबाते हुए अंगुलिया थक गई लेकिन देश और विदेश छोडि़ये जनाब अपने शहर तक की खबर नहीं मिल पाई। आप सोचेंगे ऐसा क्यूं? आइये रात 10 बजे टीवी चैनलों की बानगी पर एक नजर ड़ालें। ‘आपकी आवाज’  पंचलाइन वाला चैनल अधनंगी वीना मलिक और बड़बोली राखी सावंत के साथ क्रिकेट पर अपना ज्ञान बखार रहा था।

अंकुरघड़ी रात के ग्यारह बजा रही थी। अनमने ढंग से देश और विदेश का हाल जानने के लिए टीवी खोला। रिमोट का बटन दबाते हुए अंगुलिया थक गई लेकिन देश और विदेश छोडि़ये जनाब अपने शहर तक की खबर नहीं मिल पाई। आप सोचेंगे ऐसा क्यूं? आइये रात 10 बजे टीवी चैनलों की बानगी पर एक नजर ड़ालें। ‘आपकी आवाज’  पंचलाइन वाला चैनल अधनंगी वीना मलिक और बड़बोली राखी सावंत के साथ क्रिकेट पर अपना ज्ञान बखार रहा था।

‘सबसे तेज’ पंचलाइन के साथ चलने वाला चैनल किसी अवार्ड फंक्शन में चल रहा बदन दिखाऊ डांस प्रसारित कर रहा था। देश का एक महान चैनल जो दो महान पत्रकारों के नेतृत्व में ‘खबर हर कीमत पर’  वाली पंचलाइन के साथ चलता है खबर तो नहीं हां कॉमेड़ी हर कीमत पर जरूर दिखा रहा था। जब इन चैनलों का ये हाल हो तो अन्य चैनल क्या दिखा रहे होंगे इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं। टीआरपी की अंधी दौड़ में चैनल खबरों को छोड़कर बाकी सब कुछ दिखा रहे हैं। पर आखिर क्यूं? सिर्फ टीआरपी के लिए।

निश्चित ही मीडिया का विस्तार सभी ओर तेजी से हो रहा है। अखबारों की संख्या और उनकी प्रसार संख्या में बहुमुखी बढ़ोत्तरी हुई है। रेडियों स्टेशनों की संख्या और उनके प्रभाव-क्षेत्रों के फैलाव के साथ-साथ एफ़एम रेडियो एवं अन्य प्रसारण फल-फूल रहे हैं। स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय चैनलों की संख्या भी बहुत बढ़ी है। यह सूचना क्रांति और संचार क्रांति का युग है, इसलिए विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ इनका फैलाव भी स्वाभाविक है। क्योंकि जन-जन में नया जानने की उत्सुकता और और जागरूकता बढ़ी है।

यह सब अच्छी बात है, लेकिन चौंकाने वाली और सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि टीवी चैनलों में आपसी प्रतिस्पर्धा अब एक खतरनाक मोड़ ले रही है। अपने अस्तित्व के लिए और अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाने के लिए चैनल खबरें गढ़ने और खबरों के उत्पादन में ही लगे हैं। अब यह प्रतिस्पर्धा और जोश एवं दूसरों को पछाड़ाने की मनोवृत्ति घृणित रूप लेने लगी है। अब टीवी चैनल के कुछ संवाददाता दूर की कौड़ी मारने और अनोखी खबर जुटाने की उतावली में लोगों को आत्महत्या करने तक के लिए उकसाने लगे हैं। आत्महत्या के लिए उकसाकर कैमरा लेकर घटनास्थल पर पहुंचने और उस दृश्य को चैनल पर दिखाने की जल्दबाजी तो पत्रकारिता नहीं है। इससे तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जायेगी। पर क्या करें बात तो सनसनी और टीआरपी की है।

खबरों का उत्पादन अगर पत्रकार करें तो यह दौड़ कहां पहुंचेगी?  सनसनीखेज खबरों के उत्पादन की यह प्रवृत्ति आजकल कुछ अति उत्साहित और शीघ्र चमकने की महत्वाकांक्षा वाले पत्रकारों में पैदा हुई है। प्रतिस्पर्धा करने के जोश में वे परिणामों की चिंता नहीं करते। ऐसे गुमराह पत्रकार कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। पूरे परिवार को आत्महत्या के लिए उकसाना या रेहडीवालों को जहर खाने की सलाह देना अथवा भावुकता एवं निराशा के शिकार किसी व्यक्ति को बहुमंजिला इमारत से छलांग लगाने के लिए कहना और ऐसे हादसे दर्शाने के लिए कैमरा लेकर तैयार रहना स्वस्थ पत्रकारिता और इंसानियत के खिलाफ है।

इन दिनों कुछ खबरिया चैनल मिथक कथाओं को ऐसे पेश करते नजर आते हैं जैसे वे सच हों। वे उसे आस्था और विश्वास का मामला बनाकर पेश करते हैं। खबर को आस्था बना ड़ालना प्रस्तुति का वही सनसनीवादी तरीका है। सच को मिथक और मिथक को सच में मिक्स करने के आदी मीडिया को विजुअल की सुविधा है। दृश्य को वे संरचना न कहकर सच कहने के आदी हैं। यही जनता को बताया जाता है कि जो दिखता है वही सच है। सच के निर्माण की ऐसी सरल प्रविधियां पापुलर कल्चर की प्रचलित परिचित थियोरीज के सीमांत तक जाती हैं जिनमें सच बनते-बनते मिथक बन जाता है। मिथक को सच बनाने की एक कला अब बन चली है। अक्सर दृश्य दिखाते हुए कहा जाता है कि यह ऐसा है, वैसा है। हमने जाके देखा है। आपको दिखा रहे हैं। प्रस्तुति देने वाला उसमें अपनी कमेंटरी का छोंक लगाता चलता है कि अब हम आगे आपको दिखाने जा रहे हैं… पूरे आत्मविश्वास से एक मीडिया आर्कियोलॉजी गढ़ी जाती है, जिसका परिचित आर्कियोलॉजी अनुशासन से कुछ लेना-देना नहीं है। इस बार मिथक निर्माण का यह काम प्रिंट में कम हुआ है, इलैक्ट्रानिक मीडिया में ज्यादा हुआ है। प्रस्तुति ऐसी बना दी जा रही है कि जो कुछ पब्लिक देखे उसके होने को सच माने।

जबसे चैनल स्पर्धात्मक जगत में आए हैं तबसे मीडिया के खबर निर्माण का काम कवरेज में बदल गया है। चैनलों में, अखबारों में स्पर्धा में आगे रहने की होड़ और अपने मुहावरे को जोरदार बोली से बेचने की होड़ रहती है। ऐसे में मीडिया प्रायः ऐसी घटना ही ज्यादा चुनता है जिनमें एक्शन होता है। विजुअल मीडिया और अखबारों ने खबर देने की अपनी शैली को ज्यादा भड़कदार बनाया है। उनकी भाषा मजमे की भाषा बनी है ताकि वे ध्यान खींच सकें। हर वक्त दर्शकों को खींचने की कवायद ने खबरों की प्रस्तुति पर सबसे ज्यादा असर डाला है। प्रस्तुति असल बन गई है। खबर चार शब्दों की होती है, प्रस्तुति आधे घंटे की, दिनभर की भी हो सकती है।

लोकतांत्रिक समाज में मीडिया वास्तव में एक सकारात्मक मंच होता है जहां सबकी आवाजें सुनी जाती हैं। ऐसे में मीडिया का भी कर्तव्य बन जाता है वह माध्यम का काम मुस्तैदी से करे। खबरों को खबर ही रहने दे, उस मत-ग्रस्त या रायपूर्ण न बनाये। ध्यान रखना होगा कि समाचार उद्योग, उद्योग जरूर है लेकिन सिर्फ उद्योग ही नहीं है। खबरें प्रोडक्ट हो सकती हैं, पर वे सिर्फ प्रोडक्ट ही नहीं हैं और पाठक या दर्शक खबरों का सिर्फ ग्राहक भर नहीं है। कुहासे में भटकती न्यूज वैल्यू का मार्ग प्रशस्त करके और उसके साथ न्याय करके ही वह सब किया जा सकता है जो भारत जैसे विकासशील देश में मीडिया द्वारा सकारात्मक रूप से अपेक्षित है। तब भारत शायद साक्षरता की बाकायदा फलदायी यात्रा करने में कामयाब हो जाए और साक्षरता की सीढ़ी कूदकर छलांग लगाने की उसे जरूरत ही न पड़े। लेकिन पहले न्यूज वैल्यू के सामने खड़े गहरे सनसनीखेज खबरों के धुंधलके को चीरने की पहल तो हो।

लेखक अंकुर विजयवर्गीय हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, दिल्‍ली में वरिष्‍ठ कॉपी एडिटर हैं.

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0 Comments

  1. anil kumar

    April 16, 2011 at 3:16 pm

    aapne electronic media ke pol khol di h. badiya likha h

  2. anil kumar

    April 16, 2011 at 3:16 pm

    badiya likha h

  3. pratyoush mishra

    April 17, 2011 at 7:25 am

    ankur bhaiya………..
    bahut dino baad bhadas nikali aapne………….

  4. pratyoush mishra

    April 17, 2011 at 7:26 am

    ankur bhaiya …………. bahut dino me idher aaye aap………waise puri bhadas nikal li aapne………

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